Wednesday, October 14, 2009

फ्राइबर्ग की कुछ छवियां


फ्राइबर्ग एक छोटा सा शहर है। यह शिक्षा, पर्यावरण अध्ययन और शोध और वैकल्पिक जीवन-समाज की खोज के लिए जाना जाता है। आबादी मुश्किल से ढाई लाख की है लेकिन पार्कों और बाजारों में चहल-पहल बनी रहती है। जहां मैं हूं, वहां से पांच मिनट पैदल चलने पर पहाड़ शुरू हो जाता है। ऊपर विनयार्ड हैं .....अंगूर के बगीचे... । लगभग हर तरह के घने पेड़ हैं। सेब तो बिल्कुल मुफ्त है। पेडों से टपके फलों को कोई भी ले जा सकता है। नाशपाती के भी बहुतेरे पेड़ हैं। मेपल, सोरो विलो , त्रुस और तमाम तरह के वृक्ष और झाडियां।
शहर में कई दुकानें प्राकृतिक उत्पाद बेचती हैं। बायो-प्रोडक्ट। आलू, टमाटर, बियर, वाईन, कद्दू, गोभी। सभी तरह की सब्जियां।
सबसे अलग चीज़ यह लगी कि यह शहर पिछली सदी में सामाजिक नागरिक प्रतिरोध के लिए जाना गया। यहां की तमाम सड़कों के नाम उन लेखकों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि के नाम पर रखे गए हैं, जिन्होंने अल्पसंख्यक यहुदियों, औरतों, विकलांगों, गरीबों आदि को बचाने में यन्त्रणाएं झेलीं या जिन्हें गैस चेम्बरों में भेज दिया गया. एक सड़क पर लगे ऐसे ही एक नेम प्लेट पर अप्रत्याशित ही निगाह पडी तो देखा कि उसमें रोजा लक्ज़मबर्ग का नाम लिखा हुआ है। मैं ऐसे चित्रों को अवसर मिलते ही लगाऊंगा. रोजा लक्ज़मबर्ग को शायद १९१९ में गोली मार दी गई थी. कहीं न कहीं क्लारा जेटकिन के नाम पर भी कोई सड़क ज़रूर होगी.
यहां यह साफ़ देखा और महसूस किया जा सकता है कि इस छोटे से शहर में मानवाधिकारों, अहिंसा और लोकतंत्र के लिए भरपूर जागरूकता है। यहां वैकल्पिक सामाजिक व्यवस्था और जीवन शैली को लेकर तरह तरह के प्रयोग चल रहे हैं। कई मोहल्ले तो ऐसे हैं जो सामुदायिक आधारों पर चल रहे हैं। हर घर साल भर में जीतनी ऊर्जा का उपभोग कर रहा है, वह उससे अधिक ऊर्जा का उत्पादन सोलर और अन्य माध्यम से कर लेता है। यानी खपत से अचिक योगदान।
पास में ही, एक मैदान ऐसा है जिसे यहां की सरकार ने किसी कारपोरेट हाउस को व्यावसायिक परिसर बनाने के लिए बेच दिया था लेकिन उस जगह पर यहां के पर्यावरण कर्मी, कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी (जिनमें सत्तर के दशक के अति वाम और सम्लैंगिकतावादी आदि भी शामिल हैं) कब्ज़ा जमा कर धरने पर बैठे हुए हैं। वहां गीत-कविताएं वगैरह चलते रहते हैं। पोस्टर तरह तरह के हैं लेकिन मुझे पसंद नहीं आए। उनमें खोपडियां वगैरह डरावने चित्र बने हुए हैं।
शहर का केंद्रीय हिस्सा बहुत सुंदर है। एक बड़ा सा घंटा घर है जिसके नीचे से दरवाजा है। इस दरवाज़े के दोनों और शहर बंटा हुआ है। दायें बायें जाने वाली गलियां हैं जिनमें प्रवेश करेंगे तो पुरी दुनिया के देशों-संस्कृतियों की दुकानें मिल जाएंगी। स्थापत्य का ज़वाब नहीं। एक पुरी किताब लिखी जा सकती है।
हां परसों बहुत जोरों से पानी बरस रहा था। यह हेमंत की ऋतू की अप्रत्याशित वर्षा है। पत्तों में तरह तरह के रंग हैं। अनोखे। ऐसे रंग भारत से बिल्कुल अलग हैं।
तो पानी से बचने के लिए मै वहीं एक प्राचीन गिरजाघर में चला गया। वह अद्भुत था। उसके चित्र भी मैं पोस्ट करुंगा। बहुत शांति मिली। पता चला की दूसरे विश्व युद्ध की बम बारी में भी वह सुरक्षित बचा रह गया था।
आज बस कुछ ही घंटे बाद मैं यह शहर छोड़ दूंगा और कल विश्व पुस्तक मेले में मौजूद रहूंगा। फ़्रैंक्फ़ुर्ट में।
आज की रात हाइडेल्बर्ग में गुज़रेगी, अपने प्रकाशक, मेज़बान और मित्र क्रिश्चियन वाइस के घर पर। (और ..हां, एक अच्छी सूचना यह भी कल मिली है कि आपके इस लेखक की किताब 'और अंत में प्रार्थना ' के जर्मन में किए गए आंद्रे पेंज़ के अनुवाद को अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका से इस वर्ष प्रकाशित कथा-साहित्य में सबसे 'अच्छा और सबसे बिकने वाला' (यानी लोकप्रिय) का तीसरा पुरस्कार मिला है। लगभग १८ वर्ष पहले लिखी गई इस कथा (जर्मनी में यह उपन्यास के रूप में प्रकाशित हुआ है) की यहां के विद्वानों, साहित्यकारों और पाठकों की यह स्वीकृति रचनात्मक संघर्षों के प्रति एक नया आत्म विश्वास देगी। सभी का आभार।)
दीपावली की आप सबको बहुत बहुत अग्रिम शुभकामनाये।
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Tuesday, October 6, 2009






आप सबसे आज मैं दो महीने के लिए विदा ले रहा हूं। दिसंबर के पहले सप्ताह में फिर से मिलेंगे। हां, बीच में कहीं ऐसा अवसर मिला कि नेट मेरे पास है, तो हो सकता है कि आप कोई पोस्ट फिर पायें।
अब से दो घंटे बाद मैं अपने वैशाली के घर से निकल जाऊंगा और कल सुबह तक जर्मनी में रहूंगा। (वहां की घड़ी के मुताबिक सुबह सात बजे और हमारे समय के अनुसार सुबह लगभग ११ बजे) । मैंने पहले ही आपको बताया था कि आपके इस लेखक की दो किताबें 'और अंत में प्रार्थना' तथा 'पीली छतरी वाली लड़की' के जर्मन अनुवादों का लोकार्पण फ़्रैंकफ़ुर्ट के विश्व पुस्तक मेले में होगा। इसके बाद अलग अलग शहरों और विश्व विद्यालयों में रचना पाठ और व्याख्यान-विमर्श होंगे। फ़्रैंकफ़ुर्ट विश्व पुस्तक मेला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे प्रतिष्ठित पुस्तक मेला है। २००७ में भारत इस मेले का मानद अतिथि देश था। इस बार हमारा पड़ोसी देश चीन यह सम्मान पा रहा है।
मेरी यह यात्रा मेरे जर्मन प्रकाशक श्री क्रिश्चियन वाइस की सहायता और विश्व पुस्तक मेले की संयोजक समिति के निमंत्रण पर हो रही है। इसके पीछे मेरे जर्मन मित्रों और अनुवादकों और वहां के महत्वपूर्ण जर्मन-हिंदी-भारतविदों का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। उन सबके बारे में आपको समय-समय पर बताता रहूंगा। फ़िलहाल यह सूचना मुझ तक अवश्य पहुंची है कि दोनों किताबें अभी से, जितने भी लोगों ने पढ़ी हैं, सभी को पसंद आ रही हैं। यह बहुत उत्साह बढ़ाने वाली सूचना है।
आप सबका बहुत-बहुत आभार....!
ज़ल्द मिलेंगे ....!
दीवाली और इन दो महीनों के बीच आने वाले सभी त्यौहारों की अग्रिम ढेरों शुभकामनाएं...!

Monday, September 28, 2009

एक आतंकी का पति और बुद्ध की मुस्कान (दो)








सत्ताओं ने एक ऐसा समय रचा है हमारे इर्द-गिर्द कि सारे दुस्वप्न और आशंकाएं एक-एक कर सच होने लगती हैं।
उस रोज़ जब पोखरण में परमाणु के धमाके हुए उसके बाद के पंद्रह दिन पाकिस्तान में उथल-पुथल के थे। अगर सियासत के खिलाड़ी सरहद के इस पार अपनी हिंसा की ताकत का परीक्षण कर रहे थे तो सरहद के उस पार के खिलाड़ी इसे अपने लिए एक सुनहरा मौका मान रहे थे।
निर्वासन में रह रहीं बेनज़ीर भुट्टो ने तुरत बयान दिया: ''हिंदुस्तान के परमाणु केंद्रों को खत्म करने के लिए फौरन आकस्मिक हमला (preemptive action) कर देना चाहिए।''
२४ साल पहले, १९७४ में जब इसी पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण 'बुद्ध की मुस्कान' हुआ था, तब बेनज़ीर के पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने कहा था:''पाकिस्तान हज़ार साल तक घास खा कर रह लेगा लेकिन परमाणु बम ज़रूर बनाएगा।'' उस वक्त तक पेंटागन के शोध-सैन्य-बौद्धिक प्रयोगशालाओं में से कोई सैम्युएल हंटिंग्टन नहीं निकला था, लेकिन 'सभ्यताओं' की मुठभेड़ और कबीलाई टकराहट की बात इन सियासत के खूनी खिलाड़ियों के दिमाग में तब भी पैदा हो रही थी।
तब तक पाकिस्तान में सत्ता की कुर्सी के भूखे ज़िया उल हक ने बेनज़ीर भुट्टो के पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को फांसी पर नहीं लटकाया था। वे ज़िंदा थे और १९७१ के युद्ध में भारत के हाथों ऐतिहासिक हार के घावों को जेल में सहलाते हुए किसी मज़हबी फ़ैनेटिक या ओसामा बिन लादेन की ज़ुबान में बोल रहे थे : ''अब ईसाइयों के पास बम है, यहूदियों के पास बम है..! और अब हिंदुओं के पास भी हो गया है..। पाकिस्तान को इस्लाम का पहला बम बनाने के लिए सब कुछ कुर्बान कर देना चाहिए।''
(कई बार सभ्यताओं का इतिहास अशक्त और निहत्थे मनुष्यों और प्रकृति के विरुद्ध विनाश का षड़यंत्र रचने वाले पात्रों की नियति के साथ भी वैसा ही व्यवहार करता है। आज आप खुद सरहद के इधर और उधर के इन सभी पात्रों के जीवन के अंत के दहशतनाक दृश्यों को याद करिए। भुट्टो, ज़िया-उल-हक, इंदिरा गांधी, बेनज़ीर की ज़िंदगियों के आखिरी दृश्य ? ..उफ़...! क्या निर्दोष मनुष्यता और समूची प्रकृति के विरुद्ध विनाश के काम में लगे सत्ताओं के उन्मादी कोई पाठ कभी सीखेंगे ?
..... शायद अहिंसा और करुणा के जीवन और उत्तर-जीवन के प्रतीक बुद्ध के चेहरे में भी, उनके जीवन का वैसा हौलनाक अंत देख कर मुसकान नहीं, आंखों में आंसू ही रहे होंगे...!)

बहरहाल, १९९८ की उस तपती मई की दोपहर, जब भिंड-मुरैना के बीहड़ में, सड़क से कुछ हट कर एक 'मारुति-८००' खड़ी थी और एक पेड़ की वत्सल छांह के नीचे, आग की लपटों वाली लू से बचते हुए, एक दर-ब-दर परिवार आलू-पूरी और अचार खा रहा था।
उस दिन आलू और पूरी में अनोखा-अपूर्व स्वाद था।
आम के अचार का एक टुकड़ा कुतरते ही, बचपन में, अतीत की धुंधली होती स्मृतियों में कहीं बहुत दूर छूट गयी अमराइयों का स्वाद और गंध देह के भीतर तक भर जाती थी...।
वहां से कुछ ही हट कर, झाड़ियों के पास एक खरगोश, जिसका नाम चकमक और एक पामरेनियन, जिसका नाम लाइका था, लुका-छिपी या चोर-सिपाही खेल रहे थे....
और जहां से कुछ सौ किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में, दो देशों के सरहद पर बमों के धमाके हो रहे थे...
और वहां से कई समुद्र पार अमेरिका के किसी किसी उत्तरी शहर मे एक घबराहट औ बेचैनी से भरे सेमिनार के खत्म हो जाने के बाद, एक डरी हुई सुंदर उदास लड़की, एक डरे हुए, चिंतित और परेशान खूबसूरत लड़के का हाथ थामे प्रेस कांफ़्रेंस में कह रही थी :
''हां, यह सच है कि हम एक दूसरे को बेइंतेहा प्यार करते हैं।..और आज की तारीख में इसे दुनिया के सामने ज़ाहिर करते हैं।..और हमारा यह प्यार बमों और विनाश के खिलाफ़ है...!''
यह लड़की और यह लड़का उन दो देशों के थे, जिन्हें राजनीति ने एक ही शरीर को चीर कर अलग किया था। जैसे दो गुर्दों, आंखों या कलेजों के बीच एक सरहद की कांटेदार दीवार खड़ी कर दी गयी हो।
यह लड़की और वह लड़का उन दो अलग-अलग धर्मों के थे, जिन्हें एक-दूसरे का दुश्मन और खून का प्यासा बनाने में दोनों तरफ़ की सियासत और मीडिया और कार्पोरेट कंपनियां दिन रात लगी हुईं थीं।

बस वही हुआ।
मुश्किल से एक पखवाड़ा बीता और अमेरिका के एक टोही सैटेलाइट ने पाकिस्तान की चगाई की पहाड़ियों वाले इलाकों में कुछ रहस्य भरी गतिविधियों के इमेज दर्ज किये।
हिंदुस्तान में सांप्रदायिक राजनीतिक षडयंत्रों से दो सांसदों की ताकत को बढा़ते हुए संसद में बहुमत और सरकार बना लेने वाली पार्टी का प्रधानमंत्री अपनी विरोधी पार्टी के १९७१-७४ के इतिहास को दुहराते हुए इतिहास में अपने कमज़ोर घुटनों लेकिन हिंसा और उन्माद से भरी महत्वाकांक्षा की हिंसा के बल पर प्रवेश करना चाहता था।
इसके लिए जिस अंधराष्ट्रवाद को सामूहिक हिस्टीरिया की तरह मीडिया, अखबार और सरकार द्वारा फैलाया जा रहा था, उसकी शुरुआत सरहद के उस पार भी हो गयी।
पाकिस्तान के विदेशमंत्री अयूब खान ने घोषणा की :''कैबिनेट की बैठक ने फैसला लिया है कि पाकिस्तान को भी बम विस्फोट करना होगा। बस अब तारीख तय करना बाकी है।''
१८ मई को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के दफ़्तर में बीस आला लोग इकट्ठा थे। इनमें प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, विदेशमंत्री के अलावा तीनों फौज़ों के मुखिया और परमाणु वैग्यानिक शामिल थे।
जिस तरह हिंदुस्तान का बालीवुड 'खान-स्टार्स' के दम पर अपना धंधा चलाता है, पाकिस्तान के इस न्यूक्लियर ताकत के पीछे भी असली वैग्यानिक सितारे 'खान' ही थे। डाक्टर अब्दुल कादिर खान और डाक्टर मुनीर खान।
डाक्टर अब्दुल कादिर खान ने बयान दिया :'' हम १० दिन के भीतर हिंदुस्तान को दिखा देंगे कि हम क्या कर सकते हैं।''
..और २८ मई को तड़के अचानक पाकिस्तान ने अपने सारे संपर्क संसार से तोड़ लिए। उसके सारे फौज़ी हवाई अड्डों में एफ़-१६ और एफ़-७ एम.पी. लडाकू जहाज़ों को पायलेट के साथ मुस्तैद कर दिया गया कि बस सिग्नल मिलते ही वे टेक आफ़ करें।
चगाई की पहाड़ियों मे वह एक साफ़-शफ़्फ़ाफ़ सुबह थी। धूप खिली हुई थी और चमक रही थी। रात में उस इलाके में रहने वाले लोगों को वहां से हटा दिया गया था। सिर्फ़ बीस लोग उस 'शून्य-क्षेत्र' (ज़ीरो-ज़ोन) में मौज़ूद थे। इन बीस लोगों में सबसे युवा था मोहम्मद अरशद। वह वैग्यानिक, जिसकी विशेष्यग्यता 'ट्रिगर-टेक्नालाजी' यानी 'लिब-लिबी तकनीक' के लिए जानी जाती थी।
उसी मोहम्मद अरशद को आदेश दिया गया।
३ बज कर १६ मिनट पर उसने 'या इलाहा-इल्ललाह ...' की फ़ुसफ़ुसाहट के साथ मशीन की 'लिब-लिबी' दबाई और वह पाकिस्तान के इतिहास में दाखिल हो गया।
विस्फोट हो चुका था। रास कोह के काले ग्रेनाइट के पहाड़ सफ़ेद हो गये थे और थर्रा रहे थे। धरती कांप रही थी। धूल और धुएं के गुबारों ने आसमान को ढंक लिया था। एक के बाद एक पांच धमाके। विनाश की ताकत के परीक्षण के सबूत। बीस मुस्कुराती आंखें उन्हें संतोष के साथ घूर रही थीं।
उनके लिए यह पाकिस्तान के तवारीख के सबसे सुनहरे और सबसे महान पल थे। पाकिस्तान पहला दुनिया के 'न्यूक्लियर क्लब' का सातवां सदस्य बन गया था।
हिंदू, ईसाई, यहूदी, बौद्ध बमों के बाद पहला इस्लामी बम बनाने वाला देश।
प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने टेलीविज़न के प्रसारण में घोषणा की: ''आज हमने हिसाब बराबर कर लिया। हिंदुस्तान की मौज़ूदा सरकार के हाथों हमें यह कदम उठाने को मज़बूर होना पड़ा। हमारी सुरक्षा और अस्तित्व के सामने बहुत बड़ा खतरा मौज़ूद था। हम अपने वैग्यानिकों खासतौर पर डाक्टर अब्दुल कादिर......!''
इस घोषणा के ठीक पांच घंटे बाद इस्लामाबाद में भारत के राजदूत को बुला कर कहा गया : हमारे पास पक्की सूचना है कि हिंदुस्तान हमारे पर परमाणु केंद्रों पर हमला करने की बड़ी तैयारी में है। ऐसी हरकत वह ना करे वर्ना फ़ौरन तबाह्कून जवाबी कार्रवाई की जाएगी।''

इसके बाद पाकिस्तान में इमर्जेंसी लगा दी गयी और वहां की जनता के सारे अधिकार रद्द कर दिये गये।

हिंदुस्तान की डरी हुई अंग्रेज़ी की लेखिका अरुंधती राय ने किसी की भी स्मृतियों में हमेशा अमिट हो जाने वाले विलक्षण शब्दों में 'कल्पना का अंत' इन्हीं परमाणु विध्वंसों की संभावनाओं के बारे में लिखा। 'कल्पना का अंत' के हर वाक्य और उसके हर शब्द डर, दुस्वप्न और आशंकाओं में डुबे हुए थे।

यही वह डर और दुस्वप्न था जिसे अमेरिका में दो दुश्मन बनाए जाते देशों और कौमों के एक लड़के और लड़की की डरी हुई आंखों ने देखा था।
दोनों ने एक दूसरे का हाथ और ज़ोरों से थाम लिया।
दोनों की आंखों में डरी हुई मनुष्यता का प्यार लगातार गहरा और ठोस होता जा रहा था।
दोनों ने धीरे से एक दूसरे से, जैसे एक दूसरे को भरोसा दिलाते हुए, साफ़ साफ़ कहा :
'We have really..truly..fallen in LOVE ! Forever....!'

और वहां बुद्ध धीरे से हंसे होंगे, जिसे दोनों ने ज़रूर सुना होगा।

फिर इसके एक साल बाद, इन्हीं ता्रीखों में शुरू किया गया 'कारगिल यु्द्ध'। संसार के युद्धों के इतिहास में सबसे उंचाइयों में लड़ा जाने वाला यह एक ऐसा युद्ध था, जिसमें सरहद के दोनों तरफ़ के लोग, जिन्होंने दो अलग-अलग देशों की फौज़ों की बर्दियां पहन रखी थीं, बहुत बड़ी संख्या में मारे गये। कहा जाता है कि १९६९ में जब एक ही विचारधारा का दम भरने वाले सोवियत रूस और चीन के बीच सीमा विवाद हुआ था, तो जैसा भय सारी एशियाई देशों के ऊपर मंडरा रहा था, कारगिल युद्ध के दौरान भी वह भय और आशंका पैदा हो गई थी। वजह यह कि उस समय के रूस और चीन की तरह इस समय पाकिस्तान और हिंदुस्तान, दोनों के पास भी परमाणु बम मौज़ूद थे। इसका इस्तेमाल कोई भी किसी के खिलाफ़ कभी भी कर सकता था।
यही वजह थी कि कारगिल की लड़ाई ज़्यादातर ज़मीनी रही और इसमें बहुत बड़ी तादाद में सैनिकों को जान गंवान पड़ी।
गांव-गांव, शहर-शहर 'शहीदों' के ताबूत पहुंच रहे थे और मरने वालों के पिताओं, विधवाओं, बच्चों को 'पेट्रोल पंप' और कभी कुछ और ईनाम दिया जा रहा था। अश्विनी चौधरी ने हरियाणा के एक ऐसे ही 'शहीद' के परिजनों की त्रासदी पर एक औसत लेकिन मार्मिक फिल्म 'धूप' बनाई थी।

तो यही वे तारीखें भी थीं, जो भले ही किसी राष्ट्र-राज्य के इतिहास में दर्ज़ न हों, लेकिन जिसकी कहानी अमितावा कुमार की सांस बांध लेने वाली किताब 'एक आतंकी का पति' (Husband of a Fanatic) में कही गयी है। एक ओर बेहद निजी ज़िंदगी की घटनाएं और दूसरी तरफ़ दक्षिणी एशिया के दो पड़ोसी देशों के बीच की हिंसा और घृणा की राजनीति के आर-पार यात्रा करता यह आख्यानात्मक वृत्तांत अपने आप में एक अपूर्व मानवीय दस्तावेज़ है। सत्ताकेंद्रित राजनीति के मनुष्यता-विरोधी चेहरे को सार्वजनिक रूप से विखंडित करता हुआ।

तो..आइये अब उस लड़की और उस लड़के की ओर लौटें, जिन्होंने एक साल पहले अपने-अपने देशों की सरहद पर परमाणु बमों के विस्फोटों के विनाश के खिलाफ़ सारी दुनिया के सामने अपने प्यार का इज़हार किया था।
वह उदास, सुंदर और डरी हुई लड़की का नाम था - मोना अहमद।
और उस चिंतित, सुंदर, प्रतिभाशाली लड़के का नाम था.....अमितावा कुमार।
वही, जो खुद यह किताब लिख रहा था।
मोना अगर पाकिस्तान के लाहौर या कराची या किसीऐसे दूसरे शहर से आयी थी तो अमितावा भी हिंदुस्तान के बिहार या झारखंड या दिल्ली या पटना जैसे किसी इलाके से वहां आये थे।
दोनों अपने-अपने देशों और कौमों के साधारण, आम इंसानों की भावनाओं और ज़िंदगियों के यथार्थ को समझते थे। दोनों उस सियासत को जानते थे, जिसकी जड़ें ही दो मानव समुदायों के बीच के संदेह, घृणा और हिंसक टकराहटों के बीच होती हैं।
इसीलिए जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ और संसार की दुर्गम ऊंचाइयों में, हड्डियों तक को जमा देने वाली बर्फ़ में सांप्रदायिक राष्ट्रवादों के युद्ध में हर रोज़ अनमोल इंसानी ज़िंदगियां ताबूतों में कैद होने लगीं या बर्फ़ में जमने लगीं, तो उन दोनों ने फिर एक प्रेस कांफ़्रेंस किया।
उस प्रेस कांफ़्रेंस में उन दो उदास प्यार करने वाले पक्षियों ने कहा : 'हम एक दूसरे से बेइंतेहा प्यार करते रहे हैं और हम आज एक दूसरे से शादी करने का फ़ैसला करते हैं।'

कुछ देर की चुप्पी के बाद उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ मे जोड़ा :'' और हमारा यह विवाह दो देशों के युद्ध के विरोध में है।''

उस दिन भी, मुझे पूरा यकीन है, बुद्ध मुस्कुराए होंगे। ..आह! ऐसा जीवन, जिसमें निजी और सामाजिक के बीच कोई दूरी नहीं। कोई फांक नहीं। Personal is Political....!

लेकिन कानून तो किसी भी विवाह को तभी स्वीकार करता है, जब उस पर किसी धर्म या मज़हब की मुहर लगी हो। इसीलिए निकाह के लिए जब लड़का और लड़की मौलवी के पास पहुंचे तो मौलवी ने लड़के से कहा -'निकाह के लिए तुम्हें मज़हब बदलना होगा।'
लड़के ने कहा:'' मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। क्योंकि प्यार से बड़ा कोई मज़हब या रिलीज़न नहीं होता।''
''तो तुम इस्लाम कुबूल करते हो? अपना ईमान इस पर लाते हो?''
''जी हां! मैं पूरी ईमानदा्री से कहता हूं कि मेरा ईमान हर उस मज़हब पर आता है जो लोगों के बीच मोहब्बत की सीख देता है। इस्लाम भी ऐसा ही मज़हब है।''
''तुम्हें अपना नाम बदलना पड़ेगा। ... तैयार हो?''
''जी हां!''
''कौन-सा नाम तुम अपने लिए पसंद करोगे?'' मौलवी ने मुस्कुराते हुए पूछा। उस लड़के और उस लड़की के प्यार को देख कर उसे खुद कुछ बहुत अच्छा-सा लग रहा था।
(अब आज जब मैं आपके लिए, यह लिख रहा हूं तो मुझे यह ठीक-ठीक याद नहीं है कि मेरे प्रिय लेखक और एक बेह्तरीन इंसान अमितावा कुमार ने अपने लिए कौन-सा नाम चुना क्योंकि यह किताब पढे़ हुए आज कई साल हो गये। चलिये मान लेते हैं कि उस लड़के ने कहा होगा -'सफ़दर !'
यह नाम मेरे दिमाग मे इसलिए आया कि मेरे दोस्त सफ़दर के दिल में भी दूसरों के लिए प्यार के सिवा कुछ नहीं था। और शायद इसी गुनाह की कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी।)

.....तो उस दिन जब दक्षिण एशिया में दो पड़ोसी देशों के बीच युद्ध और हिंसा का विनाश सरहद पर लाशें बिछा रहा था, उन्हीं दो देशों के एक लड़के और लड़की के बीच निकाह हुआ।

मुझे पूरा विश्वास है, उस रोज़, आकाश में बुद्ध ही नहीं..सारे के सारे पैगंबर मुस्कुराए होंगे।

कारगिल युद्ध खत्म होने के बाद, हमेशा खेले जाने वाले घिसे-पिटे सियासी नाटक की तरह, दोनों देशों के शासकों ने फिर 'सदभावना' और 'शांति' का दौर शुरू किया। साम्राज्यवादी देशों के बहु-राष्ट्रीय हथियार विक्रेता कंपनियों के लिए युद्ध के बाद यह व्यापार और मुनाफे का चैप्टर शुरू हो रहा था। राजनीति और व्यापार दोनों के लिए युद्ध और शांति दोनों खपत और मुनाफ़े के लिए ज़रूरी होते हैं और वे अपनी मर्ज़ी से दोनों के पन्ने पारी-पारी पलटते रहते हैं।

जीटी करनाल रोड से दिल्ली से लाहौर जाने वाली 'सदभावना बस' चलाई गयी। इसमें पहले मुसाफ़िर वही सांप्रदायिक और हिंसक सियासी शतरंज के खिलाड़ी थे जिहोंने परमाणु बमों के धमाके किये थे और हज़ारों निर्दोषों को एक व्यर्थ के युद्ध में झोंक दिया था। अब नये दृश्य में वे एक-दूसरे को लड्डू-पेड़े खिलाते हुए, गले मिल रहे थे।
हर कोई सहमा हुआ यह सब देख रहा था।
बालीवुड, जो 'बार्डर' जैसी फ़िल्मों को बाक्स आफिस में हिट करा चुकी थी, अब 'वीरजारा' बनाने लगी थी। मीडिया और अखबार, जो अब तक युद्धोन्माद और हिंसक राष्ट्रवाद को हवा दे रहे थे, अब शांतिपाठ कर रहे थे।
यह राजनीति का 'मृत्युभोज' था। बेशुमार निर्दोष मनुष्यों के शवों के ऊपर गलीचा बिछाकर गज़ल और साझा कल्चर की महफिल। दोनों देशों की सरकारें अपने-अपने दरबारी लेखकों-बुद्धिजीवियों के डेलिगेशन एक-दूसरे के देशों में भेज रहीं थीं।

उस लड़के ने भी पाकिस्तान के दूतावास में अर्ज़ी दी:''मैं अपनी ससुराल जाना चाहता हूं।''
पाकिस्तान और अमेरिका, दोनों के लिए यह एक प्रिय लगने वाली आकांक्षा नहीं थी।
पाकिस्तानी डिप्लोमेटिक अफ़सरों ने कहा, वीज़ा के लिए आपको अपनी ससुराल से लोगों के निमंत्रण-पत्र पेश करने होंगे। तभी आपको इज़ाज़त दी जायेगी।
लड़की ने अपने मायके वालों को फोन किया कि 'ये वहां आना चाहते हैं। इनविटेशन लेटर्स मांग रहे हैं कौंसुलेट वाले।''
देखते ही देखते दर्ज़नों नहीं पचासों इनविटेशंस आ गये।
लड़के ने उन्हें पाकिस्तानी दूतावास के सामने रखा।
अफ़सर की पेशानी पर परेशानी और चिढ़ की लकीरें थीं। इसे कैसे रोकें। राष्ट्र-राज्य इस लड़के जैसे लोगों के लिए नहीं बनाए जाते। राष्ट्र-राज्य उसमें रहने-जीने वाले, एक दूसरे से प्यार और सहयोग करने वाले इंसानों की खातिर नहीं बनाये जाते।
राष्ट्र-राज्य तो राजनीतिकों, सरकारों, व्यापारियों, फौज़ों वगैरह के लिए हुआ करते हैं। मुश्किल मगर यह है कि अब इस लड़के को रोकें कैसे?
अफ़सर ने जवाब दिया :''हम इन डाक्युमेंट्स को अभी चेक करेंगे। बाद में आना।''
कुछ दिनों बाद, दी गयी तारीख़ और वक्त पर लड़का और लड़की फिर मौज़ूद थे।
अफ़सरों ने कहा :''हमने सारे इनविटेशन लेटर्स चेक किये हैं। इनमें से एक भी लेटर ऐसा नहीं है, जिसे तुम्हारे किसी ब्लड रिलेटिव (रक्त-संबंधी) ने लिखा हो। सब के सब तुम्हारे 'इनलाज़' (ससुराल वाले) हैं। तुम अपनी ससुराल से किसी ब्लड रिलेशन का पत्र लाकर सबमिट करो।''

लड़के की आंखों में वही हंसी थी, जो इस समय हर जागरूक और निर्दोष युवा की आंखों में झलकती है। हर उसकी आंखों में, जो दूसरों से प्यार करता हुआ हिंसा और तबाही के सारे खेल और सारी बिसातों की भयावह परिणतियों को जानता है।
लड़के का यानी मेरे प्रिय लेखक अमितावा का उत्तर था :'' देखिए, हम दोनों कौमों ने पिछली सदी से लेकर आज तक एक दूसरे का जितना खून (ब्लड) बहाया है, उसे देखते हुए हमसे ज़्यादा गहरा और पक्का 'ब्लड-रिलेशन' किसी का हो नहीं सकता।''
वे अफ़सर स्तब्ध थे।
उनके चेहरे सफ़ेद हो चुके थे। शायद इस जवाब की उम्मीद उन्हें नहीं थी।

बुद्ध ज़रूर हंसे होंगे, लड़के की इस बात पर।

इसके बाद लड़का अपनी ससुराल यानी पाकिस्तान गया। उसका वहां के युवाओं ने भरपूर स्वागत किया। विश्वविद्यालयों में उनको देखने और उन्हें सुनने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी।
स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों से, आम लोगों से सबसे उन्होंने बातचीत की।
वह लड़की भी अपनी ससुराल आयी। यानी हिंदुस्तान।
यहां पटना में जब दोनों के 'विवाह' के बाकी रीतियां पूरी की जा रहीं थीं, मैं उस दिन वहीं था। पुस्तक मेले में। एन.बी.टी. की तरफ़ से 'मीट दि आथर' कार्यक्रम में भाग लेने। तब तक मुझे पता नहीं था कि अमितावा और मोना दोनों उस दिन वहीं थे।
अमितावा ने भारत के भी तमाम स्कूली बच्चों से बात की। उनसे सवाल पूछे।
गुजरात में २००२ के सांप्रदायिक जन-संहार के बाद वहां जाकर घूमते रहे। सच यह है कि टी. आर. पी. के पीछे पागल कार्पोरेट मीडिया, सांप्रदायिक और भ्रष्ट राजनीति तथा हिंसा और मौत के सामान के व्यापारियों के सर्वव्यापी अभियान के बावज़ूद यहां रहने बसने वाले आम लोग और बच्चे...कोई भी हिंसा अब नहीं चाहता। कोई भी युद्ध और तबाही नहीं चाहता।

मेरा मन होता है कि इस किताब का हिंदी अनुवाद ही नहीं, उर्दू, बंगला समेत सारी भाषाओं में अनुवाद हो और इसे सस्ती दर पर सबको बांटा जाय। जैसा एक समीक्षक ने लिखा है कि 'दुश्मन की अवधारणा' (Idea of Enemy) पर इतनी गहरायी, तथ्यों, सर्वेक्षण और साहस के साथ लिखी गयी यह किताब सिर्फ़ दो देशों के सरहद के आर-पार की यात्रा की कहानी ही नहीं, यह हमारी अंतरात्मा के भीतर तक उतरती, सब कुछ को उलटती-पलटती, बेहद ईमानदार किताब है।
हिंदुत्ववादियों और कट्टरपंथी मुसलमानों को यह किताब उनकी साझा मानवीय विरासत की याद दिलाती है। इसे पढने के बाद अचानक याद आने लगता है कि सिंधु सभ्यता के वे मिथक और लोक गाथाओं के पात्र, जो हमारी साझी संस्कृति या तहज़ीब के हिस्सा थे, कैसे सियासत और सत्ताखोरों ने उन्हें छीन कर एक दूसरे के शत्रु-प्रतीकों में बदल डाला। ईसा की सातवीं सदी के पहले जब कहीं मुसल्मान जैसा कौम नहीं था या ईसा से ह़ज़ार साल पहले,पश्चिमी लोगों के आने के पहले तक जब कोई हिंदू कहीं नहीं होता था, हमारी लोक-गाथाएं तब भी थीं। राम से लेकर कृष्ण तक की, रामायण से लेकर महाभारत तक के पात्र तब भी थे। लेकिन वे ना तो हिंदू थे ना मुसलमान। वे तो सिंधु सभ्यता के लोगों की साझी संस्कृति की सम्मिलित मिथक-लोक आख्यानों के हिस्सा थे। राम पर सिर्फ़ कट्टर हिंदुत्ववादियों का अधिकार कैसे हो गया? उनके नाम पर सांप्रदायिक हिंसा और युद्ध और जनसंहार क्यों होने लगा? ये सवाल अनुत्तरित नहीं हो सकते।
इनका जवाब दिया जाना चाहिए। इसलिए कि हिंसा और राजनीति के इस विनाशकारी खेल की कीमत उन महान मिथकीय पात्रों को चुकानी पड़ती है।
राम जैसे करुणा और वंचना के मानवीय मिथक-नायक को देख कर अन्य समुदाय के बच्चे डर कर रोने लगते हैं।
और जब 'बुद्ध की मुस्कान' का नाम देकर परमाणु बमों का विस्फोट किया जाता है तो कांधार में, बामियान के पहाड़ों में उनका सिर मोर्टारों और मिसाइलों से तोड़ दिया जाता है।

काश अमितावा कुमार की यह किताब वे भी पढ़ते जो सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनीति करते हैं।
खैर, आखिर में आप सबसे मैं फिर से क्षमा मांगता हूं कि अपना वायदा पूरा करने में मुझे इतने सारे दिन लग गये। अंत में यह भी जोड़ना चाहता हूं कि अब

अब 'लड़के' और उस 'लड़की' के परिवार में एक नन्हीं-सी बच्ची भी है। इला नाम है उसका।
काश एक ऐसा भविष्य हमारे जीते जी आये कि इला हंसे और उसकी निर्मल पवित्र हंसी में मनुष्यों के बीच खड़ी की गयीं वे सारी दीवारें ढहें, टूट बिखर जायें, जिनकी हिफ़ाजत के नाम पर हिंसा का व्यापार और उसकी सियासत होती है।
इला की एक ऐसी मुस्कान, जो सिंधु और गंगा-यमुना के जल को फिर से मीठा और पवित्र कर दे।
एक ऐसा भविष्य आये! ज़रूर आये!

Sunday, September 6, 2009

एक खुशी छोटी-सी और....




कल ही मुझे 'पीली छतरी वाली लड़की' के जर्मन अनुवाद की किताब का कवर इमेज मिला। आप भी देखें। मुझे और मेरे दोस्तों को बहुत पसंद आया। जैसा मैंने वायदा किया है, इसके अनुवादकों से मैं ज़ल्द आपका परिचय कराऊंगा।
साथ में हिंदी और अंग्रेज़ी वाली किताबों के आवरण के चित्र भी दे रहा हूं। हिंदी वाली किताब के आवरण का रेखांकन मैंने माउस-पैड से किया था। भीतरी पृष्ठों में भी माउस-पैड ड्राइंग्स और स्केचेस किये थे।
अपने प्रिय लेखक अमितावा कुमार की किताब पर अपनी टिप्पणी की अगली कड़ी कल तक आपके सामने होगी।

Friday, August 28, 2009

एक आतंकी का पति - और बुद्ध की मुस्कान (एक)



अब से ११ साल पहले, मई या जून के महीने की लू से तपती, गर्म और झुलसती कोई तारीख थी। सुबह ६ बजे हम दिल्ली के रोहिणी इलाके के अपने फ्लैट से निकले थे। आलू, पूड़ी, अचार बना कर रख लिया गया था। एक फ्लास्क में फ्रिज़ का ठंडा पानी। रात भर फ्रीज़र में रखने के बाद सुबह निकाली गयी पानी की कुछ बोतलें भी थीं, जिनमें फ़िलहाल पानी नहीं था, उनमें बर्फ़ जमी हुई थी। हम मान कर चल रहे थे कि २-४ घंटों तक इनके भीतर जमी हुई बर्फ़ पिघलती रहेगी और हम ठंडा पानी पीते रहेंगे।
हम लोग कुल मिला कर छह जने थे। मैं, मेरी पत्नी कुमकुम, दो बेटे -सिद्धार्थ और शांतनु। साथ में लाइका और चकमक। लाइका हमारी पामेरेरियन थी और चकमक एक खरगोश। अपने मोहल्ले में बच्चों के बीच मैं 'लाइका के पापा' के नाम से ही जाना जाता था। सुबह जब उसके साथ घूमने निकलता तो आसपास की हाउसिंग सोसाइटीज़ के बच्चे-बच्चियां स्कूल के बसों के इंतज़ार में सड़क के किनारे खड़े रहते। वे पूछते -'अंकल, इस डागी का नाम क्या है?'
'यह डागी नहीं है, बेटे, ये है लाइका! ....और मैं इसका पापा हूं।' मैं जवाब देता तो वे हंसते थे। कोई बच्ची उसे बिस्किट्स देना चाहती लेकिन लाइका चुपचाप आगे बढ़ जा्ती। वह बहुत स्वाभिमानी और आत्मसंयमी थी। बहुत मुश्किल से ही वह अपने घर के बाहर का कुछ, किसी और का दिया हुआ, खाती थी।
लाइका बहुत सुंदर थी। गांव में मेरी बहन उसे प्यार से 'मृगनैनी' कहा करती थी।
मैं कभी अकेले भी अगर घूम रहा होता तो बच्चे मुझे देखते ही कहते : 'वो देखो, लाइका के पापा जा रहे हैं।'

हमारे पास जो कार थी, वह मारुति-८०० थी और उसमें ए.सी. नहीं था।
हमने हिसाब लगाया था कि बारह-एक बजे तक, जब सूरज बीच आसमान में, सिर के ऊपर होगा और आग उगल रहा होगा, तब तक हम भिंड-मुरैना के बीहड़ों के आस-पास पहुंच चुके होंगे। वहीं किसी नीम या आम-सागौन के पेड़ की छांह में दरी बिछा कर आलू-पूड़ी-अचार खाते हुए और ठंडा पानी पीते हुए एक-दो घंटा बिताने के बाद झांसी या अगर हो सके तो छतरपुर तक पहुंच कर रात बिताने की योजना थी। अगली सुबह फिर निकल पड़ने के लिए।
हम गांव जा रहे थे। हमेशा की तरह, हर बार की तरह.....बार-बार किसी सुरक्षित शरण्य की धुंधली उम्मीद में। दिल्ली के दरवाज़े सत्ताओं ने बंद कर रखे थे। सिर्फ़ अफ़वाहें हवाओं में थीं, आज की ही तरह, जिन्हें दिल्ली के भ्रष्ट राजनीतिक गिरोह पैदा कर रहे थे। ८० के बाद आने वाली टेक्नालाजी और पूंजी की सभ्यता में वे अपने अनजाने एक ऐसे निर्वैयक्तिक और सत्ताकामी वर्ग में बगल चुके थे, जिनके लिए जो सत्ताहीन था, उसके प्रति कोई संवेदना नहीं बची थी।
मैं अपने बेटों के चेहरे देखने से अक्सर बचता रहता था। ...आज भी .....मेरे साथ इस लू और आग में वे भी साथ-साथ झुलस रहे थे।
लेकिन मैंने देखा, उस दिन वे बेफ़िक्र थे। वे किसी पेड़, नदी, पहाड़ या रास्ते में पड़ते बाज़ार की दूकान को देख कर चहकते और आपस में हंसते, कुछ कहते तो मुझे ताकत मिलती थी। हम इसी तरह खु्श होते थे।
कार मैं आज की ही तरह तब भी खुद ही चला रहा था।

एक से कुछ ऊपर रहा होगा, जब हम चंबल के बीहड़ों के इलाके में पहुंच चुके थे। बोतलों की सारी बर्फ़ पिघल चुकी थी,हांलाकि पानी उनमें अभी भी पीने लायक ठंडा था। भूख लग आई थी। गले सूख रहे थे, जिन्हें हम बार-बार घूंट भर कर भिगाते रहते थे। हमारे बजट में आज सिर्फ़ एक बार का 'कोल्ड-ड्रिंक' था, जिसे हम तीन-चार बजे तक के लिए टाल रहे थे। कार अंदर से तप कर तंदूर बन रही थी।
'पापा, वो देखिये कितना बड़ा मिराज़..। लगता है कोई सचमुच का 'लेक' है।' हमारे बच्चे गर्म सडक पर आंखों को धोखा देने वाली मरीचिकाओं को ताज्जुब से देखते और चीखते। जब तक हमारी कार वहां पहुंचती, वह मायावी झील गायब हो चुकी होती और दुबारा फिर उतनी ही दूर दिखाई देने लगती।

'हिरण इन्हीं को देख-देख कर दौड़ते रहते हैं और प्यास के मारे मर जाते हैं? है ना पापा ?'

कुछ ही देर में एक छितराए हुए बबूलों वाला, झुरमुट-झाड़ियों का उजाड़-सा मैदान मिला और फिर दिखा एक नीम का अकेला पेड़ । सड़क से ज़रा-सा हट कर।
मैंने कार रोक दी। यह डाकुओं का इलाका माना जाता था। उस समय ददुआ डकैत का बड़ा नाम और आतंक था। इस लू और आग में ददुआ यहां कहां झुलसने आयेगा, हमारी पूड़ी-आलू या 'मारुति-आठ सौ' छुड़ाने?
हमने नीम की छांह में दरी बिछाई और बैठ गये। बाहर हवा गर्म थी। धूप जल रही थी लेकिन लू के थपेड़े अभी नहीं थे। गर्म झोंके थे भी, तो उनमें अभी लपटें नहीं बन रहीं थीं।
हम आलू -पूड़ी-अचार खा रहे थे। चकमक पास की झाड़ी में लाइका के साथ लुका-छिपी खेल रहा था। हम उन्हें खाने के लिए डांट रहे थे, लेकिन वे अनसुनी कर रहे थे। शांतनु पकड़ने के लिए दौड़ा, तो चकमक ने उसे छका दिया।
'छोड़ो! उन्हें खेलने दो। भूख अभी नहीं होगी। हार्न बजेगा तो अपने आप भागते हुए आंएगे।' कुमकुम ने कहा।

उस मई की दोपहर, चंबल के बीहड़ में, नीम के एक अकेले पेड़ की छांह के नीचे हमारे खाने में गजब का स्वाद था। इसके पहले आलू कभी इतने अच्छे नहीं होते थे, न पूरियां ही। हम अचार का एक छोटा-सा टुकड़ा कुतरते तो पूरी अमराई हमारे भीतर लहराने लगती। कच्चे अध-गदरे आमों की गंध हमारे भीतर हर कौर के साथ भर जाती। सलमान रुश्दी ने कहीं लिखा था कि अचार का स्वाद असल में कुछ और नहीं, अतीत के बचपन में कहीं पीछे छूट गई अमराइयों की ही पुनर्स्मृति है ।
हम जानते थे कि हम बीहड़ में लू के थपेड़े के बीच असुरक्षित हैं। लगभग दर-ब-दर। लेकिन उस समय खाने का एक-एक कौर और पानी की एक-एक घूंट हमें अब तक का सबसे अनोखा स्वाद और सुख दे रहे थे।

हम दिल्ली से लगभग३-४ सौ किलोमीटर दूर आ चुके थे। आगे हमें इससे दुगनी दूरी पार करनी थी।

लेकिन ठीक इसी तारीख में दिल्ली से इतनी ही (या शायद इससे कुछ ही अधिक) दूर, वही हिंसा और घृणा की राजनीति, जिसने हमें दर-ब-दर किया था, देश के पश्चिमी सीमांतों पर अपनी 'शक्ति' का परीक्षण और प्रदर्शन कर रहा था।
वह वैशाख की पूर्णिमा वाला दिन था। अगले दिन से ज्येष्ठ का महीना शुरू होने वाला था। ११ या १३ मई की तारीख। आज के ही दिन, ईसा से लगभग साढ़े पांच-छह सौ साल पहले बुद्ध का जन्म हुआ था।

लेकिन उस दिन, इसी तारीख में, मैं और मेरा परिवार भिंड-मुरैना के बीहड़ों में, लू के थपेड़ों के बीच, एक अकेले नीम की गनीमत छांह तले, सुबह के बने आलू-पूरी खा रहा था और यहां से दूर, पश्चिम की सरहद पर, परमाणु बमों के धमाके हो रहे थे। धूल और धुएं के उठते गुंबदों को देखकर, उनके विनाश और संहार की ताकत का अनुमान लगाते हुए उन वैग्यानिकों और राजनेताओं के चेहरे खुशी और अहंकार में अंगारों की तरह दहकने लगे थे, जो इसमें शामिल थे।
बाद में अंग्रेज़ी की लेखिका अरुंधती राय ने अपना सबसे विलक्षण और मार्मिक लेख 'कल्पना का अंत' इसी दिन की स्मृति में लिखा था।
पोखरण में यह परमाणु परीक्षण उस समय के हिंदुत्ववादी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के वैग्यानिक सलाहकार ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और परमाणु ऊर्जा कमीशन के प्रमुख, डा. आर. चिदंबरम की अगुआई में हो रहा था। गोपनीयता इतनी बरती गयी थी कि अंतरिक्ष में टोह लगाते जासूसी उपग्रहों और संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी खुफ़िया एजेंसियों तक को भनक नहीं लग सकी थी।
परीक्षण सफल रहा। विध्वंस और विनाश के इस परीक्षण को नाम दिया गया था -'शक्ति'।
.....यानि 'आदि-शक्ति दुर्गा'।
उस रोज़ जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने घोषणा की कि आज ३ बज कर ४५ मिनट पर भारत ने भूमिगत परमाणु परीक्षण किये हैं, तो मीडिया और अखबारों ने ज़ोरों से स्वागत किया था। सेंसेक्स में सबसे बड़ा उछाल आया था।..और इंडिया 'शाइन' करने लगा था।
इसके २४ साल पहले, इसी पोखरन में, १९७४ में, उस समय की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के दौर में पहली बार परमाणु परी्क्षण किया गया था। तब इसका नाम रखा गया था, 'बुद्ध की मुस्कान'। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र की निगरानी और विख्यात वैग्यानिक डा. राजा रमन्ना की अगुआई में वह परीक्षण हुआ था। डा. आर. चिदंबरम उस टीम में भी थे। तब वे इस दिन से चौबीस साल छोटे रहे होंगे।
लेकिन तब की परिस्थितियां बिल्कुल दूसरी थीं। उस समय बंगलादेश के युद्ध से भारत उबरा ही उबरा था, मशहूर चित्रकार एम.एफ़. हुसैन और विपक्षी अटल बिहारी वाजपेयी, दोनों ने, इंदिरा गांधी को 'दुर्गा' कहा था। लेकिन उस पहले भूमिगत परमाणु परीक्षण को हिंदुओं की देवी 'दुर्गा' का नाम 'शक्ति' नहीं दिया गया था। उसका नाम रखा गया था - 'बुद्ध की मुस्कान' ।
कहा गया था कि यह शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण है और लक्ष्य है चीन को यह बताना कि अब १९६२ की तरह भारत असावधान नहीं है।
लेकिन इस बार निशाने पर था पाकिस्तान। ६ दिसंबर १९९२ को बाबरी मस्ज़िद को ढहाने के बाद सत्ता में आने वाला राजनीतिक दल इस परमाणु परीक्षण के पीछे था। इसके पीछे एक साम्प्रदायिक-राष्ट्र्वादी परमाणु महत्वाकांक्षा थी। इसकी क्रिया-प्रतिक्रिया इस उप-महाद्वीप में होनी ही होनी थी। वह हुई। कारगिल के युद्ध के रूप में। गुजरात के दंगों और जन-संहार के रूप में। संसद से लेकर मुंबई और देश के तमाम नागरिक इलाकों में कट्टर आतंकवादी हमलों के रूप में, जिसमें हज़ारों निर्दोष लोग मारे गये।

लेकिन हम वहीं लौटें। उस अकेले नीम की छांह में। भिंड-मुरैना के बीहड़ में। जहां सड़क के किनारे एक 'मारुति-८००' खड़ी हुई है। और मई की उस तपती-झुलसती दोपहर एक खरगोश और एक पामरेनियन झाड़ियों में आंख-मिचौली खेल रहे हैं। उनसे कुछ ही दूर चार जनों का एक परिवार आलू-पूड़ी और अचार खा रहा है। उसे अभी तक इस परमाणु विस्फोट का पता नहीं है।
वह तो यह भी नहीं समझ पा रहा है कि जो मनुष्यता और प्रकृति विरोधी, क्रूर राजनीतिक सत्ता यहां से कुछ दूर, पोखरण में अपनी हिंसा की परमाणु क्षमता को तौल रही है, उसी के एक हल्के से इशारे से कई-कई साल से वह इस कदर दर-ब-दर है।

और अभी उस पल इस परिवार को यह भी नहीं पता है कि यहां से कई समुद्र पार, हज़ारों किलो मीटर दूर, अमेरिका के किसी उत्तरी शहर में, किसी सभागार में, ठीक इसी समय एक सेमिनार चल रहा है। उसमें दुनिया भर के कई बुद्धिजीवी हिस्सा ले रहे हैं। उनके चेहरे चिंताओं और बेचैनियों में डूबे हुए हैं।
वे जान रहे हैं कि एशिया अब युद्ध, विनाश, जन-संहार और ऐतिहासिक त्रासदियों की एक भयावह सुरंग के मुहाने पर खड़ा हुआ है। उसे वहां धकेला जा रहा है। एक पूरी योजना बन चुकी है।

क्या इसे रोका जा सकता है?

नोअम चोम्स्की उस सेमिनार में पर्चा पढ़ रहे हैं -' एट वार विद एशिया'। उनके एक-एक शब्द 'लोकतंत्र', 'विकास', 'सभ्यता', 'संपन्नता' के चमकते परदों के नीचे के डरावने, अमानुष, हिंसक चेहरों को खोल रहे हैं। वे कह रहे हैं कि अब 'स्वतंत्रता' के असली मायने हैं हत्या, लूट, जन-संहार और विनाश की आज़ादी। सबसे डरावनी बात यह कि घृणा और हिंसा की ये कार्रवाइयां की जाएंगी, 'न्याय' या 'इंसाफ़' के नाम पर।
राजनीतिक सत्ताओं के उन्माद और रक्त-पिपासा का यह दौर अंतहीन दुस्वप्नों को बिल्कुल निकट भविष्य में जन्म देने जा रहा है। व्यक्तिगत और सामुदायिक तबाहियों के हौलनाक दृश्य पैदा करने जा रहा है।
वे दिन करीब आते जा रहे हैं जब दक्षिण एशिया के लोग मानव सभ्यता के अब तक के इतिहास की सबसे डरावनी और त्रासद स्थितियों से गुज़रेंगे।
सभी चेहरों पर चिंताओं की लकीरें गाढ़ी हो गयी हैं।

उसी सेमिनार में एक युवा और आकर्षक हिंदुस्तानी अपना पेपर खत्म करता है।
एक पाकिस्तान से आयी हुई उदास और डरी हुई लड़की उसे देखती है।
दोनों उस अभागे दिन, उन दो अभागे देशों के हैं, जिनकी सरहद पर बमों के ये धमाके हो रहे हैं।
दोनों एक दूसरे को देखते हैं। एक जैसा ही डर और एक जैसी ही चिंताएं उन दोनों खूबसूरत युवा चेहरों में है।

दोनों चुपचाप आडिटोरियम के बाहर निकलते हैं। उनके हाथ एक दूसरे से जुड़ते हैं।
एक प्रेस-कांफ़्रेंस होती है। दोनों एक दूसरे को देखते हैं फिर धीरे-से लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहते हैं : 'हमारी ज़िंदगी में आज की तारीख सबसे अहम है। क्योंकि आज हमें यह पहली बार एहसास हुआ है कि हम एक-दूसरे से बेइंतहा प्यार करते रहे हैं।''
फिर कुछ पल की चुप्पी के बाद वे घोषणा करते हैं : 'हम आज इसी दिन से अपने प्यार को सारी दुनिया, सारी कायनात के सामने प्रगट करते हैं। ......और हमारा यह प्यार परमाणु विस्फोटों और उनकी विनाश की ताकत के खिलाफ़ है।''
...और उस कई समुद्र पार के आकाश में बुद्ध मुस्कुराते हैं।

बुद्ध की अदृश्य मुस्कान वहां भी है, जहां चंबल के बीहड़ में, १३ मई की झुलसती आग के बीचों बीच, एक नीम के पेड़ के नीचे की छांह में एक परिवार आलू-पूड़ी और आम का अचार खा रहा है।

और उससे कुछ ही दूर एक खरगोश, जिसका नाम 'चकमक' है और एक पामरेरियन, जिसका नाम 'लाइका' है, दोनों झाड़ियों के पीछे आंख-मिचौली खेल रहे हैं।
(बाकी ज़ल्द ही)

Sunday, August 23, 2009

अरेबा परेबा







मैंने पिछली पोस्ट में वादा किया था कि अपने प्रिय लेखक अमितावा कुमार की प्रसिद्ध किताब 'Husband of a Fanatic' के बारे में आपको बताऊंगा, लेकिन यह सारा समय कई-कई तरह की अस्त-व्यस्तताओं में गुज़रा। ज़ल्द ही उस किताब के बारे में पोस्ट लगाऊंगा क्योंकि हिंसाओं और घृणाओं और युद्धों के जिस दौर से हम सब गुज़र रहे हैं, उसमें इस किताब का ज़िक्र बहुत ज़रूरी और प्रासंगिक हो उठा है। यह किताब एक ऐसे प्यार और विवाह का किस्सा बयान करती है, जो विनाश और युद्ध के विरुद्ध दो युवा प्रेमियों के जीवन का सच है।
आज २३ अगस्त है और आज इस समय भारतीय कविता के महान कवि विंदा करंदीकर का जन्म दिन है। विंदा करंदीकर के समय में हम लिख रहे हैं और जीवित हैं, यह हमारे जैसे लेखक के लिए गर्व और सौभाग्य की चीज़ है। १९१८ में आज की ही तारीख में जन्मे विंदा जी आज ९१ वर्ष के हो जाएंगे। वे मराठी ही नहीं, भारतीय और विश्व कविता के एक शिखर व्यक्तित्व हैं। उन्होंने अंग्रेज़ी में भी बहुचर्चित कविताएं लिखी हैं। आपके इस लेखक की उनसे भेंट है। एक फ़िल्म के सिलसिले में उनके घर उनसे मिलने का अवसर मिला और फिर हमेशा के लिए उनसे रागात्मकता के तार जुड़ गये। विंदा करंदीकर प्रखर मार्क्सवादी चिंतक और रचनाकार रहे हैं और उनका जीवन एक साफ़-सादे संघर्षशील कवि की निस्संग उपलब्धियों का जीवन रहा है। छह वर्ष पहले, २००३ में उन्हें ग्यानपीठ पुरस्कार मिला था। इसके पहले उन्हें 'सोवियत लैंड नेहरू सम्मान' और साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका था।
पिछले कई वर्षों से वे स्वस्थ नहीं हैं। उनके सुदीर्घ जीवन की शुभकामनाओं के साथ उनकी एक कविता आप पढें। यह कविता उनकी बहुत चर्चित 'आततायी अभंग' शृंखला में से है।


आतंकी अभंग

विठ्ठला, विठ्ठला / भाकरी गा होई ;

पोटामध्ये येई / शान्तवाया .

आम्ही भुकी पोरे / सैरावैरा धावू

एकमेका खाऊ / धन्य माया!

आम्ही भुके जीव / देतसू इशारा :

आमच्या पुढारा / नको येऊ.

विठ्ठला, विठ्ठला / आम्ही अन्नभक्त ;

आम्हा देवरक्त / वर्ज्य नाही!

ऊठ ऊठ विठ्या / दाव देवपण ;

नहीं तरी घण / तुझ्या माथी.

माझ्या पोटी भूक / तुझ्या पोटी माया ;

मग हा कासया / गदारोळ?

पाठ आणि पोट / यांचा झाला टाळ ;

अभंगाचे बल / अमर्याद.


और अब मैं आप सबके साथ अपनी एक खुशी को बांटना चाहता हूं।

आज ही आपके इस लेखक के कथा संग्रह 'अरेबा परेबा' के मराठी अनुवाद को महाराष्ट्र का सबसे महत्वपूर्ण 'बालशास्त्री जम्भेलकर सम्मान' मिला है। इस किताब का विलक्षण अनुवाद मेरे प्रिय मित्र और स्वयं मराठी के महत्वपूर्ण लेखक, समाजकर्मी और चिंतक जयप्रकाश सावंत ने किया था, जिसे पेंगुइन इंडिया ने प्रकाशित किया था। (हिंदी में कुछ वर्ष पहले 'समयांतर' नामक दिल्ली की एक पत्रिका ने इस पर एक प्रायोजित 'समीक्षा' प्रकाशित करवायी थी।) महत्व्पूर्ण यह तथ्य है कि यह पुरस्कार विंदा करंदीकर को २००३ में मिले 'ग्यानपीठ सम्मान' की राशि से दी जाती है, जिसे उन्होंने मराठी में किये जाने वाले अनुवाद के प्रोत्साहन के लिए दान कर दिया था।

आज विंदा जी के घर पर एक प्रेस कांफ़्रेंस में इसकी विधिवत घोषणा ठीक इसी पल की जा रही होगी, जब मैं आपके साथ अपना हर्ष बांटने के लिए यह पोस्ट लिख रहा हूं।

जयप्रकाश सावंत को बहुत बहुत बधाई।

उनका एक पत्र परसों मुझे ई-मेल से मिला था। मैं उसे भी आप सबके सामने रख रहा हूं। सच मानिए किसी भी लेखक के लिए ऐसे पल बहुत प्रेरक होते हैं। खासकर ऐसे लेखक जो तरह-तरह की अन्यायी सत्ताओं की मार अकेले सह रहे होते हैं।


देखें जयप्रकाश सावंत का पत्र :


Dear Uday ji
I wish to wake you up with this Happy News:
Marathi 'Areba Pareba' has received a very prestigious award for translation called Baalshaastri Jambhekar Puraskar. This award is given every year by Aantarbhaarati Anuwaad Suvidha Kendra.
Baalshaasti Jaambhekar (1812-1846) , one of the pioneers of Marathi Renaissanse is rightly known as ' Aadhya Samaj-sudharak, Vruttapatrakar ( he started the first Marathi daily called Darpan and also the first Marathi magazine called Digdarshan, Bhashantarkar, Vyaakarankar, Itihas-sanshodhak, Ganitadnya, Shikshan-tadnya' and has numerous books and translations to his credit and all this before he died at the age of 34 in 1846!

But the thing that will delight you still more is that this puraskar was instituted by the Trust from the donation given for this specific purpose, by our respected poet Shri Vinda Karandikar. He donated Rs. 2.00 lakhs from the amount he received from the Dnyaanpeeth Award. (Do you know this, earlier he had donated all the money received from Kabeer Sanmaan towards Earthquake Relief Funds?
I am going to Vinda's house today with the Saane Guruji Trust people to present him the copy of Areba Pareba. The Award will be officially announced in a Press Conference on 23rd August, on Vinda ji's birthday.
I am basking in this happiness of reflected glory of your creative genius...This is the 2nd Uday Prakash collection in Marathi and both have received prestigious puraskars, which says a lot more about the strength of the origional writing and the love and admiration for your work in my language.
A Big Thank You with a Hug.
Give this Good News to Bhabhi ji and your sons and entire family.
With Warm Regards To All


Jayprakash Sawant

बहुत बहुत बधाई जयप्रकाश सावंत को और मराठी के उन तमाम साहित्यकारों, दोस्तों और पाठकों को, जो मैं जानता हूं, आज बहुत खुश होंगे।




Sunday, August 2, 2009

शहीद दिवस : येहुदा अमिखाई की कविता


(पिछले कुछ दिनों से सांप्रदायिक-जातिवादी और अंधराष्ट्रवादी हिंसाओं की जीत और कामयाबियों का जश्न जिस तरह से मीडिया, अखबार और राजनीति में मनाया गया, वह भयावह था। इस उपमहाद्वीप की सारी अशक्त आबादी या गैर-राजनीतिक नागरिकता इस समय ऐतिहासिक असुरक्षा और वध्यता के बीच सांसें ले रही है। जैसा आप सब जानते हैं, आपका यह लेखक भी हिंसा, अफ़वाह और जातीय घृणा के इस घमासान के बीच घिरा हुआ था। ...घिरा हुआ है।...इन दिनों लगातार अपने प्रिय कवि येहुदा अमिखाई की यह कविता बार-बार याद आती रही...और अपने प्रिय लेखक अमितावा कुमार की मशहूर किताब 'Husband of a Fanatic' की भी। आज आप युद्ध में मारे गये लोगों के स्मृति दिवस के जश्न या त्यौहार पर लिखी गयी येहुदा अमिखाई की कविता पढिये। इसे अभी कुछ ही मिनट पहले मैंने आपके लिए ही अनुवाद किया है। कल या परसों अमितावा की किताब के बारे में..! )

युद्ध में मारे गये लोगों का स्मृति दिवस

येहुदा अमिखाई

युद्ध में मारे गये लोगों का स्मृति दिवस। इसमें आप भी जोड़ दीजिये
अपने नुकसानों का लेखा-जोखा उनके दुखों के साथ,
आपको छोड़ कर चली गई उस औरत से उपजे दुख को भी इसमें शामिल कर दें,
मिलाएं शोक को शोक के साथ, ग़मों को ग़म के साथ, वक़्त के मामले में बेहद किफ़ायती इतिहास की तरह,
इतिहास, जो तीज-त्यौहारो, छुटि्टयों, बलिदानों और गमज़दा तारीखों को
हमारी याददाश्त की आसान सुविधा की खातिर, एक ही किसी दिन में मिला डालता है।

ओह ! यह महान मधुर दिवस, पोपले मुंह वाले बूढ़े डरावने ईश्वर के लिए,
चीनी और दूध की चाशनी में भीगी नर्म-गीली रोटी की तरह।
``इस सबके परदे के पीछे छुपी हुई है कोई महान् खुशी !´´
भीतर-भीतर रोने और बाहर चीखने का कोई मतलब नहीं है।
``इस सबके परदे के पीछे शायद कोई महान् खुशी छुपी हुई है।´´

युद्ध में मरे लोगों का स्मृति दिवस। कसैले तेज़ नमक को किसी
प्यारी-सी नन्हीं बच्ची की तरह फूलों से सजा दिया गया है। सड़कों को
खाली करा के रस्सियों से घेर दिया गया है, जिससे जीवित और मरे हुए लोग
साथ-साथ जुलूस में चल सकें बिना धक्का-मुक्की के।
बच्चे भी धीमे-धीमे चलें उस दुख के साथ, जो उनका अपना नहीं है, एक-एक कदम
रखते हुए, जैसे टूटे-बिखरे कांच की किरचों पर रखे जाते हैं संभाल कर पांव ।

उस बांसुरी-वादक का फूंक मारता मुंह कई दिनों तक ऐसे ही रहा आएगा।
एक मरा हुआ सैनिक तमाम छोटे-छोटे सिरों के ऊपर तैरता है,
किसी मृतक के तैरने की हरकत के साथ,
मुर्दों की उस बहुत प्राचीन गलती के साथ, जिसे वे किसी ज़िंदा पानी की जगह पर
लगातार करते रहते हैं।

एक झंडा असली यथार्थ से सारे रिश्ते खो डालता है और फहराता रहता है।
एक दूकान का शो-विंडो खूबसूरत औरतों के कपड़ों से सजा हुआ है,
नीले और सफेद रंगों में।
और सब कुछ तीन भाषाओं में
हिब्रू, अरबी और मौत।

एक महान् और शाही जानवर मर रहा है
सारी-सारी रात चमेली की लताओं के नीचे
दुनिया को लगातार घूरता हुआ।

एक आदमी जिसका बेटा युद्ध में मारा गया है चल रहा है सड़क पर
जैसे कोई औरत जिसकी कोख में मरा हुआ भ्रूण हो।
``इस सबके परदे के पीछे कोई महान् खुशी छुपी हुई है।´´