आपने मेरे ब्लॉग में पिछले साल जॉन पिल्गर द्वारा म्यांमार (बर्मा) की फौजी जुंटा द्वारा जेल में कैदी की ज़िंदगी बिता रही आंग सान सू की का साक्षात्कार पढ़ा होगा। यह बहुत लोकप्रिय हुआ था और कई पत्रिकाओं ने इसे पुनर्मुद्रित किया था। दिल्ली से प्रकाशित होने वाला समाचार पाक्षिक `समकाल´ और भोपाल से प्रकाशित होने वाली साहिित्यक-सांस्कृतिक पत्रिका `शब्द संगत´ इनमें प्रमुख थे। विएतनाम से लेकर पूर्वी तिमूर, म्यांमार, अफगानिस्तान और इराक आदि पर अंतरराष्ट्रीय महत्व के वृत्तचित्र बनाने वाले तथा हिंसक, मानवताविरोधी, लोकतंत्र का मुखौटा लगाए मुनाफाखोर कारपोरेट आवारा बाज़ारू साम्राज्यवाद और उसकी रंगीनियों का गुणगान करने वाले टीवी और मीडिया द्वारा फैलाये जा रहे झूठ और मिथकों का जान पिल्गर ने जिस तरह से पर्दाफाश किया है, वह उन्हें आज का सबसे पढ़ा-देखा-सुना जाने वाला पत्रकार बनाता है।
जॉन पिल्गर ने अभी कुछ ही दिन पहले गाजा और इस्राइल-फिलिस्तीन के बारे में `स्टेट्समैन´ में और आंन सांग सू की ही तरह बांगलादेश के गिरफ़्तार नेता और बंग बंधु शेख मुजीबुर्रहमान के साथी तथा पूर्व प्रधानमंत्री मौदूद अहमद के बारे में `गार्डियन´ में लिखा है।
`मोहल्ला´ में फिलिस्तीन को लेकर जिस तरह की `ब्लाग-बहस´ चल रही है, उसे देखते हुए जॉन पिल्गर की यह टिप्पणी ज़रूरी हो जाती है। मैं इन दोनों को कुछ कडियों में संक्षेप में आपके लिए प्रस्तुत करूंगा। उसके पहले इतने दिनों तक अपनी अनुपस्थिति की वजह बता दूं।
पिछले दिनों हुए विश्व पुस्तक मेला के दौरान मेरी दो किताबों -`अपनी उनकी बात´ और `नयी सदी का पंचतंत्र´ का विमोचन मराठी के सुविख्यात कवि, कलाकार और बुिद्धजीवी सतीश कालसेकर ने और हिंदी के सुविख्यात आलोचक डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय ने किया। इन किताबों की तैयारी के अलावा इस दौरान हिंदी के बहुत से सुप्रतिष्ठित लेखकों और कवियों की किताबों के कवर भी बनाये और कुछ कवियों तथा कथाकारों की किताबों के ब्लर्ब भी लिखने पड़े। इटली, त्रिवेंद्रम, जयपुर, उज्जैन आदि की यात्रा की थकान के बीच में ये सारे काम आते रहे। फिर 5 मार्च को मेरे बेटे सिद्धार्थ और बहू मेरी देगूत के विवाह का स्वागत-भोज भी आयोजित करना पड़ा। मेरी की मां लोरेंस और मौसी एलेन के साथ-साथ मेरे कई पुराने दोस्त-साथी भी दिल्ली आ गये थे, इसलिए थोड़ा-सा समय उधर भी देना पड़ा। निरंजन, नामदेव लाघवे, मदन कश्यप, अजय शर्मा ..सभी ने परिवार के सदस्यों की तरह सब कुछ सम्भाला. यानी व्यस्तताओं के बीच सुख आनंद और निश्चिंत-शांति के कुछ पल भी आपके इस लेखक के जीवन में आते रहे। मेरे मित्र और प्रकाशक अरुण माहेश्वरी तथा जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने अपने परिवार के साथ इन सारी जिम्मेदारियों को उठाया। उनके बिना यह आयोजन होता भी नहीं। उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना शब्दों के बाहर की बात हैं।
इस बीच (हालांकि दिल्ली के कुछ ताकतवर और संगठनबद्ध, कामयाब और दुनियादारी के बीज गणित में अव्वल, अपनी अयोग्यता और अशिक्षा के बावज़ूद जातिवादी-इलाकाई जुगाड़, सांस्थानिक तिकड़म और राजनीतिक-नौकरशाही के समीकरणों के उस्ताद कवियों ने इस ब्लॉग पर `आत्म मुग्धता और आत्म-प्रचार´ का आरोप लगाया है। फिर भी ......'एक जिद्दी धुन' हमारी भी है ...'ज़माने में तो अपना जब तलक ये जीना होना है/ तुम्हारी चोटें होनी हैं, हमारा सीना होना है...) कुछ ऐसी घटनाएं हैं, जिनका मेरे लिए एक लेखक के नाते महत्व है। एक तो `पीली छतरी वाली लड़की´ के अंग्रेजी और मराठी अनुवाद के प्रकाशन के लिए पेंगुइन प्रकाशन से अनुबंध हुआ। `ए गर्ल विद दि गोल्डेनपारासोल´ ‘शीर्षक से अप्रैल-मई में अंग्रेजी में प्रकाश्य किताब के अनुवादक जैसन ग्रूनबाम हैं, जिन्हें इस अनुवाद के लिए 2005 का प्रतिष्ठित `पेन´ ग्रांट भी मिल चुका है। मराठी अनुवादक हैं जाने माने समकालीन चित्रकार और मराठी युवा कवि गणेश बिस्पुते। मेरे लिए ये दोनों घटनाएं सिद्धार्थ और मेरी के `स्वागत-भोज´ जैसी ही सुखकारी थीं। फरवरी में ही भोपाल में `वनमाली´ पुरस्कार मिला। तीन दिन वहां भी बिताये, जहां बहुत से पुराने साथियों के साथ मिलना-जुलना ही नहीं, अपने पाठकों का प्यार भी नसीब हुआ। 27 फरवरी को ही `मोहन दास´ के उिड़या अनुवाद की किताब का लोकार्पण भुवनेश्वर में हुआ। निमंत्रण के बावज़ूद वहां जा नहीं सका। इसका अनुवाद अंग्रेजी और उिड़या के कवि मनु दाश ने किया है। उनके अनुसार उडिया में भी कन्नड और मराठी की तरह `मोहन दास´ लोकप्रिय हो रहा है। इस बीच जन नाट्य मंच से जुड़े युवा अभिनेता उत्तम हालदार द्वारा फोन पर यह भी सूचना मिली कि 'मोहन दास' पर फीचर फिल्म बन कर तैयार है और मुम्बई में उसके दो `प्रिव्यू´ हो चुके हैं। इसके प्रोड्यूसर और डायरेक्टर दिल्ली में भी इसके प्रिव्यू की तैयारी कर रहे हैं।
अभी पिछले कुछ दिनों की दूसरी घटनाएं यह हैं कि नेपाल के `फाइन प्रिंट´ के प्रकाशक अजित बराल `मोहन दास´ का नेपाली भाषा में प्रकाशन की तैयारी में हैं और देश के जाने माने रंगकर्मी वामन केंद्रे हिंदी और मराठी में इसका साल भर तक चलने वाली नाट्य प्रस्तुति प्रारंभ करने की तैयारी में लगे हैं।
मेरे जैसे स्वतंत्र लेखक की प्रसन्नता और संतोष के ये पल अनमोल हैं। .... और विश्वास करें, ये पल आप सब के लगाव, प्यार और उस अदृष्ट सत्ता की शीतल -वत्सल छांह के कारण है, जिसके बल पर मैं अभी तक लिख रहा हूं, और अभी-भी हंस रहा हूं।
और बदस्तूर ज़िदा हूं। जीता-जागता। अपनी ही कहानी के एक पात्र `टेपचू´ की तरह, जिसे (एक नयी सूचना और निमंत्रण के अनुसार) विश्व रंगमंच दिवस पर, 27 मार्च को, पुणे के फिल्म एंड टेलिविज़न संस्थान के छात्र नाटक के रूप में खेलने जा रहे हैं। और हां, याद आया, जयपुर के प्रतिभाशाली युवा रंगकर्मी निर्देशक अभिषेक गोस्वामी और वही के विलक्षण अभिनेता ज़फर को भी बधाइयां, जिन्होंने फरवरी में ही जयपुर और फिर भोपाल में `तिरिछ´ का प्रभावशाली मंचन किया। बाबा नागार्जुन की तरह मै भी इन तरुणों -युवाओं के माथे को चूमता हू। ईश्वर उन्हें वह सब कुछ दे, जिसकी वे आकांक्षा रखते है।
आज विदा लेता हूं। बहुत सारा काम अधूरा पड़ा है। कल आप पढ़िये जॉन पिल्गर की फिलिस्तीन-इस्राइल पर टिप्पणी का पहला अंश। कार्पोरेट पूंजी और उससे नाभि-नाल बद्ध टी. आर. पी. वादी मुनाफ़ाखोर मीडिया द्वारा फैलाये जा रहे हमारे समय के सर्वव्यापी छल, हिंसा और कपट की पटकथा और निर्बल मनुष्यों और राष्ट्रों को पूंजी तथा अनैतिक सत्ताकेंद्रों द्वारा कुचलने और गुलाम बनाए जाने का एक असली ब्यौरा।
Friday, March 14, 2008
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The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled
15 comments:
tumhari chonte hongi
hamaraa seena haga...
KYA BAAT HAI UDAY PRAKASH JI!
iltiza hai ki ise bhi apne zazbaat ki mahfil mein meri shubhkamna mankar shumaar kar lijiye...
JINKE HAATHON MEIN
LAKIREN NAHIN CHHALE HONGE.
WAQT KI DOR VAHI LOG
SAMBHALE HONGE.
AUR JO LOG GAMO-DARD
KE PAALE HONGE
UNKE JEENE KE ANDAAZ
NIRALE HONGE.
AUR HAAN...PARINDON VAALI POST MEIN AAPNE MERI TIPPNEE PADHIN ?
ओह! ओह! चंद्र कुमार जी, 'परिन्दों वाली पोस्ट' पर आपकी टिप्पणी आज देख पाया....! राजनांद गांव ...मुक्तिबोध स्मारक समारोह..जैसन का मेरे साथ दिल्ली से कार चलाते हुए वहां पहुंचना...इतनी भीड और आप ..सब याद आ गया.
जीवन इतना अस्त-व्यस्त-त्रस्त (?) रहता है..लेकिन आपके शेर ने नयी ताकत दी. मैने शम्शेर जी का शेर उद्ध्रित किया था.
आभार...! इस पुनर्मिलन के लिये शुक्रिया!
sir g, sbse pahle aapko intni dher sari uplbdhiyon ke lie itni hi sari badhaiyan....aatmmugdhta buri chij nhi hai agr vh kisi aur ka bhi kisi n kisi rup me bhala hi krti ho...ahit nhi... aur ....intjar hai jhon pilger ki tippni ka...
टेपचू कहानी यहाँ प्रकाशित करने का आपसे अनुरोध है. कई मित्रों से सुना है इसकी तारीफ़. कहीं से खोजकर भी पढ़ने को नहीं मिला है. यदि वेब पर उपलब्ध हो तो कड़ी भी दे सकते हैं.
उदय जी,
सोचा था भोपाल में मिल सकूंगा पर जा नहीं पाया .. आपको पुन: बधाई।
हाल में एक फिल्म देखी थी, उस पर कुछ लिखा है अपने ब्लाग पर ... देखिएगा।
उदय जी,
सोचा था भोपाल में मिल सकूंगा पर जा नहीं पाया .. आपको पुन: बधाई।
हाल में एक फिल्म देखी थी, उस पर कुछ लिखा है अपने ब्लाग पर ... देखिएगा।
उदय भाई, ससुरत्व प्राप्ति की बहुत-बहुत बधाई। इतनी सार्थक व्यस्तताएं कम ही आती हैं। आशा है, अब आपके शब्द यहां पढ़ने को मिलेंगे।
बधाईयाँ- ऐसे ही अच्छे समय आपकी हंसी के साथ हँसते चलें फले फूलें; सिद्धार्थ और मेरी को भी बड़ी सारी शुभ कामनाएँ - सादर मनीष [ p.s. न दद्दा , लड़िका हरेन के काज केर फोटो ऊटू नही लिहिन का? हाँ एक ठे अउ बतकहाए का है के जौउन दिन हमार काज भा रहा - एक ठे बड़ मनई आएन और कहिन Many happy returns of the day - अब नाम न पूछी पर ओनखेर कहा अबहिन तक सच नहीं भा [:-) ]
उदय प्रकाश जी,
आपकी यादें ताज़ा हुईं ,लिहाज़ा बेहद खुश हूँ.
राजनांदगाँव में मुक्तिबोध स्मारक ने आप जैसे
दिव्य शब्द -शिल्पियों से साथ हम सबका नाता जोड़ दिया है .
यहाँ आपके काव्य पाठ और जैसन साहब की
हिन्दी अभिव्यक्ति की चर्चा आज भी होती है .
दूरदर्शन ने दिल्ली से इस स्मारक पर
खूबसूरत वृत्त -चित्र का दो बार प्रसारण किया .
एक डॉक्युमेट्री अभी और बन रही है .
इधर ,सृजन संवाद भवन का लोकार्पण भी हो चुका है .
भविष्य में विशेष साहित्यिक आयोजन होंगे .
आशा है आप हमारे बीच पुनः पधारेंगे .
आपकी, आदमी..... मरने...के बाद वाली कविता का ,
ज़िक्र के साथ सस्वर पाठ, मैं अक्सर किया करता हूँ .
आपकी ढेर सारी कृतियाँ ,सतत लेखन -चितन ,
फिल्म-निर्माण आदि अहम क्षेत्रों में प्रगतिगामी रचनात्मक सक्रियता
आपकी सर्जनात्मक बेकली के प्रत्यक्ष गवाह हैं.
इनसे नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीख मिल सकती है .
देर आयद दुरुस्त आयद। इस बीच आप बहुत सी उपलब्धियाँ और हम सब के लिए बहुत सी जानकारियां लेकर आए हैं।
.......
बेटे-बहु को मेरी तरफ़ से मंगल कामनाएं।
मेरे परिवार में एक दुखद घटना हो जाने के कारण गाँव जाना पड़ गया था, इस वजह से स्वागत-समारोह में शामिल नहीं हो सका।
अरुण जी, सचमुच जीवन में अधिकतर घटनायें आकस्मिक ही होती हैं. अब यही देखिये कि २ दिनों के बाद मैं आज अपने ब्लोग तक पहुंच पाया. आपके परिवार में घटी दुर्घटना के प्रति मेरी संवेदना स्वीकार करें. रवि रत्लामी जी, आपकी पोस्ट देख कर सुखद आश्चर्य हुआ. आपतो इस वर्चुअल ब्लाग-दुनिया के गुरु और लीजेन्ड माने जाते हैं. 'टेपचू' के बारे में आपने पूछा है. यह कहानी 'अभिव्यक्ति' (पूर्णिमा वर्मन) ने १-२ साल पहले प्रकाशित की थी. वहां के 'आर्काइव' में ज़रूर मिल जायेगी. इसका एक अन्ग्रेजी अनुवाद (अनु:राबर्ट ह्यूक्स्टेड, वर्जीनिया, यू.एस.ए.) भी नेट पर उपलब्ध है. लिन्क मैं भेज दूंगा. साफ़्ट कापी नहीं है, वर्ना आपका आदेश मैं ज़रूर पूरा करता. लेकिन इस कहानी की भी एक कथा है. २३ साल की उमर में (१९७६) जे.एन.यू. का छात्र होने के दौरान, आपातकाल के समय इसे लिखा था. यह जे.एन.यू. के छात्रों के बीच बहुत लोकप्रिय हुई. बाद में १९८०-८१ में यह 'सारिका' (संपा: कन्हैयालाल नन्दन) प्रकाशित हुई. वहां भी इसे अपार लोकप्रियता मिली. बस यही मेरा 'अपराध' हो गया. आप जानते होंगे, छत्तीसगढ मे टेपचू, लेपचू, समनू, छन्गू जैसे नाम आम होते हैं. इसकी देशव्यापी लोकप्रियता और चर्चा से चिढ कर दिल्ली के एक ताकतवर गुट्बाज पहाडी ब्राह्मण ने इसे लूशुन की विख्यात कहानी 'आह्क्यू की सच्ची कहानी' की नकल घोषित कर दिया. (टेपचू' के 'चू' से उन्होंने अन्दाजा लगाया कि इसका चीन से कुछ लेना-देना होगा.) और बस 'विवाद' शुरू हो गया. ऐसे 'विवादों' ने मेरे और मेरे परिवार के जीवन को पिछले लगभग ३० वर्षों से बहुत आहत और छतिग्रस्त किया है. मैं अपने ब्लाग पर कभी इसकी मज़ेदार 'अकाउन्टिंग' करूंगा. अपने वतन से दूर होकर 'अल्पसंख्यक' और 'अकेले' होने का असली संघर्ष मेरे जैसे राज्धानियों के हाशिये के लेखक-रचनाकार जानते हैं. राजनीति में 'अल्पसंन्ख्यक' शब्द का दूसरा अर्थ है. वह 'पोलिटिकल कांस्ट्रक्ट' है. एक 'पावर-टूल'. गुजरात के अल्पसंख्यकों पर कविता लिखकर पार्टी और मित्र-मंड्ली की वाह-वाह पाने वाले और सारे पद-पुरस्कार प्राप्त करने वाले इलाकावादी और जातिवादी कवि किसी वास्तविक अल्पसंख्यक और अकेले व्यक्ति को अपने इलाके में पाकर कितने क्रूर और हिंसक हो सकते हैं, इसका व्रित्तान्त आज के उत्तर-आधुनिक समय में ज़रूरी है, जिससे हम और हमारे बाद आने वाली पीढियां अपनी मासूमियत के हाथों छ्ली न जा सकें. हिन्दी साहित्य और हिन्दी-पट्टी की राजनीति, दोनों एक-दूसरे के भ्रष्ट 'एलीट' का 'विस्तार' और 'रेप्लिका' हैं. यह मेरा आत्मबोध और जीवनबोध दोनों है. उस जीवन का सारांश जिसकी संध्या घिरने लगी है..
चंद्रभूषण जी, आपका फोन नम्बर किसी 'कास्मिक नम्बर' में बदल गया है. कभी आयें. हरे प्रकाश जी, जान पिल्गर के लिये एक-दो दिन और इन्तज़ार कर लें. कल रात से चित्तरंजन पार्क (सोचें वैशाली से दूरी !!) के एक स्टूडियो में इस 'कलम के कुली' की दिहाडी का काम चल रहा है. आज रात २ बजे लौट पाया. अभी फिर निकलने का वक्त हो रहा है. नींद, थकान, दूरी और अधूरी मजूरी फिर दिल्ली के 'उस्तादों' की दहशत..इन सब के बीच ज़िंदगी का अनिश्चित रैंडम संगीत....पीडा और सुख की मेलोडी...आंसू और पसीने की धुन...(बहुत मज़ेदारी है ! नयनारा नूर का गाया हुआ फ़ैज़ का गीत आपने सुना होगा -'आज बाज़ार में पा-बदौला चलो'.अपने वक्त के 'हुक्मरानों' का कैदी जब हथकडी-बेडी के साथ बाज़ार की सडकों से गुज़ारा जाता है तो उस सन्गीत से सत्ताधारियों और उनके मुसाहिबान को आनंद मिलता है)
आप सब बस थोडा-सा इन्तज़ार कर लें..
Bye for the moment...
Will meet soon..!
'We'll sing songs of our pains
And captivity...
Sufferings and joys..
Just trust..and wait !
A slave to be crucified
Is never never late..'
Wishing all the bests
उदय प्रकाश जी, धन्यवाद. इस कहानी को यूनिकोडित कर रचनाकार में यहाँ पर पुनर्प्रकाशित किया गया है. अंग्रेज़ी अनुवाद की कड़ी भी अवश्य देंगे, ताकि पाठकों की सुविधा के लिए वह कड़ी भी वहाँ दी जा सके.
uday sir ji aapka yh comment bhi bahut marmik hai....aise mt likha kijie please
रवि रत्लामी जी, आपका बहुत बहुत आभार. लेकिन अच्छा होता कि आप कहानी बिना किसी टिप्पणी के देते. खैर ...इस पर प्रतिक्रियाओ की प्रतीक्श्छा रहेगी.
'अउर अपना त जोशिम जी फ़ुरिन के मज़ा लगाय दिहेन. हम हंसत हंसत कुर्सी से भुइयां मां धडाम से चित होइ गयेन. राम दे. उन बड्कऊ का हमार साहेब सलाम कहि देब.'
विशाल जी, आपका आभार. मैं जल्द ही आपका ब्लाग देखूंगा.
आज फ़िलिस्तीन वाले लेख का पहला हिस्सा लगा दिया है. लेकिन इधर तिब्बत में भी वैसा ही हो रहा है. मुक्ति आन्दोलनों के सामने अनेक चुनौतियां हैं.
चिट्ठाजगत में आपको उपस्थित पा कर सुखद आश्चर्य हुआ। बहुत वर्षों से इच्छा थी 'वॉरेन हेस्टिंग्स का सांड' की तारीफ में कुछ कहने की और, बुरा न मानें तो, 'पीली छतरी वाली लड़की' (ऐसा ही कुछ नाम था शायद) को गरियाने की। पहले तो बड़े लेखक पहुँच से दूर हुआ करते थे। अब वह इच्छा पूरी हो पाएगी। आप फ़िल्म भी बना रहे हैं यह जान कर खुशी हुई। कुछ समय से हिन्दी साहित्य जगत की गतिविधियों से अवगत नहीं रह पाया। शुभकामनाएं, इस उम्मीद के साथ कि फ़िल्म 'वॉरेन हेस्टिंग्स का सांड' के ही स्तर की होगी।
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