मनीष जी, बहुत दिनों बाद थोड़ी मोहलत मिली हैं। ...कल अपना वीजा लेकर लौटा। ओलिम्पिक मशाल की वजह से पूरी दिल्ली के ट्रैफिक का हाल तो आप अखबारों टी.वी में देख ही चुके होंगे। उसी की गिरफ्त में मैं भी था। सोमवार को कोरिया चला जाऊंगा। उसके पहले कोशिश करूंगा की 'तिब्बत' कविता के बारे में अपनी स्मृतियाँ यहाँ लिख डालूँ...लेकिन लगता हैं, एक कविता के बारे में और वह भी एक अकेले कवि के पोस्ट में रूचि कितनों को होगी? लेकिन जैसा की कहावत हैं...रचना एक मोनोलोग होती हैं....एक एकालाप...फिर यह तो चिट्ठी हैं...कोई न पढे आप तो पढेंगे ही...
दूसरी कड़ी
मुझे बिल्कुल ठीक-ठीक साल याद नहीं, जब यह घटना घटी। शायद 1960-61 का वर्ष होगा। हो सकता है इसके आगे-पीछे का कोई साल हो। हां, इतना ज़रूर याद है कि हमारे गांव के आज वाले घर के सामने का हिस्सा बन कर तैयार हो चुका था। यानी 1957-58 बीत चुका था। नेहरू जी तब हमारे प्रधानमंत्री होते थे और वे जीवित थे। बच्चे उन्हें चाचा नेहरू कहते थे। गांव के स्कूलों में उन्हें यही सिखाया जाता था। कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी हुआ करती थी और उसका झण्डा बिल्कुल राष्ट्रीय तिरंगे जैसा होता था बस बीच में अशोक चक्र की जगह पर चरखा बना रहता था। कहते थे कि वह चरखा गांधी जी ने नेहरू जी को दिया था, जिसे गांधी जी की हत्या के बाद नेहरू जी ने कांग्रेस के झण्डे में छपवा दिया था। उन दिनों जब चुनाव होते तो पैंफलेट बंटते, जिनमें छपा होता -`मुहर हमारी वहीं लगेगी, जहां बनी बैलों की जोड़ी।´ अब पता नहीं वे बैल झण्डे से निकल कर कहां चले गये?
तब तक अमेरिका के राष्ट्रपति केनेडी शायद जीवित थे और मैं अपने बालों को उनकी तरह बनाने की कोशिश किया करता था। बालों के मामले में केनेडी और देवानंद मेरे आदर्श हुआ करते थे। बालों में तेल और पानी चुपड़कर और सामने पेंसिल खोंसकर, दोनों तरफ से हथेलियों में बालों को दबा कर बहुत बार मैंने देवानंद की तरह फुग्गे बनाये। लेकिन केनेडी के सूखे हुए बाल हमेशा मुझे अधिक पसंद थे। शायद तब तक रूस का अंतरिक्ष यात्री यूरी गगारिन अंतरिक्ष तक पहुंच गया था। इसके पहले रूस एक कुतिया `लाइका´ को भी अंतरिक्ष तक पहुंचा चुका था। स्पेस टेक्नोलाजी के लिहाज से अमेरिका बहुत पीछे छूटता जा रहा था। पिता जी के पास रात में बैठने वाले लोगों में अक्सर बहस होती थी कि रूस और अमेरिका में कौन आगे है, कौन ज़्यादा ताकतवर है और कौन हमारा सच्चा दोस्त है।
मेरी मां भी तब जीवित थीं, कैंसर में उनकी श्वासनली नहीं गली थी और तब तक `नेलकटर´ कहानी लिखने की यंत्रणापूर्ण कल्पना मैं कर भी नहीं सकता था। मेरी मां और नेहरू जी की मृत्यु एक ही साल -1964 में हुई थी। 27 मई को नेहरू जी और 30 दिसंबर को मां। ये दोनों घटनाएं मेरे बचपन की बहुत दुखद घटनाएं थीं। 27 मई को पिता जी ने रोते हुए कहा था कि नेहरू जी के दिमाग की नस चीन से धोखा खाने के कारण फटी थी।
मैंने नेहरू जी की मृत्यु के बाद उनका एक चित्र अपने घर की दीवाल पर वाटर कलर से बनाया था। `अस्ताचल की ओर जाते चाचा नेहरू´। मां ने उस चित्र को देखा था और मुझे डांटा था कि तुमने नेहरू जी का चेहरा, जो कि इतना सुंदर था, वह क्यों नहीं बनाया? उनकी पीठ क्यों बनाई ? पिता जी बताते थे कि नेहरू जी इतने सुंदर थे कि केनेडी और देवानंद उनके सामने कुछ नहीं थे। नेहरू जी की सुंदरता पर भारत के गवर्नर जनरल माउंटबेटन की पत्नी और अमेरिका की कोई मशहूर हीरोइन (शायद मर्लिन मुनरो या शरले मक्लीन या फिर कोई और) फिदा थीं। दोनों नेहरू जी से शादी करना चाहती थीं लेकिन नेहरू जी ने कहा था - `नो......नो, आई कैन नॉट डू दिस´। फिर थोड़ा रुक कर पिताजी जोड़ते -`बिकॉज़ आयम आलरेडी मैरीड !´ मां कहतीं कि नेहरू जी की पत्नी बहुत सुंदर थीं, लेकिन नेहरू जी के बिलायत चले जाने और अंग्रेजों जैसा बन जाने से इलाहाबाद में अकेली रहते-रहते बीमार होकर मर गईं।
मैंने मोमबत्ती और सनलाइट साबुन की बटि्टयों को चाकू और ब्लेड से छील-छील कर नेहरू जी के कई बस्ट और पुतले बनाये थे। अगर आप में से किसी ने `नेहरू, अस्ताचल और खंडित स्त्रियां´ नाम की कई साल पहले लिखी गई मेरी कहानी पढ़ी हो, तो जान सकते हैं कि नेहरू जी का संबंध हमारे घर और मेरे बचपन के साथ कितनी गहराई से जुड़ा हुआ था। लेकिन एक बात मैं यहां यह ज़रूर कहना चाहूंगा कि इन संबंधों का राजनीति से कभी कोई संबंध नहीं था। इस सब पर मैं कभी बाद में लिखूंगा। अभी तो लौटें उस घटना की ओर, जिसका `तिब्बत´ से लेना-देना है।
जिस दिन वह घटना घटी थी, उस दिन मैं रसोई में मां की ही बनाई रोटियां और आलू परवल की सब्ज़ी, जो पिता जी को बहुत पसंद थी, खाकर हाथ-मुंह धोने पछीत (पिछवाड़े) की ओर निकला था। पछीत की तरफ ही, थोड़ी दूर, नदी बहती थी और उस दिन वह बाढ़ में उतरा रही थी। शायद जुलाई, यानी आषाढ़ का महीना रहा होगा।
मैं रसोई के पिछले दरवाज़े के पास रखे पत्थर पर खड़ा होकर हाथ-मुंह धो रहा था, जब मैंने वह देखा, जो मेरी स्मृति में किताबें के लिए गया हो गया और जो कई साल बाद `तिब्बत´ कविता लिखने का कारण बना।
उस समय मेरी उम्र, आप अनुमान लगा सकते हैं, आठ या नौ साल की रही होगी। उन दिनों मैं खूब चित्र बनाता था, कविताएं लिखता था और एक पुराने `रोली कॉर्ड´ कैमरे से 120 ब्लैक एंड व्हाइट फोटो खींच कर उन्हें खुद ही प्रिंट करने की ओ में लगा रहता था। मेरे भाई तकनीकी के मामले में मेरे गुरु थे। आप में से जिन्होंने भी `अपराध´ और `भाई का सत्याग्रह´ कहानियां पढ़ी हैं, वे यह जानते होंगे कि पांच साल की उम्र में ही पोलियो के कारण उनका एक पांव बेजान हो चुका था। तब भी साइकिल चलाने और तैरने में उनका कोई मुकाबला नहीं था।
हमारे घर में `भारत´ नाम का अखबार इलाहाबाद से आता था और कभी-कभी `नव-भारत´ भी। पत्रिकाएं बहुत-सी आती थीं, जिन्हें कभी नये घर की परछी (बारामदे) में तो कभी घर से ज़रा-सा बाहर कटहल के पेड़ के नीचे, बेंत की आराम कुर्सी पर बैठे हुए पिता जी पढ़ते रहते थे। पिता जी को किताबें और बेंत की कुर्सियां बहुत पसंद थीं, जिन्हें वे इलाहाबाद से मंगाते थे। हमारे घर में एक ग्रामोफोन भी था, जो खराब पड़ा था। एक हैंडिल से उसमेंo चाभी भरने पर रिकॉर्ड घूमता था लेकिन चूंकि उसका िस्प्रंग टूटा हुआ था और साउंड बॉक्स भी जंग खाकर बेकार हो चुका था इसलिए वह ग्रामोफोन अटारी (दुछत्ती) के स्टोर रूम में रख दिया गया था। रेडियो आ चुका था इसलिए उसे हमारे घर ने त्याग दिया था।
टेक्नॉलॉजी के साथ हमेशा यही होता है। एक समय का `क्रेज़´ देखते ही देखते कबाड़खाने का सामान बन जाता है। अपने गौरवशाली अतीत पर ऐंठता और जंग खाता हुआ। लेकिन यह बात मनुष्यों पर भी लागू होती हैं।
मैं और मेरे भाई दोनों ऐसी त्यागी जा चुकी पुरानी-चीज़ों को दुबारा जीवित और ठीक करने में दिन रात लगे रहते थे। ग्रामोफोन में जो डिस्क लगता था, उसे शहरी लोग `रिकॉर्ड´ कहते थे और गांव के लोग `तवा´। वह चपड़े या लाख का बना होता था और देखने में उसी लोहे के तवे जैसा दिखता था, जिस पर मां रसोई में रोटियां बनाती थीं। हमारी अटारी में ऐसे अनगिनती तवे थे। अनमोल घड़ी, आह, आग, जाल, पता नहीं कितनी फिल्मों के गाने उन तवों की बारीक लकीरों में बंद थे जो सुई रखते ही जिंदा हो जाते थे।
यह सोचना भी अब कितना विचित्र लगता है कि पलाश या छिउला के पेड़ में रहने वाले छोटे-छोटे लखौरी कीड़े पेड़ के तने और पत्तियों से जो गाद के रवे इकट्ठी करते थे, उसी लाख से ये रिकॉर्ड बनते थे जिसकी बारीक लकीरों पर सुई के घूमते ही -`मेरा सुंदर सपना बीत .....गया ´ या `आवाज़ दे कहां है, दुनिया मेरी जवां हैं....´ जैसे गाने निकलने लगते थे। क्या यह कौतुक किसी जैव-यांत्रिकी, यानी छिउले के नन्हें-नन्हें कीड़ों और जर्मनी से लेकर कलकत्ता तक फैलीं रिकॉर्ड बनाने वाली कंपनियों की मशीनों के तालमेल का अनोखा जादू नहीं था?
इसीलिए मैं कभी भी, आज तक किसी नयी से नयी प्रविधि या टेक्नॉलाजी को वैसा अ-मानवीय और अ-प्राकृतिक नहीं मान पाता, जैसा लोग अक्सर मानते हैं।वह तो प्रविधि का इस्तेमाल हैं, जो यह सब तय करता हैं।



The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled