




मैंने मुंशी प्रेमचंद को नहीं देखा। जब मेरा जन्म हुआ, उसके सोलह साल पहले उनकी मृत्यु हो चुकी थी। जब मैं कुछ लिखने-पढ़ने और समझने लायक हुआ, तब से मैंने उनकी कहानियां पढ़नी शुरू कीं| उनकी कहानियां और उपन्यास पढ़ते हुए कई-कई बार उनसे मिलने का मन होता था। अब भी होता है। लेकिन
ऐसे कैसे हो सकता है कि जिसकी मृत्यु मेरे जन्म से भी सोलह साल पहले हो चुकी हो, उससे मिला जा सके?
लेकिन मैंने उस लेखक को ज़रूर कई बार देखा और कई बार उससे मिल भी चुका था, जिसे मुंशी प्रेमचंद ने ‘भारत का गोर्की’ कहा था। इस लेखक से प्रेमचंद की इतनी गहरी आत्मीयता भी थी कि उन्होंने अपनी मृत्यु के समय, अपने जीवन के अंतिम पलों में, उसका हाथ अपने हाथों में थाम रखा था।
....और जब उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली तो उनका सिर इसी लेखक की गोदी में था।
आप समझ गये होंगे कि मैं ‘त्यागपत्र’, ‘परख’, ‘दशार्क’, ‘जयवर्धन’, ‘सुनीता’,‘सुखदा’ जैसे उपन्यासों और ‘नीलम देश की राजकन्या’, ‘तिरबेनी’, ‘एक रात’, ‘अपना-अपना भाग्य’, जैसी कहानियों के रचनाकार जैनेंद्र की बात कर रहा हूं।
१९८२ में मैं टाइम्स आफ़ इंडिया की साप्ताहिक पत्रिका ‘दिनमान’ के संपाद्कीय विभाग में काम करने आया था। १०, दरियागंज उसका पता हुआ करता था। इस जगह से, एक ही मंजिल से ‘सारिका’, ‘वामा’, ‘पराग’ ‘खेल टाइम्स’ और अंग्रेजी की ‘कैरियर कंपटीशन टाइम्स’ जैसी पत्रिकाएं छपती थीं।
जैनेंद्र जी का घर वहां से तीन मिनट की पैदल दूरी पर था। उनके घर मैं आठ-दस बार गया होऊंगा। कई बार वे खुद भी चल कर ‘सारिका’ या ‘दिनमान’ के संपादकीय विभाग में आ जाते थे। उनके बेटे प्रदीप कुमार ने अपना ‘पूर्वोदय प्रकाशन’ वहीं अपने घर के पास खोल रखा था और उनके लिए जब मैंने कुछ काम किया, तो आना-जाना लगा ही रहता था।
लेकिन पहली बार मैंने उन्हें तब देखा था, जब वे सागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में व्याख्यान देने आये थे। उस समय मैं एम.ए. फाइनल का छात्र था। शायद १९७३ की बात होगी।
उन्हें बनियान या हलके खादी के कुर्ते में, सफ़ेद हलकी सूती धोती में कई बार देखा था। गर्मियों मे छत पर पानी छिड़क कर खटिया पर लेटे, कुछ सोचते या कुछ पढ़ते भी एकाध बार देखा था। घर के बैठक वाले कमरे में तो भेंट होती ही रहती थी। प्रोफ़ेसर हरियन्ना की विलक्षण सौंदर्यशास्त्र की पुस्तक ‘The Art Experience’ का जब ‘कला अनुभव’ शीर्षक से अनुवाद किया था, तो उसका अनुवाद उन्हें बहुत पसंद आया था। उनकी ही पहल पर बाद में रोम्यां रोलां की डायरी ‘Inde’ के आंशिक अनुवाद और संपादन का काम किया था। ‘The Art Experience’ के अनुवाद का काम कठिन लेकिन बहुत विचारोत्तेजक काम था। पाश्चात्य और प्राच्य सौंदर्य चिंतन (Western and Oriental aesthetics) के अंतर और भारतीय सौंदर्यबोध को समझने के लिए यह एक विलक्षण पुस्तक है। प्राच्य संस्कृति और सौंदर्यबोध को जानने केलिए एडवर्ड सईद मदद नहीं करते। प्रो. हरियन्ना, आनंद कुमारस्वामी और ए.के. रामानुजम को पढ़्ना ज़रूरी है।
अब जैनेंद्र जी को गुज़रे कई साल हो चुके हैं। चार साल पहले, २००५ में उनकी जन्मशती भी मनाई गयी थी, जिसमें प्रचलन के मुताबिक हिंदी के अध्यापकों, तमाम हिंदी संस्थानों के पदाधिकारियों और ‘लघु’ पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों आदि ने जम कर हवाई यात्राएं कीं। पांचतारा सुविधाओं का लाभ उठाया। भाषणबाजियां, लफ़्फ़ाजियां हुईं। जेबें गर्म हुईं। बैंक अकाउंट बढा। बहरहाल।
जो वाकया मैं आपको बताने जा रहा हूं, वह अभी दो महीने पीछे का है। जर्मनी के बोन विश्वविद्यालय में अध्यापन कर रहे प्रो.हेंज़ वेर्नर वेस्लर दिल्ली आए हुए थे। वे दलित साहित्य के साथ-साथ भारतीय समाज में जातीय अंतविरोधों और टकराहटों पर महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। हिंदी के कुछ समकालीन लेखकों की रचनाओं के अनुवाद भी उन्होंने जर्मन भाषा में किये है। वे प्रख्यात दलित लेखक सूरजपाल चौहान के मित्र भी हैं। (आपको यह जान कर खुशी होगी कि अक्टूबर, २००९ में फ़्रैंकफ़ुर्त विश्व पुस्तक मेला में प्रकाशित होने वाली ‘पीली छतरी वाली लड़की’ के एक अनुवादक वे भी हैं और उन्हें यह बहुत पसंद भी है। मैं ज़ल्द ही इस लंबी कहानी के अनुवाद और इसके अनुवादकों के बारे में आप सबको कुछ रोचक जानकारियां दूंगा।)
तो, उस दिन रविवार का दिन था। हमने योजना बनाई कि सुबह-सुबह दरियागंज की पटरियों मे लगने वाले किताब बाज़ार के चक्कर लगाएंगे और वहां पर अगर कोई पुरानी किताब हाथ लगी तो जश्न मनाएंगे। इसके बाद हम हिंदी कथा साहित्य के महान कथाकार जैनेंद्र जी का घर देखेंगे।
लेकिन जब हम लोग दरियागंज के किताबों के पटरी-हाट से, दो घंटे घूमने के बाद उस गली में पहुंचे, जहां ‘टाइम्स आफ़ इंडिया’ की पुरानी इमारत थी, जहां से ‘दिनमान’, ‘सारिका’,’माधुरी’, ‘वामा’, ‘पराग’ आदि पत्रिकाएं निकलती थीं और जहां मैंने लगभग नौ साल काम किया था, तो वहां का दृश्य ही दूसरा था। वह गली पह्चानी नहीं जा रही थी। पुरानी इमारतों की जगह नई बिल्डिंगें खड़ी थीं। तोड़-फोड़, ध्वंस-निर्माण का काम चल रहा था।
मैं वहां हेंज़ वेर्नर वेस्लर के साथ बड़े आत्मविश्वास के साथ गया था, कि जाते ही सीधे जैनेंद्र जी के घर जाएंगे। वहां के फोटोग्राफ़्स लेंगे और कुछ पल उनकी स्मृतियों के बीच गुजारेंगे। जब मैं बोन गया था तो मैं वेस्लर के साथ महान संगीतग्य बीथोवान का घर भी देखने गया था। वेस्लर भी जैनेंद्र की रचनाओं को पसंद करते हैं।
लेकिन उस गली का तो हुलिया ही पहचान में नहीं आ रहा था।
‘जैनेंद्रजी का घर कहां पर है?’ हमने कई लोगों से पूछा। उस गली के दूकानदारों से लेकर अपने-अपने घरों के सामने खड़े-बैठे लोगों, बच्चों-महिलाओं, सभी से। ‘कौन से जैनेंद्र जी?’ हर कोई हमसे ही पूछता।
‘त्यागपत्र’, ‘सुनीता’, ‘दशार्क’ के लेखक। हिंदी के महान साहित्यकार।‘ हम उन्हें बताते।
‘हमें नहीं पता।‘ उनका संक्षिप्त-सा जवाब होता।
एक जगह कुछ कालेज की छात्राओं जैसी लड़कियां खड़ी थीं। उनसे पूछा। उन्होंने एक दूसरे से आपस में खुसर-पुसर की फिर कहा : ‘क्या वो सीरियल भी लिखते हैं?’ उनमें से एक धीमी आवाज़ में अपनी सहेली से कह रही थी :’मैंने नाम तो सुना है। त्यागपत्र कोई सीरियल था शायद ।‘
जब १०, दरियागंज के टाइम्स आफ़ इंडिया बिल्डिंग से हिंदी की पत्रिकाएं निकला करती थीं, तब इस गली के सारे लोग, चाय-खोमचे वालों से लेकर पनवाड़ी और दूकानदार तक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, अग्येय, श्रीकांत वर्मा के नाम जानते थे। पता नहीं वह जनसंख्या अब कहां चली गयी?
हम जैनेंद्र जी के घर की खोज में लगातार भटक रहे थे। जिस जगह पर उनके बेटे प्रदीप जी ने ‘पूर्वोदय प्रकाशन’ खोल रखा था, वहां से सारे बोर्ड-बैनर गायब थे और वहां किसी और के नाम की प्लेट लगी थी। एक लंबी-सी कार पार्क थी। बहुत देर जब कालबेल दबाने के बाद भी कोई मानव नमूदार नहीं हुआ तो अगल-बगल के घरों से पूछ्ताछ की। कोई कुछ नहीं जानता था। एक ने अंदाज़ा लगाते हुए पूछा :’क्या जैनेंद्र साहब जैन थे? आप उस दूसरी गली में चले जाइये, वहां एक जैन एड्वोकेट रहते हैं। वे ज़रूर बता देंगे।‘
अब इसके अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था कि हम भारत के गोर्की को ‘जैन’ की पहचान से खोजें।
लेकिन जैन एड्वोकेट ने भी हाथ खड़े कर दिए। उनकी पत्नीनुमा महिला ने ज़रूर कुछ देर तक माथे पर सिलवटें बनाते हुए शून्य में कुछ टटोलने-खंगालने की कोशिश की फिर उन्होंने भी सांस छोड़ दी और कहा ‘सारी, हम आपकी मदद नहीं कर सकते।‘
खैर, बहुत भटकने के बाद हमने संयोग से एक ऐसे घर का कालबेल दबाया, जिसमें से एक बेहद मिलनसार और खुशमिज़ाज़ सज्जन से हमारी मुलाकात हुई। उन्होंने वेस्लर को देखा। फिर मुझे। और फिर दोनों को फिरंग समझ कर अंग्रेज़ी बोलने लगे। जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं ठेठ हिंदुस्तानी हूं और मेरे साथ जो खूबसूरत-सा विदेशी खड़ा है, वह फर्राटे से शुद्ध हिंदी बोलता है तो वे चौंक गये। उनका नाम नरेश जैन था। उस पूरे इलाके में वे अकेले ऐसे मनुष्य थे, जिसके पास १०-१५ किताबें थीं, जिसे उन्होंने अपनी ‘लाइब्रेरी’ बताते हुए हमें गर्व से दिखाया।
लेकिन वहां भी प्रेमचंद या जैनेंद्र की कोई किताब नहीं थी। हां उनके ड्राइंगरूम में एक क्राइस्ट की आदमकद पत्थर की मूर्ति लगी हुई थी। वेस्लर ने बताया कि जर्मनी या यूरोप में भी कोई इस तरह ड्राइंगरूम में सजावट के लिए क्राइस्ट की मूर्ति नहीं लगाता। हमें नरेश जैन एक अच्छे इंसान लगे।
कुछ देर बाद वे अपने घर के पिछवाड़े की एक बेहद संकरी गली में ले गए और चारों तरफ से बड़ी इमारतों और नयी बनती बिल्डिंगों के बीच पिसते और किसी कदर बचे रहने की ज़िद में जूझते एक जर्जर, टूटते-फूटते मकान की ओर इशारा करते हुए कहा :’यही वो घर है, जिसमें जैनेंद्र रहा करते थे।‘
ऊपर की ओर जाती संकरी सीढ़ियां अंधेरे में डूबी थीं। उस पुराने घर की दीवालों से प्लास्टर उखड़ रहे थे।
सीढ़ियों के नीचे दीवाल पर एक बहुत पुराना लकड़ी का नेमप्लेट, जिसके अक्षर मिट रहे थे, अटका हुआ था। जैनेंद्र कुमार, प्रदीप कुमार, पूर्वोदय प्रकाशन और मकान का नम्बर उस पर लिखा था।
‘उनके बेटे प्रदीप को कुछ साल पहले स्ट्रोक लगा था, तबसे वे गुड़्गांव की तरफ़ चले गये। शायद अपने बेटे के पास। सज्जन आदमी थे। अपने प्रकाशन की किताबें, जिनमें सारा जैनेंद्र साहित्य भी था, उन्होंने इसी घर में रखवा दिया है। वो उधर देखिए, ‘पूर्वोदय प्रकाशन’ की तख्ती लगी हुई है।'
हमने सब कुछ देखा। मुझे अपनी स्मृति और आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था। क्या यही वह घर है, जहां मैं कई बार आ चुका था? क्या इसी घर में स्वामी मल्लै मंदिर का पुजारी और रसोइया नरसिम्हन, जो फौज़ की नौकरी छोड़कर भाग आया था, मेरे कहने पर काम करने लगा था? अब नरसिम्हन कहां होगा?
नरेश जैन ने ऊपर की ओर इशारा किया। वहां वर्षों से बंद, छोटी-सी, धूल-गर्द और कालिख मे बुझी हुई एक खिड़की थी।
‘यहां नीचे एक खाली जगह हुआ करती थी। एक छोटा सा मैदान जैसा। जब मैं छोटा था तो मोहल्ले के दूसरे बच्चों के साथ यहां कभी बैडमिंटन और कभी क्रिकेट खेलता था। जैनेंद्र इसी खिड़की से हमें देखते रहते थे।‘
नरेश जैन ने कहा : ‘ही वाज़ अ वेरी सिंपल एंड पुअर मैन।‘
आप भी उसी सीधे-सादे, गरीब आदमी का घर देखिए, जो हिंदी का, प्रेमचंद के अलावा दूसरा महान कथाकार था, जिसको महात्मा गांधी भी पढ़ते थे और दोनों के बीच पत्र-व्यवहार होता था, जिसने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया था और देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था, जिसने हिंदी गद्य को आधुनिक रूप दिया था, जिसे प्रेमचंद ने ‘हिंदी का गोर्की’ कहा था और जिसके हाथों को अपने हाथों मे थामे हुए, उसकी गोद में अंतिम सांस ली थी।
......और जब आप ये चित्र देख रहे हों तो हिंदी के उन मठाधीशों के चेहरे भी याद करिये जो निराला को प्रसाद, जैनेंद्र को प्रेमचंद, भवानीप्रसाद मिश्र को नागर्जुन, अग्येय को मुक्तिबोध, निर्मल वर्मा को भीष्म साहनी के खिलाफ़ खड़ा करते हैं और अपने लिए कोठियां-बंगले, बैंक अकाउंट और विद्वान आलोचक की छवियां बनाते हैं।