
दुनिया भर की बर्लिन-दीवारों को तोड़ो
जॉन पिल्जर
गाज़ा में रहने वालों के प्रतिरोध-संघर्ष ने साहस की जो मिसाल पिछले दिनों पेश की, वह वारसा में गटर की ज़िंदगी जीने वाली जनता के विद्रोह और बर्लिन की दीवार को ढहा देने वालों के पराक्रम के बाद से कभी देखने में नहीं आई थी। इस्राइल के ग्यारहवें प्रधानमंत्री एरियेल शेरोन द्वारा इस्राइल के कब्ज़े वाली गाज़ा की पश्चिमी सीमा में दीवाल की घेराबंदी के जरिये निवासियों को बाड़े के भीतर घेर कर उनकी ज़मीन और संसाधनों की डकैती कर लेने की कोशिशें अभी तक कामयाब नहीं हो पायी हैं। शेरोन की `महा-परियोजना´ को अंजाम देने के लिए आज तक उन्हें एक फिलिस्तीनी `मीर जाफ़र´ या `जयचंद´ के दस्तखत की ज़रूरत है, जो उन्हें आज तक नहीं मिल पा रहा है। गाज़ा के वाशिंदों ने आज तक इन अतिक्रमणकारियों के मंसूबों पर पानी फेरा है और यह बिल्कुल तय है कि वे आगे भी यही करेंगे। संघर्षरत फिलिस्तीनियों की इस सफलता का एक गहरा प्रतीकात्मक सन्देश है जिसका रिश्ता समूची दुनिया के मजलूम लोगों की ज़िंदगी और उम्मीदों के साथ जुड़ा हुआ है।
`शेरोन ने हमारी किस्मत में जो लकीरें खींचनीं चाहीं वह किसी ऐसे अराजक समाज की किस्मत की लकीरें थीं जिसे कतर-ब्यौंत दिया गया है, जिसे बरबाद कर दिया गया है, जो हिंसक है, तबाह है, अशक्त है और जिस पर खिचड़ी फौजी जुंटाओं, गिरोहों, मजहबी मुल्लाओं और कट्टरपंथियों की हुकूमत है। वह अराजक समाज, जो जातीय और मजहबी कबीलों के रूप में टुकड़े-टुकड़े हो चुका है और जिसे इस सबके लिए जिम्मेदार साझेदारों ने आपस में बांट लिया हैं । आज के इराक की ओर निगाह डालिए वही सब कुछ शेरोन हमारे लिए चाहता था और उसका मंसूबा लगभग कामयाब ही होने वाला था!´ कहना है एक फिलिस्तीनी नागरिक कारमा नबूलसी का।
इस्राइल और अमेरिका के जन-उत्पीड़न परीक्षणों ने अपने इस लक्ष्य को लगभग हासिल ही कर लिया था। सबसे पहले `बारिश´ आई। `बारिश´ उन दहशतनाक `ध्वनि-विस्फोटों´ (सोनिक बूम्स) का छद्म नाम (कोड नेम) है, जो हर रात गाज़ा के बच्चों को डर के मारे पागल कर डालता था। फिर `ग्रीष्म वर्षा ´ हुई, जिसमें नागरिकों पर बमों और मिसाइलों की झड़ी लगा दी गई। इसके बाद असंवैधानिक फांसियां और मौत की सजाएं और अंत में गाजा पर जबरन कब्जा। अतिक्रमण।
इस्राइल के मौज़ूदा रक्षामंत्री एहुद (अहद) बराक ने हर तरीके की नाकेबंदी की। पानी और सीवेज पंपों, अस्पतालों में डायलिसिस की मशीनों, नवजात शिशुओं के लिए इंक्युबेटर आदि सबके लिए ज़रूरी बिजली की सप्लाई ठप्प कर देना और अधिकांशत: कुपोषण के शिकार बच्चों से भरी आबादी के लिए ईंधन और भोजन की आपूर्ति बंद कर देना। इस सबके साथ अथक, उबाऊ, बेईमानी से भरी जुगलबंदी चलती रही पश्चिमी राजनीतिक नेताओं और उनके संगतकार पश्चिमी मीडिया-उदघोषकों की। एक का सुर दूसरे के सुर में मिलता हुआ। बासी लफ्फाजियों के बाद लफ्फाजियां, तथाकथित `अंतरराष्ट्रीय समुदाय´ के आयोगों के बाद आयोग, जिसका कुल जमा मतलब निर्दोष गाजा निवासियों की सहायता नहीं बल्कि इस्राइल के निर्विवाद गैरकानूनी अतिक्रमण को `विवादित´ सिद्ध करने के बहाने खोजना और फिलिस्तीनी जनता द्वारा लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सत्ता को `आतंकवादी हमास´ के रूप में खारिज करना क्योंकि `हमास इस्राइल के अस्तित्व के अधिकार को स्वीकार करने से इनकार करता है´ जब कि जगजाहिर सच यह है कि इस्राइल ही फिलिस्तीनियों के अस्तित्व के वैधानिक, ऐतिहासिक और मानवीय हक को नकारता है।
इस्राइल के शांति आंदोलन `गुश शालोम ´ के संस्थापक यूरी एवनेरी ने 26 जनवरी को लिखा था -`इस्राइली जनता से जो सच छिपाया जा रहा है वह यह है कि गाज़ा से दागे जाने वाले `कसम´ रॉकेट कल से ही बंद हो सकते हैं। हमास कई महीने पहले युद्धबंदी (सीज़फायर) का प्रस्ताव भेज चुका है। इस हफ़्ते उसने अपना प्रस्ताव फिर दोहराया है। ...आख़िर हमारी सरकार इस प्रस्ताव को फौरन मान क्यों नहीं लेती? सीधी-सी बात :`हमास´ से समझौता? उससे हम बात करें? इस्राइली जनता की यातना को खत्म करने से ज्यादा ज़रूरी है `हमास´ का बहिष्कार! सच तो यह है कि `हमास´ बहुत पहले इस्राइल के सामने 10 साल तक युद्धबंदी का प्रस्ताव रख चुका था और तभी से वह इस्राइल के रूप में यहूदी राज्य के अस्तित्व को मान्यता दे चुका है।´
फिलिस्तीनी नागरिकों के प्रतिरोध को पिछले दिनों नाटकीय तरीके से प्रेरणा दी मिस्र (इजिप्ट) के स्टार फुटबाल खिलाड़ी मोहम्मद अबु तरेका ने। अबु तरेका को मिस्र का जिनेदिन ज़िदान का कहा जाता है। अपनी राष्ट्रीय फुटबाल टीम को अफ्रीकी नेशंस कप में सूडान की मज़बूत टीम पर 3-0 से जीत दिलाने के बाद अबु तरेका ने अपनी कमीज़ ऊपर उठाकर अपनी बनियान दर्शकों के सामने खोल दी, जिस पर गाज़ा के निवासियों के समर्थन की अपील अरबी और अंग्रेजी दोनों भाषओं में लिखी हुई थी। दर्शकों की भीड़ स्टेडियम में तालियों और शोर के साथ जोश में उठ खड़ी हुई और दुनिया के लाखों लोगों ने अबु तरेका और गाज़ा के निवासियों के प्रति समर्थन व्यक्त किया। फीफा (फेडरेशन ऑफ इन्टरनेशनल फुटबाल एसोसियेशन) के सामने अबु तेरेका को पीला कार्ड दिखाये जाने की कारवाई पर विरोध प्रगट कर रहे खेल पत्रकारों के प्रतिनिधि मंडल के सदस्य मिस्र के एक खेल पत्रकार ने कहा- `अबु तरेका ने जो काम किया है उससे कई तरह की दीवालें ढह जाती हैं। चुप्पियों की दीवालें .....हमारे दिमाग के भीतर की दीवालें !´
कार्पोरेट मीडिया में जहां `रुपर्ट मरडॉकशाही ´ का बोल-बाला है, जिसमें सारी दुनिया को `इस्तेमाल करो और फेंक दो´ के नजरिये से देखा जाता है, उसमें ऐसी घटनाओं को समझने की हमारी बुद्धि भोंथरी हो चुकी है। यहां ऐसी खबरों का चुनाव किया जाता है जो या तो हमारे भीतर दुचित्तापन और घबराहट पैदा करती हैं या हमें अकर्मण्य बनाती हैं। उदाहरण के लिए आजकल मीडिया में जिन खबरों को सबसे ज्यादा अहमियत दी जा रही है वह है आगामी राष्ट्रपति के चुनाव के जरिये व्हाइट हाउस पर अपना-अपना दावा ठोंकने वाले दो बिल्कुल एक जैसे मौकापरस्तों की जमात की सनक और लफ्फाजी की खबरें दोनों जमात बुश शाही की युद्ध नीति का समर्थन करने के मामले में एक दूसरे से बढ़-चढ़ कर हैं। जॉन मैकेन , जिनका रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार चुना जाना लगभग तय है - `एक शताब्दी तक चलने वाला महायुद्ध´ चाहते हैं। दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी अपने दो उम्मीदवारों को इसलिए सबसे प्रासंगिक बता रही है क्योंकि इनमें से एक महिला है और दूसरा अश्वेत। लेकिन इससे ज्यादा बकवास की बात कुछ हो नहीं सकती। आखिर जॉर्ज बुश की चहेती कट्टर रक्षा सचिव कोंडोलिज़ा राइस तो दोनों एक साथ है। यानी महिला भी और अश्वेत भी।
और ज़रा हिलैरी क्लिंटन के पीछे की अंधेरी-धुंधलकों से भरी दुनिया पर नज़र डालिये। उनके समर्थकों में मोसांटो नामक कुख्यात कंपनी भी शामिल है, जिसने `एजेंट ऑरेंज´ जैसा घातक फौजी रसायन बनाया, जो आज तक विएतनाम को तबाह कर रहा है। (हमारे देश में आंध्र, विदर्भ से लेकर पंजाब तक कपास के किसानों की आत्महत्या के पीछे भी इसी कंपनी द्वारा भेजे गये कपास के हत्यारे बीजों का हाथ है।)
बराक ओबामा के प्रमुख चुनाव प्रचारकों में से एक ज़िबिग्न्यु ब्रेजेंस्की भी हैं, जो अफगानिस्तान में उस `ऑपरेशन साइक्लोन´ के मुख्य स्थापत्यकार थे, जिसके पंजे और नाखून आगे चल कर फिदायीनों के जिहादवाद, अलकायदा और 9/11 तक फैल गये।
(कल अगली कड़ी)
Monday, March 17, 2008
फिलिस्तीन
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The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled
6 comments:
उफ़, अश्लील...यही मुंह से निकलता है, नर पिशाचों की करतूतों के बारे में पढ़कर. हमारे `राष्ट्रभक्त रंबांकुरों` को इस्रायल और अमेरिका की ये करतूतें बेहद लुभाती हैं. उन्हें तो जिदान से लेकरमोहम्मद अबु तरेका तक सब गंवार, आतंकवादी और मानवता के दुश्मन लगते ही हैं...दिक्कत ये है कि दुनिया का नक्शा काफी बदल हया है और न्याय कि ताकतें बेहद अरक्षित हैं. लेकिन इतिहास ये भी है कि संघर्ष कभी थमते नहीं हैं. मरे-गिरे लोग भी बार-बार उठकर चुनौती देते हैं. ....लोग अमेरिका के चुनाव में इसकी जीत और उसकी जीत को लेकर बड़ी उम्मीदों के ख्वाब दिखाते हैं जबकि हकीकत वे ख़ुद भी जानते हैं. आप इस तरह की चीजें पढ़वाते रहें..इससे उन लोगों को मजबूती मिलती है, जो मजबूती चाहते हैं..वरना तो सब अपने ठोस व्यक्तित्व के सांचों में जीते ही हैं.....(आप लोगों से पाठक उम्मीदें रखते हैं.....)
filistin par aapki nyI post dekhi. aapke pakch ko bhi jana.
अबू तरेका का उदाहरण वाकई महत्वपूर्ण् है .. नयासमय पर आपकी टिप्पणी से मुझे काफी हौसला मिला है .. आज ही फेलिनी की "रोमा" की डीवीडी मिली है.. जल्द ही उस पर कुछ लिखूंगा
tippni aankh khol di....dhundhlka kitna prtdar hai...
प्रणाम - सभी परिजनों के साथ होली होय - त्यौहार की समस्त शुभकामनाएँ - सादर - मनीष
माफ़ी....बहुत अस्त-व्यस्तता रही. मेरे गांव की होली के कुछ टुकडे देखें....नगडिया, ढोलकी, मंजीरा...
होली की शुभकामनाएं
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