Friday, December 26, 2008

'पीली छतरी वाली लड़की' पर एक नई राय



यह एक गुस्सैल लेकिन ज़रूरी किताब है

मेरे प्रिय मित्र और 'हजबैण्ड आफ़ अ फ़ैनेटिक', 'पासपोर्ट फ़ोटोज़', 'पेडागाज़ीज़ कल्चरल स्टडीज़ एंड द पब्लिक स्फ़ियर' जैसे महत्वपूर्ण पुस्तकों के चर्चित लेखक, जो अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के आलोचक और मानवाधिकारों के लिए सदा संघर्षरत रहने वाले प्रखर बौद्धिक हैं, उन्हीं अमितावा कुमार (आप चाहें तो अमिताभ कह लें) ने ४ दिन पहले (२३ दिस.) को अपने बेहद लोकप्रिय ब्लाग में 'पीली छ्तरी वाली लड़की' के जेसन ग्रूनबाम द्वारा किये गये अनुवाद पर एक संक्षिप्त टिप्पणी की है। जेसन स्वयं अंग्रेज़ी के चर्चित कथाकार हैं और जैसा कि मैंने कुछ महीने पहले आपको सूचित किया था, उन्हें हाल में ही कोसावो के अपने अनुभवों के आधार पर लिखी गयी एक मार्मिक और दहला देने वाली कहानी पर अमेरिका का बहुत प्रतिष्ठित 'ओ हेनरी कथा सम्मान ' मिला है। जेसन शिकागो में हिन्दी पढ़ाते हैं, जम्मू-कश्मीर, पूर्वी तिमूर, कोसावो, नेपाल आदि में मानवाधिकारों के लिये, कैदियों और उत्पीड़ितों के पक्ष में काम कर चुके हैं। हिंदी ही नहीं, भोजपुरी भी ऐसी बोलते हैं कि शक होता है...कहीं ये शख्स असल में हिंदुस्तानी तो नहीं, जिसने किसी वज़ह से अमेरिकी त्वचा पहन रखी है। वे मेरे गांव घूम चुके हैं और आजकल एक उपन्यास लिखने के लिये और 'मैंगोसिल' का अनुवाद करने के लिये विश्वविद्यालय से अकादेमिक छुट्टी पर हैं और 'कैट्स किल्स में, जंगल और वन्यप्राणियों से घिरे अपने सुदूर एकांत कठबंगले में अकेले रह रहे हैं। मैं भी तीन रात वहां आज की देश-दुनिया की राजनीति और अपनी हिंदी भाषा-साहित्य के हाल-हुलिये पर बात करते हुए जेसन और वहां के हिरणों के साथ रह चुका हूं। वहां कुछ कवितायें भी लिखी थीं। कभी वे कविताएं (थोड़ा मरम्मत के बाद) मैं आपके सामने प्रस्तुत करूंगा।
(मेरी वर्तनी की गलतियों पर मत जाइयेगा, इतनी यात्रायें कीं, तो ज़रा फिर से अभ्यास करना पडेगा! )


हां, जब ओबामा की जीत चुनावों के बाद घोषित हुई तो आधीरात जेसन का एसएमएस आया-'मैं इस समय ब्रुकलिन के पुल पर हूं ...और...आह ! हम जीत गये हैं !'


खैर, अभी ये देखना बाकी है कि क्या यह सचमुच 'हमारी' जीत है?


इतिहास अक्सर धोखा देता है।


बहरहाल, आज आपका यह लेखक बहुत खुश है। नया साल आने को है। इसके ठीक पहले ३ नवंबर को मैं 'बाबा' (दादा) बना हूं, मेरी बहू मेरी और बेटे सिद्धार्थ की गोद में हमारा पहला पोता 'मैरियूस' आया है। और इसी समय, 'पीली छतरी...' लिखने के अपराध में जिस कट्टर फ़ाशीवादी जातिवाद की प्रतिहिंसा और प्रतिशोध के चलते भाषा और देश में दर-बदर होने की वास्तविकता मेरे दरपेश है, ऐसे वक्त में अमितावा की ये टिप्पणी और मलयालम में इसका अनुवाद शुरू होना, ऐसी घटनाएं हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि एक समय वह ज़रूर, कभी न कभी आयेगा, जब मैं भी जेसन को एस एम एस करूंगा कि 'मैं इस समय छतीसगढ़ में सोन या नर्मदा के पुल पर हूं और ..... आह !..... हम भाषा और संस्कृति में भ्रष्ट, बर्बर और बेशर्म सवर्णवादी उत्पीड़न के विरुद्ध इस लंबे .... असंभव से लगते संघर्ष में जीत गये हैं....' और 'अब हमें और हमारे बच्चों को भी इस भाषा की डिग्री लेने पर नौकरियां मिलेंगी...! हम भी अखबारों और चैनलों और कालेजों, विश्वविद्यालयों में दाल-रोटी, भात-खिचड़ी पायेंगे...! हां फोकट की कार और दिल्ली में एच आई जी/ एम् आई जी फ्लैट भी । हां और सरकारी सुविधा और किसी अकादमी या केन्द्रीय हिंदी संस्थान का वातानुकूलित लक -दक, मह -मह चेंबर भी....! (बिना किसी अफसर और मानव संसाधन या संस्कृति शिक्षा मंत्री की चापलूसी के .......! आह! वो सुबह कभी तो आयेगी ....!!)


हो सकता है, वह दिन अभी दूर हो...! हो सकता है वह दिन मेरे जीवन काल के बाद, सिद्धार्थ, मारियूस और आप सब युवाओं के जीवन में कभी आये .... लेकिन सच मानिये, सिर्फ़ राजनीति ही नही, भाषा और संस्कृति के भूगोल में भी जब तक सवर्णवादी और जातिवादी औपनिवेशिक वर्चस्व को ध्वस्त नहीं किया जाएगा, तब तक हमारी हिंदी भाषा और इसके लेखक को संसार में वही ज़गह मिलती रहेगी, जो जगह हमारी हिंदी पट्टी के राजनीतिक नेताओं और अफ़सरों को मिलती है।


भाषा हमारी व्यावहारिक चेतना होती है। और साहित्यिक रचनायें सिर्फ़ किसी प्रवचनकारी बाबा का वागाडंबर, किसी व्यवसायी या विग्यापनबाज बनिये या किसी धूर्त और झूठे सियासी एजेंट की लफ़्फ़ाजी नहीं होती । बिना किसी यातना और दंड और कठिन मेहनत से गुज़रे, फ़कत वक्रोक्तियों और जुगाड़बाजियों से सब कुछ हासिल करने वाले भ्रष्ट जातिवादियों से मुक्ति के लिए हमारी आंखें उसी तरह तरस रही हैं, जिस तरह अंग्रेज़ी राज में हिंदुस्तानियों की आंखें स्वाधीनता के लिए तरस रहीं थीं।


(लगता है मैं आवेग में कुछ ज़्यादा लिख गया। माफ़ करेंगे .... ज़रूर !)


तो...अमिताभ की टिप्पणी पढिये। लेकिन ये ध्यान रहे कि ये राय जेसन के अनुवाद के बारे में है।