Thursday, January 22, 2009

हंसी-खुशी के मौके पर अपनी अंखियां नम क्यों हैं ?


(छह जनवरी 2009 को लिखी गई पोस्ट। देरी के लिए क्षमायाचना के साथ)


मैं आज आप सबसे माफ़ी मांगता हूं। जिन लोगों की बदौलत ज़िंदगी के मायने हैं और जिनकी वज़ह से आज भी शब्दों पर भरोसा छूट नहीं पाता। जिनके होने से मेरा घर डगमगाता हुआ सही, पर सलामत अभी भी है। बिजली जल रही है। टेलिफोन, मोबाइल, नेट, कार सब चल रहे हैं। जिनके होने से मैं और मेरा परिवार बना रहा। और जिनके साथ ने हर बार उसी भाषा में बार-बार लौटने की इच्छा और हिम्मत दी, जिसमें बसना एक तरह से `अपवर्जन´ की काफि़र या विजातीय कोशिश है (सबवर्सिव इल्लेजिटिमेट एक्ट)। मैं आप सब पाठकों, दोस्तों, साथियों और इस गली में आने वाले उन सभी से क्षमा मांगता हूं कि चाहते हुए भी नव वर्ष के शुभकामना संदेशों, जो डाक, एस.एम.एस., ईमेल और फोन के ज़रिये आये, उनके उत्तर नहीं दे सका। कभी-कभी ही नहीं, बल्कि जिस दौर में मेरे जैसे लोग रह रहे हैं, उसमें अक्सर ऐसे पल कम आते हैं, जब हम भीतर से सचमुच खुश हों। ब्रेख्त़ की लगभग लोकोक्ति बन चुकी कविता पंक्तियां हैं -`जो हंस रहा है, बुरी ख़बर उस तक नहीं पहुंची है।´ लेकिन यह पहले की कविता है। अब हमारे समय में तो हंसना एक उद्योग है। पेप्सी या कोक, के.सी.एफ. या मकडोनल की तरह यह आज के कंज्यूमर मिडिलक्लास का एक ज़रूरी जायका है। आज तो जो हंस रहा है , वह हमारे समय की बुरी लेकिन ज़रूरी खबरों को हमसे छिपा रहा है। हमारे कई टीवी चैनल तब भी हंस रहे थे, जब कोसी की बाढ़ में हज़ारों मर गये थे और कई हज़ार बेघरबार हो कर तबाह थे। यह तब भी लगातार हंसता है और चुटकुले सुनाता है, मिमिक्री करता है, जब पहले सैकड़ों की तादाद में किसान और अब उनके अलावा हाल की ग्लोबल मंदी से बेरोजगार हुए हाइटेक इंजीनियर या प्रोफेशनल आत्महत्या करते हैं। इसकी हंसी तीन-चार दिनों के लिए मद्धिम तब पड़ी थी, जब मुंबई के ताज और ट्राइडेंट होटल पर आतंकवादियों ने हमला किया था।


कई बार सोचता हूं, अगर यह हमला सिर्फ छत्रपति शिवाजी स्टेशन के रेलगाड़ी पर सफर करने वाले मामूली मुसाफि़रों तक ही सीमित रहता या अगर यह दुनिया की सबसे विराट् और बदहाल मज़लूमों का अंतरराष्ट्रीय म्यूज़ियम बन चुकी मलिन बस्ती `धारावी´ पर हुआ होता, तो क्या यह तब भी इतनी बड़ी घटना बनता? शायद नहीं। क्योंकि वह हमला हमारी `राष्ट्रीय ´ आंतरिक सुरक्षा के लिए इतना बड़ा मायने नहीं रखता। तो क्या जैसा पी।सी. जोशी ने ही नहीं, और भी कई ऐसे समाजविदों ने कहा है, वह सच है कि हम एक नहीं दो या उससे अधिक `राष्ट्र ´ हैं? बिहार में कोसी ने जब जनसंहार किया तो क्या कोई गृहमंत्री बदला गया? किसी मुख्यमंत्री की छुट्टी हुई? क्या कोई बरखा दत्त उस तरह से असंतुलित एमोशनल एक्सटेसी में कैमरे के सामने चीखती हुई दिखी? वे लोग जो बाढ़ में बह गये, जिनमें बड़ी तादाद में बच्चे, महिलाएं भी शामिल थे, उनकी मृतात्माओं की शान्ति के लिए क्या इतने चमकदार रंगीन युवाओं ने इंडिया गेट या गेटवे ऑफ इंडिया में मोमबत्तियां जलाईं ? मोसांटो नाम की जो कुख्यात कंपनी कपास के बीजों के नाम पर मौत का पैकेट किसानों को आज तक बेरोक टोक भेज रही है और वे बैंक जिनके जाल में फंस कर दस साल में सवा-डेढ़ लाख किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं, वे किस 'राष्ट्र'के नागरिक हैं? उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किस सरकार के ऊपर आयद होती है? कुछ महीने पहले वंदना शिवा की पंजाब पर रिपोर्ट पढ़ी थी। हरितक्रांति के दौरान जिस पंजाब के किसानों ने, दुनिया भर में अपना पेट भरने के लिए भीख का कटोरा फैलाए इस देश को अनाज से पाट दिया था, खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना दिया था और जिसकी बदौलत पंजाब की संस्कृति का रंग पूरे हिंदुस्तान में बरसने लगा था ...रंगीन पगड़ी, दुपट्टे, लुंगी, कुरते, सलवार... ! भांगड़ा...टप्पा....। बंदना शिवा ने लिखा था कि उसी पंजाब के लुधियाना और भटिण्डा जैसे जिलों के गुरुद्वारों में उन्होंने ढाई हज़ार से ज्यादा विधवाएं देखीं ! सफेद सलवार...सफेद चूनर ...सफेद माथा...! ऐसा सफेद जो तमाम रंगों की मौत से पैदा होता है। पंजाब के रंगों की हत्याएं करके, ढाई हज़ार औरतों का सुहाग छीन लेने वाले को `आतंकवादी´ कौन कहेगा। क्या ऐसा कोई एन।एस।जी। या स्पेशल टास्क फोर्स या कमांडो दस्ता कहीं मौज़ूद है जो किसानों की हत्याओं (जिन्हें हम `आत्महत्या´ कहने के आदी बना दिये गये हैं) को रोक सके? पिछले साल `अमर उजाला´ के पत्रकार प्रताप सोमवंशी की एक ऐसी ही रिपोर्ट बुंदेलखंड में बैंको द्वारा ट्रैक्टर के कर्ज में फंसा दिये गए भोले-भाले किसानों की बड़ी तादाद में आत्महत्याओं के बारे में आई थी।


गहरा िड्रप्रेशन और बेचैनी पैदा होती है। पेंटागन के मशहूर रणनीतिकार और इक्कीसवीं सदी को `सभ्यताओं के संघर्ष और टकराहट की सदी´ घोषित करने वाले मरहूम सैम्युएल हंटिंगटन ने भी अपनी विवादित किताब में लिखा था कि तीसरी दुनिया के देशों में, और खास कर एशियाई-अफ्रीकी देशों में `लोकतंत्र´ (डेमोक्रेसी) कहीं नहीं है। वहां `धनतंत्र´ (प्लूटोक्रेसी) है। और वहां जनता के बोटों द्वारा चुनी गई सरकारें दरअसल धनिकों या व्यापारिक कंपनियों (कार्पोरेट्स) के `मुनीम´ और `मैनेजर´ हैं। लेकिन अब तो लगता है कि हालात और बदतर हो चुके हैं। अब तो जैसे वह `धनतंत्र´ (प्लूटोक्रेसी) भी एक दूसरे तंत्र में तब्दील हो चुका है। और वह है `लुटेरा-माफिया तंत्र´ (क्लेप्टोक्रेसी)! राजनीति से लेकर संस्कृति और साहित्य तक इस माफियातंत्र के अनेक रूप और आकार देखे जा सकते हैं।गरीबों, किसानों, मज़दूरों, बेरोज़गारों आदि को तो छोड़िये, हमारे जैसे लेखकों की भी नागरिकता किस `राष्ट्र ´ की है? अपनी मेहनत और संयोगों के चलते हर रोज़ आत्महत्याओं या विक्षिप्तताओं को टालते हम लोग क्या इन नाचते-गाते, हंसते-खाते और अखंड-अनवरत उत्सव और समारोह मनाते सत्तावानों को कहीं दिखाई पड़ते होंगे ? शायद नहीं!


(इसके आगे का हिस्सा दूसरी कड़ी में)