
॥ मैं लौट जाऊंगा॥
क्वांर में जैसे बादल लौट जाते हैं
धूप जैसे लौट जाती है आषाढ़ में
ओस लौट जाती है जिस तरह अंतरिक्ष में चुपचाप
अंधेरा लौट जाता है किसी अज्ञातवास में अपने दुखते हुए शरीर को
कंबल में छुपाए
थोडे़-से सुख और चुटकी भर सांत्वना के लोभ में सबसे छुपकर आयी हुई
व्यभिचारिणी जैसे लौट जाती है वापस अपनी गुफ़ा में भयभीत
पेड़ लौट जाते हैं बीज में वापस
अपने भांड़े बरतन, हथियारों, उपकरणों और कंकालों के साथ
तमाम विकसित सभ्यताएं
जिस तरह लौट जाती हैं धरती के गर्भ में हर बार
इतिहास जिस तरह विलीन हो जाता है किसी समुदाय की मिथक गाथा में
विज्ञान किसी ओझा के टोने में
तमाम औषधियां आदमी के असंख्य रोगों से हार कर अंत में जैसे लौट जाती हैं
किसी आदिम स्पर्श या किसी मंत्र में
मैं लौट जाऊंगा जैसे समस्त महाकाव्य, समूचा संगीत, सभी भाषाएं और
सारी कविताएं लौट जाती हैं
एक दिन अंतरिक्ष में वापस
मृत्यु जैसे जाती है जीवन की गठरी एक दिन सिर पर उठाये उदास
जैसे रक्त लौट जाता है पता नहीं कहां अपने बाद शिराओं में छोड़ कर
निर्जीव निष्पंद जल
जैसे एक बहुत लंबी सज़ा काट कर लौटता है कोई निरपराध कैदी
कोई आदमी
अस्पताल के गहन चिकित्साकक्ष में
एक लंबी बेहोशी के बाद
एक बार आंखें खोल कर लौट जाता है
अपने अंधकार में वापस ॥
(१९९४)



The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled