
बग़दाद में जॉर्ज बुश के विदाई समारोह के मौके पर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस के दौरान उन पर ईराकी न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर मुंतज़र अल-ज़ैदी द्वारा जूता फेंक कर मारने की घटना का वीडियो देखते हुए बार-बार यह सवाल उठता है कि मुंतज़र अल-ज़ैदी के इस कारनामे को हिंसक और आतंकवादी माना जाय या इराकी और मध्य एशियाई जनता की दबी-कुचली, आहत और दुखी भावनाओं का एक प्रतीकात्मक अहिंसक प्रतिरोध?अरब और ईरानी टीवी चैनलों में इस घटना की वीडियो फुटेज बार-बार दिखाई जा रही है। स्लो-मोशन में भी। इस फुटेज में जार्ज बुश , जिन्हें अमेरिकी जनता ने पहले ही बाहर का रास्ता दिखा दिया है, प्रेस कांफ्रेंस में अपनी ओर आते जूते से बचने के लिए बायीं ओर झुकते हैं और तभी टीवी रिपोर्टर की आवाज़ सुनाई देती है :`ईराक की जनता द्वारा तुम्हारी विदाई का ये आखिरी चुंबन है, कुत्ते !´ कहने की जरूरत नहीं कि `अल बगदादिया´ नामक एक स्वतंत्र टीवी चैनल में मामूली संवाददाता का काम करने वाला मुंतज़र अल-ज़ैदी इस समय पूरे अरब और मध्य एशियाई जनता का हीरो बन चुका है और उसके समर्थन में नाचते-गाते लोग सड़कों पर उतर आए हैं। हांलाकि इराक की मौज़ूदा सरकार ने इसे `बर्बर´ और `शर्मनाक ´ कृत्य घोषित किया है। आज के समय में जनता और सरकार के नजरियों में ऐसा विरोधाभास लगभग विश्वव्यापी है। कह सकते हैं कि दुनिया के अधिकांश देशों की सरकारें जॉर्ज बुश की सहयोगी हैं और दुनिया के लगभग सभी देशों की जनता (और इसमें अमेरिका की जनता भी शामिल है) जॉर्ज बुश की विरोधी है। इस वीडियो फुटेज को इस समय अरब देशों और मध्य एशियाई देशों के टीवी चैनल उसी उत्साह और तत्परता के साथ दिखा रहे हैं, जिस जोशो-खरोश के साथ अमेरिका ओर यूरोप के चैनलों में कुछ साल पहले का वह फुटेज दिखाया जा रहा था, जिसमें बगदाद में नाटो और अमेरिकी फौज़ों की फतह के बाद, सद्दाम हुसैन की मूर्ति और पोस्टरों पर जूते मारते और तोड़-फोड़ करते लोगों के दृश्य प्रसारित किये जा रहे थे। मिस्र के विदेशमंत्री अहमद मेहर की टिप्पणी है -`इस घटना से पता चलता है कि इस समूचे मध्य एशियाई क्षेत्र में जार्ज बुश ने अपने प्रति कैसी भावना को पैदा किया है। अमेरिका पहले भी इस क्षेत्र में लोकप्रिय नहीं रहा है, लेकिन उसके प्रति जनता की भावना इस हद तक नीचे जा पहुंची है, यह घटना उसका खुलासा करती है।एक खबर यह भी है कि मुंतज़र अल-ज़ैदी ने जिस कंपनी का जूता बुश पर फेंक कर मारा था, उसका ब्रांड अचानक वहां के बाजारों में छा गया है। खुद उस फेंके गये जूते की नीलामी की राशि का अंदाज़ा बड़े-बड़े दिग्गज नहीं लगा पा रहे हैं। हां, कुछ फिलिस्तीनी सूत्रों के अनुसार, हेब्रान की एक बड़ी जूता कंपनी ने मुंतज़र अल-ज़ैदी और उसके परिवार वालों को आजीवन अपनी कंपनी का जूता मुफ्त देने का एलान किया है। इतना ही नहीं, इस घटना पर एक `ऑन लाइन बुश-गेम´ भी बन गया है, जिसे आप भी खेल सकते हैं। बगदाद की घटना के 24 घंटे के भीतर-भीतर नेटजन खिलाड़ी अपने `निशाने´ पर 600,000 जूते जड़ चुके हैं। आप भी अपना निशाना चाहें तो आजमा सकते हैं। यह : http://www.kroma.no/2008/bushgame/ पर उपलब्ध है। बहरहाल, एक ऐसे समय में, जब हमारे देश पर बर्बर आतंकवादी हमले के घाव अभी तक ताज़ा हैं, और जहां कारपोरेट मीडिया और सत्ताधारी राजनीति के हलके में जॉर्ज बुश अभी तक `वार अगेंस्ट टेरर´ के सेनानायक के रूप में पूजे जाते हैं, यहां इस जूता मारने की घटना को किस रूप में लिया जाय ? यह सवाल मैंने अपने घर अक्सर आने वाले एक गांधीवादी बुद्धिजीवी मित्र से पूछा। उनका कहना था :`देखिये, कोई भी कर्म बपने संदर्भ के सापेक्ष्य ही हिंसक या अहिंसक होता है। अगर कोई अमीर या ताकतवर किसी गरीब और निर्बल को जूता मारता है, तो बिना संदेह यह हिंसा और बर्बरता का कर्म है। लकिन अगर कोई असहाय, मज़लूम और सताया गया गरीब आदमी किसी ताकतवर को `कुत्ता´ कहता है या `जूता´ या `किताब´ खींच कर मारता है, तो यह एक अवज्ञापूर्ण , अहिंसक प्रतिरोधात्मक कार्रवाई है। क्योंकि इस कार्रवाई की व्यापकता में हिंसा, बरबादी और निर्दोषों के जान-माल के नुकसान की अन्य संभावनाएं बिल्कुल नहीं हैं।´
उनका कहना था कि न्यूयार्क की जुड़वा इमारतों, भारत के संसद भवन और मुंबई पर आतंकवादी हमलों की कठोर भर्त्सना करने के बावज़ूद वे बगदाद में घटी इस घटना को किसी आतंकवादी या कट्टरतावादी कृत्य से जोड़कर देख पाने में खुद को असमर्थ पाते हैं।´ जॉर्ज बुश की नीतियों ने सिर्फ और सिर्फ ताकत, सिर्फ और सिर्फ हिंसा, सिर्फ और सिर्फ झूठ का सहारा लिया और 9/11 को न्यूयार्क में अल कायदा के आतंकवादी हमले के साथ संसार भर में अमेरिका और वहां की जनता के प्रति जो विश्वव्यापी सहानुभूति की लहर उठी थी, उसे अपने आठ साल के विध्वंसक कार्यकाल में उन्होंने भय और नफरत की लपटों में बदल डाला।मेरे गांधीवादी मित्र का कहना था :`जिस आदमी ने इराक और अफगानिस्तान को कब्रगाह, कैदखानों, मलबों और बारूद कि सुरंगों में बदल डाला हो और जिसकी निगाहें ईरान, उत्तरी कोरिया समेत दूसरे देशों में बमबारी के लिए तरस रही हों, उस पर एक स्वतंत्र चैनल के टीवी रिपोर्टर द्वारा मामूली सा एक जूता उछालने की घटना हिंसक और आतंकवादी कैसे हो सकती है ?'
सोचिए, अगर जालियांवाला बाग के कत्लेआम को अंजाम देने वाला जनरल डायर किसी देशप्रेमी लेखक को कनॉटप्लेस या चांदनी चौक में मिल जाता और वह उसे जूता या किताब फेंक कर मारता, तो आप उसे क्या कहते?´
इतना कह कर वे चले गये। मैं नहीं जानता, इस घटना की व्याख्या बाकी लोग कैसे करेंगे। लेकिन इतना मुझे ज़रूर लगता है कि हमारे यहां की सरकार और मीडिया उस किताब या जूता मारने वाले हिंदुस्तानी लेखक का रिश्ता अल-कायदा या लश्कर या माओवाद _नक्सलवाद से जोड़ने में कोई कसर न छोड़ती। नीचे यु ट्यूब में बग़दाद का जूता देखिये :
http://in.youtube.com/watch?v=i4dsB4F6puM&NR=1



The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled