
हाय ....
महाकाय दस्यु
नाटा है काला है मोटा है जंगली
बिखरी है दाढ़ी
कंधे से लटका
सीने पर कारतूस का पट्टा !!
हाथ में रायफल !
क्रोधी है बन्दूक
देख रही वह तो
दूर वहां , दूर वहां,
......
......
अंधियारे इरादों के धड़
इशारों से करते हैं
किन्हीं स्याह सतहों की बात .....
उदार चेतनाध्यक्ष का खून
राष्ट्राध्यक्ष का खून
आत्माध्यक्ष का खून ...
पृथ्वी पर कहीं कोई वारदात
ऐसी कि जल उठे
दुनिया का सर, पैर, हाथ....
टूट-फूट , टूट- फूट , सब अस्तव्यस्त ,
टीले के वक्ष में सब कुछ ध्वस्त .....
-मुक्तिबोध



The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled