Tuesday, March 10, 2009

संभाजी भगत का जादू


'कोई सेट पे बैठा है/कोई नेट पे बैठा है/ कोई चैट पे बैठा है/ इंटरनेट पे बैठा है/स्पाइस जेट पे बैठा है/जंबो जेट पे बैठा है/ ..... अपन तो साला कबसे खाली पेट पे बैठा है/ .....सूखे खेत पे बैठा है/टूटे मेड पे बैठा है..../''
और
'कोई दिल्ली में बैठा है भाई/ कोई बम्बई में बैठा है भाई/ भोपाल में बैठा है भाई/ लोकसभा में बैठा है भाई/विधानसभा में बैठा है भाई/ इनको पहचान लेना रे भाई/ इनसे नोट तो लेना रे भाई.....लेकिन ....(अररर...अररर... धाप॥) इनको बोट देना रे भाई॥'
और
'सुबह सुबह अपन टीवी खोलता है तो उसमे एक बाबा आता है | वो बाबा कहता है ...'हवा ले लो ....हवा छोडो... , हवा ले लो ...हवा छोड़ो.....हवा ले लो .....! अरे हम कई-सा हवा खींचे रे साला ..कई-सा हवा छोडे ? इधर खाली पेट में हवा कितना फुल करवाएगा ये टीवी वाला बाबा? ये तो साला पहिलेइच से फुल है !"

ये गीत के बोल हैं संभाजी भगत के| २२ फरवरी की रात दो घंटे तक हजारों लोगों के बीच इस अद्भुत लोकगायक , लोकरंगकर्मी ने अपने जादू से हम सबको किसी रस में नहीं डुबाया| वह कोई इंटरटेनमेंट नहीं कर रहा था| वह जैसे सब को सोते से जगा रहा था| पश्चिम में जैसे कोई पाप रॉक शो होता है, उसी तरह विदर्भ और महाराष्ट्र के दूर दूर के कस्बों शहरों गाँवों से आए दलित और आदिवासी बुद्धिजीवी, लेखक और साधारण लोग, युवा और बुजुर्ग सभी संभाजी भगत के साथ साथ झूम रहे थे, तालियाँ बजा रहे थे|
यह मौका था 'अम्बेडकरी साहित्य और संस्कृति समारोह' का | लेकिन बिल्कुल अलग|... और आडियंस वैसा नहीं, जैसा हम दिल्ली या दूसरी राजधानियों में देखते हैं...!
मैंने आन्ध्र के अद्भुत लोक-कवि गद्दर का कार्यक्रम भी दो बार देखा था| लेकिन इस बार संभाजी भगत का हमेशा के लिए भक्त हो गया| इतना विट, इतना हास्य, ऐसा तीर जैसा भेदने वाला व्यंग्य , इतनी अपडेटेड जानकारियां और उन्हें किसी विज्ञापन की पंचलाइन या स्लोगन में बदलने का ऐसा हुनर...! वाह, क्या कमाल था, शब्दों से परे ! कभी मराठी तो कभी हिन्दी | एक तरफ़ प्रसून जोशी जैसे हिन्दी के लेखक हैं जो कारपोरेट कंपनियों के लिए 'ठंडा मतलब कोका कोला' जैसा स्लोगन बना कर लाखों-करोड़ों की कमाई कर रहे हैं| सुनीता नारायण से लेकर दुनिया भर के पर्यावरण और स्वास्थ्य कर्मियों के प्रतिरोध और ऐसी बहु-राष्ट्रीय साफ्ट ड्रिंक के ज़हर और मुनाफे के सारे प्रमाण सामने होने के बावजूद, जो क्रिकेट से लेकर बालीवुड के तमाम स्टार सेलिब्रिटी हिन्दुस्तानी भाषाओं को इस विषाक्त बाज़ार का औजार बना रहे हैं, ऐसे में संभाजी भगत, जो गाँव-गाँव घूम कर, पिछडे इलाकों और गरीब बस्तियों में जाकर जैसी जागरूकता फैला रहे हैं , वह एक मिसाल है|
२३ फरवरी को सारे अखबारों में हेड लाइनें थीं -'अमरावती हिल उठी'|
अफसोस मैं अपना हैंडीकैम नहीं ले गया था| अपने छोटे से निकोन के डिजिटल कैमरे से कुछ विडियो क्लिप लिए उन्हें आज जोड़ कर आपके सामने रख रहा हूँ!

कल होली है! आप सभी को सच्चे मन से होली के रंग पर्व पर ढेरों मंगल कामनाएं !

अगली पोस्ट पर मैं आपको अमरावती में गुज़रे उन तीन रातों और चार दिन का संक्षिप्त ब्योरा दूंगा, जिन्होंने मुझे एक नए सिरे से बदला !
आइये और संभाजी भगत का क्लिप देखिये :


video