
फिर से एक कविता का ड्राफ्ट
मेरे सिर पर कोई मुकुट नहीं था
मेरी आंखें सब कुछ देखती जैसी ही आंखें थीं खामोश
हथेलियों में पद्म और शंख नहीं थे
भाग्यरेखाएं अगर थीं भी कभी
तो घिस चुकी थी
या उन्हें मिटाया जा चुका था
न आंत थी न आमाशय
भूख अगर थी तो उसे भूल चुका था
किसी याद की तरह जो आती थी फिर खो जाती थी
न कोई परिवार था न कुटुंब न ठिकाना
एक भटकता हुआ लापता कोई शरीर था उसके अंदर
एक थी कोई आत्मा जैसी चीज़
जो लगातार अपना जुर्म पूछती थी
न नौकरी थी न नगद न भरोसा न और जीने की चाह
हद है कि हत्यारों से तब भी डर लगता था
एक कहते थे देश था
एक पढ़ते थे व्यवस्था थी
एक जिसमें मैं बोलता था और सोचता था वह भाषा थी
एक बेदखली थी सबसे
आंखों में जहां सपने हो सकते थे
फटी हुईं बिवाइयां थीं
ओ मेरे वक्त के ठगो और लुटेरो
राम करे तुम पर गिरे औलिया का कहर
ख़लक करे एक दिन तुम्हारा हिसाब
तुम्हारी दौलत और कामयाबियों पर नाज़िल हो
कायनात भर के मजलूमों और फक़ीरों
की आब
(दिल्ली लौटने के बाद पहली कविता)



The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled