
विचार
(अपनी पीढी के सबसे प्रतिभाशाली, अद्वितीय और मेरे सबसे प्रिय कवि असद जैदी के लिए यह कविता)
वे प्रखर विचार जिनमें अतीत के अन्यायों अतिचारों और निरंकुशताओं की
निर्मम आलोचना है आप गौर से देखें तो उनमें निश्चित खामोशी है
आज की निरंकुशताओं और अन्यायों के प्रति
अतीत के अन्यायियों की ही दीर्घ आनुवांशिकता की संतानें हैं ये विचार और विचारक
उनका एक तंत्र है बहुत बड़ा और है एक बेशर्म कालजयी एकता
परिवर्तनकारी लगते इन विचारों के तंत्र के पीछे वह ताकत है
जिसे हासिल किया गया है अनीति से
आइये देखें वह वाक्य जिसमें गुज़र चुकी सदियों के
तमाम अत्याचारियों विरुद्ध एक चमकता हुआ बिंब है
उसे तोड़ें अखरोट की तरह तो दिखेगा वर्तमान के अत्याचारियों के पक्ष में
छुपा हुआ तर्क
वहां विचारक नहीं
दिखेगा चिंतन की भाषा के चोगे में छिपा कोई मक्कार वाक्पटु अधिवक्ता
आज के हत्यारे को बचाने के निमित्त अतीत के हत्यारों के विरुद्ध तर्क और
प्रमाण पेश करता हुआ
कुछ न्यायाधीश दिखेंगे
अन्याय के पक्ष में जिनका फैसला पूर्वाधोषित है
दिखेंगे कुछ चश्मदीद गवाह जो कहेंगे हमने कुछ नहीं देखा
उस दिन हम इस पृथ्वी पर थे ही नहीं
कुछ विद्वान दिखेंगे जिनकी अकादंमिकता है वर्तमान अन्यायी सत्ता के बारे में
मौन धारण करते हुए अतीत के बारे में निरंतर बोलते रहना
कुछ चर्चित और पुरस्कृत कवियों का झुंड दिखेगा
हत्या के पल मुंह फेर कर दूसरी ओर जो अपने-अपने बचपन का
वही गीत गाएंगे जो हर हत्या को निरापद
और हर हत्यारे को हत्या के बाद मानवीय बनाता हैं।
(शीघ्र प्रकाश्य कविता संग्रह 'एक भाषा हुआ करती हैं' से)
Sunday, May 11, 2008
कौवों का काकटेल
Wednesday, May 7, 2008
वारेन हेस्टिंग्स का सांड : कुछ चित्र
I am happy to inform you that we in the Department of Indian Theatre, Panjab University successfully staged your short story Warren Hastings Ka Saand in February this year to packed houses continuously for ten days and it was highly acclaimed by the press and the public। The cast consisted of the students and the play was directed by me। The music was given by Shri Kavalam Padmanabhan, choreography by Evoor Rajendran Pillai and set by Mahendra.
I am sending you some photographs of the production. They are taken by Shri Pradeep Tewari of The Tribune.
Our only regret is that we could not have you here to witness the performance.
With regards,
KUMARA VARMA
Tuesday, May 6, 2008
तिब्बत के बारे में
आषाढ़ महीने की उस रात, नदी के पार, दूसरे तट पर, रहस्यपूर्ण आग की धुंधली-झिलमिलाती नन्हीं-नन्हीं लपटें टहल रही थीं। हमारे बीच की दूरी में बाढ़ में उतराती नदी की तेज धार और उसका हहराता हुआ शोर था। मैंने मां को पुकारा, `मम्मा, देखो नदी के पार चितावर जल रहा है।´
मां उठ कर आयीं। उन्होंने गौर से देखा और कहा, `सुनो, क्या तुम्हें कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही है, आदमियों की?´
मैंने अपने कान उधर लगाए। धीरे-धीरे बाढ़ के शोर और रात की दूसरी ध्वनियों में कहीं डूबी हुईं मनुष्यों की आवाज़ें सुनाई देने लगीं। कुछ ही पलों बाद पता लगने लगा कि इसमें संगीत जैसा कुछ है। कुछ ध्वनियों की बार-बार आवृत्ति।
मां रसोई के अंदर जा चुकी थीं और मैं वहीं खड़ा था चुपचाप। उन रंगीन धुंधली रोशनियों को घूमते-टहलते देखता और वहां से उठने वाली आवाज़ों को सुनने की चेष्टा करता हुआ।
कुछ देर के बाद, उन सुदूर रोशनी के वृत्तों में से मनुष्यों के आकार झलकने लगे। अस्पष्ट, अस्थिर लेकिन निश्चित जीवित मानव आकृतियां। कुछ-कुछ उस जैसा, जैसा मैंने एक बार बचपन में रेडियो के भीतर देखा था, लेकिन जिसे बाद में बड़े और वयस्क लोगों ने मेरा सपना कह कर टाल दिया था। तभी से मैंने यह तय कर लिया था कि भविष्य में अपने साथ घटने वाली ऐसी कोई घटना दूसरों को नहीं बताऊंगा, जिस पर उनको विश्वास नहीं होगा। अगर आप मेरी एक बहुत पहले लिखी गई कहानी `डिबिया´ पढ़ेंगे, तो आपको मेरे इस निर्णय के बारे में पता चल जाएगा।
उस रात भी मैं यही सोच रहा था। मेरी आंखें साफ देखने लगीं थीं कि नदी के उस पार, नन्हीं नन्हीं कंदीलें लिए और किसी लय में लगातार कुछ बोलती-दोहराती हुई वे आकृतियां किसी और की नहीं, लामाओं की ही हैं। पिताजी ने बताया था कि उनके गांव तिब्बत पर चीन ने हमला कर दिया है और वे अपना घरबार, सब कुछ वहां छोड़कर, भाग कर हमारे देश में चले आये हैं। अब वे सरगुजा के उस पहाड़ पर रहेंगे, मेनपाट में, जहां `पहाड़ी कोरबा´ और `ओरांव´ रहते हैं।
तो, इसका मतलब, नदी के पार आग का वह खेल, चितावर या मृत पशुओं और मनुष्यों की हडि्डयों में उपस्थित फास्फोरस के ऑक्सीजन में जलने से पैदा होने वाला दृश्य नहीं था, वह कोई विभ्रम या स्वप्न भी नहीं था, बल्कि वहां एक असली और वास्तविक घटना घट रही थी।
मैं पता नहीं कितनी देर तक वहां, रसोई की पछीत में, बाढ़ में उफनते सोन के किनारे, अंधेरे के पार यह दृश्य देखते और अपने कान वहां से उठने वाले शब्दों को पकड़ने में लगाए, ध्यानमग्न, चुपचाप खड़ा रहा।
मां ने खाना खा लिया था। बचा-खुचा खाना आलमारी में रख दिया था। बरतन समेट दिये थे। इसके बाद वह बाहर आयीं और मुझसे पूछा -`कुछ पता चला? कौन लोग हैं ?´
उत्तर में मैंने सिर्फ इतना कहा कि `मुझे तो लामा लग रहे हैं।´ और चुप हो गया।
लेकिन मैं सच कह रहा हूं कि उस रात मुझे स्पष्ट लगा था, कि जो संगीत जैसी आवाज़ वहां से आ रही थी, वह कोई गाना नहीं, कोई ऐसा मंत्र था, जिसमें कोई दारुण विलाप भी सम्मिलित था। जैसे कोई समूची आत्मा, देह और हृदय के साथ, अपने पूरे अस्तित्व के साथ रोते हुए शोकगीत में कोई प्रार्थना करे।
अगली सुबह नदी में और ज्यादा बाढ़ आ चुकी थी। इतनी बाढ़ में पेड़ के तने को खोखला करके बनाया गया हमारे गांव का डोंगा, बांस की बल्ली से ठेलकर चलाया नहीं जा सकता। बल्ली तो नदी की धार की थाह ही नहीं पाएगी।
सुबह मैंने फिर रसोई की पछीत से जाकर उस जगह को देखा, जहां रात में यह घटना घटी थी। लेकिन वहां कोई नहीं था। वह जगह सुनसान थी लेकिन उस तक बाढ के कारण पहुंचा नहीं जा सकता था।
कई दिनों के बाद गांव के लोगों ने बताया कि अनूपपुर से सरगुजा की ओर जाने वाली रेलगाड़ी पांच-छह दिनों के लिए रद्द हो गई थी और वहां स्टेशन के प्लेटफार्म पर किसी बीमार तिब्बती शरणार्थी की मृत्यु हो गई थी।
इसका मतलब यह हुआ कि उस रात लामा लोग उसी अपने साथी का अंतिम संस्कार करने नदी के तट पर आये थे।
मैं आज तक नहीं जानता कि लामा मृतक का अंतिम संस्कार किस तरह करते हैं। उसे दफनाते हैं, जलाते हैं, पारसियों की तरह कहीं शव को छोड़ देते हैं या नदी में बहा देते हैं। लेकिन मुझे इतना ज़रूर लगता है कि अपने घर और देश से हज़ारों मील दूर, जब कोई तिब्बती किसी और पराये देश में मरता है, तो अंतिम संस्कार के समय लामा जो प्रार्थना करते हैं या मंत्र पढ़ते हैं, तो वह असल में, ध्यान से सुनो तो, और कुछ नहीं, एक विलाप जैसा कुछ होता है। बहुत मार्मिक। भीतर तक बेध डालने वाला। व्याकुल कर डालने वाला।
और अगर कोई सिर्फ राजनीतिक नहीं रह गया है, उसके भीतर मनुष्य जैसा कुछ बचा रह गया है तो उसकी स्मृति का पीछा यह विलाप कभी नहीं छोड़ता।
मेरी स्मृति में तो यह दृश्य इसलिए भी अमिट रहा आया क्योंकि मां की मृत्यु के बाद ही मैंने गांव का वह घर छोड़ दिया था और फिर पिताजी की मृत्यु के बाद तो वहां लौटने का विकल्प ही नहीं था।
इस घटना के वर्षों बाद, 1975-76 में, जब मैं जे एन यू में शोधछात्र था, जहां बाद में कुछ समय के लिए अध्यापक भी हुआ, तब मैंने वहां की लाइब्रेरी में विश्वप्रसिद्ध कथाकार असिमोव की एक कहानी पढ़ी। वह कहानी मुझे कभी नहीं भूलती। उस कहानी का सारांश, स्मृति के सहारे आपको बता रहा हूं।
अमेरिका के दो भाषावैज्ञानिकको कहीं से पता चलता है कि ल्हासा के प्राचीन बौद्धमठ में तिब्बत की प्राचीन लिपि में लिखी गई एक ऐसी पांडुलिपि है, जिसमें स्रिष्टि के निर्माण और विनाश का सारा रहस्य बंद है। लेकिन समस्या यह है कि `मोहनजो दाड़ो´ की लिपि की तरह ही, उस अज्ञात लिपि को भी अभी तक संसार का कोई भाषावैज्ञानिक `डिकोड´ नहीं कर पाया है। पश्चिम और अमेरिका ही नहीं, कई दूसरे देशों के भाषा वैज्ञानिक चोरी छुपे उस सैकड़ों पृष्ठों वाली पांडुलिपि के कुछ पन्नों की नकल अपने साथ ले गये हैं और भरपूर मेहनत की है, लेकिन अभी तक कोई सफल नहीं हुआ है। उस मठ के लामाओं के अनुसार इस अज्ञात लिपि को किसी अन्य भाषा में समझना या बदलना वर्जित है। उनकी मान्यता के अनुसार, जिस दिन कोई मनुष्य इस पांडुलिपि को पूरी तरह `डिकोड´ कर देगा, यह समूची स्रिष्टि उसी पल नष्ट हो जाएगी।
अमेरिका के वे दोनों वैज्ञानिक दिन रात उस अज्ञात लिपि का अध्ययन करने में लगा देते हैं। कई वर्षों के बाद वे दोनों उस लिपि को `डिकोड´ करने में सफल हो जाते हैं और फिर एक छोटा `टू-सीटर´ हवाई जहाज लेकर तिब्बत पहुंचते हैं और वहां के लामा से उस रहस्यपूर्ण पांडुलिपि को देखने और पढ़ने की इच्छा प्रकट करते हैं।
लामा उन्हें मठ में, उस पांडुलिपि को देखने और पढ़ने की अनुमति तो देता है लेकिन कड़े शब्दों में उन्हें चेतावनी भी देता है कि वे उसे `डिकोड´ करने और दूसरी, आज की किसी जीवित भाषा में बदलने और व्याख्यायित करने की कोशिश न करें, वर्ना यह स्रिष्टि समाप्त हो जाएगी।
दोनों भाषावैज्ञानिक रोज़ उस मठ के भीतर जाकर, उस प्राचीन पांडुलिपि को चोरी से `डिकोड´ करना शुरू कर देते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि लामाओं की यह मान्यता किसी पूर्व-आधुनिक, पूर्व-वैज्ञानिक समय में जन्म लेने वाले अंधविश्वास से अधिक और कुछ नहीं है।
लगभग दो महीने की दिन-रात की कठिन मेहनत के बाद वे पांडुलिपि के अंतिम पृष्ठ तक पहुंच जाते हैं। फिर अंतिम पैरा तक। और फिर आखीर में पांडुलिपि का सिर्फ अंतिम वाक्य बचता है।
इस जगह दोनों को गहरा असमंजस होता है। एक दुविधा, जिसमें एक तरह का भय भी शामिल है। कहीं लामाओं की वह प्राचीन मान्यता सच हुई तो ?
अंत में वे दोनों उस अंतिम वाक्य को भी `डिकोड´ करने का निर्णय लेते हैं और कुछ ही पलों में उसे पूरा कर डालते हैं।
वे दोनों ल्हासा के उस प्राचीन बौद्ध मठ से बाहर निकलते हैं। बाहर बर्फ उसी तरह है, वैसी ही शांति, उसी तरह बस्तियां और चहल-पहल। कहीं कुछ नहीं बदला। दोनों को हंसी आती है।
उसी रात वे लामा से विदा लेकर अमेरिका के लिए उड़ जाते हैं। इतने वर्षों तक अज्ञात और अबूझ रही आयी एक प्राचीन लिपि को विखंडित कर डालने और अब उसे आज की आधुनिक भाषा में ले जाने का गर्व एक तरफ और तिब्बतियों के पुराने अंधविश्वास के गलत सिद्ध हो जाने की प्रसन्नता दूसरी तरफ। दोनों नशे में हैं और तिब्बतियों का पेय `छंग´ पी रहे हैं।
और तभी उनके एयरक्राफ्ट का पायलट डरा हुआ कहता है :` सर, उधर तो देखिये, सामने! ये क्या हो रहा है?´
दोनों भाषावैज्ञानिक स्तब्ध रह जाते हैं।
वे सामने, अंतरिक्ष की ओर देखते हैं,..... वहां सौरमंडल के चमकते हुए सारे नक्षत्र एक-एक कर बुझ रहे हैं।
अगर आपने मेरी कहानी `वारेन हेस्टिंग्स का सांड´ पढ़ी है तो उसके नायक सांड को अच्छी तरह से जानते होंगे, जिसे तिब्बत के एक बूढ़े लामा ने सैम्युएल टर्नर को दिया था, और जो दरअसल एक याक था। इस कहानी की अंतिम पंक्तियां एक बार फिर पढ़िये।
``.... वैसे तिब्बत का वह बूढ़ा लामा दिल्ली के `मजनूं का टीला´ नामक इलाके में शरणार्थी के रूप में अब भी रहता है। उसे सैम्युएल टर्नर की याद है, जिससे वह लगभग सवा दो सौ साल पहले मिला था।
रहस्यभरी झुर्रियों में मुस्कुराता हुआ वह लामा कहता है, ``वह सांड अभी मरा नहीं है।´´
(अगली कडी में मैं बताऊंगा कि २८ साल पहले १९८० में 'तिब्बत' कविता को 'भारत भूषण पुरस्कार' मिलने के बाद दिल्ली में ताकतवर सत्ताकेंद्रित लेखकों-कवियों द्वारा क्या राजनीतिक व्याख्यायें हुईं, कैसे इस कविता को 'डिकोड' किया गया (जिसके खतरे अभी भी हैं) और कैसे पहले मुझे कविता से बेदखल किया गया और फिर.....लेकिन उसके पहले चण्डीगढ में कुमार वर्मा के निर्देशन में १० दिनों तक खेले गये 'वारेन हेस्टिंग्स का सांड' की मंच प्रस्तुति के कुछ द्रिश्य...)
Monday, May 5, 2008
तिब्बत के बारे में
वह आषाढ़ का महीना रहा होगा।
कुछ दिन पहले लगातार हुई बारिश थम चुकी थी लेकिन हवा और मिट्टी में भारीपन और नमी छोड़ गई थी। शायद आषाढ़ की पहली बारिश थी। वैशाख-जेठ की तीखी धूप में महीनों से जली-झुलसी धरती पर जब वर्षा की पहली बूंदें गिरती हैं तो धरती का अब तक का ताप बुझता है। जैसे गर्म तवे पर पानी के छींटे मार दिये गये हों। और फिर मिट्टी की सोंधी गंध चारों ओर भाप बनकर बिखर जाती है। हम गहरी सांसें खींचते हैं और पृथ्वी का सोंधापन हमारे फेफड़ों में भर जाता है। समूची देह में सिहरन दौड़ती है और हम जान जाते हैं कि बरसात आ गई।
कहते हैं कि महान चित्रकार पिकासो, ऐसी पहली बारिश में, बादलों को घिरते देख कर, अपनी छत पर चढ़ जाता था और नाचने लगता था। वर्षा का आना संसार की और हमारे जीवन की हरबार एक अपूर्व और महान घटना होती है। मैंने अब तक बहुत खोजा लेकिन शायद अभी तक किसी परफ्यूम कंपनी ने कोई ऐसा सेंट नहीं बनाया है, जो आषाढ़ की पहली वर्षा के साथ धरती की देह से उठती मिट्टी की गंध की स्मृति जगा दे।
ऐसी ही वर्षा के बाद, गरमी के दौरान धरती के भीतर, अपने बिलों में अब तक छिपी असंख्य चींटियां अचानक बाहर निकल आती हैं और शाम को आकाश में उड़ने लगती हैं। उनके पंख उग जाते हैं। झुंड की झुंड वे बाहर आकाश की ओर उड़ती हुई आंगन के ऊपर मंडराने लगती हैं। लेकिन उनके पंख इतने क्षणभंगुर होते हैं, कि बस हवा के एक हलके झोंके या उनकी किसी छोटी उमंग भरी हरकत से तिड़क कर टूट जाते हैं और फिर वे किसी कीड़े की तरह, अपने असली रूप में, किसी शरन्य की खोज में धरती पर गिर कर असहाय रेंगने-भटकने लगती हैं। हम इन चींटियों को पतंगों के नाम से, उनके जीवन के कुछ पलों में जानते हैं। जहां कहीं उजाला दिखे, कोई बिजली का बल्ब, लालटेन या कंदील, ये पतंगे झुण्ड के झुण्ड वहां टूट पड़ते हैं। आषाढ़ की पहली बारिश की शीतलता और कंदील या बल्ब की जिस रोशनी ने उनके जीवन में भविष्य की नयी आशाएं जगाईं थीं, कुछ ही देर के बाद उसकी वास्तविकता सामने आ जाती है।हर सुबह हम अपनी देह पर उगे निर्बल पंखों के साथ आकाश की ओर उड़ती और किसी उजाले को देख कर एक साथ किसी सामूहिक आशावाद में टूट पड़ने वाली इन चींटियों के अनगिनत शव झाड़ू लगाकर बाहर फेंक देते हैं। उनका वह कुछ पलों के कौतुक और उल्लास से भरा जीवन, सुबह तक कचड़े के ढेर में तब्दील हो चुका होता है।
पंख लगी चींटियों के जीवन का यह छोटा-सा अध्याय, उनकी सभ्यता के इतिहास में किसी `यूटोपिया´ के बनने और फिर उसके टूटने का मार्मिक अध्याय होता है। ठीक मनुष्यों की सभ्यता के इतिहास के किसी खण्ड की तरह।
तो, वह ऐसी ही कोई रात थी। आषाढ़ की पहली वर्षा के बाद की कोई रात।
उस रात नदी उतरा रही थी। अगर एक-दो दिन के भीतर फिर पानी बरस गया तो बाढ़ आ जाएगी और नदी हमारी रसोई के पीछे तक बहने लगेगी। रात में घर में, हर ओर, नदी की धार के साथ बह कर आने वाले सांप, गोजर, कनखजूरे और कछुए टहलने लगेंगे। मेंढकों का भी तो यही समय होता है। धरती की दरारों में महीनों से समाधि लगाए या `हाइबरनेट´ करते ये तरह-तरह के मेंढक भी पहली बरसात के साथ ही बाहर निकल आते हैं और रात भर हम उनकी आवाज़ सुनते हैं। दादुर-धुन। एक अजब सा संगीत। झींगुरों के गिटार, पहरुए पक्षी की टनक, किसी रात्रि-पक्षी की दूर तक जाती मेंडोलिन या बांसुरी की संगत में लगातार चलता संगीत।
उस रात आलू और परवल की सब्जी बनी थी। पिताजी की पसंद। मैं हमेशा की तरह कुछ बनाने या पढ़ने में लगा था। पंख वाली चींटियों पर कुढ़ता-भुनभुनाता हुआ, जो बार-बार किताब के पन्नों पर, मुझ पर या मेरी लालटेन पर आकर गिरती थीं। रात में खाना खाते हुए भी बहुत सतर्क रहना होता है। एक बार ऐसे ही, लालटेन की धुंधली रोषनी में, रात में हमारे घर कोई खाना खा रहा था और जब उसने थाली में रखे अचार को उठाना चाहा तो अचार एक अजीब सा शोर करता हुआ उड़ गया। हम जूतों के भीतर रात में पांव डालते डरते हैं। कहीं कोई मेढक, सांप या कोई और जंतु छुपा न बैठा हो। एक बार फूफा जी ने आधी रात अपने सिरहाने रखी टॉर्च उठानी चाही तो वह अजीब सी आवाज़ निकालता भाग गया। पता नहीं बारिश से बचने कोई नेवला या ऊदबिलाव उनके तकिये के पास, जहां टॉर्च थी, छिपा बैठा था।
मैं हमेषा मां के साथ खाता था। मां सब लोगों के खाना खा लेने के बाद बचा-खुचा अपने लिए लेकर बैठती थीं। हां, मेरे लिए एक कटोरी सब्जी वह हमेशा अलग से रख लेती थीं।खाना खाने के बाद हाथ-मुंह धोने और कुल्ला करने के लिए जब मैंने रसोई का पिछला दरवाज़ा खोला तो नदी के शोर, िझलमिलाते अंधकार और रात की असंख्य आवाज़ों ने मुझे चारों तरफ से घेर लिया। अगर आपका घर किसी नदी के तट पर है तो आप जान सकते हैं कि यह सब कितना अजब और सम्मोहक होता है। चारों ओर से घेर कर आपको अपने भीतर खींचकर डुबा लेने वाला। लेकिन हमेशा भय और दुस्वप्न के एक साथ-साथ चलने वाले अनुभव के साथ।
कितना विरल होता है बाढ़ में उतराती नदी के पास रात में अकेले खड़े होना। किसी इंद्रजाल में बिंधे हुए। अंदर-अंदर भय से सिहरते हुए। फिर भी वहां से हटने से इनकार करते हुए।
और तभी मेरी निगाह अंधेरे में, बाढ़ में उतराती नदी के दूसरे पार की ओर गई। वहां पहले, वर्षों पहले, एक मंदिर हुआ करता था। वहां बुद्ध की एक मूर्ति थी। तथागत। लेकिन उन्हें चंदन-टीका लगाकर दूसरे देवी-देवताओं के साथ रख दिया गया था। कहते थे कि वे सिद्ध-भगवान हैं। इस पूरे इलाके में अब भी बुद्ध की बहुत-सी खंडित, टूटी-फूटी प्रतिमाएं यहां-वहां मिलती हैं। उस इलाके में जब कोई कुआं खोदता है या अपने नये घर की नींव, तो ऐसी मूर्तियों का मिलना एक सामान्य सी बात है। कलिंग का वह क्षेत्र, जहां अतिक्रमणकारी सम्राट् अशोक की सेना ने निहत्थे, गरीब, शांत लोगों के अहिंसक प्रतिरोध के उत्तर में भयावह जनसंहार किया था और फिर जहां से पूरब-दक्षिण, राजगीर-उदयगीर तक पहुंचते-पहुंचते उसे स्वयं अपनी हिंसा से ग्लानि हुई थी और वह बौद्ध हो गया था, उस उत्कल-कलिंग क्षेत्र का सीमांत विंध्य पर्वत की इसी श्रृंखला के पास है। मैं कई बार सोचने लगता हूं कि बुद्ध की प्रतिमाओं को तोड़कर जगह-जगह मंदिर खड़ी कर देने वाले लोग आखिर कौन थे? ब्राह्मण ? प्राचीन इतिहास के हिंदू तालिबान ? या कोई और ?
उस रात बाढ़ में उफनती नदी के दूसरे पार आग की लाल, पीली, नीली लपटें किसी क्रम में टहल रहीं थीं। जैसे कुछ लोग अपने हाथों में नन्हीं-नन्हीं मशालें लिए एक वृत्त में घूम रहे हों। हमारे गांव में माना जाता है कि रात में चितावर की लकड़ी इसी तरह जलती है। और अगर उसे नदी के पानी में डुबा दिया जाय तो वह सांप बन जाता है। लेकिन चितावर को पकड़ पाना आसान नहीं होता। अगर कोई उसे पकड़ ले तो चितावर पारस पत्थर की तरह काम करता है। यानी जिस भी धातु को चितावर की लकड़ी से छू दोगे, वह सोना बन जाएगा।
बचपन में हम में से बहुतों की फैंटेसी में चितावर को पाना उसी तरह उपस्थित था जैसे बहुत पहले अरब, इजिप्ट और मेसोपोटामिया के अलकीमियागरों (अलकेमिस्ट) की फैंटेसी में किसी ऐसे रासायनिक फार्मूले की खोज, जो किसी भी धातु या पदार्थ को सोने में बदल दे। क्योंकि हर पदार्थ (मैटर) तो असल में एक ही होता है, उसकी आंतरिक संरचना ही उसे दूसरों से भिन्न बना डालती है। पदार्थ की उसी आंतरिक संरचना को बदलने वाले सूत्र को खोज निकालने के शताब्दियों तक चलने वाले प्रयत्नों के बीच ही उस विज्ञान का जन्म हुआ जिसे हम `केमिस्ट्री´ के नाम से आज जानते हैं।
क्या हमारे `मकांदो´ जैसे गांव की चितावर वाली अवधारणा के पीछे भी कोई ऐसा ही विज्ञान था, जिसका आविष्कार आज तक नहीं हो पाया ? या वह सब एक सामुदायिक लोक-विश्वास था? एक पूर्व-आधुनिक मिथ्याचेतना? कोई अंधविश्वास ?
बाद में, जब मैं आठवीं दर्जे में पढ़ता था, तब केमिस्ट्री के हमारे अध्यापक वर्मा जी, जो काले रंग के थे, चेहरे में चेचक के दाग थे और जिनकी आंखें हमेशा लाल रहती थीं, ने बताया था कि रात में मरे हुए जानवरों और मनुष्यों की हडि्डयों का फास्फोरस भी ऑक्सीडाइज़ हो कर इसी तरह जलता है और लोग डर जाते हैं।
(प्रोफेसर वर्मा जी के बारे में मैं फिर कभी लिखूंगा, क्योंकि अरब के कीमियागरों की तरह वे भी किसी भी धातु को सोने में बदलने के रहस्यपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोगों में लगातार पागलों-तांत्रिकों की तरह लगे रहते थे और मेरे कुछ सहपाठियों के मुताबिक, वे एक बार इसमें अचानक कामयाब भी हो गये थे। लेकिन अपने उस करतब को वे दुबारा नहीं दोहरा पाये क्योंकि कोई न कोई एक ऐसी चीज़ वे भूल गये थे, जिसने उस एक बार यह करिश्मा कर डाला था। तभी से उनका दिमाग कुछ सनक गया था। वे बहुत निराश आवाज़ में कहते थे -`मेरे हाथ विज्ञान आते-आते फिसल गया। वह जादू हो कर रह गया।´
सच बात, विज्ञान तो वही होता है, जिसे बार-बार दोहराया जा सके। जो किसी नियम के अधीन कोई करिश्मा हरबार करता हो। नहीं तो बस, जादू!)
मनीष जी, बस कुछ ही घंटों के बाद अगली कड़ी....
Saturday, May 3, 2008
एक मित्र का अचानक जाना
हालांकि अब तक आपका धैर्य साथ छोड़ चुका होगा और आप नाराज़ होकर इस गली की ओर आना बंद कर चुके होंगे लेकिन आखिर अपनी धुरी से बेदखल होकर अंतरिक्ष में खानाबदोश भटकता कोई नक्षत्र किसी किस्से को भला एक बैठिकी में कैसे पूरी करे ? मेरे उपन्यास न लिखने के पीछे भी तो यही भटकन और अस्थिरता है, जो विश्वास कीजिये मेरा चुनाव नहीं, इस अन्यायी, जातिवादी, भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था की निर्मम विनिर्मिति है।
इस बीच जब कोरिया से लौटकर आया तो पता चला मेरे विलक्षण आत्मीय मित्र अशोक शास्त्री का निधन हो गया। जाने के पहले उनसे कई बार लंबी बातें हुईं थीं। कुछ ही दिन पहले उनका पत्र आया था। मेरे बेटे सिद्धार्थ के विवाह स्वागत भोज में शामिल होने के लिए 5 मार्च को भी वे जयपुर से चले थे, लेकिन `मिड वे´ तक चहुंचकर लौटना पड़ा। उनका स्वास्थ्य उस दिन भी ठीक नहीं था।
अशोक शास्त्री हिंदी के कालजयी कथाकार रांगेय राघव के जामाता थे। उनकी सुपुत्री सीमंतिनी के पति। वे कुछ ही समय पहले तक दिल्ली के `जनसत्ता´ अखबार में वरिष्ठ सहायक संपादक के पद पर थे और उन्हीं की ज़िद में मैं निरंतर इस अखबार में लिखता भी रहा। अभी तक इस शोक से उबर नहीं पाया हूं।
ईश्वर आदरणीया सुलोचना जी और सीमंतिनी जी को यह दुख सहने का साहस दे।
`तिब्बत´ के बारे में बस इसके बाद। कल तक।
Monday, April 21, 2008
तिब्बत के बारे में
................
Jason
Friday, April 18, 2008
तिब्बत के बारे में
आप लोगों ने इतनी रूचि दिखाई....लेकिन इस ज़ल्दबाज समय में मनीष जी को लिखी गयी इस चिट्ठी की पोलिटिकल रीडिंग न करें। धैर्य, जो अब शायद किसी जंगल में रहता हैं, उसे साथ रखें...
तीसरी कड़ी
मैंने और मेरे भाई ने उस छोटे से गांव में, जहां तब तक बिजली नहीं आई थी, पुल और सड़क नहीं बनी थी, जहां महेश सिंह के गोसार में से गायों-भैंसों के निकल जाने के बाद, वहीं टाट पट्टी बिछा कर हमारा स्कूल चलता था, जहां छुई मिट्टी की दवात, सरकंडे और करील की कलम और काठ की पाटी में हम वर्णमाला लिखते-पढ़ते थे, लेकिन ऐसा गांव, जहां रेडियो आ चुका था, अखबार और तमाम पत्रिकाएं आने लगीं थीं, वहां हमने कई तकनीकें विकसित कीं। मार्क्वेज़ के `वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड´ के कस्बानुमा गांव मकांदो से अलग और भिन्न हमारा गांव नहीं था। मकांदो में किये जा रहे वैज्ञानिक-तकनीकी आविष्कारों से कम रोमांचक हमारे बचपन की उपलब्धियां नहीं थीं।
बैटरी और चुंबक और टिन की पट्टी से बार-बार जलने-बुझने वाला बल्ब, तांबे के तारों को मोम में डुबाकर, इंसुलेट करके और आर्मेचर बाइंडिंग करके घूमने वाली छोटी -सी पंखी, जिसे देख कर मां हैरत में पड़ गईं थीं, शायद थोड़ा-सा डर भी गईं थीं। पतंगी धागे के दोनों सिरों पर दो खाली डिब्बे जोड़ कर अपने घर से टिर्रा-किरपाल के घर को कनेक्ट करने वाली टेलिफोन लाइन। कागज के काले गत्ते को पिन या सुई से बारीक छेद कर, बंद कमरे की अंधेरी दीवाल पर बाहर के संसार के चलते-फिरते रंगीन उल्टे दृश्य ... पेट्रोमेक्स, जिसे हमारे यहां `गैसबत्ती´ कहते थे, उसके कांच की तीन पटि्टयों के त्रिभुज बनाकर, ऊपर काला कागज़ लपेटकर, उसके अंदर रंगीन चिंदियां डाल कर बनाया गया केलाइडोस्कोप। चकमक और लोहे को रगड़कर पैदा की गयी चिनगारी और मूंज की बत्ती से बनने वाली `परमानेंट माचिस´.....और प्रिज्म ....! ....और हां, मार्क्वेज़ के मकांदों के कर्नल बुएंदी की तरह ही आतिशी शीशे और सूर्य की किरणों के फोकस और आग के अनेक खेल ....
लेकिन हमारी कुछ टेक्नॉलॉजियां खासी क्रूर और निर्मम भी हुआ करती थीं, जैसे पतंगों या बड़ी तितलियों को पकड़ कर उनकी पूंछ में धागा बांध कर कागज की चिंदी या माचिस का खोखा लगा देना, काले गुबरैलों की कमर में खाली गत्ते के डिब्बों की `ट्रॉली´ जोड़ देना और फिर कंकड़ों को उसमें भर कर लोड करना और फिर अपने इस ज़िंदा ट्रक की ताकत देखना। आज सोच कर लगता है, गुबरैले कीड़े को कितनी तकलीफ होती रही होगी। .....और स्कूल जाते वक्त, तालाब के पास की गड़ही को पार करते वक्त अक्सर टांगों में चिपक जाने वाली खून-चूस जोंकों को चुटकी भर नमक डाल कर काठ के एक फट्टे के दोनों सिरों पर कील ठोंक कर जोंक को तान देना और फिर उसे एकतारे की तरह बजाना। तालाब के पानी में रहने वाले पंडोर सांप को सिर के पास से .... गर्दन पकड़ कर पत्थर पर रगड़ना , जो हमने बंदरों से सीखा था , या उसकी पूंछ पकड़कर घुमाते हुए पेड़ के तने पर बार बार पटकना (मैं इस सब पर कभी विस्तार से लिखूंगा, और उन जंगली जानवरों के बच्चों के बारे में भी, जिन्हें हमने उन दिनों पाला।) मनीष जी , कई बार लगता हैं कि पिछडे आदिवासी समाजों में ऐसी कितनी निर्ममताएं होती है....अन्य प्राणियों के प्रति हिन्साओं से भरी, लेकिन जब आप अपने आज के विकसित और प्रविधियों से आधुनिक हो चुके समाजों द्वारा किए गए संहार और युद्ध और पर्यावरण तथा मनुष्यों के विनाश की व्यापकता को देखते है तो क्या ये पुरानी हिंसा बच्चों का खेल नहीं लगती?
तो ऐसा ही कुछ समय था, जब हमने अपने गांव में पहली बार तिब्बत से आये हुए `लामाओं´ को देखा। उनके परिवारों को देखा। पिता जी ने बताया कि `लामाओं´ के गांव तिब्बत पर चीन ने हमला कर दिया है और वे भाग कर हमारे यहां आ गये हैं। वे लोग सरगुजा के पहाड़ पर रहेंगे, जहां 'पहाड़ी कोरबा' और 'ओरांव ' लोग रहते हैं। उस समय हम हर तिब्बती को `लामा´ ही कहते थे। जिस जगह वे बसने जा रहे थे उस जगह का नाम था 'मेनपाट'।
हमारे गांव से तीन किलोमीटर दूर अनूपपुर रेल्वे जंक्शन था। आप में से शायद किसी ने मेरे पहले कविता संग्रह `सुनो कारीगर´ में वह कविता पढ़ी हो, जिसका शीर्षक है `अनुकपुर जंक्शन ´ और जो बाबा कारंत जी को बहुत पसंद थी । यह एक छोटा-सा जंक्शन है, जहां से सरगुजा यानी अंबिकापुर की ओर जाने के लिए आज भी गाडी बदलनी पड़ती है। अगर आप अमरकंटक जाना चाहें जो सोन और नर्मदा, दोनों का उदगम है, तब भी आपको अनूपपुर में ही उतरना पड़ेगा। यानी अब आप जान ही गये होंगे कि मेरा गांव इन दो बड़ी नदियों के उद्गम के बिल्कुल करीब है। माफ़ करिये, सोन नदी नहीं, नद है। `मेल रीवर´। उसे पुराणों में `भद्र´ कहा गया है। देश के उन पांच पुरूष नदों में से एक जिनमें व्यास, सिंधु, ब्रह्मपुत्र आदि आते हैं। कहते हैं सोन की तो नर्मदा से शादी होने जा रही थी। मंडप लग चुका था और फेरे पड़ने वाले थे। बस अचानक नर्मदा को गुस्सा आया और वे विवाह की गांठ तोड़ कर उल्टी दिशा में भाग गईं। वज़ह यह कि नर्मदा `कुलशीला´ थीं, यानी `ऊंची जाति´ की और सोन इसलिए `कुल-भ्रष्ट´ हो गया था, क्योंकि उसका प्रेम-प्रसंग एक नीची जाति की लड़की `जुहिला´ से चल रहा था। आप अगर विंध्य क्षेत्र के नक्षे को देखें तो पायेंगे कि `जुहिला´ भी एक नदी ही है, ज़रा छोटी और दुबली-पतली, लेकिन जो जाति वहिष्क्रित अपने प्रेमी सोन से , कटनी के पास, लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की दुर्गम-कठिन यात्रा करने के बाद, मिल जाती है। फिर दोनों बिहार में `पतित-पावनी´, `मोक्ष-दायिनी´ गंगा में समाहित हो जाते हैं। जब कि अपने `कुल-शील´ पर इतराती नर्मदा गंगा से कभी नहीं मिल पाती। वह भारत की अकेली ऐसी नदी है जो उत्तर से पश्चिम-दक्षिण की ओर, यानी उलटी दिशा में बहती है। हमारे गांव के लोग कहते हैं देखो भाग्य का खेल और ईश्वर की लीला, कुजात ठहरा दिया गया सोन जुहिला के साथ गंगा में मिलकर तर गया और अहंकारी नर्मदा गिरी जाके लंपट की गोदी में। कहते हैं कि समुद्र का देवता वरुण लंपट होता है, इंद्र और कुबेर की तरह। तमाम यक्षिणियों के साथ फ्लर्ट करने वाला।तब से कई साल बाद जब मैं आज नर्मदा के `सरदार सरोवर´ बांध वाले विवाद की ओर देखता हूं, तो लगता है सचमुच बेचारी नर्मदा कितनी अभागी थी। आज भी (धन) कुबेरों की वासना और लोभ की जंजीरों में जकड़ी हुई।क्या उसे अपनी जाति के दंभ का दण्ड मिला ?
ओह, मनीष जी, मैं आपको कहां भटकाने लगा। दरअसल, मैं खुद ही भटक गया था।हम तो तिब्बत के शरणार्थियों की बात कर रहे थे, जिन्हें हम सब `लामा´ ही कहते थे।तो...... `लामा´ अपने परिवारों के साथ उसी अनूपपुर के प्लेटफॉर्म पर उतरते थे। अगली गाड़ी के लिए उन्हें वहां कई-कई घंटे इंतज़ार करना पड़ता था। कई बार, खासतौर पर बरसात के दिनों में, सरगुजा की ओर जाने वाली वह अकेली गाड़ी, रास्ते में पड़ने वाली नदियों में बाढ़ आ जाने या पटरियों पर पानी भर जाने के कारण कई-कई दिनों के लिए रद्द हो जाती थी, तब `लामा´ हमारी नदी के किनारे की रेत पर आ जाते। वहीं खाते-नहाते। उन्हें वहां देखना हम बच्चों के लिए एक बिल्कुल नया दृश्य बनता। याद रखें तब तक टी वी नहीं था और सिनेमा था तो, लेकिन हमारे गाँव तक नहीं पंहुचा था॥ ..हमारे गांव और आस-पास के लोग तो ज्यादातर काले रंग के थे। मेरे कई चचेरे भाई और बहनें भी काली ही थीं। लेकिन `लामा´ लोग खूब गोरे और सुंदर होते थे। उनके बच्चे और स्त्रियां भी। बच्चे और स्त्रियां तो इतनी सुंदर होतीं, कि उन्हें देखते हमारी आंखें पलक झपकना बंद कर देतीं।
हम बच्चों को `लामा´ लोग प्यार करते थे। अपने कंधे पर लटकते गेरुआ झोले में से `लेमंचूस´ और रंगीन मीठीगोलियां देते थे। वे हमेशा मुस्कुराते हुए लगते। उनकी आंखें और उनका चेहरा, जब भी देखो तब धीरे-धीरे मुस्कुराता हंसता हुआ लगता। एक अजब सी शांति से भरा. .....और गेरुआ लबादा पहनने वाले, घुटे हुए सिर वाले बूढ़े लामाओं का तो जैसे पूरा शरीर ही किसी बहुत धीमी मुस्कान में डूबा हुआ लगता।
गांव वाले कहते कि ये लोग बुद्ध भगवान के पुजारी हैं। तो क्या वह बुद्ध की मुस्कान थी, जो उनकी पूरी देह और उनकी समूची उपस्थिति में दिखाई देती थी ? बुद्ध की वही मुस्कान, जिसके नाम पर तब से लगभग सैंतीस साल बाद 1998 में भारत की , अपने आपको 'धार्मिक' कहने वाली, सरकार ने परमाणु बम ब
