Friday, July 22, 2011

लेखक भाषा का आदिवासी है


(१५ फरवरी 2011  को  यह वक्तव्य मैंने लिखा था. तकनीकी असुविधाओं के बावजूद इसे आज अपने गाँव में लगा रहा हूँ. साहित्य अकादमी पुरस्कार का यह औपचारिक  'स्वीकार -वक्तव्य' था. पिछली पोस्ट मैंने २ मार्च को लिखी थी, लगभग चार महीने बाद, दिल्ली से १०५७ (एक हज़ार सत्तावन) किलोमीटर दूर, सारी दूरियां लांघते हुए एक बार फिर आपके पास हूँ.)

मुझसे कहा गया है कि मुझे साहित्य अकादेमी द्वारा ‘मोहन दास’ को दिये गये पुरस्कार को स्वीकार करते हुए, इस संदर्भ में अपनी ओर से कुछ कहना है। यह एक परंपरा रही है। मेरे असमंजस और दुविधा की शुरूआत ही यहीं से होती है। मैं क्या कहूं? 
मुझे लिखते-पढ़ते हुए कई दशक हो चुके हैं। लिखने की शुरूआत बचपन से ही कर दी थी, जब खड़ी हिंदी बोली ठीक ढंग से आती भी नहीं थी। तब कभी यह सोचा नहीं था कि इसी भाषा में एक दिन सिर्फ लेखक बनना है। ऐसा लेखक, जिसकी सामाजिक अस्मिता और जीवन का आधार किसी एक भाषा में लिखने तक ही सीमित होकर रहता है। रोलां बाथ जिसे ‘पेपर बीइंग’ कहते थे। तरह-तरह के कागजों़ पर स्याही में लिखे या छपे अक्षरों-शब्दों में, उन्ही के जरिये किसी तरह अपना अस्तित्व बनाता हुआ प्राणी। आज के समय में वे होते तो कहते आधिभौतिक आभासी व्योम में द्युतिमान अक्षर या शब्द के द्वारा अपने होने को प्रमाणित करता कोई अस्तित्व। यानी 'कहीं नहीं' में 'कहीं होता' कोई अ-प्राणी। ‘ए वर्चुअल नॉनबीइंग।’ यानी ‘ए सोशल नथिंग।’ किसी अप्रकाशित को महाशून्य में प्रकाशित करने की माया रचता भासमान अनागरिक। आकाशचारी ‘नेटजन’। 
बचपन जैसा असुरक्षित और भटकावों से भरा रहा, उसे देखते हुए, आकांक्षा यही थी कि आगे चलकर एक सुरक्षित और अपेक्षाकृत स्थिर वास्तविक जीवन मिले। इसके लिए वास्तविक कोशिश भी की। परिश्रम किया। परीक्षाओं में अंक अच्छे लाए। यह सारा प्रयत्न उसी भाषा में किया, जिसमें लेखक के रूप में उपस्थित और जीवित रहता था। सोचा कोई नौकरी मिल जाएगी तो वास्तविक जीवन गुज़र जाएगा। समाज-परिवार की जिम्मेदारी निभ जाएगी। किसी मध्यवर्गीय नागरिक की तरह। फिर एक समय, जब युवा होने की दहलीज़ पर ही था, यह लगा कि अपने लिए तो सभी जीते हैं। इतना आत्मकेंद्रित क्या होना? जो किताबें पढ़ता था, उनसे भी यही प्रेरणा मिलती थी कि अपने समय को अधिक न्यायपूर्ण, सुंदर, मानवीय और उत्तरदायी बनाना चाहिए। इतिहास ऐसे प्रयत्नों के बारे में, उन प्रयत्नों की सफलताओं-असफलताओं के बारे में बताता था। उपन्यास, कविताएं, दर्शन, विज्ञान और मानविकी की तमाम पुस्तकों में ऐसे संकेत और विवरण थे। कलाएं भी इसका उदाहरण बनती थीं। नितांत अकेलेपन और एकांतिक पलों में उपजने वाली भाषिक-वाचिक अभिव्यक्तियों या अन्य कलाओं में भी यह प्रयत्न दिखाई देता था। लेकिन इन सबमें सबसे प्रगट और शायद अधिक ठोस, साफ और आसान-सा उपक्रम जहां दिखता था, उसे राजनीति या सामाजिक कर्म कहते हैं। तो मैं उधर भी गया। इस सबके पीछे ऐसा लगता है कि कोई महान मानवीय-सामाजिक कार्य करने, बड़ा परिवर्तन लाने का कोई आत्मबलिदानी आदर्श या क्रांतिकारी लक्ष्य किसी समय रहा होगा। जिस पीढ़ी का मैं था, वह पीढ़ी ही कुछ-कुछ ऐसी थी।
आज इस उम्र में, इतनी दूर आकर कह सकता हूं, कि शायद वह सारा प्रयत्न भी मेरी अपनी ही सुरक्षा और अस्तित्व की चिंता से जुड़ा हुआ था। एक स्तर पर वह कहीं गहराई से व्यक्तिगत भी था। शायद हम किसी भी परिवर्तन की कोशिश  में तभी सम्मिलित होते हैं, जब हम उसमें स्वयं अपनी मुक्ति और अपनी स्थितियों में बदलाव देखते-पाते हैं। मेरे पास भाषा और अपने शरीर के अलावा कोई दूसरा साधन और ऐसा माध्यम नहीं था, जिससे मैं दूसरों, और इस तरह अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए ऐसा सामाजिक प्रयत्न कर सकता। तो एक दीर्घ समय तक, बल्कि अपने जीवन के सबसे बड़े हिस्से को, मैंने वहीं खर्च किया। यही सोचते हुए कि एक ऐसे समाज और समय में, जिसमें मेरे जैसे अन्य सभी सुरक्षित और स्वतंत्र होंगे, उसमें मैं भी स्वतंत्रता और नागरिक वैयक्तिक गरिमा के साथ रह सकूंगा। 
आज इतने वर्षों के बाद भी मुझे लगता है कि मैं इस भाषा, जो कि हिंदी है, के भीतर, रहते-लिखते हुए, वही काम अब भी निरंतर कर रहा हूं। जब कि जिन्हें इस काम को भाषेतर या व्यावहारिक सामाजिक धरातल पर संगठित और सामूहिक तरीके से करना था, उसे उन्होंने तज दिया है। इसके लिए दोषी किसी को ठहराना सही नहीं होगा। वह समूची सभ्यता का आकस्मिक स्तब्धकारी बदलाव था। मनुष्यता के प्रति प्रतिज्ञाओं से विचलन की यह परिघटना संभवतः पूंजी और तकनीक की ताकत से  अनुचर बना डाली गई सभ्यता का छल था। मुझे ऐसा लगता है कि इतिहास में कई-कई बार ऐसा हुआ है कि सबसे आखीर में, जब सारा शोर, नाट्य और प्रपंच अपना अर्थ और अपनी विश्वसनीयता खो देता है, तब हमेशा इस सबसे दूर खड़ा, अपने निर्वासन, दंड, अवमानना और असुरक्षा में घिरा वह अकेला कोई लेखक ही होता है, जो करुणा, नैतिकता और न्याय के पक्ष में किसी एकालाप या स्वगत में बोलता रहता है। या कागज़ पर कुछ लिखता रहता है। किसी परित्यक्त अनागरिक होते जाते बूढ़े की अनंत बुदबुदाहट, कभी किसी पुरानी स्मृतियों के कोहरे और अंधंरे से निकलती और कभी किसी स्वप्न के बारे में संभाव्य-सा कुछ इशारा करती। इसे ‘सॉलीलाक्वीस’ कहते हैं। मैं ज़रा-सा भाग्यशाली इसलिए हूं कि इस स्वगत को सुनने वाले बहुत से लोग मुझे अपनी ही नहीं, दूसरी अन्य भाषाओं में भी मिल गये हैं। इसमें हमारे अपने देश  की भी भाषाएं हैं और दूसरे कुछ देशों  की भी।
एक प्रश्न हमेशा मेरे सामने आ खड़ा होता है। वह यह कि जिस धरती पर मैं भौतिक रूप से रहता हूं, जिस शहर, समाज या राज्य में, उसका मालिक आखिर कौन है? किसका आधिपत्य उस पर है? किसी नागरिक, प्रजा या मनुष्य  के रूप में उस मालिक ने मुझे कितनी स्वतंत्रता दे रखी है? उसकी हदबंदियां और ज़ंजीरें कहां-कहां हैं? और ठीक इसी से जुड़ा हुआ, इसी प्रश्न के साथ, इसी प्रश्न का दूसरा हिस्सा भी सामने आ जाता है कि जिस भाषा में मैं लिखता हूं, उस भाषा का मालिक कौन है? वह कौन सी सत्ता है, जिसके अधीन यह भाषा है? जैसा मैंने अभी कहा, लेखक और कुछ नहीं, भाषा में ही अपना अस्तित्व हासिल करता कोई प्राणी होता है। भाषा ही उसका कार्यक्षेत्र, उसका देश , उसका घर और उसका अंतरिक्ष होती है। उसकी संपूर्ण सत्ता भाषा में ही अंतर्निहित होती हैं। लेकिन मैंने अक्सर पाया है कि भाषा और भूगोल, या शब्द और राज्य, दोनों को अपने अधीन बनाने वाली सत्ता एक ही होती है। कई तरह के प्रतिपक्षी और प्रतिभिन्न पाठों में प्रकट होते शब्दाडंबरों या डेमॉगागी के आर-पार वर्चस्व की वही संरचनाएं रहती हैं, जो किसी धरती के नागरिक या किसी भाषा के लेखक की स्वतंत्रता को नियंत्रित, अनुकूलित या अधीन करती हैं। हर तरह की ऐसी सत्ता, मुझे अनिवार्य रूप से लगता है कि अपने मूल चरित्र में सर्वसत्तावादी होती है। इतिहास ने और मेरे अपने ही जीवन की स्मृतियों और अनुभवों ने इस धारणा को पुष्ट ही किया है। यह सत्ता राज्य-व्यवस्था ही नहीं, किसी भी भाषा में विनिर्मित उन विचार-सरणियों को भी अधिगृहीत कर लेती हैं, जिनमें सबकी मुक्ति की कोई संभावना होती है। पिछले दो-ढाई दशकों के मेरे अनुभवों और संज्ञान ने यह बोध मुझे दिया है। इसीलिए, जिस भाषा में मैं लिखता और रहता हूं, वह मेरे लिए, सिर्फ ‘हिंदी’ नहीं रह जाती। वह जीवन और यथार्थ का एक ऐसा जटिल प्रश्न बन कर उपस्थित होती है, जिसे किसी कथा या कविता या अपने किसी बयान में कहता हुआ मैं सत्ताओं के संदेह के घेरे में अक्सर आता रहता हूं।


इसके बाद इस जगह मैं चुप रहूंगा।



मैं स्मरण दिलाना चाहूंगा कि पिछली सदी के ठीक बीतते ही, जब सब नयी सहस्राब्दी के स्वागत की मुद्रा में थे, मैंने एक लंबी प्रेमकथा लिखी थी -‘पीली छतरी वाली लड़की’। आप अगर ध्यान दें, तो लोकरंजक सरलता के उस सहज पाठ में भाषा और मनुष्य का गहरा अनुचिंतन और विखंडन एक साथ विन्यस्त था। अपने नये कविता संग्रह-‘एक भाषा हुआ करती है’ का भी ध्यान मैं दिलाना चाहूंगा। मुझे लगता है कि  हो जाने की अस्मिता हासिल होने के बाद उसकी स्वतंत्रता किसी भी जातीय, सांप्रदायिक, धार्मिक, लैंगिक या राजनीतिक या डेमॉगागिक वर्चस्व से नियंत्रित होती ही है। हर लेखक को, अगर उसने अन्य अस्मिताओं के सारे आवरण और कवच उतार दिये हैं और उसके पास अपने जीवन और अपने आत्म की रक्षा के लिए भाषा के अतिरिक्त कोई दूसरा उपकरण नहीं बचा है, तो उसे हमेशा अपनी इस पराधीनता या औपनिवेशीकरण  से मुक्ति का प्रयत्न करना ही पड़ता है। 



मेरा यह भी मानना है और इसे मैं पिछले लंबे अर्से से कहता आ रहा हूं कि लेखक वस्तुतः अपनी भाषा का मूलनिवासी या आदिवासी होता है। उसकी भाषा ही उसका जल, जंगल, ज़मीन और जीवन हुआ करता है। किसी लालच या अन्य उन्माद में सभ्यताएं हमेशा किन्हीं आदिवासियों को उसके स्थान से विस्थापित करती आयी हैं। यह सिर्फ किसी कोलंबस का ऐतिहासिक वृत्तांत भर नहीं है, बल्कि एक ऐसा सर्वव्यापी सच है, जो आज तक देखी-जानी गई हर तरह की सत्ता-संरचना को शर्मशार कर सकती है। आज जब मैं यहां आपके सामने अपना यह वक्तव्य पढ़ रहा हूं, उस समय आप सब देख रहे हैं कि पूंजी और तकनीक की ताकतों के साथ जुड़ी लोभ की सत्ता ने किस व्यापक पैमाने पर हिंसा और संवेदनहीनता के साथ निरस्त्र मूलनिवासियों को उनकी जड़ों से उखाड़ना शुरू किया है। यह एक तरह का सभ्यता का उन्माद है। एक ऐसा मनोरोग जो किसी खास जगह नहीं, बल्कि संसार के सभी वंचित, वध्य, सत्ताहीन और शांत-अहिंसक मूलनिवासियों के जीवन में ‘होलोकास्ट’ पैदा कर रहा है। कई साल पहले मिशेल फूको की किताब -‘सभ्यता और उन्माद’ पढ़ी थी, उसे इस डरावने ढंग से प्रमाणित होते आज हम अपने सामने देख रहे हैं।
भाषा भी पूंजी और तकनीक के साथ जुड़ी लोभी सत्ता-संरचनाओं की चपेट में है। इसके विस्तार में मैं नहीं जाना चाहूंगा। उतना समय भी नहीं है। लेकिन इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि भाषा भी अब एक जिंस और एक उत्पाद भर मान ली गई है और इससे जुड़े जितने भी अकादेमिक, व्यापारिक और राजकीय उद्यम हैं, किसी सचमुच स्वतन्त्र नागरिक लेखक की उसमें कहीं कोई जगह नहीं है। वह विस्थापन के ठीक उसी बिंदु पर है, जिसमें हमारे समय की वंचित मूलनिवासी मनुष्यता है। 
मैं साहित्य अकादेमी को धन्यवाद देता हूं और उस निर्णायक मंडल के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं, जिसने मेरी लंबी कहानी या आख्यान ‘मोहन दास’ को यह सम्मान दिया। जाहिर है, कोई भी पुरस्कार किसी भाषा और भूमि में किसी मनुष्य का पुनर्वास तो नहीं कर सकता, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मैं अपनी खुशी यहां प्रकट करता हूं। 
यह खुशी इसलिए अर्थ रखती है कि इस राज्य के एक नागरिक के रूप में मैं कुछ अपेक्षाकृत सुरक्षित-सा अनुभव कर रहा हूं।

आप सबका हृदय से आभार।      
                          

Wednesday, March 2, 2011

दो साल पहले की एक पोस्ट, जिसे मैने 'डैशबोर्ड' के आर्काइव से निकाला

(यह पोस्ट मैने दो साल पहले लिखी थी। आज अचानक ही अपने ब्लाग के 'डैशबोर्ड'  की सफाई के लिए गया तो यह वहां मिला । ..अक्सर ऐसे पोस्ट को लगाया नहीं जाना चाहिये। किसी खास मूड और हताशा के पलों  में  वे पैदा होते हैं। ..लेकिन फिर भी इसे मैं लगा रहा हूं । इसे स्वस्थ ढंग से लिया जाय और जो हमेशा सत्ता, संपर्क, जोड-तोड, गुट्बाजी आदि में मुब्तिला रहते हैं, वे एक बार ज़रूर सोचें कि उनकी इन गतिविधियों से अकेला उदय प्रकाश ही नहीं, हज़ारों-लाखों लेखक प्रभावित-प्रताडित होते रहते हैं। कई तो गुमनामी और वंचना के अंधेरे में हमेशा के लिए खो जाते हैं।....
यह पोस्ट मैं इसलिए भी लगा रहा हूं कि अब हालात और बिगड चुके हैं...! हांलाकि दूसरी ओर एक ऐसी विराट जागृति भी क्षितिज में उभरती दिखाई दे रही है, जो भ्रष्टाचार, निरंकुशता, झूठ, जाति-नस्लवाद आदि को समूल उखाड फेंकने के लिए मिस्र, लीबिया से लेकर सारी दुनिया में अपनी मौज़ूदगी दर्ज करा रही है।
बस इसे पढिये और इसे लेकर अगर जातिवादी-सत्तापरस्त-राजनीतिक गुटों ने तूल बनाना शुरू किया तो अपने इस लेखक के साथ रहिए। अपनी भाषा, अपने समाज, अपने देश को स्वतंत्र, समतामूलक, बिरादराना और आधुनिक बनाने के लिए लंबी लडाई लडें।
सच मानिये इस सब में मेरा कोई निजी स्वार्थ नहीं है। बल्कि यह एक जोखिम ही है, जिसे मैं  फिर मोल ले रहा हूं।  )


(पुरानी पोस्ट : असंपादित ) 


मैंने आख़िरी पोस्ट जुलाई को लिखी थी और आज २७ नवम्बर हैं|.....बीच का समय यात्राओं और भटकावों से भरा हुआ है| थकान, उलझनों, खुशियों और तनावों में डूबता-उतराता |
जब मैं दिल्ली से जा रहा था , रास्ते में पत्नी कुमकुम ने कहा आपको याद है आज जुलाई है| इसी तारीख को ३१ वर्ष पहले हमने विवाह किया था|
हमारे सामने सड़क थी| एक हज़ार पचास किलोमीटर आगे हमें अपने गांव जाना था | मध्य प्रदेश और छत्तीस गढ़ का सिवान | हम अपना ठिकाना खोज रहे थे | कहीं बसने की कोशिश| 

फिर तीन महीने सात दिन छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में ही बीते | दुर्ग, रायपुर, अम्बिकापुर, रीवा, शहडोल, उमरिया, अनूपपुर ..... और उस इलाके के कई गांव | एक दूसरी उपत्यका| एक और उपग्रह | एक दूसरा हिन्दुस्तान |

जिस दिन मैं वहां अपने गांव पहुचा , उसके अगले दिन १३ जुलाई को ठूनू की मृत्यु हुई | पिछले साल मैं उसे एक चश्मा दे आया था | वह खुश था और वह और जीना चाहता था | लेकिन ७० की उम्र में वह सुबह कुयें के जगत पर दातून करते हुए मर गया |
गांव में हल्ला था कि वह पंचक में मरा है | और अब वह अपने साथ इस गांव के पांच जीवित लोगों को और ले जायेगा |
गांव ऐसे ही भय और अंधविश्वास में जीते हैं | आज भी |

लेकिन यह भय सच था |
सत्रह दिनों में मेरे गांव और उसके आस-पास के टोलों में छः लोगों की मृत्यु हुई | समीरा ने आत्महत्या की| सौरहा टोला की एक औरत रात में सांप काटने से मरी | दो लोग  बुढापे के कारण मरे | लेकिन अगर उन्हें ठीक खाना मिलता और ज़रूरी दवाईयां, तो वे दस-पन्द्रह साल और जी सकते थे | दो मौतें मैलेरिया से हुई | गाजर घास और लन्टिना जैसे खर-पतवारों के बेतहाशा फैलाने से घातक मैलेरिया उस पूरे इलाके में बहुत फैल रहा है | नए किस्म के मच्छर उन्ही की जड़ों में पनपते हैं , ऐसा लोगों ने बताया |

लेकिन वहां की सबसे बड़ी बीमारी का नाम है -गरीबी |

बिजली वहां कुल मिलाकर - घंटे के लिए आती है | मोबाइल के नेटवर्क ठीक से काम नहीं करते | मेरा 'एयरटेल' गूंगा-बहरा हो चुका था |

जब जुलाई को दिल्ली छोड़ कर हम लोग जा रहे थे तब सेंसेक्स २०,००० की गगन चुम्बी उंचाइयां पार कर चुका था | संसद में नोटों की करोडों की गड्डियां बटते हमने वहां कसबे के एक दोस्त के घर पर टी वी पर देखा | यह किसी दूसरी दुनिया से आने वाली खबरें होती हैं | उस दुनिया से जहां से राजनीति और ठेकेदार और बंदूकें आती हैं | जहां से हिंसा और उत्पीडन के सामान आते हैं |

ठूनू , समीरा, सुखानिया सभी की कथाएं हैं | उन सभी का जीवन हमारे समय का ही आख्यान था | मोहनदास की तरह, या टेपचू और वाकणकर की तरह | शायद हम सबकी तरह | पूंजी और राजनीतिक सत्ता के उपनिवेशों में अपनी अपनी त्रासदियां और दुखांत रचते हुए|

मोहनदास १७ -१९ जुलाई को ओसियान फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाई गयी | फ़िल्म के प्रोड्यूसर यानी उत्तर प्रदेश के राज्य परिवहन के अफसर , जो हिन्दी की एक साहित्यिक पत्रिका भी निकालते हैं, सवर्ण हिन्दी के उस तथाकथित  वामपंथी गुट के साथ जुड़े हुए हैं, जिसका हर बडे पुलिस अधिकारी, आई.इ.एस. अफसर, मंत्री आदि से गहरा अनैतिक और बेशर्म संबंध है| अपने ३२ साल के दिल्ली के जीवन में मैंने जिसके किसी भी मेंबर को 'बेरोजगार' कभी नहीं देखा| अखबारों, कारपोरेट घरानों, सरकारी संस्थानों में जो, तमाम लाभ के पद और पुरस्कार बटोरता उसी तरह टहलता है, जैसे ये सभी उसके फ़्लैट के टायलेट हों| 
वह हर जगह मौज़ूद है। वह सबसे ऊंची जातियों का है। 
श्रम से अधिक जुगाड और 'लायज़निंग'  पर वह निर्भर है।  लेकिन वह नाजिम हिकमत, ब्रेख्त, नेरूदा. लोर्का, पाश, फैज़ और तमाम क्रांतिकारी कवियों लेखकों के नाम ऐसे लेता है, जैसे वे उसकी निजी जागीर हों| 
ऐसे लेखकों आप अकेला कभी नहीं देखेंगे। वह गिरोहबंद है। चोम्स्की जिसे 'क्लेप्टोक्रेट' कहते हैं, यानी 'लुटेरा-माफिया समूह', यह वही है। यह किसी को भी हिंदी में तबाह करने की ताकत रखता है। 
लेकिन इसे परास्त करना इसलिए ज़रूरी है क्य़ोंकि बिना इसके अपनी भाषा को स्वतंत्र और आधुनिक नहीं किया जा सकता। 


बहरहाल, 'मोहन दास' फिल्म का यह प्रोड्यूसर पिछले कुछ वर्ष किसी संगीन आरोप में निलंबित भी रह चुका है|  इसी प्रोड्यूसर  और मेरे कई डाक्युमेंटरीज  में कैमरामैं रह चुके और अब मेरे ही कारण पहली बार किसी फ़िल्म के  निर्देशक बने व्यक्ति ने मुझे निमंत्रित नहीं किया था |
वजह ?
मैं इसे समझ पाने में हमेशा असफल रहा करता हूँ|
हद तो यह थी कि  अपने कई इंटरव्यू में निर्देशक ने कहानी को अपनी मौलिक कल्पना घोषित किया था | ये सारे लिंक नेट पर उपलब्ध हैं|
लेकिन पता चला कि तमाम युवाओं ने अपने ब्लॉग पर और कई समीक्षाओं में इन सब कोशिशों की धज्जियां बिखेर दीं| अगर 'मोहन दास' पहले से ही इतना लोकप्रिय न हो गया होता, उसके इतने अनुवाद और इतने मंचन न हुए होते, तो हिंदी साहित्य का  एक पूरा गिरोह इस तैयारी में था कि इसे विवादित कर दिया जाय|
वे ऐसा कई बार कर चुके हैं..! मेरी रचनाओं में व्यक्तियों की खोज, उसे 'नक़ल' आदि कहना और अपने संपर्क के जरिये अखबारों में अभियान चलाना..! यह एक डरावना आतंकवाद है|  एक तरह का  फासीवाद|

लेकिन  हर बार जनता ने, तमाम भाषाओँ के बौद्धिकों-रचनाकारों ने हस्तक्षेप किया है| और हम बचे हैं|

वे मेरे पाठक ही हैं...और वे सारे युवा जो मेरी अस्मिता को बचाए हुए हैं..!
हर बार, अचानक वे कहीं से आते हैं और मुझे अंधेरों में से निकाल लेते हैं..!
पता चला 'जनसत्ता' में कुंवर नारायण जी ने भी लिखा कि कि जब ओसियान में 'मोहन दास' दिखाई जा रही थी, तो उदय प्रकाश कहाँ थे?  कहीं उनके साथ फ़िल्म बनाने वालों ने वही तो नहीं किया, जो इस फ़िल्म में 'मोहन दास' के साथ किया गया?
उनका मैं कृतज्ञ हूँ| 'आत्मजयी' जब अपने बचपन में, गाँव में पढी थी, उसके बाद ही कठोपनिषद खरीद लाया था| उनके अन्दर कोई एक गहरी नैतिक करुना   है, ऐसा मुझे हमेशा  लगता है| 

खैर, अगर आप एक लेखक, कलाकार और कवि का जीवन जीते हैं तो अन्यायी और भ्रष्ट ताकतें आपके साथ वही व्यवहार करती है , जो उन्होंने 'मोहनदास' के साथ किया, या जो वे अपने समय के अशक्त, गरीब, मेहनतकशों और नागरिकों के साथ करती हैं |
 ओसियान में  फ़िल्म के क्रेडिट के डिस्प्ले के साथ भी ऐसा ही हुआ |

जिस दिन दिल्ली में ओसियन फ़िल्म फेस्टिवल में मोहनदास फ़िल्म दिखाई जा रही थी उस दिन मैं अनूपपुर की सब्जी मंडी में दोअपहर और रात के खाने के लिए सब्जी खरीद रहा था| तभी मोबाइल बजा| उधर से अजीत कौर बोल रहीं थीं|  पंजाबी की विख्यात लेखिका, सार्क लेखक संगठन की संयोजिका और अकादमी आफ फाइन आर्ट्स की संचालक|
दिल्ली में एक ऐसी उपस्थिति, जिनसे मैं शायद ही कभी मिलता होउं, लेकिन जब भी, जहां कहीं भी मेरा लिखा कुछ छापता है, उनका फोन ज़रूर आता है| आत्मीयता से भरा| दुलारता-सा| प्रोत्साहित करता|
वही आवाज़ थी| 'उदय जी आप कहां हैं?...मैं अभी मोहन दास देख कर निकली हूं| पूरे अपने जीवन में मैं चार बार रोई थी, आज इस फ़िल्म में सात बार रोई हूँ...!'
..उनकी आवाज़ में वही वत्सलता है|
'मैं अपने गाँव में हूँ और इस वक्त मोहन दास मेरे साथ ही है|' मैं अपनी भावुकता को संभालते हुए कहता हूँ|
थोड़ी ही देर में फोन डेड हो जाता है| ऐसा ही होता है यहाँ|  बात पूरी भी नहीं हो पाई थी|

मैंने लगभग दिल्ली छोड़ने का फैसला कर लिया है|
ज़हालत है, अगर आप ताकतवर नहीं हैं, किसी गिरोह में नहीं हैं, किसी अफसर, मंत्री, व्यावसायिक घराने, माफिया के सदस्य नहीं हैं| आश्चर्य है की यहाँ शायद ही कोई यह सुनने के लिए तैयार हो कि २५ साल बिना किसी नौकरी के रहना कितना मुश्किल और जानलेवा है|
वे सब मुस्कुराहटों से भरे, संतुष्ट, अघाए और आर्थिक रूप से सुरक्षित लोग हैं|
दसवीं दर्जे की शिक्षा है लेकिन वि.वि. और कालेजों के प्रोफेसरों की नियुक्ति करते हैं|  मुश्किल से ग्रेजुएट हैं लेकिन केन्द्रीय विश्व विद्यालयों के एकेडमिक कौंसिल के सदस्य हैं|
वे मेरे समकालीन हैं| वे सब महान हैं| खैर!

यहाँ गाँव में स्थितियाँ विकट हैं|  पहले से भी बदतर|
ग्रामपंचायतों में इतना भ्रष्टाचार और इतनी हिंसा की मैंने कभी कल्पना नहीं की थी| खदानों में नंबर दो का अवैध उत्खन हर जगह चल रहा है और इसमें समूचा राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र शामिल है|

मुझे डर भी लगता है कि अगर मैं यहाँ रहा तो कहीं मुझे भी 'नक्सल' न घोषित कर दिया जाए| अगर ऐसा किया गया तो मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि अपने आप को वामपंथी कहने वाले सवर्ण हिन्दी लेखक, जो अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े 'लेखक संगठनों' को चलाते हैं और राजधानियों में रहते हुए अपने बेटे, दामाद, बेटी, प्रेमिका, पत्नी, जाती-बिरादरी को हर सरकारी संस्थान में फिट कराते रहते हैं और जो अतीत की तमाम महा-वृत्तांतों ..१८५७, गांधी, भगत सिंह, मार्क्स-लेनिन वगैरह का नाम लेते रहते हैं, वे सब मेरी यंत्रणा में सत्ता के और मददगार होंगें|
उनके तो ऐसे बड़े-बड़े पुलिस अफसरों से करीबी रिश्ते हैं, जिनके अध्: पतन के किस्से मैं सुनता रहता हूँ| उन सबको वे मुक्तिबोध, रेणु अदि बताते रहते हैं...!ओह!

लगता है मैं इस पोस्ट को लिख नहीं पाउँगा ..! मैं अपनी उँगलियों को, जो की-बोर्ड पर चल रही हैं..अपने दिमाग से अलग नहीं कर पा रहा हूँ ..!
या हज़रत ...औलिया ...! हे ईश्वर, मुझे शक्ति दे...! सच कहने की शक्ति..! 

Sunday, January 16, 2011

वह, जिसे शोक कभी नहीं घेरता, वह असल में 'युगपुरुष' नामक चीज़ ही है


आज (१६ जनवरी २०११) हिंदी के वरिष्ठ कवि, आलोचक, संस्कृतिकर्मी, कला चिंतक अशोक वाजपेयी ७० वर्ष के हो रहे हैं। आज ही 'जनसत्ता' के अपने नियमित स्तंभ 'कभी-कभार' में उन्होंने लिखा है :
''किसी ने आपसे नहीं कहा था कि आइये, साहित्य रचिये। यह आपका (अपना) फैसला था कि आप साहित्य और उसमें भी कविता जैसी उदास विधा में काम करेंगे। पर आप जानते हैं कि भले इस फैसले में दूसरों की कोई भूमिका नहीं थी, (लेकिन)  दूसरे न होते तो आप एक अधसदी से ज्यादा इस काम में लगे न रहते, जब कि उसे छोड़ कर कुछ अधिक लाभकारी, अधिक दृश्य करने के लालच (अवसर) लगातार मिलते रहे हैं। आप अगर विरत या निराश होकर कहीं और नहीं गये तो शायद इसलिए कि आपको लगता रहा है कि दरअसल आपका असली घर भाषा है: आप उसी में रहते हैं, उसी में जीते आये हैं और उम्मीद है कि उसी में मरेंगे। यह घर ऐसा है कि वह पूरी तरह से आपने नहीं बनाया-बसाया है। उसमें दूसरों की की बड़ी भूमिका है। वे उसमें हमेशा मौज़ूद रहे हैं। भाषा एक ऐसा घर है जिसमें जब आप अकेले भी हों तो अदृश्य ढंग से ही सही, दूसरे मौज़ूद रहते हैं: शायद कवि-मित्र कमलेश ने इसी को 'खुले में आवास' कहा है और उससे भी पहले गा़लिब ने 'बेदरोदीवार का इक घर'। इस विश्वास से डिगने का कभी कभी अवसर नहीं आया कि भाषा का सच उतना ही सच है जितना कि और कई तरह के सच; कि कई मायनों में वह अधिक टिकाऊ सच है, कि वह कई बार अधिक स्मरणीय है और कि वह छोटी-छोटी सच्चाइयों को भी अपने अंदर सहेज और बचाकर रखता है।...''
.....''इसमें संदेह नहीं कि साहित्य ने अंतत: बचाया। उसने हर हालत में मनुष्य बने रह सकने का सबक कभी स्थगित नहीं किया। उसने अंधेरे को, जो हर समय बढ़ता ही जाता है, नज़रंदाज़ नहीं होने दिया, लेकिन इस उम्मीद को (भी) बनाये रखा कि अब भी रोशनी मुमकिन है; कि हम किसे न किसी रोशनी तक पहुंच सकते या उसे थोड़ी देर के लिए ही सही, पैदा कर सकते हैं..। उसने इस इच्छा को कभी शिथिल नहीं पड़ने दिया कि हमें रोशनी चाहिए और उस पर हमारा हक है।''
आप सब जो इस मेरे  ब्लाग पर आते रहे हैं और अपना संबल देते रहे हैं, जानते ही हैं कि पिछले कुछ वर्षों से मैं 'भाषा' को लगातार और बारबार 'शरण्य' या 'घर' कहता रहा हूं। महान भाषा-चिंतकों को भी कई बार उद्धृत करते हुए, धीमी आवाज़ में ही सही, लेकिन निरंतर कहने की कोशिश की है कि लेखक ही भाषा का मूल-निवासी या आदिवासी है और उसे वहां से बेदखल करने वाली शक्तियां वे रही हैं जो उसे अपने किसी उपनिवेश में बदलने के लिए लगातार सक्रिय रही हैं। भाषा में उसके मूल निवासी की यह ज़रा-सी जगह बची रहनी चाहिए। जब-जब ऐसा नहीं हुआ है तब-तब स्वयम लोकतंत्र की मूल प्रतिज्ञाओं का ही उल्लंघन हुआ है। आज के अपने स्तंभ 'कभी-कभार' में भी और इसके पहले भी साहित्य और कलाओं के ऐसे औपनेवेशीकरण की मुखालफ़त में, उसकी स्वायत्तता और गरिमा के पक्ष में अशोक वाजपेयी ने कई बार लिखा है। मुझे कोई कारण नहीं लगता कि उस पर अविश्वास करूं सिर्फ़ इसलिए कि इससे उनके बीच मेरी स्वीकृति बढ़ेगी, जो अर्से से उन पर अविश्वास करते रहे हैं।
यह ब्लाग मेरी निजी डायरी या निजी नोटबुक की तरह है। इसे मैं किसी साहित्यिक पत्रिका या अन्य किसी सार्वजनिक जगह की तरह नहीं बरत रहा। आज भी वही बात है। मैं खुश हूं और अशोक वाजपेयी को उनके ७० वें जन्मदिन पर ढेरों--ढेरों शुभकामनाएं देता हूं और यह आकांक्षा करता हूं (शायद 'प्रार्थना' करने या 'दुआ' करने के लिए अपने दोस्तों के बीच अधिक जाना जाता हूं) कि वे इससे भी अधिक ऊर्जा और सक्रियता के साथ आने वाले सुदीर्घ समय तक वही सब कुछ करते रहें जो वे कर रहे हैं, बल्कि आधी से भी अधिक सदी से करते रहे हैं।
वे हमारे समय के एक बहुत बड़े व्यक्तित्व हैं उनका अपना एक 'आभा/ प्रभा-मंडल' है। हर बड़े ग्रह-नक्षत्र का ऐसा 'प्रभा-मंडल' होता ही है। उनके उस मंडल को बनाने वाले और उससे प्रदीप्त होने वालों में मेरी कोई जगह कत्तई नहीं है। मैं उनके विचारों और उनके विन्यासों या भाषिक भंगिमाओं का लेखक हूं भी नहीं। शायद मैं  इस पल जो कुछ यहां लिख रहा हूं, वह लिखते हुए मैं लेखक भी नहीं हूं। शायद जिस स्थिति और जिस जगह पर स्वयम अशोक जी और उनके प्रभा-मंडल के अन्य लेखक हैं, वहां तक मेरे होने की टिमटिमाहट भी नहीं पहुंचती होगी। पहुंच पाती नहीं होगी।  आज उनके बारे में 'जरत्कारु' और 'विष्णुप्रिया' जैसी विलक्षण कविताएं लिखने वाले, अपने भाषिक संस्कारों में मेरे भी बहुत प्रिय रहे कवि कमलेश जी ने उन पर लिखते लिखते कुछ हिचकिचाहट दिखाई है।.. मैं उस 'हिचक' को थोड़ा-सा गाढ़ी स्याही से उभारते हुए लिखना चाहता हूं कि यह स्वीकारने में अब कोई हिचक या संकोच नहीं होना चाहिए कि संस्कृति और साहित्य के निर्धारित समय और जगह में अशोक वाजपेयी निस्संदेह 'युग-पुरुष' ही हैं। उन्होंने यह 'पद' अपनी कर्मठता, प्रतिभा और संकल्प से हासिल कर डाला है।  उनका यह 'युग-पौरुषत्व' कई बार दूसरों या 'अन्यों' को खटकता होगा, लेकिन इससे फ़र्क क्या पड़ता है?

यह एक संयोग ही है कि कुछ साल पहले प्रख्यात आलोचक डाक्टर रामविलास शर्मा पर 'डाक्युमेंटरी' -'कालजयी मनीषा' बनाते हुए मैंने  उन्हें एक जगह 'ऋषि' कह डाला था, तब  बाद में यह जान कर आश्चर्य हुआ था कि लिखित में अशोक वाजपेयी यह विशेषण उन्हें कुछ पहले ही दे चुके थे। कौन नहीं जानता कि डाक्टर रामबिलास शर्मा उन विचारों के कत्तई नहीं थे, जिनके लिए अशोक जी जाने जाते हैं। सतत आमंत्रण के बावज़ूद 'भारत भवन' न आने की ज़िद और संकल्प से अविचलित रहने और तमाम तरह के प्रलोभनों के प्रति अपनी सहज विरक्ति रखने वाले, निष्कंप और खासे अकादमिक मार्क्सवादी डाक्टर रामबिलास शर्मा किसी भी तरह से अशोक वाजपेयी की सौंदर्याभिरुचि या भाषिक आस्वाद के लेखक आलोचक नहीं थे। लेकिन उनके प्रति जिस सम्मान और उदात्तता का परिचय अशोक जी ने दिया था, मुझे लगता है अभी तक 'शीतयुद्ध' की मन:स्थिति में रहे आने वाले लेखकों-आलोचकों को भी वैसे ही 'वैचारिक खुलेपन के बड़प्पन' का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। अशोक वाजपेयी ने अपने कर्म और सृजन से हमारे समय में जो लंबी रेखा खींची है, उसे खरोंचने-मिटाने के प्रयत्न, मुझे पूरा विश्वास है कि अब     हास्यास्पद और क्षुद्र्त्व भरे ही सिद्ध होंगे।
यह कहा जायेगा कि ऐसा 'विरुद गान' मैं इसलिए कर रहा हूं कि अभी-अभी 'मोहन दास' को जो साहित्य अकादमी सम्मान दिया गया है, उसकी ज्यूरी में अशोक वाजपेयी भी थे और मैं यह उसकी कृतज्ञता के एवज में लिख रहा हूं। यहां मैं यही कहना चाहता हूं कि मैं अशोक जी का प्रिय कवि और रचनाकार कभी नहीं रहा (हांलाकि मेरे नये कविता-संग्रह 'एक भाषा हुआ करती है' का ब्लर्ब उन्होंने ही लिखा है) उनके स्तंभ और आलोचनात्मक लेखन में भी मेरा ज़िक्र शायद ही कहीं रहता हो। मेरी तरफ़ भी लगभग यही बात लागू होती है। मैंने उन पर कभी कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं लिखा। जो भी लिखा, वह एक समय 'पोलिटकली करेक्ट' रहने के लिए, उन्हें आहत करने के लिए ही लिखा। स्वाभाविक रूप से उन्हें मेरा असंदिग्ध दुस्साध्य शत्रु होना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मेरा उनसे व्यक्तिगत संपर्क भी लगभग नहीं है। बल्कि मुझे यह बाद में पता चला कि वे साहित्य अकादमी की ज्यूरी में भी थे। यह भी बताने की कई कोशिशें हुईं कि मैं उनकी पहली पसंद नहीं था। इसे मानने में भी मुझे कोई संदेह नहीं। लेकिन मैं इस तथ्य को कैसे भुलाऊं कि इसके पहले 'द्विजदेव' और 'फिर उसके बाद 'कृष्णबलदेव वैद सम्मान' के भी निर्णायक वही थे। ऐसा वे क्यों करते रहे ? मैं समझ नहीं पाता। लेकिन सच यह भी है और यह मेरा निजी सच  है कि उनके लेखन और व्यक्तित्व से मै निरंतर प्रेम करता रहा हूं। मैंने अभी अपना ५८ वां साल इसी १ जनवरी को पूरा किया है, इसलिए पूरे एक युग की दूरी मेरे और उनके बीच है। वे अभी भी अपने को 'बूढ़ा' मानने से कतराते हैं, जब कि मैं बचपन से ही बूढ़ा हो चुका था। मुझे लोग बताते हैं कि जब मेरी उम्र ५-६ साल की रही होगी और लोग मुझसे पूछते थे कि तुम्हारी उम्र कितनी है तो मैं कहा करता था 'अस्सी साल' ! ..और लोग हंसा करते थे।  तो आज जब यह लिख रहा हूं तो शायद मैं दो-ढाई सौ साल का हो चुका होऊंगा...।
मैं उनकी एक कविता 'देवता हमें पुकारेंगे' की कुछ पंक्तियां उद्धृत कर रहा हूं :

''जब पाप या प्रेम करने की बची न होगी शक्ति,
जब एक लहूलुहान भाषा और जर्जर शरीर भर होंगे पास,
जब शब्द उड़ रहे होंगे चिंदियों की तरह हवा में
तब किसी पुराने छज्जे से
स्वप्न की किसी ऊंची चट्टान से
सदियों से बंद किसी खिड़की से
देवता हमें पुकारेंगे..''
(जारी....)

(अभी तीन दिन पहले ही राजस्थान-मुंबई के सफर से लौटा हूं और अभी भी कई कामों में उलझा हुआ हूं। कल या परसों इस टिप्पणी को पूरा पोस्ट करूंगा। पिछले साल  अशोक वाजपेयी का एक चित्र अपने कैमरे से खींचा था। अच्छा तो नहीं आया था, लेकिन उसे फोटोशाप से कुछ बदल कर लगा रहा हूं।)

Sunday, October 10, 2010

'पार्थक्य' और 'एकांत' और मेरी कविताएं



('पचास कविताएं' :  किताब की भूमिका)
कविताएं बचपन से ही मेरे सबसे निकट रही हैं। वे मेरे अस्तित्व के एकांत, निस्संग सन्निकटता और नीरवता की सबसे भरोसेमंद और अटूट साथी रही हैं। कई बार जब यह गहरा संदेह पैदा होता है कि इस समय और स्थान में, जहां चारों ओर अनगिन सत्ताओं का सर्वव्यापी साम्राज्य है, क्या सचमुच मेरी भी कहीं कोई मौलिक सत्ता और कहीं कोई प्रामाणिक अस्तित्व  है, क्या मैं भी कहीं ‘उपस्थित’ हूं, तो कविता ही उसका, कमज़ोर ही सही, पर सबसे पहला और शायद अंतिम प्रमाण होती है।
जब सारी सत्ताएं साथ छोड़ जाती हैं, या उनके फैसलों का शोर चारों ओर गूंज रहा होता है, तो वह कविता ही है, जहां अपनी आवाज़  साफ सुनाई देती है। कविता कभी भी, पराजय, विध्वंस, आत्महीनता और गहरे दुखों के पल में भी हाथ और साथ नहीं छोड़ती। वह एक ऐसे निरापद दिक-काल का निर्माण करती है, जहां पूंजी से लेकर राजनीति, धर्म, नस्ल, जाति, मास-मीडिया और तकनीक की तमाम संगठित सत्ताओं की हिंसा और अन्याय के विरुद्ध किसी वंचना या विराग में डूबा एक गरीब या फकीर अपना कोई सबसे मानवीय, नैतिक और पवित्र फैसला सुनाता है। दिक और काल, समय और यथार्थ, निजता और समूह, व्यक्ति और सत्ता-प्रणालियों के बारे में कोई धीमा, मंद, निजी निर्णय। एक ऐसा अस्फुट एकालाप, जो बहुत करीब से, ध्यान लगाकर ही सुना जा सकता है।
कविता समूची प्रकृति और मनुष्यता के उत्पीड़न और विनाश में लगी सबसे बलशाली ताकतों के ‘पाप’ (नैतिक) और ‘अपराध’ (सामाजिक-संवैधानिक) के खिलाफ़ हमेशा  कोई न कोई ‘फतवा’ जारी करती रहती है और अपने जीवन को बार-बार दांव पर लगाती है। वह हर बार कोई न कोई जोखिम या खतरा मोल लेती है और हर बार किसी संयोग या चमत्कार से बच निकलने पर अपना पुनर्जीवन हासिल करती है और एक बार फिर सांस लेना शुरू करती है। फिर से किसी नये जोखिम भरे दायित्व का बोझ उठाने के लिए।
मुझे याद है, जब मैं बहुत छोटा था और मां कैंसर में मर रहीं थीं। डाक्टरों ने जवाब दे दिया था और उन्हें मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल से गांव के घर में वापस ले आया गया था। पिता जी के पास सारे पैसे और जेवर खत्म हो चुके थे। अब कोई भौतिक और बाहरी मदद मां के लिए निरर्थ हो चुकी थी। वे सिर्फ अनार का रस पी रहीं थीं। तब भी वह कविता ही थी और चित्र, जिनके जरिये मैं अपनी मां को बचाने के लिए कैंसर से पूरे भरोसे के साथ लड़ रहा था। मां की मृत्यु के वर्षों बाद तक उस कमरे की दीवारों पर, जिसमें मां अपने जीवन में रहतीं थीं, मेरी बनाई अनगिनती आकृतियां थीं और उतने ही शब्द, जो उस समय मेरी समझ में अबूझ शक्तियों से भरे थे और वे मृत्यु को कहीं दूर रोक कर, मां को मेरे लिए बचा सकते थे।
ऐसा लेकिन नहीं हुआ। शब्द और दीवारों या कागज़ों पर, किसी अकेले निर्बल कलाकार या कवि द्वारा उकेरे गये अक्षर या आकार अक्सर प्रत्यक्ष और प्रबल भौतिक शक्तियों के हाथों पराजित होते हैं, मिटा दिये जाते हैं। लेकिन जिसके पास कोई और बल न हो, दूसरा कोई विकल्प ही न हो, तो बार-बार अपने इन्हीं उपकरणों की ओर लौटने के, कोई दूसरा चारा भी तो नहीं होता।
तमाम सारी बाहरी ताकतें जब भाषा पर आक्रमण करती हैं और स्मृतियों का विनाश करने के अपने राजकर्म या वणिककर्म में संलग्न हो जाती हैं, तो कविता मनुष्य या किसी व्यक्ति की स्मृतियों को बचाने के प्राणपन संघर्ष में मुब्तिला होती है। विस्मरण के विरुद्ध एक पवित्र और ज़रूरी संग्राम की शुरुआत सबसे पहले कविता ही करती है, अगर वह अपने किसी अन्य हितसाधन में नहीं उलझ गयी है, और सबसे अंत तक वही उस मोर्चे पर रहती है। सबसे पहले और सबसे अंत में यह मोर्चा भाषा का ही होता है। कविता की एक ऐसी निजी कवि-भाषा, जो जीवन के अनुभवों से अपना अर्थ प्राप्त करती है, प्रचलन, प्रयोग और मुहावरों से नहीं। कविता भाषा के चालू प्रत्ययों, मुहावरों और वागाडंबरों (रेटरिक या डेमागागी) को नष्ट करती है। उन्हें प्रश्नांकित करती है। .....और जो कविता जितना अधिक यह काम करती है, वह अपने विरुद्ध उतना ही विस्मरण का विरोध एकत्र करती है।
एक तरफ वह स्मृति की रक्षा करती है, दूसरी ओर वह भाषा में शब्दों के अर्थ की भी रक्षा और उनका पुनरुद्धार करती है। वह शब्दों में नये अर्थों को आविष्कृत भी करती है। वह शब्दों को उनकी विनषट स्मृतियों के साथ बचाते हुए उन्हें किसी शरणार्थी शिविर तक पहुंचाती है। उनके घावों पर मलहम लगाती है और पट्टियां बांधती है। हमारे समय में, भाषा का अलग-अलग गैर-मानवीय या मनुष्य-विरोधी परियोजनाओं में जैसा ‘इस्तेमाल’ किया गया है, उसके संदर्भ में मुझे पोलिश भाषा के अपने प्रिय कवि ताद्युश रोज़ेविच की कविता 'शब्द’ की याद आ रही है -‘‘बचपन में शब्द मलहम की तरह घावों पर लगाये जा सकते थे/ हम दे सकते थे उसे/ जिसे हम प्यार करते थे/’’(इस कविता का अनुवाद इस ब्लाग पर पहले मैं दे चुका हूं।)
हर सच्चे कवि को संसार की बाहरी सत्ताएं भाषा और अपने समाज से हमेशा बेदखल करती हैं। वह विस्थापन और उत्पीड़न की यातना उसी तरह भोगता है जैसे कोई आदिवासी या संस्कृति और समाज का सबसे निचला वर्ग और वर्ण।  वह कविता या रचना ही है, जो उसे करुणा और सहानुभूति से भरे, एक पवित्र और अपेक्षाकृत सुरक्षित शरण्य में आश्रय देती है। ......और वह थोड़ी-सी गरिमा जो हर मनुष्य और हर तरह की कला के लिए अभीष्ट है।
कहीं पढ़ा था कि कविता किसी अनजान देश के किसी छोटे-से स्टेशन के निर्जन प्लेटफार्म में देर रात खड़ी किसी रेलगाड़ी की तरह होती है। बिल्कुल खामोश। अपनी अगली यात्रा को फिलहाल कुछ समय तक स्थगित करती हुई। बीच-बीच में, कभी-कभी इंजन से निकलती भाप से ही पता चलता है कि सांस अभी कायम है। .....और अभी आगे कुछ स्टेशन और हैं, जहां तक यात्रा जारी है।
राजनीतिक सत्ताएं कभी भी किसी कविता को ईनाम नहीं देतीं। क्योंकि वे हमेशा पिछली कुछ सदियों में कविता विरोधी सिद्ध होती आई हैं। मेरा अभिप्रेत गहन मानवीय संपृक्ति और प्रतिबद्धता की कविता से है। आज तक के इतिहास में किसी भी धार्मिक या व्यापारिक या राजनीतिक सैद्धांतिकी या  विचारधारा की कोई भी राज्यसत्ता ऐसी नहीं पाई गई है, जिसने प्रतिपक्ष की या किसी अकेले मनुष्य की अपने से असहमत, विसंवादी स्वर में बोलती कविता को बर्दाश्त किया हो। बेदखली, दण्ड, निर्वासन, उपेक्षा, उत्पीड़न, प्रताड़नाएं और अंतत: कवि की मृत्यु ही अक्सर ऐसी कविता का ईनाम हुआ करता है। मैं आपसे पूरी पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ कह रहा हूं, कि मैं ऐसा ही कवि हूं और यही बने रहना चाहता हूं।
जैसा मैंने पहले कहा, अपने बचपन से शब्दों और रंगों को मैंने अपने सबसे अधिक करीब पाया। बहुत निकट। यदि बाहर का संसार मुझे निराश और दुखी करता था, या अगर वहां रहते हुए मुझे अपने,(मुक्तिबोध के शब्दों में) ‘अकेलेपन और पार्थक्य’ का बोध होता था, या अगर वहां की सत्ताओं के सामने मैं स्वयं को बहुत निर्बल और असहायता से भरा पाता था, तो वे शब्द और रंग ही होते थे, जो मेरा संबल और मेरे सहचर बनते थे। वे बहुत नैतिक, निर्दोष, गहरी संवेदनात्मकता और सहानुभूति से भरे होते थे। मैंने उनके साथ और उन्होंने मेरे साथ बहुत-सा समय बिताया है। लगभग एक जीवन भर। इस साथ-साथ के समय का बहुत रोमांचक, कौतुक भरा, स्वप्नों और शोक-हर्ष से भरा एक अलग आख्यान है, जिसे कभी संभव हुआ तो मैं लिखूंगा। .....और आज जब मैं ये पंक्तियां लिख रहा हूं, तब भी, सिर्फ वही मेरे साथ हैं। लेखक होने के अतिरिक्त मेरी कोई अन्य अस्मिता नहीं है। नागरिक, पारिवारिक संबंघ-संज्ञाएं, कौटुंबिक-जातीय सूत्र, सांस्थानिक, धार्मिक-राजनीतिक संबंद्धताएं आदि जो अन्य प्रचलित-परिचित अस्मिताएं होती हैं, उनमें से अधिकांश से मुक्त होने, उन्हें छोड़ने की मैंने या तो स्वयं कोशिश की है, या फिर उनमें से बहुतेरी प्रत्यक्ष बाहरी निरंकुश और भ्रष्ट सत्ताओं द्वारा अन्यायपूर्वक मुझसे छीन भी ली गई हैं। ......और मैं एक ऐसे एकांत में घिर गया हूं, जो भाषा के तमाम सामूहिक-औपचारिक संरचनाओं और उद्यमों-व्यवसायों से बने एक शोर-ओ-गुल से भरे समाज से निर्वासन का एकांत है। यह प्रीतिकर नहीं, पीड़द है। पर यह निर्वासन इतिहास के एक बहुत विराट~ सभ्यतामूलक अनुभव के साथ भी  मुझे जोड़ता है। इसीलिए यह एक ‘प्रिवेलेज’ भी है। यह एक ऐसी अवस्थिति है जो मेरे अनुभवों और अवस्थिति को, मेरी चेतना और संवेदना को इस देश की उस विराट~ वंचित मनुष्यता की नियति के साथ जोड़ देती है, विस्थापन और उत्पीड़न, संघर्ष और छलनाएं ही जिसका इतिहास है।
मुझे यह मानने में कत्तई हरबार यह दिक्कत होती है कि अपने इस ‘निर्वासन’ का निर्माण मैंने स्वयं किया है। या जैसे कि यह निर्वासन मेरी कोई अपनी चुनी हुई चीज है और अपनी इस नियति और अवस्थिति का समूचा उत्तरदायित्व मेरे अपने ऊपर ही है। ऐसा अगर कोई कहता है, तो सीधे-सीधे उस पर संदेह किया जाना चाहिए । निश्चयात्मक संदेह। क्योंकि जिस समय और यथार्थ में हम हैं, उसमें ऐसे लोग स्वयं उस सत्ता के ही प्रच्छन्न प्रतिनिधि हैं,  जो इस समय के हर विस्थापित और उत्पीड़ित समूह, वर्ग, जाति या व्यक्ति की नियति का उत्तरदायी किसी उत्पीड़क सत्ता-प्रणाली को नही, बल्कि स्वयं उसी को मानते हैं, जो उसका शिकार है। वे अपराधी हैं और अलग-अलग महावृत्तांतों के मृत वागाडंबरों के पीछे छुपे अनैतिक आतताई हैं। आज के मुहावरे में वे सत्ताओं के दलाल हैं।
लेकिन यह जो निर्वासन या विस्थापन है क्या यह कोई ऐसा अलगाव है, जिसने मुझे मेरे समय और यथार्थ से काट दिया है, पृथक कर दिया है और उसकी सारी सूचनाएं मुझ तक पहुंचनी बंद हो गई हैं? मुझे लगता है वास्तविकता इसके ठीक उलट है। इस दूरी से संभवत: मुझे वह सारा प्रपंच अधिक साफ दिखाई देता है, जो निकट होने पर ओझल और अगोचर हो जाता था। मुक्तिबोध ने अपने एक निबंध में ‘एकांत’ और ‘पार्थक्य’ का महत्वपूर्ण विश्लेषण किया था -
‘‘यह पार्थक्य घनघोर है। यह मेरा किया नहीं है। मैं इस पार्थक्य का विधाता नहीं। वह मेरे ज़माने की बदनसीबी है। जिस चबूतरे पर मैं खड़ा हुआ हूं, उसके पाये का वह पाप है। आज से दस-बीस साल पहले यह कहा जाता था कि कलाकार हमेशा अकेला होता है। इस पर मेरी टिप्पणी केवल इतनी ही है कि हर आदमी को, सोचने-विचारने के लिए, मनो-मंथन के लिए, एकांत चाहिए, जिसमें केवल वह ही हो और कोई न हो। कलाकार का जीवन चूंकि अधिकतर मनोमय है (व्यस्त रहते हुए भी) इसलिए मुझे एकांत आवश्यक है। अपने मनोमय जीवन में प्रत्येक व्यक्ति अकेला होता है। यह स्वभाव-सिद्ध है। (लेकिन) अकेलापन और पार्थक्य में अंतर है।’
मुझे नहीं लगता कि मुक्तिबोध की तरह किसी अन्य लेखक-कवि ने अकेलेपन के ऐसे दुर्निवार एकांत का सामना कभी किया हो। निर्मल वर्मा या अज्ञेय का एकांत और अकेलापन अलग तरह का था। मुक्तिबोध के वे पत्र, जो उन्होंने अंग्रेज़ी में अपने गहरे मित्र नेमिचंद जैन को लिखे, उनके निर्वासन और पार्थक्य-बोध की सांद्र-सघन तीव्रता को सामने लाते हैं। यह अकेलापन अपनी अनुभूतिपरक बनावट में, सतह से देखने पर, पहली दृष्टि में,  निर्मल वर्मा, काफ्का या किसी भी विलक्षण रचनाकार के एकांत के भले करीब लगता हो, लेकिन यह उस अप्रतिम बौद्धिक का भी अकेलापन है, जो अपने समस्त स्नायुतंत्र के साथ आत्मस्थ नहीं, मूलत: विश्वचेतस या कालचेतस है। वह तिलक की तरह जेल में रहते हुए ‘गीता-रहस्य’ भी लिख सकता है, नेहरू की तरह ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ भी और जूलियस फ्यूचिक की तरह ‘फांसी के फंदे से’ भी। हमारे समय के किसी भी सच्चे रचनाकार के पास असंख्य आंखें और असंख्य ‘एंटिना’, ‘राडार’ और  ‘स्कैनर’ होने चाहिए। यह उसका संकटग्रस्त जीवन ही उसे दे सकता है, कोई विनिर्मित भाषिक भंगिमा नहीं। आप यातनाग्रस्त  और अन्यायी दोनों एक साथ नहीं हो सकते। वंचित और लुटेरा दोनों कोई अगर एक साथ होने का दावा करता है, तो उसके पीछे का कोई रोचक विडंबनाओं से भरा-पूरा वृत्तांत भी ज़रूर  होगा। ऐसा आज के समय में होता भी है। इसकी खोज़  मैं अक्सर कथाकार बन कर किया करता हूं और आप सब वह किस्सा तो जानते ही हैं .....।
मुक्तिबोध ने अपने इसी निबंध में एक जगह लिखा है -
‘‘किनारे रह कर, तटस्थ रह कर, (डिसएंगेज्ड रहकर, अनकमिटेड रहकर) जिंदगी जीना भद्रलोक के सफ़ेद कुर्तों के आरामकुर्सीदार वातावरण में भले ही पहुंचा दे, भले ही हम भद्रलोक की शानदार सादगी तथा आरामदेह चमकीलेपन के रंगों से अपने आसपास के अल्प-भोजियों को अपनी महत्ता का बोध करा दें, भले ही हम अपने मित-भाषण द्वारा बौद्धिक संस्कृति और कलात्मक अभिरुचि की की धाक जमा दें, किंतु हम वह ज़िंदगी नहीं जी सकते जिसे मैं, अपने शब्दों में, बिजली की  तड़पदार ज़िंदगी कहता हूं। ऐसी ज़िंदगी जिसमें अछोर, भूरे, तपते मैंदानों का सुनहलापन हो, जिसमें सुलगती कल्पना छूती हुई भावना को पूरा करती है, जिसमें सीने का पसीना हो और मेहनत के बाद की आनंदपूर्ण थकन का संतोष हो। बड़ी और बहुत बड़ी ज़िंदगी जीना (इम्मेंस लिविंग) तभी हो सकता है, जब हम मानव की केंद्रीय  प्रक्रियाओं के अविभाज्य और अनिवार्य अंग बन कर जियें। तभी ज़िंदगी की बिजली सीने में समाएगी।चाहे प्रगतिवादी हो या प्रयोगवादी, जिसने भी उच्च-मध्यवर्ग की सफेदपोश भद्रता के महत्व की कुर्सियों पर आराम किया कि वह गया, मर गया। ऐसा मेरा खयाल है। यह खयाल कुछ लोगों के लिए खतरनाक है-चाहे वे कितने ही प्रगतिवादी या इसके विपरीत बंगले के निवासी तकली-कातू गांधीवादी क्यों न हों! हमारे बहुत से साथी इसी ज़िंदगी में स्वर्ग देखना चाहते हैं और अपने बाल-बच्चों को स्वर्ग दिखाना चाहते हैं।’

विख्यात पोलिश कवि, जिनका अपना जीवन भी सतत निर्वासन और यंत्रणाओं के बीच गुज़रा, अदम जगाजेयेव्स्की की कविता की पंक्तियां याद आती हैं :

'‘मैं अब पहले की तरह दर्शन शास्त्र, कविता और
दूसरी जिज्ञासाओं का छात्र नहीं रह गया हूं
मैं वह युवा कवि नहीं हूं अब
जिसने कविता की तमाम पंक्तियां लिखीं
जो भटका किया असंख्य संकरी गलियों-सड़कों
और विभ्रमों की सुरंगों में


घड़ियों की सत्ता और अंधेरे की परछाइयां ही
मेरी बरौनियां अपने हाथों से छूती थीं


लेकिन आज भी
किसी नक्षत्र का थोड़ा-सा उजाला
मुझे मेरी राह सुझाता है
और वह थोड़ा-सा उजाला ही है
जो मुझे नष्ट कर सकता है


या बचा सकता है ।''

मैं आपसे, अपने पाठकों और मित्रों और शुभेच्छुओं से बहुत भावुकता और साफगोई के साथ यह कहना चाहता हूं कि ‘वह थोड़ा-सा उजाला' मेरी कविताओं को आज तक आपसे मिला है, जिसने मुझे हमेशा नष्ट होने से बचाया है। शायद यही कारण है कि मेरे दो-तीन दशक पूर्व प्रकाशित कविता संग्रहों से लेकर हाल-फिलहाल के संग्रह तक, अपने नये-नये संस्करणों में लगातार आते रहे, भले ही मैं आलोचकों-आचार्यों की कवि-कुल- सांस्थानिक सूचियों में अनुपस्थित पाया जाऊं। यह सब आप सबके कारण ही संभव हुआ। यह सच है। मैं बहुत सहज होकर, समूची विनम्रता के साथ यह सच भी कह रहा हूं कि मैंने कवि होने के लिए कोई अन्य उपक्रम कभी नहीं किये।
आप सबके प्रति गहरी कृतज्ञता से भरा मैं अपने अलग-अलग संग्रहों की पिछली पचास कविताओं के साथ इस किताब में एक जगह उपस्थित हूं।


वैशाली, सोमवार, 4 अक्तूबर, 2010

(‘भारत भूषण अग्रवाल सम्मान’ की 25 वीं वर्षगांठ के समय इसका किंचित- तात्कालिक और संक्षिप्त रूप लिखा गया था। प्रस्तुत संकलन की भूमिका  के लिए मैंने उसे अधिक  परिवर्धित और कुछ विस्तृत किया है। यह किताब वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित हो रही है।)

Monday, September 20, 2010

'तिरिछ' : वे चार पत्र जो किस्सा बन गये

(आज, १५ नवंबर, २०११ को अचानक पुरानी चिट्ठियों में 'तिरिछ' के बारे में कन्नड़ भाषा के महान भारतीय कथाकार यू.आर. अनंतमूर्ति जी का ४ वर्ष पहले भेजा गया पत्र मिल गया। इतनी आवेग और आत्मीयता के साथ लिखा गया यह पत्र मेरे लिए एक धरोहर की तरह है। )
कल रात पुरानी चिट्ठियों की फाइल उलटते-पलटते कुछ ऐसे भी पत्र मिले जो अब, इतने वर्षों बाद, स्मृतियों में किसी कहानी की तरह ही कौंधते हैं। आप सब, जो मेरे लिखे को पसंद करते हैं, के अलावा ये पत्र भी ऐसे हैं, जो लिखते रहे आने का ढाढ्स और भरोसा देते हैं।
ये तीनों पत्र आज से लगभग चौथाई सदी पहले (२५ साल के आसपास) लिखी गयी कहानी 'तिरिछ' से संबंधित हैं। इनमें से एक पत्र तो मेरे दोस्त और साथी  सफ़दर हाश्मी का है और अन्य तीन पत्रों में से दो इसी कहानी की एक पाठिका  पूनम वर्मा के पत्र हैं। उनके कुल चार पत्र मुझे मिले थे, जिनमें से एक तो मेरे जन्मदिन की बधाई (१ जनवरी) का कार्ड था, दूसरा कहीं खो गया। उस खोये हुए पत्र की कुछ यादें अभी भी बाकी हैं। तीसरा पत्र एक अप्रत्याशित-सा पत्र था। 


 कई बार लगने लगता है, किसी लेखक का जीवन, समय के साथ-साथ बीतते हुए, किसी किस्से जैसा ही होता जाता है।
इसे अपने ब्लाग में इसलिए भी प्रस्तुत कर रहा हूं कि किसी भी रचना की गरिमा, उसके अर्थ और महत्व का असली आधार उसके पाठकों की स्वीकृति और उनकी प्रतिकृया ही होती है। ऐसे लेखक, जो अपनी भाषा में कुछ नया और प्रचलन से हटकर कुछ करने का जोखिम उठाते हैं, उन्हें शक्ति, प्रेरणा और संबल हमेशा अपने पाठकों से ही मिलता है। सांस्थानिक और जिसे 'मुख्यधारा' की आलोचना  के नाम से जाना जाता है, वह प्रचलित और वर्चस्वशील आलोचना अपनी ताकत भर इसे अस्वीकृत करती है।



इन पत्रों को मैं अपने दोस्तों और अपने प्रियजनों के लिए ही यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। क्योंकि सच यही है कि वही मेरे शब्दों को शक्ति और उन पर मुझे भरोसा देते हैं। इन पत्रों पर या इन्हें यहां प्रस्तुत करने पर लेखकों की बहस वगैरह से मुझे प्रसन्नता नहीं होगी। एक फ़िल्म कभी देखी थी, उसका एक पात्र अदालत में न्यायाधीश से यह प्रश्न पूछता है: 'ऐसा क्यों होता है हमेशा कि जो भी व्यक्ति अपने देश के लोगों से प्यार करता है, और लोग भी जिसे अपना लेते हैं, उस देश की 'सरकार' (गवर्नमेंट) या सत्ताएं उसकी शत्रु हो जाती है?'
(इस पोस्ट को ब्लाग में लगाने के कुछ ही देर बाद कुछ मित्रों ने कहा कि अब तो ऐसे पत्र ही लिखे जाने बंद हो गये हैं। ईमेल और एस.एम.एस. का ज़माना आ गया है। संयोग ही था कि तीन साल पहले इसी कहानी के कन्नड़ अनुवाद पर 'संस्कार' जैसे कालजयी उपन्यास के रचनाकार, सुविख्यात  महान साहित्यकार यू.आर.अनंतमूर्ति जी का एक' ईमेल' भी मुझे मिला था, जो बाद में  किसी पत्रिका में छपा था, उसे भी पोस्ट कर रहा हूं। )


Friday, September 10, 2010

मेधा पाटकर की कविता की 'अंतर' और 'उत्तर-पाठिकता' : एक विचार

(१९९६ में बरगी बांध के विस्थापितों के लिए किए जा रहे आंदोलन में भाग लेते हुए मेधा पाटकर को वहां के कलेक्टर और एस.पी. ने रुखन जंगल के वन विभाग के रेस्ट हाउस में १३ दिन तक रखा था। इसी में एक तेंदुआ भी पिंजड़े में रखा गया था। कहा जा सकता है कि सरकारी रेस्ट हाउस, जो सिर्फ़ सरकारी अफ़सरों और राजनीतिक नेताओं आदि (तथा उनका खुशामदी, उन पर  आश्रित वह वर्ग जिसे हम चोम्सकी जैसे चिंतकों के शब्दों में 'अदृश्य सरकार' (इनविजिबिल  गवर्नमेंट) कहते हैं ) के  लिए ही ज़्यादातर इस्तेमाल होता है, उसमें मेधा पाटकर और वह तेंदुआ, दोनों कैद में ही थे। मेधा पाटकर ने यह कविता उन्हीं दिनों लिखी थी। पहली बार यह कोलकता से प्रकाशित होने वाली पत्रिका- 'वागर्थ' के सितंबर, २०१० अंक में प्रकाशित हुई है। यह कविता आप भी पढें। लेकिन इस कविता को पढ़ते हुए इसके 'अंतर-पाठ' और 'उत्तर-पाठ' पर ज़रूर विचार करें, यह मेरा आग्रह है। निहायत सहज भाषा में, अत्यंत साधारण सी लगती इस कविता का 'अंतर-पाठ' हमारे आज के समय के गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक संकेतों को अंतर्भूत करता चलता है। इस कविता में आने वाले - 'छंद-मुक्त तेंदुआ और मैं' , 'रक्षा-बंधन में आज/ कल और इस पल भी/ तेंदुआ और मैं..' , 'व्यवस्था के कब्ज़े में अस्त-व्यस्त/ तेंदुआ और मैं/' , बंदूकों की नलियों में ठुसे अंधेरों में/ निद्रित तेंदुआ और मैं/' 'रेस्ट हाउस में एवरेस्ट के पहरेदार / तेंदुआ और मैं..'  जैसी सरल और समकालीन हिंदी कविता में प्रचलित भाषिक संरचनाओं में लगभग अनुपयु्क्त या विसंवादी-सी लगती  अभिव्यक्तियां वस्तुत: ऐसी अर्थवान कूट-संरचनाएं हैं; जिनके अर्थ कविता, लोकतंत्र, स्त्री अस्मिता, पितृसत्तात्मकता, राजनीतिक -प्रणाली, पर्यावरण और नागरिक अधिकारों की वास्तविक अवस्थितियों की पहचान तक पहुंच कर खुलते हैं या 'डिकोड' होते हैं।
हमारा आज का साहित्य जिन 'जगहों' से संचालित और सम्मानित-प्रतिष्ठित होता है, कविता का 'उत्तर-पाठ' उस 'पद-कूट' को रोज़-रोज़ इस्तेमाल से घिसे हुए 'रेस्ट हाउस' जैसे मामूली संबोधन से अचानक एक ऐसे गहरे और चिंताजनक अर्थाशय से संपृक्त कर देता है, कि यह कविता मामूली नहीं रह जाती, आज के समय के गहरे संकटों और उत्पीड़न के कई 'रूपों' को निर्भयता से खोलने वाली एक महत्वपूर्ण कविता बन जाती है।
यह असंदिग्ध रूप से किसी भी भारतीय भाषा की ही एक 'समकालीन' कविता है, क्योंकि 'मराठी' या  'हिंदी' जैसा साधारण लगने वाला, एक किसी 'भाषा' को संकेतित करने वाला शब्द भी, 'एक वचन' नहीं। अपने कथ्य में हमारे देश में आज के सबसे गंभीर संकट और विडंबना को धारण करने के कारण यह 'विश्व-कविता' का सहज हिस्सा बन सकने की संभावना और सामर्थ्य रखती है। इसका अन्य भाषाओं में भी अनुवाद होना चाहिए।
पर्यावरण और नागरिक-मानवीय अधिकारों के लिए वर्षों से इस संघर्षरत शांतिकामी महान व्यक्तित्व की यह कविता प्रस्तुत करते हुए मुझे गर्व और सार्थकता की अनुभूति, दोनों एक साथ है। आशा है आप भी इसे पढ़ेंगे। )



रेस्ट हाउस, तेंदुआ और मैं
मेधा पाटकर


निर्जन वन के आवरण में 'सुरक्षित'
तेंदुआ और मैं
हरे भरे बादलों और सूरज की धार से
छंद मुक्त तेंदुआ और मैं

बंदूकों की नलियों में ठुंसे अंधेरे में
निद्रित तेंदुआ और मैं
हर सुबह की आहट से दूर
तेंदुआ और मैं

रक्षा-बंधन में आज
कल और इस पल भी
तेंदुआ और मैं

अपनी ही आवाज़ सुनने में व्यस्त
तेंदुआ और मैं
बाहर से भीतर-निडर
तेंदुआ और मैं

व्यवस्था के कब्ज़े में अस्त-व्यस्त
तेंदुआ और मैं

रेस्ट हाउस में एवरेस्ट के पहरेदार
तेंदुआ और मैं।


(अनु. परवीन जहांगीर, इस कविता को उपलब्ध कराने में सिवनी निवासी व्रजकिशोर चौरसिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही  है। वे बरगी बांध आंदोलन में मेधा जी के साथ रहे हैं। अगर उन्होंने इस कविता को सुरक्षित न रख लिया  होता, तो यह  'वागर्थ ' के माध्यम से हम तक न पहुंच पाती)