हालांकि अब तक आपका धैर्य साथ छोड़ चुका होगा और आप नाराज़ होकर इस गली की ओर आना बंद कर चुके होंगे लेकिन आखिर अपनी धुरी से बेदखल होकर अंतरिक्ष में खानाबदोश भटकता कोई नक्षत्र किसी किस्से को भला एक बैठिकी में कैसे पूरी करे ? मेरे उपन्यास न लिखने के पीछे भी तो यही भटकन और अस्थिरता है, जो विश्वास कीजिये मेरा चुनाव नहीं, इस अन्यायी, जातिवादी, भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था की निर्मम विनिर्मिति है।
इस बीच जब कोरिया से लौटकर आया तो पता चला मेरे विलक्षण आत्मीय मित्र अशोक शास्त्री का निधन हो गया। जाने के पहले उनसे कई बार लंबी बातें हुईं थीं। कुछ ही दिन पहले उनका पत्र आया था। मेरे बेटे सिद्धार्थ के विवाह स्वागत भोज में शामिल होने के लिए 5 मार्च को भी वे जयपुर से चले थे, लेकिन `मिड वे´ तक चहुंचकर लौटना पड़ा। उनका स्वास्थ्य उस दिन भी ठीक नहीं था।
अशोक शास्त्री हिंदी के कालजयी कथाकार रांगेय राघव के जामाता थे। उनकी सुपुत्री सीमंतिनी के पति। वे कुछ ही समय पहले तक दिल्ली के `जनसत्ता´ अखबार में वरिष्ठ सहायक संपादक के पद पर थे और उन्हीं की ज़िद में मैं निरंतर इस अखबार में लिखता भी रहा। अभी तक इस शोक से उबर नहीं पाया हूं।
ईश्वर आदरणीया सुलोचना जी और सीमंतिनी जी को यह दुख सहने का साहस दे।
`तिब्बत´ के बारे में बस इसके बाद। कल तक।
Saturday, May 3, 2008
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The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled