



(मेरी वर्तनी की गलतियों पर मत जाइयेगा, इतनी यात्रायें कीं, तो ज़रा फिर से अभ्यास करना पडेगा! )
हां, जब ओबामा की जीत चुनावों के बाद घोषित हुई तो आधीरात जेसन का एसएमएस आया-'मैं इस समय ब्रुकलिन के पुल पर हूं ...और...आह ! हम जीत गये हैं !'
खैर, अभी ये देखना बाकी है कि क्या यह सचमुच 'हमारी' जीत है?
इतिहास अक्सर धोखा देता है।
बहरहाल, आज आपका यह लेखक बहुत खुश है। नया साल आने को है। इसके ठीक पहले ३ नवंबर को मैं 'बाबा' (दादा) बना हूं, मेरी बहू मेरी और बेटे सिद्धार्थ की गोद में हमारा पहला पोता 'मैरियूस' आया है। और इसी समय, 'पीली छतरी...' लिखने के अपराध में जिस कट्टर फ़ाशीवादी जातिवाद की प्रतिहिंसा और प्रतिशोध के चलते भाषा और देश में दर-बदर होने की वास्तविकता मेरे दरपेश है, ऐसे वक्त में अमितावा की ये टिप्पणी और मलयालम में इसका अनुवाद शुरू होना, ऐसी घटनाएं हैं, जिन्हें देख कर लगता है कि एक समय वह ज़रूर, कभी न कभी आयेगा, जब मैं भी जेसन को एस एम एस करूंगा कि 'मैं इस समय छतीसगढ़ में सोन या नर्मदा के पुल पर हूं और ..... आह !..... हम भाषा और संस्कृति में भ्रष्ट, बर्बर और बेशर्म सवर्णवादी उत्पीड़न के विरुद्ध इस लंबे .... असंभव से लगते संघर्ष में जीत गये हैं....' और 'अब हमें और हमारे बच्चों को भी इस भाषा की डिग्री लेने पर नौकरियां मिलेंगी...! हम भी अखबारों और चैनलों और कालेजों, विश्वविद्यालयों में दाल-रोटी, भात-खिचड़ी पायेंगे...! हां फोकट की कार और दिल्ली में एच आई जी/ एम् आई जी फ्लैट भी । हां और सरकारी सुविधा और किसी अकादमी या केन्द्रीय हिंदी संस्थान का वातानुकूलित लक -दक, मह -मह चेंबर भी....! (बिना किसी अफसर और मानव संसाधन या संस्कृति शिक्षा मंत्री की चापलूसी के .......! आह! वो सुबह कभी तो आयेगी ....!!)
हो सकता है, वह दिन अभी दूर हो...! हो सकता है वह दिन मेरे जीवन काल के बाद, सिद्धार्थ, मारियूस और आप सब युवाओं के जीवन में कभी आये .... लेकिन सच मानिये, सिर्फ़ राजनीति ही नही, भाषा और संस्कृति के भूगोल में भी जब तक सवर्णवादी और जातिवादी औपनिवेशिक वर्चस्व को ध्वस्त नहीं किया जाएगा, तब तक हमारी हिंदी भाषा और इसके लेखक को संसार में वही ज़गह मिलती रहेगी, जो जगह हमारी हिंदी पट्टी के राजनीतिक नेताओं और अफ़सरों को मिलती है।
भाषा हमारी व्यावहारिक चेतना होती है। और साहित्यिक रचनायें सिर्फ़ किसी प्रवचनकारी बाबा का वागाडंबर, किसी व्यवसायी या विग्यापनबाज बनिये या किसी धूर्त और झूठे सियासी एजेंट की लफ़्फ़ाजी नहीं होती । बिना किसी यातना और दंड और कठिन मेहनत से गुज़रे, फ़कत वक्रोक्तियों और जुगाड़बाजियों से सब कुछ हासिल करने वाले भ्रष्ट जातिवादियों से मुक्ति के लिए हमारी आंखें उसी तरह तरस रही हैं, जिस तरह अंग्रेज़ी राज में हिंदुस्तानियों की आंखें स्वाधीनता के लिए तरस रहीं थीं।
(लगता है मैं आवेग में कुछ ज़्यादा लिख गया। माफ़ करेंगे .... ज़रूर !)
तो...अमिताभ की टिप्पणी पढिये। लेकिन ये ध्यान रहे कि ये राय जेसन के अनुवाद के बारे में है।



The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled