Friday, May 30, 2008

एक कविता का मसौदा



फिर से एक कविता का ड्राफ्ट
मेरे सिर पर कोई मुकुट नहीं था
मेरी आंखें सब कुछ देखती जैसी ही आंखें थीं खामोश
हथेलियों में पद्म और शंख नहीं थे
भाग्यरेखाएं अगर थीं भी कभी
तो घिस चुकी थी
या उन्हें मिटाया जा चुका था

न आंत थी न आमाशय
भूख अगर थी तो उसे भूल चुका था
किसी याद की तरह जो आती थी फिर खो जाती थी

न कोई परिवार था न कुटुंब न ठिकाना
एक भटकता हुआ लापता कोई शरीर था उसके अंदर
एक थी कोई आत्मा जैसी चीज़
जो लगातार अपना जुर्म पूछती थी

न नौकरी थी न नगद न भरोसा न और जीने की चाह
हद है कि हत्यारों से तब भी डर लगता था

एक कहते थे देश था
एक पढ़ते थे व्यवस्था थी
एक जिसमें मैं बोलता था और सोचता था वह भाषा थी
एक बेदखली थी सबसे

आंखों में जहां सपने हो सकते थे
फटी हुईं बिवाइयां थीं

ओ मेरे वक्त के ठगो और लुटेरो
राम करे तुम पर गिरे औलिया का कहर
ख़लक करे एक दिन तुम्हारा हिसाब

तुम्हारी दौलत और कामयाबियों पर नाज़िल हो
कायनात भर के मजलूमों और फक़ीरों
की आब
(दिल्ली लौटने के बाद पहली कविता)