Friday, June 26, 2009

उनका उनके पास

जैसा तय था और उस दिन कुछ युवाओं की मांग थी कि २० जून को त्रिवेणी कलाकेंद्र में पढ़ी गयी कविताओं को यहां पोस्ट करूं तो उसी की आपूर्ति में दो कविताएं यहां एक के बाद एक प्रस्तुत हैं। वैसे ये कविताएं 'संवेद' (संपादक : किशन कालजयी, राजीव रंजन गिरि, अंक सितंबर २००८) में पहले प्रकाशित हो चुकी हैं लेकिन मेरे नये कविता संग्रह 'एक भाषा हुआ करती है में संकलित नहीं हैं।


उनका उनके पास

पानी तो नदियों को लौटा ही देना चाहिए
और ठीक हिसाब लगा कर कुछ कुओं और तालाबों को भी

आखिर में अगर फिर भी कुछ तलछट बचा रह जाए
तो हमारे गांव के अंधे राम गरीब नापित उम्र सत्तर साल आठ महीने
के लोटे में उसे डाल दिया जाय
उसका लोटा भरने की फ़ुरसत अब किसी को नहीं है गांव में

बादल दे दिये जाने चाहिए आसमान को ज़रूरत भर
इसमें कोई खास मुश्किल नहीं होनी चाहिए
इस काम में अभी तक का कोई कानून आड़े नहीं आता
बस हममें ज़रा-सा संयम, कंजूसी और समझदारी की दरकार है

जिनके घर, इस बीच, जब से ये नया दौर आया है
छीन लिये गये हैं बैंकों, कंपनियों और सरकारों द्वारा
ज़ल्द से ज़ल्द मानसून आने के पहले
उन्हें वापस कर दिये जांय तो बहुत अच्छा होगा
उनके बच्चे भीगेंगे नहीं उनकी रोटियां गीली नहीं होंगी

जंगल दे देने चाहिए जंगलियों और आदिवासियों को वापस
दुनिया भर के पढे़-लिखे शहरातुओं की भी अब यही राय ठहरी है
बाद में उसमें बंदर, मोर, पेड़, चिड़ियां, शेर, तितलियां वगैरह अपने आप हो जाएंगे
वो कुदरत जो घास उगाती है वही सब कुछ बना डालती है एक दिन

मेरी छोटी समझ के अनुसार
कविता लौटा ही देना चाहिए कवि को वापस चुपचाप
हालांकि उसे खोजना होगा बहुत वह छुपा बैठा होगा कहीं
किसी दीवार के पीछे
डरा हुआ ज़माने से
इसमें कोई बड़ा जलसा करने की ज़रूरत नहीं है
अफ़सरों, हाकिमों, मुसाहिबों से कहना चाहिए
वे अपनी थैलियां समेटें, कार स्टार्ट करें और अपनी-अपनी ड्यूटी पर वापस जायें
देश की कानून-व्यवस्था की हालत इन दिनों ठीक नहीं है
वैसे भी आज के अंगरेज़ी राज में हिंदी को गुजरात या नांदीग्राम बना कर
इतना गदर मचाने की कौन-सी सलाहियत

धर्म को तो वापस पाने के लिए
तमाम दुनिया भर के गरीब बदहाल ईश्वर जाने कितने सालों से बैठे हैं
सीढ़ियों पर भिखमंगों की तरह उदास
उनके कटोरे में डाल दो उसे वापस
वे चले जाएंगे अपने-अपने परलोक में तुम्हें दुआएं देते

खेत फौरन दे देने चाहिए उन्हें जो हर रोज़ इन दिनों
फतिंगों की तरह जान दे रहे हैं नाहक
खाना उसे जो भूखा है
दवाइयां उस बीमार को जिसके पास अस्पताल की ओर ताकने तक की
न ताकत है न सिक्के

जहां तक मेरा सवाल है तो धन्यवाद
बस आप मेरे कपड़े-लत्ते ही लौटा दें
तो गनीमत ।


दयार

दिल्ली को एक उजड़ा हुआ दयार
आखिरी अभागे मुगल बादशाह ज़फ़र ने कहा था
जहां से उसका दिल उचाट था आखिरी दिनों

किसका दिल लगा करता है दिल्ली में
कौन आबाद हुआ करता है दिल्ली में
ज़फ़र के डेढ़ सौ साल बाद
यह एक ज़रूरी आर्थिक और राजनीतिक सवाल है
इसीके जवाब में कहीं दिखेगी हिंदुस्तानियों के भाग्य पर लगे
ताले की गुमशुदा चाभी

गर्मियों में चांदी की थाल में दोपहर
यमुना के किनारे उगाये गये खरबूज़ों और काबुल से लाये गये
सरदा की ख़ुशबू से भरी मीठी फ़ांकें जिसके लिए आती थीं हर रोज़
उसी में भेजा गया था उसके दोनों बेटों के कटे हुए सर

जलावतनी में मरने के पहले तक
रंगून में यही अंतिम स्मृति रही होगी
मेरे खयाल से बहादुरशाह ज़फ़र के भीतर दिल्ली की

आज तलक बदस्तूर फ़ौज़ी छावनी है लालकिला
और एक हिस्सा अजायबघर
जिसमें टिकट ख़रीद कर पर्यटक देख सकते हैं लाइट एंड साउंड कार्यक्रम
जहां से फहराया जाता है हर साल एक नियत तारीख़ पर झंडा

आलम में इंतख़ाब यह शहर अब एक लदा-पदा हहराता
रंगीन दयार है दौलतमंद
शाहजहानाबाद में भी चलने लगी है बेआवाज़ मेट्रो
लुटियन के टीले पर रहते हैं ज़फ़र के डेढ़ सौ साल बाद के हुक्मरान
सियासत और तारीख़ यहां फ़कत लाइट एंड साउंड कार्यक्रम है
रिमोट की एक हरकत पर सामने परदे पर हाज़िर

सब्र करो दिल्ली वासियो सब्र

इस दयार के किसी एक शाख पर
जून पचहत्तर में किसी बदहवास सुदूर पूरबी बयार के साथ आकर अटका
एक ज़र्द सूखता पत्ता

मैं अब गिरा
कि तब ।

Wednesday, June 24, 2009

एक-बचन फैसला


चार रोज़ पीछे आपके इस लेखक को कृष्ण बलदेव बैद सम्मान मिला। प्रख्यात कवि-आलोचक और संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ज्यूरी के अकेले निर्णायक थे। उन्होंने कहा-' इस सम्मान की निर्णय प्रकृया 'एकवचन' है, जब कि 'पूर्वग्रह' के अलावा जिस पत्रिका का संस्थापन-संपादन मैंने किया था, उसका नाम 'बहुवचन' था। यह निर्णय पूरे तौर पर मेरा था इसीलिए यह 'एकबचन' फ़ैसला है।'

कृष्ण बलदेव बैद जी की अधिकांश रचनाएं मैंने पढ़ी हैं। 'उसका बचपन' और 'गुज़रा हुआ ज़माना' उनके ऐसे उपन्यास हैं, जो एक ऐसे उपन्यासकार के रूप में उनकी पहचान बनाते हैं, जो कथा और आख्यान के ढांचे और बनावट में अपनी मौलिकता के साथ प्रयोगों और पुनर्रचनाओं का जोखिम मोल लेता है। मैं उनसे कभी व्यक्तिगत रूप से नहीं मिला था। एक आध बार दूर से देखना-सुनना हुआ था। मुझे उनसे मिलकर बहुत खुशी हुई। चंपा बैद जी से भी मुलाकात हुई। 'उसका बचपन' जब १९५५ में लिखा गया था, तब मेरी उम्र तीन साल की रही होगी। तब तक क्या मैंने कभी ऐसा स्वप्न देखा होगा कि एक दिन मैं भी लेखक बनूंगा? वह भी एक ऐसी भाषा में, जिसमें लेखक हो कर जीना आसान नहीं हैं। लेखक होते ही जिस भाषा के भ्रष्ट सत्ताकेंद्र आपसे आपका अतीत और भविष्य दोनों छीन लेते हैं।

बैद जी ने कुछ अविस्मरणीय कहानियां भी लिखी हैं। 'उड़ान' उनमें से एक है।

मैं इस पुरस्कार से जुड़ा एक रोचक किस्सा आपको बताता हूं।

पिछले साल की बात है। जून-जुलाई महीने की ऐसी ही तारीखों की। उस बार मानसून लेट नहीं हुआ था। बारिश खूब हो रही थी और नदियां बाढ़ में उतरा रहीं थीं। उन दिनों मैं अपने गांव गया हुआ था। मध्य प्रदेश और छ्त्तीसगढ़ की सीमा पर, सोन नदी के किनारे बसा हुआ, छोटा-सा गांव -सीतापुर। दिल्ली छोड़ने का पूरा मन बना चुका था। गांव में एक जर्जर लेकिन विशाल पैतृक घर है। इतना बड़ा कि १९८६ में 'उपरांत' फ़िल्म की शूटिंग टीम वहीं रुकी हुई थी और फ़िल्म वहीं रहते हुए शूट की गयी थी। फ़िल्म के निर्देशक का नाम मोहन हरि था। मूल रूप से वह कैमरामैन था। एफ़.टी.टी. आइ. पुणे से सिनेमेटोग्राफ़ी में डिप्लोमा किया था। 'हीरालाल का भूत' कहानी पसंद आयी तो फ़िल्म बनाने का फ़ैसला ले लिया। अभी कुछ महीने पहले पता चला कि दिल्ली के चिराग दिल्ली-नेहरू प्लेस के इलाके में सड़क पार करते हुए मोहन हरि ब्लू लाइन बस के पहियों के नीचे आ गये। बहुत दुख हुआ। मैंने उन्हें १९८६ के बाद से कभी नहीं देखा था। 'उपरांत' का क्या हुआ, यह भी मुझे नहीं मालूम।
खैर, तो अपने गांव में अपने उस घर के एक हिस्से को रहने के लायक बनाने में मैं जुटा हुआ था। मि्स्त्री-मज़दूर काम कर रहे थे। सभी न सिर्फ़ मेरे परिचित थे बल्कि उनकी कई पीढ़ियों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। गांवों में अभी भी इतनी स्मृतियां किसी भी परिचय के पीछे उपस्थित रहती हैं।
शायद २ या ३ जुलाई की तारीख रही होगी जब मिस्त्री राम करन मेरे पास शाम को आया। 'कल से काम रुक जायेगा।' उसने चिंतित स्वर में कहा।
'क्यों ?'
'सीमेंट में मिलाने के लिए रेत खत्म हो चुकी है। मैंने आस-पास हर जगह पता कर लिया है। कहीं नहीं है। नदी तो बाढ़ में उतरा रही है। कई दिन लगेंगे उसके तट की बालू को ऊपर निकलने में।'
मैं परेशान था। देर रात तक, जहां भी जिसने बताया, गया। लेकिन रेत कहीं नहीं थी। विकास के नाम पर जितना कांस्ट्रक्शन और खोदा-खादी का काम चल रहा है चारों ओर, उसमें रेत अब एक नायाब कीमती जिंस हो चुकी है।
लग रहा था कि घर अधूरा ही रह जाएगा और जितनी बारिश हो रही है, कहीं उसमें यह अधबना हिस्सा ढह न जाय।
संयोग से रात में मेरे एक चचेरे भतीजे मंटू ने बताया कि उसके पास कुछ रेत है। उसका गांव १२ किलोमीटर दूर था। सुबह मैंने १०-१२ सीमेंट की खाली बोरियां उठाईं और अपनी 'बैगन-आर' के ऊपर के कैरियर में रख कर चल पड़ा। साथ में मेरी पत्नी और बहन भी साथ थीं।
उस समय सुबह के छ्ह बजे थे। खाली बोरियों में रेत भर कर ९ बजे के पहले मुझे वापस अपने गांव पहुंच जाना था वर्ना मज़दूर और मिस्त्री लौट जाते। फिर एक डर यह भी था कि अगर उन्होंने मज़बूरी में कोई दूसरा काम पकड़ लिया तो फिर मुझे बहुत लंबा इंतज़ार करना पड़ता। यहां रेत तो थी और इतनी थी कि अभी १० दिन तक मेरा काम चल सकता था। लेकिन इतनी सुबह बोरियों में रेत भरने के लिए यहां मज़दूर कहां मिलते। गांव के लोग गाय-बैल लेकर खेतों की ओर या फिर दिशा-फ़राकत के लिए बाहर जा चुके थे। जिन्हें शहर की ओर मज़दूरी पर निकलना था, वे अपने जाने की तैयारी में थे।
कोई चारा दूसरा नहीं था। मैंने खुद ही फ़ावड़ा उठाया और बोरियों में रेत भरने लगा। पत्नी और मंटू मदद के लिए आ गए थे।
और तभी मेरा मोबाइल बजना शुरू हुआ। यह एक चमत्कार ही था क्योंकि मेरे गांव में एयरटेल नेट्वर्क काम नहीं करता। बहुत दिनों से मोबाइल गूंगा रहता था। ताज़्ज़ुब यह भी था कि उसमें थोडी-बहुत बैटरी बाकी थी। दो दिन पहले चार्ज किया था, शायद वही काम कर रहा हो।
मैंने जैसे-तैसे फ़ावडे़ को घुटनों में टिका कर मोबाइल आन किया।
दूसरी ओर अशोक जी की आवाज़ थी -'कैसे हैं आप? हमने इस साल कृष्ण बलदेव बैद सम्मान आपको देने का निर्णय लिया है। २७ जुलाई को कार्यक्रम रखा जा सकता है। बैद जी का जन्म दिन है। आप वैशाली में ही तो हैं ?'
मैं असमंजस में था। यह मेरे लिए बिल्कुल अप्रत्याशित था।
मैंने उनका आभार प्रकट किया। लेकिन फिर उन्हें अपनी स्थिति बतायी। दिल्ली से मेरा गांव एक हज़ार सत्तावन किलोमीटर दूर है। भोपाल से भी लगभग इतनी ही दूरी है।
'कोई बात नहीं। आप अपना काम पूरा करिए। आपके आने के बाद ही यह कार्यक्रम होगा।' अशोक जी ने कहा।

मैं इस बात को छुपाना नहीं चाहता कि मैं कृतग्य था और खुश। मैं उनके और मनीष पुष्कले दोनों के प्रति अपना गहरा आभार व्यक्त करता हूं। मनीष एक चित्रकार हैं। पुरस्कार के लिए इतनी राशि जुटाना उनके लिए बहुत आसान नहीं होगा, यह मैं अच्छी तरह से जानता हूं। यह लेखकों, कलाकारों का अपना परस्पर समर्थन और सहकार है।

इस घटना के एक साल बाद, चार रोज़ पीछे, इसी २० जून को यह आयोजन हुआ। इस जुलाई में मैं गोरखपुर, कुशीनगर (बुद्ध के निर्वाण का स्थल) से लौट कर फिर गांव जाऊंगा। मेरे घर की मरम्मत का काम कुछ और आगे बढे़गा।
और अपना विलंबित उपन्यास 'चीना बाबा' लिखने में मुझे मदद मिलेगी।
त्रिवेणी कलाकेंद्र में आयोजित इस कार्यक्रम में मैंने अपनी तीन कविताओं का पाठ किया था। मेरे पास एस.एम.एस. आये हैं कि मैं उन्हें ब्लाग पर दूं।
कोशिश रहेगी कि कल पोस्ट करूं।

Monday, June 15, 2009

हमने 'भारत के गोर्की' का घर देखा .....









मैंने मुंशी प्रेमचंद को नहीं देखा। जब मेरा जन्म हुआ, उसके सोलह साल पहले उनकी मृत्यु हो चुकी थी। जब मैं कुछ लिखने-पढ़ने और समझने लायक हुआ, तब से मैंने उनकी कहानियां पढ़नी शुरू कीं| उनकी कहानियां और उपन्यास पढ़ते हुए कई-कई बार उनसे मिलने का मन होता था। अब भी होता है। लेकिन
ऐसे कैसे हो सकता है कि जिसकी मृत्यु मेरे जन्म से भी सोलह साल पहले हो चुकी हो, उससे मिला जा सके?

लेकिन मैंने उस लेखक को ज़रूर कई बार देखा और कई बार उससे मिल भी चुका था, जिसे मुंशी प्रेमचंद ने ‘भारत का गोर्की’ कहा था। इस लेखक से प्रेमचंद की इतनी गहरी आत्मीयता भी थी कि उन्होंने अपनी मृत्यु के समय, अपने जीवन के अंतिम पलों में, उसका हाथ अपने हाथों में थाम रखा था।

....और जब उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली तो उनका सिर इसी लेखक की गोदी में था।

आप समझ गये होंगे कि मैं ‘त्यागपत्र’, ‘परख’, ‘दशार्क’, ‘जयवर्धन’, ‘सुनीता’,‘सुखदा’ जैसे उपन्यासों और ‘नीलम देश की राजकन्या’, ‘तिरबेनी’, ‘एक रात’, ‘अपना-अपना भाग्य’, जैसी कहानियों के रचनाकार जैनेंद्र की बात कर रहा हूं।
१९८२ में मैं टाइम्स आफ़ इंडिया की साप्ताहिक पत्रिका ‘दिनमान’ के संपाद्कीय विभाग में काम करने आया था। १०, दरियागंज उसका पता हुआ करता था। इस जगह से, एक ही मंजिल से ‘सारिका’, ‘वामा’, ‘पराग’ ‘खेल टाइम्स’ और अंग्रेजी की ‘कैरियर कंपटीशन टाइम्स’ जैसी पत्रिकाएं छपती थीं।
जैनेंद्र जी का घर वहां से तीन मिनट की पैदल दूरी पर था। उनके घर मैं आठ-दस बार गया होऊंगा। कई बार वे खुद भी चल कर ‘सारिका’ या ‘दिनमान’ के संपादकीय विभाग में आ जाते थे। उनके बेटे प्रदीप कुमार ने अपना ‘पूर्वोदय प्रकाशन’ वहीं अपने घर के पास खोल रखा था और उनके लिए जब मैंने कुछ काम किया, तो आना-जाना लगा ही रहता था।
लेकिन पहली बार मैंने उन्हें तब देखा था, जब वे सागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में व्याख्यान देने आये थे। उस समय मैं एम.ए. फाइनल का छात्र था। शायद १९७३ की बात होगी।
उन्हें बनियान या हलके खादी के कुर्ते में, सफ़ेद हलकी सूती धोती में कई बार देखा था। गर्मियों मे छत पर पानी छिड़क कर खटिया पर लेटे, कुछ सोचते या कुछ पढ़ते भी एकाध बार देखा था। घर के बैठक वाले कमरे में तो भेंट होती ही रहती थी। प्रोफ़ेसर हरियन्ना की विलक्षण सौंदर्यशास्त्र की पुस्तक ‘The Art Experience’ का जब ‘कला अनुभव’ शीर्षक से अनुवाद किया था, तो उसका अनुवाद उन्हें बहुत पसंद आया था। उनकी ही पहल पर बाद में रोम्यां रोलां की डायरी ‘Inde’ के आंशिक अनुवाद और संपादन का काम किया था। ‘The Art Experience’ के अनुवाद का काम कठिन लेकिन बहुत विचारोत्तेजक काम था। पाश्चात्य और प्राच्य सौंदर्य चिंतन (Western and Oriental aesthetics) के अंतर और भारतीय सौंदर्यबोध को समझने के लिए यह एक विलक्षण पुस्तक है। प्राच्य संस्कृति और सौंदर्यबोध को जानने केलिए एडवर्ड सईद मदद नहीं करते। प्रो. हरियन्ना, आनंद कुमारस्वामी और ए.के. रामानुजम को पढ़्ना ज़रूरी है।
अब जैनेंद्र जी को गुज़रे कई साल हो चुके हैं। चार साल पहले, २००५ में उनकी जन्मशती भी मनाई गयी थी, जिसमें प्रचलन के मुताबिक हिंदी के अध्यापकों, तमाम हिंदी संस्थानों के पदाधिकारियों और ‘लघु’ पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों आदि ने जम कर हवाई यात्राएं कीं। पांचतारा सुविधाओं का लाभ उठाया। भाषणबाजियां, लफ़्फ़ाजियां हुईं। जेबें गर्म हुईं। बैंक अकाउंट बढा। बहरहाल।
जो वाकया मैं आपको बताने जा रहा हूं, वह अभी दो महीने पीछे का है। जर्मनी के बोन विश्वविद्यालय में अध्यापन कर रहे प्रो.हेंज़ वेर्नर वेस्लर दिल्ली आए हुए थे। वे दलित साहित्य के साथ-साथ भारतीय समाज में जातीय अंतविरोधों और टकराहटों पर महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। हिंदी के कुछ समकालीन लेखकों की रचनाओं के अनुवाद भी उन्होंने जर्मन भाषा में किये है। वे प्रख्यात दलित लेखक सूरजपाल चौहान के मित्र भी हैं। (आपको यह जान कर खुशी होगी कि अक्टूबर, २००९ में फ़्रैंकफ़ुर्त विश्व पुस्तक मेला में प्रकाशित होने वाली ‘पीली छतरी वाली लड़की’ के एक अनुवादक वे भी हैं और उन्हें यह बहुत पसंद भी है। मैं ज़ल्द ही इस लंबी कहानी के अनुवाद और इसके अनुवादकों के बारे में आप सबको कुछ रोचक जानकारियां दूंगा।)
तो, उस दिन रविवार का दिन था। हमने योजना बनाई कि सुबह-सुबह दरियागंज की पटरियों मे लगने वाले किताब बाज़ार के चक्कर लगाएंगे और वहां पर अगर कोई पुरानी किताब हाथ लगी तो जश्न मनाएंगे। इसके बाद हम हिंदी कथा साहित्य के महान कथाकार जैनेंद्र जी का घर देखेंगे।
लेकिन जब हम लोग दरियागंज के किताबों के पटरी-हाट से, दो घंटे घूमने के बाद उस गली में पहुंचे, जहां ‘टाइम्स आफ़ इंडिया’ की पुरानी इमारत थी, जहां से ‘दिनमान’, ‘सारिका’,’माधुरी’, ‘वामा’, ‘पराग’ आदि पत्रिकाएं निकलती थीं और जहां मैंने लगभग नौ साल काम किया था, तो वहां का दृश्य ही दूसरा था। वह गली पह्चानी नहीं जा रही थी। पुरानी इमारतों की जगह नई बिल्डिंगें खड़ी थीं। तोड़-फोड़, ध्वंस-निर्माण का काम चल रहा था।
मैं वहां हेंज़ वेर्नर वेस्लर के साथ बड़े आत्मविश्वास के साथ गया था, कि जाते ही सीधे जैनेंद्र जी के घर जाएंगे। वहां के फोटोग्राफ़्स लेंगे और कुछ पल उनकी स्मृतियों के बीच गुजारेंगे। जब मैं बोन गया था तो मैं वेस्लर के साथ महान संगीतग्य बीथोवान का घर भी देखने गया था। वेस्लर भी जैनेंद्र की रचनाओं को पसंद करते हैं।
लेकिन उस गली का तो हुलिया ही पहचान में नहीं आ रहा था।
‘जैनेंद्रजी का घर कहां पर है?’ हमने कई लोगों से पूछा। उस गली के दूकानदारों से लेकर अपने-अपने घरों के सामने खड़े-बैठे लोगों, बच्चों-महिलाओं, सभी से। ‘कौन से जैनेंद्र जी?’ हर कोई हमसे ही पूछता।
‘त्यागपत्र’, ‘सुनीता’, ‘दशार्क’ के लेखक। हिंदी के महान साहित्यकार।‘ हम उन्हें बताते।
‘हमें नहीं पता।‘ उनका संक्षिप्त-सा जवाब होता।
एक जगह कुछ कालेज की छात्राओं जैसी लड़कियां खड़ी थीं। उनसे पूछा। उन्होंने एक दूसरे से आपस में खुसर-पुसर की फिर कहा : ‘क्या वो सीरियल भी लिखते हैं?’ उनमें से एक धीमी आवाज़ में अपनी सहेली से कह रही थी :’मैंने नाम तो सुना है। त्यागपत्र कोई सीरियल था शायद ।‘
जब १०, दरियागंज के टाइम्स आफ़ इंडिया बिल्डिंग से हिंदी की पत्रिकाएं निकला करती थीं, तब इस गली के सारे लोग, चाय-खोमचे वालों से लेकर पनवाड़ी और दूकानदार तक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, अग्येय, श्रीकांत वर्मा के नाम जानते थे। पता नहीं वह जनसंख्या अब कहां चली गयी?
हम जैनेंद्र जी के घर की खोज में लगातार भटक रहे थे। जिस जगह पर उनके बेटे प्रदीप जी ने ‘पूर्वोदय प्रकाशन’ खोल रखा था, वहां से सारे बोर्ड-बैनर गायब थे और वहां किसी और के नाम की प्लेट लगी थी। एक लंबी-सी कार पार्क थी। बहुत देर जब कालबेल दबाने के बाद भी कोई मानव नमूदार नहीं हुआ तो अगल-बगल के घरों से पूछ्ताछ की। कोई कुछ नहीं जानता था। एक ने अंदाज़ा लगाते हुए पूछा :’क्या जैनेंद्र साहब जैन थे? आप उस दूसरी गली में चले जाइये, वहां एक जैन एड्वोकेट रहते हैं। वे ज़रूर बता देंगे।‘
अब इसके अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था कि हम भारत के गोर्की को ‘जैन’ की पहचान से खोजें।
लेकिन जैन एड्वोकेट ने भी हाथ खड़े कर दिए। उनकी पत्नीनुमा महिला ने ज़रूर कुछ देर तक माथे पर सिलवटें बनाते हुए शून्य में कुछ टटोलने-खंगालने की कोशिश की फिर उन्होंने भी सांस छोड़ दी और कहा ‘सारी, हम आपकी मदद नहीं कर सकते।‘
खैर, बहुत भटकने के बाद हमने संयोग से एक ऐसे घर का कालबेल दबाया, जिसमें से एक बेहद मिलनसार और खुशमिज़ाज़ सज्जन से हमारी मुलाकात हुई। उन्होंने वेस्लर को देखा। फिर मुझे। और फिर दोनों को फिरंग समझ कर अंग्रेज़ी बोलने लगे। जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं ठेठ हिंदुस्तानी हूं और मेरे साथ जो खूबसूरत-सा विदेशी खड़ा है, वह फर्राटे से शुद्ध हिंदी बोलता है तो वे चौंक गये। उनका नाम नरेश जैन था। उस पूरे इलाके में वे अकेले ऐसे मनुष्य थे, जिसके पास १०-१५ किताबें थीं, जिसे उन्होंने अपनी ‘लाइब्रेरी’ बताते हुए हमें गर्व से दिखाया।
लेकिन वहां भी प्रेमचंद या जैनेंद्र की कोई किताब नहीं थी। हां उनके ड्राइंगरूम में एक क्राइस्ट की आदमकद पत्थर की मूर्ति लगी हुई थी। वेस्लर ने बताया कि जर्मनी या यूरोप में भी कोई इस तरह ड्राइंगरूम में सजावट के लिए क्राइस्ट की मूर्ति नहीं लगाता। हमें नरेश जैन एक अच्छे इंसान लगे।
कुछ देर बाद वे अपने घर के पिछवाड़े की एक बेहद संकरी गली में ले गए और चारों तरफ से बड़ी इमारतों और नयी बनती बिल्डिंगों के बीच पिसते और किसी कदर बचे रहने की ज़िद में जूझते एक जर्जर, टूटते-फूटते मकान की ओर इशारा करते हुए कहा :’यही वो घर है, जिसमें जैनेंद्र रहा करते थे।‘
ऊपर की ओर जाती संकरी सीढ़ियां अंधेरे में डूबी थीं। उस पुराने घर की दीवालों से प्लास्टर उखड़ रहे थे।
सीढ़ियों के नीचे दीवाल पर एक बहुत पुराना लकड़ी का नेमप्लेट, जिसके अक्षर मिट रहे थे, अटका हुआ था। जैनेंद्र कुमार, प्रदीप कुमार, पूर्वोदय प्रकाशन और मकान का नम्बर उस पर लिखा था।
‘उनके बेटे प्रदीप को कुछ साल पहले स्ट्रोक लगा था, तबसे वे गुड़्गांव की तरफ़ चले गये। शायद अपने बेटे के पास। सज्जन आदमी थे। अपने प्रकाशन की किताबें, जिनमें सारा जैनेंद्र साहित्य भी था, उन्होंने इसी घर में रखवा दिया है। वो उधर देखिए, ‘पूर्वोदय प्रकाशन’ की तख्ती लगी हुई है।'
हमने सब कुछ देखा। मुझे अपनी स्मृति और आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था। क्या यही वह घर है, जहां मैं कई बार आ चुका था? क्या इसी घर में स्वामी मल्लै मंदिर का पुजारी और रसोइया नरसिम्हन, जो फौज़ की नौकरी छोड़कर भाग आया था, मेरे कहने पर काम करने लगा था? अब नरसिम्हन कहां होगा?
नरेश जैन ने ऊपर की ओर इशारा किया। वहां वर्षों से बंद, छोटी-सी, धूल-गर्द और कालिख मे बुझी हुई एक खिड़की थी।
‘यहां नीचे एक खाली जगह हुआ करती थी। एक छोटा सा मैदान जैसा। जब मैं छोटा था तो मोहल्ले के दूसरे बच्चों के साथ यहां कभी बैडमिंटन और कभी क्रिकेट खेलता था। जैनेंद्र इसी खिड़की से हमें देखते रहते थे।‘
नरेश जैन ने कहा : ‘ही वाज़ अ वेरी सिंपल एंड पुअर मैन।‘

आप भी उसी सीधे-सादे, गरीब आदमी का घर देखिए, जो हिंदी का, प्रेमचंद के अलावा दूसरा महान कथाकार था, जिसको महात्मा गांधी भी पढ़ते थे और दोनों के बीच पत्र-व्यवहार होता था, जिसने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया था और देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था, जिसने हिंदी गद्य को आधुनिक रूप दिया था, जिसे प्रेमचंद ने ‘हिंदी का गोर्की’ कहा था और जिसके हाथों को अपने हाथों मे थामे हुए, उसकी गोद में अंतिम सांस ली थी।

......और जब आप ये चित्र देख रहे हों तो हिंदी के उन मठाधीशों के चेहरे भी याद करिये जो निराला को प्रसाद, जैनेंद्र को प्रेमचंद, भवानीप्रसाद मिश्र को नागर्जुन, अग्येय को मुक्तिबोध, निर्मल वर्मा को भीष्म साहनी के खिलाफ़ खड़ा करते हैं और अपने लिए कोठियां-बंगले, बैंक अकाउंट और विद्वान आलोचक की छवियां बनाते हैं।

Monday, June 8, 2009

एक स्याह और शोकाकुल तारीख : हबीब तनवीर का जाना


१९८२ : जब हबीब साहब बेरसराय में पड़ोसी थे.


२००८ : भोपाल में जब उन्होंने 'वनमाली सम्मान' दिया
हम में से हज़ारों लोग आज उदास होंगे. हबीब साहब का जाना एक जलती हुई रौशन कंदील का अचानक बुझ जाना है. उन्हें अभी कई बरस और रहना चाहिए था. हमारे बीच.
उनका जाना सिर्फ़ भारतीय रंगमंच की एक महान समर्पित प्रतिभा और धर्मनिरपेक्षता और प्रगतिशील मूल्यों के प्रति एक समर्पित और प्रतिबद्ध योद्धा-कलाकार का जाना ही नहीं है, मेरे जैसे तमाम लोगों के लिए यह एक निजी क्षति भी है. अपने समय में उनके होने का भरोसा अब नहीं रहा.
अलविदा हबीब साहब ...! अलविदा ! आप हमारे दिलों में हमेशा-हमेशा रहेंगे....!

Wednesday, June 3, 2009

कविता की किताब अब मेज़ पर


आखिर परसों 'एक भाषा हुआ करती है' की पांच लेखकीय प्रतियां (Author's complimentary copies) कूरियर सर्विस से मिल गयीं। 'सुनो कारीगर', अबूतर कबूतर' और 'रात में हारमोनियम' के बाद यह मेरा चौथा कविता संग्रह है। पहला कविता संग्रह 'सुनो कारीगर' पहली बार १९८० में प्रकाशित हुआ था, उनत्तीस साल पहले। अब तीसवें साल 'एक भाषा हुआ करती है' को अपनी मेज़ पर देख कर और हाथों से उसे छूकर बेइंतहा खुशी ..या....अनहद आनंद के क्षण मिल रहे हैं। ठीक यहीं एक विनम्र सच कह रहा हूं कि यह सब आपकी बदौलत है यानी मेरे समय के वे लोग, वे अपने, जिन्होंने अपनी मुट्ठी से मेरी उंगलियां अब तक नहीं छोड़ीं और १९८० से लेकर आज तक मेरे सभी कविता संग्रह 'आउट आफ़ प्रिंट' कभी नहीं हो सके। उनके संस्करण निरंतर होते रहे। अपनी किताब को छपा हुआ देख कर शायद लेखक को वही खुशी मिलती है, जो किसी धूप-आंच में उगे किसी पौधे को अपनी किसी डाल पर फूल के खिलने को देख कर होती है। या किसी बियाबां बंजर में खड़े किसी अकेले पेड़ को अपने फल देख कर..या...किसी स्त्री को नौ-दस महीने के तनाव, यंत्रणा, आशंका और तपस्या के बाद किसी लेबर रूम या कमरे में अपने बगल में, अपनी ही कोख से बाहर एक नन्हें-से बच्चे को देख कर होती होगी।
अभी तक मेरे कभी किसी कविता संग्रह का 'विमोचन' समारोह नहीं हुआ। प्रायोजित आलोचनाएं नहीं प्रबंधित (organize) की गयीं। ऐसा अपनी फ़ितरत और वश में भी नहीं था। इन संग्रहों की कविताएं यहां-वहां चुपचाप छपती रहीं और किताबें खामोशी के साथ आती रहीं। भाषा, जीवन, समाज और कविता से ताकतवरों और उनके गिरोहों द्वारा लगातार बेदखल किये जाने के बावज़ूद ये किताबें हर साल अनाम पाठकों द्वारा खरीदी जाती रहीं।
यह संग्रह स्व. नेमिचंद जैन और स्व. कोमल कोठारी की स्मृति को समर्पित है। दोनों का स्नेह, साथ और सहयोग आपके इस लेखक को समय समय पर मिलता रहता था। अब उन दोनों की अनुपस्थिति ही उपस्थित है। (इस ब्लाग में इन दोनों के साथ अपने अनुभवों -संस्मरणों का साझा ज़ल्द करूंगा। ) इस संग्रह का ब्लर्ब विख्यात कवि-आलोचक और संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने , अपने व्यस्ततम समय के बीच लिखने की तकलीफ़ की है। उन्होंने ब्लर्ब में जिन कविताओं का हवाला दिया है, उनमें से एक-दो कविताएं नीचे लगा रहा हूं।

हां, इस संग्रह का आवरण एक बिल्कुल युवा लेकिन अत्यंत प्रतिभाशाली फोटोग्राफर मार्कुस फ़ोर्नेल के एक फोटोग्राफ से बना है। 'मोहन दास' का आवरण भी मार्कुस का था, बस मैंने उस रियलिस्टिक कैमरा इमेज को फोटोशाप में ले जाकर विरूपित करते हुए एक दूसरा प्रभाव दे दिया था और दिल्ली की चांदनी चौक का एक बैसाखी लेकर चलने वाला वह अपाहिज बूढा, महात्मा गांधी के धुंधले वाटर कलर आभासी छवि में तब्दील हो गया था। 'चाय के कप' का यह फोटो तीन साल पहले एक बिल्कुल सुबह लालकिले के ठीक सामने, भगीरथ पैलेस की मुख्य सड़क की पटरी पर एक चाय के ठेले पर रखे उसी कप का है, जिसे फोटो खींचे जाने के तुरत बाद हमने पी लिया था। चीनी मिट्टी का कप, उसके भीतर रखी शीशे की गिलास और उसके भीतर 'कड़क' ...खूब देर तक औंटाई गई वह देशी चाय, कहते हैं जिसकी लोकप्रियता को मार्केट सर्वेक्षणों द्वारा जान कर कोकाकोला ने इसी 'सड़क छाप' चाय के देसी स्वाद वाला अपना ब्रांड 'जार्जिया टी' उतारा था। गिलास में रखी खौलती हुई कड़क चाय से उंगलियां न जलें, इसलिए गिलास को कप के भीतर डाल दिया गया। अब आराम से बिना डर चुस्कियां लीजिये और इसका लुत्फ़ उठाइये ......और लालकिला देखिए।
मुझे लगता है हमारी भाषा हिंदी महानगरों और राजधानियों की पटरियों-नुक्कड़ों पर ऐसे ही ठेलों में बिकती इस चाय के स्वाद और सुंदरता के बहुत करीब है।
अब आप इसी संग्रह की तीन कविताएं देखिए:

।। एक ज़ल्दबाज़ बुरी कविता में आंकड़े।।


कविता का एक वाक्य लिखने में दो मिनट लगते है
इतनी देर में चालीस हज़ार बच्चे मर चुके होते हैं
ज़्यादातर तीसरी दुनिया के भूख और रोग से

दस वाक्यों की ख़राब ज़ल्दबाज़ कविता में अमूमन लग जाते हैं
बीस से पच्चीस मिनट
इतनी देर में चार से पांच लाख बच्चे समा जाते हैं
मौत के मुंह में
कविता अच्छी हो इतनी कि कवि और आलोचक
उसे कविता कहना पसंद न करें या उसके कई ड्राफ्ट तैयार हों
तो तब तक कई करोड़ बच्चे, कई हज़ार या लाख औरतें और नागरिक
मर चुके होते हैं निरपराध इस विश्वतंत्र में

यानी ज़्यादा मुकम्मल कविता के नीचे
एक ज़्यादा बड़ा शमशान होता है

जितना बड़ा शमशान
उतना ही कवि और राष्ट्र महान्


।। तनिक कान दें ।।

विद्वता है आपके पास शास्त्र और ज्ञान
भवन है भोजन है साधन और मंडली
सत्ता संस्थान है
अंटी में आपकी में हिंदी - हिंदुस्तान है

जोगी सा भोगी सा रोगी सा लोभी सा
रमा हुआ बानी में बोली को गूंथता
चूहे सा डरा हुआ, लिपटा हुआ आटे में
लापता कबूतर सा डरता गणतंत्र में
फिर भी जो कहता हूं तनिक इधर कान दें

कब तलक पधारेंगे यहां से आप कृपया श्रीमान्
कब तलक चलेगा यह भीषण संभाषण यह षटरस जलपान
तानेंगे कब तक यों भाषा की ड्योढ़ी पर अपनी दूकान

सिधारें तो हम भी गांठ गठरी की खोलें
हम भी तो मंच पर रंच भर अपना रचा बांचें
सभागार खाली हो
जाएं सब आपके संग हाकिम हुक्काम
तो हम भी तनिक नाचें

हुड़क उठती है करेजे में जिया डोलता है मन कचोटता है
सोचिए आपकी निस्बत हमारा आंती-पोटा कितने बरस से खाली है

तनिक नीचे तो निहारें
हमारे भीतर की कलाएं जाने कब से रही हैं अकुलाय
बरसों से बाल-गोबिंद और मेहरिया भूख से रही है बिलबिलाय ।।

॥ रेख़्ते में कविता॥

जैसे कोई हुनरमंद आज भी
घोड़े की नाल बनाता दीख जाता है
ऊंट की खाल की मसक में जैसे कोई भिश्ती
आज भी पिलाता है जामा मस्ज़िद और चांदनी चौक में
प्यासों को ठंडा पानी

जैसे अमरकंटक में अब भी बेचता है कोई साधू
मोतियाबिंद के लिए गुलबकावली का अर्क

शर्तिया मर्दानगी बेचता है
हिंदी अखबारों और सस्ती पत्रिकाओं में अपनी मूंछ और पग्गड़ के
फोटो वाले विज्ञापन में हकीम बीरूमल आर्यप्रेमी

जैसे पहाड़गंज रेल्वे स्टेशन के सामने सड़क की पटरी पर
तोते की चोंच में फंसा कर बांचता है ज्योतिषी
किसी बदहवास राहगीर का भविष्य
और तुर्कमान गेट के पास गौतम बुद्ध मार्ग पर
ढाका या नेपाल के किसी गांव की लड़की
करती है मोलभाव रोगों, गर्द, नींद और भूख से भरी
अपनी देह का

जैसे कोई गड़रिया रेल की पटरियों पर बैठा
ठीक गोधूलि के समय
भेड़ों को उनके हाल पर छोड़ता हुआ
आज भी बजाता है डूबते सूरज की पृष्ठभूमि में
धरती का अंतिम अलगोझा

इत्तेला है मीर इस जमाने में
लिक्खे जाता है मेरे जैसा अब भी कोई कोई
उसी रेख़्ते में कविता ।

Sunday, May 31, 2009

सभ्यताओं की नींव कौन रखता है?

video
अभी कुछ ही रोज़ पहले एक दोस्त ने यह क्लिप भेजा था। तब तक वह एक बड़े व्यावसायिक अखबार में एक अच्छे ओहदे पर था। लेकिन वह अपने आपको कभी प्रबंधन का हिस्सा नहीं मानता था। उसके सरोकार दूसरे थे और वह कहता था कि मैं मालिक को अपना हुनर और अपनी मेहनत बेचता हूं, मासिक पगार पर।
आज आपके लिए जब उसका भेजा यह क्लिप लगा रहा हूं, तब तक वह नौकरी के बाहर है। उसे इस्तीफ़ा देना पड़ा है। नियम ही ऐसा है कि इस व्यवस्था में मालिक कभी इस्तीफ़ा नहीं देता। उसकी कोई गलती भी कभी नहीं हुआ करती।
गलतियां और अपराध हमेशा वे करते हैं, जो अपनी मेहनत, ज़िंदगी के अहम उत्पादक साल और अपना हुनर बेचते हैं।
बहरहाल, यह क्लिप देखिए।
यह क्लिप एक किसी आमफ़हम कांस्ट्रक्शन मज़दूर का है। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, बंगलोर कहीं पर कुछ बन रहा होगा ....। कोई होटल, शापिंगमाल, हाउसिंग कालोनी, फ़्लाईओवर, पार्क, शापिंगप्लाज़ा, मेट्रो या रिसार्ट...। यह आदमी किसी हमारे जैसे गांव से आया होगा। इसे दिहाड़ी के पूरे पैसे भी नहीं मिलेंगे। यह कांस्ट्रक्शन साइट के आसपास किसी अनधिकृत जगह पर कुछ दिन गांव से अपने साथ आये परिवार के साथ रहेगा।
इसके बच्चों को कोई शिक्षा नहीं मिलेगी।
इसके पास 'सैनिटेशन' की कोई सुवधा नहीं होगी।
इसकी पत्नी या बहन या बेटी कहीं भी खुली ज़गह में, चलती सड़क के किनारे, हज़ारों आंखों की घृणा और लोलुपता को सहते हुए 'दिशा-फ़राकत' करेंगी।
बच्चे चौराहों पर भीख मांगेगे या अनाप-शनाप चीज़ें बेचेंगे। मोबाइल चार्जर, प्लास्टर आफ़ पेरिस के गणेश, रूमाल, डस्टर, नारियल, सिर हिलाता कुत्ता या कमर हिलाती बार्बी डाल....!
वे भुट्टे बेचते हुए ही नहीं वह अखबार और उसी व्यापारिक समूह की रंगीन पत्रिकाएं बेचते हुए भी मिल जाएंगे, जिनमें नये-नये मंत्रिमंडल के सदस्यों की रंगीन तस्वीरें होंगी। उन अखबारों-पत्रिकाओं में नये रियल्टी-शो के चित्र होंगे। क्रिकेट के नये स्टार्स और उनके रोमांस के किस्से होंगे। वही अखबार या पत्रिका, जिसके मालिक कभी गलती नहीं करते और जो इस्तीफ़ा नहीं देते।
इन लोगों के पास पता कर लीजिए, कोई मतदाता पहचानपत्र नहीं होगा।
नयी टेक्नाला्जी को धन्यवाद कि उनके पास 'दुनिया को मुट्ठी में कर लेने वाले' किसी कार्पोरेट हाउस की बदौलत मोबाइल नंबर तो है, जहां से झारखंड, छत्तीसगढ, मध्याप्रदेश के किसी गांव से उनके पास कोई फोन आ जाता है -'चाचा, कोसी लगता है..इस साल फिर उमड़ेगी !'...या....'अम्मा को भरती करा दिया है। लेकिन...खेत का मेड़ टूट गया है। ...सिन्नी तो दो दिन के बुखार में चल बसी।'
अब इस क्लिप को देखते हुए ज़रा इस ईंट ढोते आदमी की 'मार्फोलाजी' पर गौर कीजिये। क्या वह 'फ़ेयर कलर' का है और इसकी संतानें 'लवली' होंगी? क्या वह किसी एंगल से ऊंची जात और ऊंची नस्ल का लगता है? क्या उसका हुलिया उन १०-१५ प्रतिशत लोगों से मेल खाता है, जो चुनावों में 'पप्पू' नहीं बनते? और जिनके लिए कम दरों पर बैंकें 'हाउस लोन' और 'कार लोन' देती हैं? 'अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष' ने इक्कीसवीं सदी की 'नयी दुनिया' के विकास के लिए 'वाशिंगटन आम सहमति' के तहत जो नयी योजनाएं बनाईं थीं, जिसका पालन सारे विकासशील देशों की सरकारें करती हैं और 'आर्थिक उदारवाद' या 'एकानमिक रिफ़ार्म' की मूल आत्मा जिसमें निवास करती है, क्या उसमें इस 'हुनरमंद मेहनतकश' की ज़िंदगी के बारे में कोई सपना देखा गया है?
क्या इसी आदमी के बच्चे 'स्लम डाग' होते हैं, जो बिना शिक्षा के 'कौन बनेगा करोड़पति' के लकदक शो में क्विज़ का जुआ खेलते हैं और करोड़पति बन जाते हैं, क्योंकि इस अर्थव्यवस्था में अपने इस क्लिप में मौज़ूद बाप के 'हुनर' और 'श्रम' और 'ईमानदारी' का वह हश्र जानते हैं?
क्या इसी ईंट ढोते आदमी के बच्चों को निठारी का कोई आदमखोर अमीर उठा कर ले जाता है, उनसे अपनी हवस मिटाता है और फिर उन्हें 'रोस्ट' या 'ग्रिल' करके, कबाब बना कर खा जाता है? या किसी गुड़गांव हास्पिटल में उनका गुर्दा निकाल कर, 'ग्लोबल' हो चुके 'मार्केट' में, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा (डालर या यूरो) में किसी 'उपभोक्ता' को बेच देता है?
क्या यह एक या दो डालर प्रति दिन से भी कम आय में जीने वाला इस 'शाइनिंग' मुल्क का वह ७०-७२ प्रतिशत मनुष्य नहीं है, जिसकी एफ़.आइ.आर. ज़्यादातर मामलों में कहीं किसी थाने में लिखी नहीं जाती, क्योंकि उसके पास कोई स्थानीय पता नहीं होता और जिसके पास ईंट ढोने, मज़दूरी करने के अलावा कोई 'पावर' नहीं होता?
गौर से देखिये कहीं यही तो वह आदमी नहीं, जिसके कुनबे की किसी औरत को निराला ने, इलाहाबाद के आसपास की किसी सड़क पर देख कर अपनी मशहूर कविता लिखी थी या जिसके बुढ़ापे पर 'पेट-पीठ दोनों मिल कर हैं एक, चल रहा लकुटिया टेक ' जैसी दूसरी प्रसिद्ध कविता लिखी थी, जिसे हम अपने बचपन में प्राइमरी स्कूल की 'बाल भारती' नामक पाठ्य पुस्तक में पढ़ते थे और परीक्षाओं में 'स-संदर्भ व्याख्या' किया करते थे?
क्या यही वह आदमी तो नहीं, जिसे गांधी जी ने 'अंतिम मनुष्य', मार्क्स ने 'सर्वहारा', अंबेडकर ने 'दलित' कहा था और हमारी आज की सभ्यता जिसे 'धारावी या जे.जे. कालोनी का कुत्ता' (स्लम डाग) कहती है और जिसके आह्वान में गाना गाती है -'आजा आजा नीले आसमाने के तले ...आजा ज़री वाले शामियाने के तले?'
धन्यवाद मोबाइल....इन्हें 'नंबर' तो देदिया वर्ना इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनका कोई 'एड्ड्रेस' भी नहीं होता।
कमाल का हुनर है ना ... इस आमफ़हम मज़दूर में?
आज तक के मानव सभ्यताओं के इतिहास में हर सभ्यता की नींव की ईंट यही रखते हैं, जिनमें खुद उनका पता ठिकाना कभी नहीं होता।
और अगर आप सोचें तो ठीक यही बात लगभग भाषा में 'हुनर' और 'मेहनत' करने वाले भाषा के मज़ूर' यानी 'लेखक' पर भी लागू होती है।

Wednesday, May 27, 2009

उस घर को मैंने देखा...फिर उंगलियों से उसकी उदासी को छुआ




video


मेरी एक बहुत पहले लिखी गयी कहानी का शीर्षक है 'खंडित स्त्रियां, नेहरू जी और अस्ताचल'। आज २७ मई है और यह कहानी २७ मई १९६४ की स्मृति में लिखी गयी थी। तब जब मैं १२ साल का था। उस कहानी को अगर आप पढे़ तो इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पं. जवाहरलाल नेहरू के साथ कितना गहरा संवेदनात्मक लगाव दूर-दराज़ के गांवों के साधारण लोगों में भी था। मेरे पिता उस समय के समाजवादी और गांधीवादी थे, लेकिन २७ मई को दोपहर जब आकाशवाणी से देवकीनंदन पांडे की कांपती हुई आवाज़ ने नेहरू की मृत्यु की खबर दी, तो वे रो रहे थे। उस दिन हमारे घर ही नहीं, गांव के कई घरों में चूल्हा नहीं जला था। आकाशवाणी में समाचार पढ़ते हुए उस दिन देवकीनंदन पांडे भी रो पड़े थे। कहते हैं इस पर उन्हें आल इंडिया रेडियो के अफ़सरों ने नोटिस दी थी कि यह 'उदघोषक' के 'प्रोफ़ेशन' के खिलाफ़ है और यह एक ग़लती है। लेकिन बाद में यह माना गया कि ३० जनवरी १९४८ की खबर की तरह, २७ मई १९६४ की सूचना भी भारतीय इतिहास के उस भावनात्मक आघात की अभिव्यक्ति थी, जिसे समाचारवाचक देवकीनंदन पांडे की कांपती और सिसक पड़ने वाली आवाज़ ने प्रामाणिक बनाया था। वे एक महान 'प्रोफ़ेशनल न्यूज़रीडर' थे। (आप शायद जानते हों कि फिल्म और टीवी अभिनेता सुधीर पांडे उन्हीं के बेटे हैं और दिलचस्प बात यह कि आपके इस लेखक की एक कहानी 'हीरालाल का भूत' पर आधारित फ़िल्म 'उपरांत' से उन्होंने अपना अभिनय का सफ़र शुरू किया था।)

आपमें से अगर किसी ने मेरी कहानी 'खंडित स्त्रियां, नेहरू जी और अस्ताचल' पढ़ रखी हो तो मेरे बचपन में नेहरू जी की उपस्थिति को भी जानते होंगे। सनलाईट साबुन की बट्टियों को चाकू से छील-तराश कर नेहरू जी का बस्ट और प्रोफ़ाइल बनाना, उन दिनों के प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर (जो नेहरू जी के दोस्त भी थे) के कार्टूनों से नेहरू की नाक, अचकन, चूड़ीदार पाज़ामा और बाईं ज़ेब में लगे सुर्ख़ गुलाब की आउट-लाइन कापी करना, मेरे उन दिनों के शगल में शामिल था। (बाद में 'नौनिहाल' फिल्म का वह गाना -'मैंने इक फूल, जो सीने पे लगा रक्खा था, उसके परदे में तुम्हें दिल पे छुपा रक्खा था, .....था जुदा सबसे मेरे इश्क़ का अन्दाज़ सुनो। मेरी आवाज़ सुनो...।' बच्चों के प्रति या अपने बाद आने वाली नयी पीढ़ी के प्रति उनके लगावों को जिस तरह प्रगट करती थी, कि नेहरू के बारे में कोई भी राजनीतिक मूल्यांकन व्यर्थ और अप्रिय लगने लगता था। वैसे कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि वह सुर्ख़ गुलाब तो उस बिछड़े हुए 'प्यार' की स्मृति में नेहरू ने अपने दिल से लगा रखा था, जिसका संबंध लेडी एडविना से था। जो भी हो, लेकिन कई बार मुझे एडवर्ड सईद की बात सही लगती है कि पूरब के लोग साधारण तौर पर 'भावुक' या 'जज़बाती' लोग हैं। योरोप की तरह औपचारिक आधुनिक राजनीतिक लोग नहीं। जब वे किसी से जुड़ते हैं तो 'जी' और 'जान' से जुड़्ते हैं। 'दिमाग़' वे उठाकर कहीं कोने में डाल देते हैं। वे धुर 'सेरेब्रल' कभी नहीं होते। जिस समय की बात मैं आपको बता रहा हूं, उस पूरे दौर में -नेहरू, राज कपूर, गुरुदत्त, शैलेंद्र, साहिर, टैगोर, निराला, महादेवी, पी.सी. जोशी ...सब अपनी बनावट में 'नियो-रोमांटिक' थे। साहित्य ही नहीं, राजनीति में भी 'रोमांटिकता' की 'छायाएं' गहरी थीं। वह 'छायावादी' या दूसरी तरह से 'उत्तर-छायावादी' दौर ही था, जिसमें मेरे जैसे 'सर्किट' लेखकों की बचपन की स्मृतियों का निर्माण हुआ होगा।)

२७ मई के बाद जब मैंने अपने घर की दीवाल पर सूर्यास्त के समय, अस्ताचल की ओर जाते नेहरू जी का वाटर कलर चित्र बनाया तो मेरी मां ने कहा था -'तुमने नेहरू जी की पीठ क्यों बनाई? इतना सुंदर उनका चेहरा था, वह तो इस चित्र में छुप गया है।'

१९६४ में ही, ३० दिसंबर को मेरी मां की भी मृत्यु हो गयी थी कैंसर से। यानी २७ मई से लगभग सात महीने बाद। उस दिन उन्होंने यह भी कहा था:' तुम हमेशा दुख वाले चित्र ही क्यों बनाते हो? वैसी ही कविताएं भी? दूसरी तरह की चीज़ें भी बनाया करो।'

ओह! मैं क्या लिखने जा रहा था और किन स्मृतियों में चला गया।

तो अब आज की पोस्ट के बारे में।

पिछले साल, २००८ में, इसी मौसम में मैं इटली गया था। एक साहित्यिक समारोह में भाग लेने। कभी उसके बारे में लिखुंगा। (इस यात्रा के लिए मैं सुविख्यात लेखिका अर्चना वर्मा और लोकप्रिय लेखक, समाजकर्मी और 'कल्पना' के ब्लागर सुनील दीपक जी का आभारी हूं। क्या आप जानते हैं कि सुनील दीपक 'जन' पत्रिका के संपादक और सुप्रसिद्ध समाजवादी चिंतक स्व. ओमप्रकाश दीपक जी के पुत्र हैं। अपने युवा दिनों में, ए.आइ.एस.एफ़. में होने के बाव्ज़ूद हम लोग 'जन' के नियमित पाठक होते थे और हमारी पीढी पर उन विचारों का बहुत असर भी था।)

खैर, तो उस यात्रा के समय भी आज की ही तरह दिल्ली का तापमान ४६-४७ डिग्री से. था। बिजली की कटौती भी ऐसी ही। १२-१४ घंटे बिना कूलर-पंखे के। लेकिन जब मैं इटली के शहर टूरिन के ऊपर था तो देखा कि वहां के दूर-दूर तक फैले हुए पहाड़ सफ़ेद बर्फ़ से ढंके थे। अपने कैमरे से मैंने उनके चित्र उतारे। एयरपोर्ट पर उतरा तो तूरिन शहर माइनस १५ डिग्री की ठंड में कांप रहा था।

तूरिन उत्तरी इटली में पो नदी के किनारे बसा एक ऐतिहासिक शहर है। एकीकृत इटली की राजधानी रह चुका तूरिन 'आटो-मोबाइल सिटी' के रूप में जाना जाता है। व्यापार और संस्कृति दोनों के लिए प्रसिद्ध। यहां अगर जर्मन दार्शनिक फ़्रेडरिक नीत्शे रह चुके हैं तो यहीं के विलक्षण मार्क्सवादी विचारक और इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य अंतोनियो ग्राम्शी भी थे। इटली की विख्यात फ़ुट्बाल टीम के रोसिनो और पिएरे जैसे कई सुपर स्टार यहीं बसते हैं। मेरे प्रिय लेखक और कथाकार इतालो काल्विनो भी इसी शहर के थे, पिछले साल ही मैंने उनकी एक कहानी 'केक शाप में चोरी' का अनुवाद किया था, जो 'शब्द संगत' में प्रकाशित हुआ और चर्चित भी।

और हां....! सबसे रोचक जानकारी तो छूटी ही जा रही थी। मशहूर कार निर्माता कंपनी 'फ़िएट' का शहर भी यही है। यहां से कुछ ही दूर उनका कारखाना है। पता चला, अब 'फ़िएट' के अधिकांश शेयर टाटा ने खरीद लिए हैं।

बहरहाल, मेरी बहुत इच्छा उस घर और दर को देखने की थी, जिसका संबंध एक महान भारतीय महिला से है। तुरिनो या तुरिन, आप जो भी कहें, से बस ५५-६० किलोमीटर दूर, अराबासानो नामक एक छोटे से कस्बे में उस महान भारतीय का घर है, जो आज आम भारतीयों की उम्मीदों और आशाओं की प्रतीक है। कहा जाता है कि जब हम किसी को अपना वोट देते हैं, तो उसे हम संविधान द्वारा प्रदत्त अपनी संप्रभुता और शक्ति सौंपते हैं। है ना कितनी विलक्षण बात यह भारतीयों के बारे में, जिन्हें जाति, धर्म, नस्ल, भाषा के नाम पर बार-बार बांटने की कोशिश की जाती है, लेकिन जब चुनाव का समय आता है तो यहां की जनता इन सारी संकीर्णताओं को ठोकर मार कर अपनी उस विशाल मानवीय हार्दिकता और चेतना का सबूत देती है, जो सियासत के तमाम खिलाड़ियों, दिग्गजों और मीडिया के अटकलबाजों की हर भविष्यवाणी को झूठा साबित करती है।
अरबासानो (orbassano) एक छोटा-सा कस्बे जैसा शहर है। १५-२० हज़ार की आबादी। ज़्यादातर यहां कामगार और मध्यवर्ग के साधारण लोग रहते हैं। बहुत से लोग दूसरे विश्वयुद्ध के आसपास बाहर से आये हुए लोग हैं। 'फ़िएट' कार का कारखाना इसी कस्बे के पास है।
बहुत पूछना पड़ा और बहुत खोजना पड़ा। कोई ठीक-ठीक नहीं बता पा रहा था। फिर एक अखबार और मैगज़ीन बेचने वाली लगभग ७५-८० साल की महिला से पता चला। 'ओह! वो..सोनिया अंतोनिया मैनो...? उसे तो मैं तब से जानती हूं जब वह छोटी-सी बच्ची थी।'
उसी बू्ढी़ महिला ने पता बताया और थोड़ा भटकने के बाद हम उस घर के दरवाज़े पर थे। धूसर कत्थई और गहरे सलेटी रंग का वह बिल्कुल साधारण-सा दोमंजिला घर बिल्कुल चुप था। अकेला और उदास। पता चला यहां सिर्फ़ सोनिया गांधी की सबसे छोटी बहन अनुष्का रहती है। लेकिन वे भी अपनी छोटी-सी दूकान में चली जा्ती हैं। किसी ने बताया उस दूकान का नाम 'गणपति' है।
उस घर की साधारणता से मैं चकित था। हमारे यहां अगर कोई विधायक भी बन जाता है, तो देखते-देखते उसकी भव्य कोठी खड़ी हो जाती है। और दूसरी तरफ़ यह मामूली-सा घर ?
इसी घर में वह लड़की रहती थी, जिसने २० साल की उम्र में अपने पिता के विरोध के बावज़ूद एक शर्मीले-से भारतीय लड़के से प्यार किया और फिर वह जीवन भर के लिए उस देश में चली आयी जहां एक के बाद एक त्रासदियां और चुनौतियां उसकी प्रतीक्षा में बैठी थीं।
मैं जब उस घर को देख रहा था तो एक अजब-सी उदासी बारबार घिर आती थी। ....और जब मैंने नेमप्लेट पर जमी धूल को उंगलियों से पोंछा तो सोच रहा था उसी नेहरू परिवार की विरासत को इतनी संलग्नता के साथ, पीड़ाओं और निजी दुखों के एक के बाद एक आघात के बाद, सहेजने वाली इस 'भारतीय' महिला को आखिर 'भारतीय' राजनीति ने दिया क्या है?
मेरे दिमाग में यह सवाल भी था कि क्या वैभव और सत्ता को इतनी बार 'नहीं' कहने वाला कोई दूसरा व्यक्तित्व आज के राजनीतिक परिदृश्य में, देश और दुनिया में है क्या?
उस घर को देख कर मन सचमुच भारी था।
आप सब जानते हैं कि मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं। आपसे भी मेरा अनुरोध है कि इस पोस्ट का कोई राजनीतिक पाठ तैय्यार न करें। २२ मई राजीव गांधी की पुण्यतिथि थी और पांच दिन बाद २७ मई को नेहरू जी की। मेरे पास डीवी कैसेट में ये छवियां बंद थीं। सोचा आज आप सबके साथ शेयर करता हूं।
तो देखिये तूरिन और आरबासानो की कुछ छवियां।......और, सोनिया अंतोनिया मैनो .....नहीं....सोनिया गांधी का घर।