Saturday, March 21, 2009

एक पत्राचार जिससे जिंदगी के मायने पैदा होते हैं


मैंने कहा था कि २० से लेकर २३ फरवरी २००९ की तारीखें जो अमरावती में गुज़रीं, उनकी मेरे जीवन में एक गहरी भूमिका तय हो चुकी हैं|मैं एक बहुत साधारण-सा लेखक हूँ, आप सब जानते है| अमरावती में मैं उन लोगों से मिला जो सचमुच महान है| अपने संघर्षों को भी समूची साधारणता में देखने वाले| मैं एक दो रोज़ में अमरावती पर अपनी पोस्ट आपके सामने लगाऊंगा लेकिन उसके पहले आप प्रोफ सतेश्र्वर मोरे जी के ये पत्र देखिए, जो मेरे लिए किसी धरोहर से कम नहीं है खैरलांजी की घटना ने महाराष्ट्र और विदर्भ में जो नयी जागृति पैदा की है , उसे एक व्यापक आन्दोलन में बदलने में सतेश्र्वर मोरे की भूमिका क्रांतिकारी है हम हिन्दी पट्टी के लेखक उत्सुकता और उम्मीद के साथ स्वयं अपनी मुक्ति के लिए उसी दिशा की ओर देख रहे है
आइये आप भी देखिये वे तीन पत्र ;
मार्च १८, २००९
सस्नेह जयभीम
दोपहर आपका ब्लॉग ओपन कीया तब साइड बार पे ' लेखकी मृत्यु अभी बाकी है ' ये शीर्षक देखा और क्लिक किया तो आपके अंग्रेजी ब्लॉग पे चला गया वहा आपने आगरा में दिया भाषण पढ़ा और रातको आपको मेल करने के लिए मेरा इनबाक्स ओपन किया तो आपका मेल देखकर हैरान हो गया मेरे समज में नहीं आया जिस भाषण बारे में मै लिखना चाहता था वो भाषण जोड़कर आपने मेल किया था आपस में इतना आतंरिक तालमेल ! ये सच्चे स्नेही और साथी का परिणत रूप है| तो मै पिछला और अगला जनम मानता हु| लेकिन इस जनम में आपका साथ नहीं छुटनेवला! आप जैसा आदरणीय साथी मिलना ये इस जनम का सार्थक है| लेखक ने कितनी व्यापक सोच रखनी चाहिए इसका एक सम्पूर्ण माडल ये आपका भाषण है पढ़ते समय बड़ा मजा आया लेकिन उतनीही अस्वस्थतता अंदरही अन्दर खाए जा रही थी| क्या हम इस वास्तवताको सामने रखकर एक नयी सोच दुनिया के सामने ला सकते है? लेखक होना मतलब एक नयी दुनिया के निर्माण की जिम्मेदारी nibhana! कैर अपने अपने सोच की बात है!
अमरावती में आप के बाजु में जो बालक बैठा था उसका नाम अश्वाजित है| खैरलांजी के घटना का निषेध करने के लिए अमरावती में समाज के सभी वर्ग के लोग रस्ते पे उतर आये थे| उस दिन हमने पुरे अमरावती को हिलाकर रख दिया था|तब पुलिस की गोली का शिकार बना दिनेश वानखडे (उम्र लभग १९/२०) का वो छोटा भाई है| उस दिन हमने उनके पिता नरहरी वानखडे और माताजी मनोरमा वानखडे को निमंत्रित किया था लेकिन वो सुभ्ही कम पे निकल जानेसे उस मनपर उसके छोटे भाई अश्वाजित को बुलाना पड़ा| ये आन्दोलन हम सबने अर्थात नॉन पोलटिकल लोगोने खडा किया था | जिसमे मुझे कुछ हरदम के कलमो के साथ ३०७ के तहत जेल में दस दिन काटना पड़ा| मै मेरी पत्नी और हमारे सभी साथी उन सब के ऊपर ३०७ लगा है| आनंद teltumbdeji ने उसपे एक रिपोट लिखि है जो नेट पे है और पिपल मोर्चा में भी प्रकाशित की है|
बहोत लिखा अब रुकता हु| जयभीम
आपका
सतेश्वर मोरे

अत्यंत अत्यंत प्रिय सतेश्वर मोरे जी, आपके इस पत्र को मैं कई-कई बार पढ़ चुका हूं। कुछ पत्र और कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो जीवन भर के साथी बन जाते हैं। मैंने भी जीवन में बहुत कठिनाइयां झेली हैं। १३ साल की उम्र में घर छो्ड़ कर चला आया था। अब ५७ वें साल में हूं। मैं कह सकता हूं कि आपसे मिलना मेरे लिए किसी नियति द्वारा निर्देशित घटना थी। मैं कई बार आपके पारदर्शी, नि्श्छ्ल, संवेदनशील और मानवीयता से भरे व्यक्तित्व को आश्चर्य से देखता रह जाता हूं। और जब इसी कोमल व्यक्तित्व के साहस, जुझारूपन, सक्रियता और इतने व्यापक सामाजिक सरोकारों से जुडे़ पक्षों को देखता हूं, तो मन आदर से भर जाता है। अमरावती आने से पहले मैं बहुत निराश, अकेला, हताशा से भरा हुआ था....अब लगता है मुझे मेरे लोग, मेरे परिजन, मेरे साथी मिल गये। यह लिखते हुए मेरी आंखें डबडबाई हुई हैं और मैं सच्चे मन से यह लिख रहा हूं। मैं आपका यह पत्र अगर आप अनुमति दें तो अपने ब्लाग पर देना चाहूंगा। आपके व्यक्तित्व को तो यह पत्र प्रगट करता ही है, मुझे भी हिंदी समाज की जातिवादी-सवर्णवादी दुनिया में यह ताकत और संबल देता है। २६ से २८ तक मैं मुंबई रहूंगा। आपको यह जान कर खुशी होगी कि रंगनाथ पठारे स्वयं मेरे लघु उपन्यास 'मैंगोसिल' का मराठी अनुवाद कर रहे हैं। सन २००५ में उनके ही हाथों मैने 'पहल' सम्मान प्राप्त किया था। आपको और आपके समुचे परिवार को बहुत बहुत शुभकामनाएं। नागदिवे जी, बाघमारे जी और सभी साथियों को मेरा अभिवादन दें। कल-परसों तक ब्लाग पर अमरावती के बारे में लिखूंगा। आपका सदा उदय प्रका्श जय भीम

२१ मार्च, २००९
आदरणीय उदयजी
दोपहरको आपका मेल पढा ' अत्यंत प्रिय सतेश्वर मोरे जी ' के आगे और एक 'अत्यंत ' जुड़ गया है| ये वैसे ख़ुशीकी बात नहीं है| जिम्मेदारी की बात है| रिश्ता जोड़ना जितना कठिन है, उससे जादा वो निभाना बड़ा कठिन है| खैर! अब जुड़ गये तो निभायेंगे भी|
कठनायिया तो जिंदगी का हिस्सा है | वो है, इसीलिए जिन्दगी में कुछ करने की और; करने के लिए लड़नेकी चाहत जिन्दा है| बस्स! इसेही जीना कहते है| khairlaji के समय हर गाव की तरह हमारा गाव भी अपनी जिम्मेदारी टालने पे तुला था| बस्स! जिलाधिकारी को निवेदन और कुछ धरना आन्दोलन करके अपनी जिम्मेदारी से अलग होना चाहता था| हमें अच्छा नहीं लगा क्योकि जो घटना थी वो मानवीयता की सभी सीमा को पार कर चुकी थी| ये कोई एक जाती या धर्म की बात नहीं थी| ये अपने आप में मानव का एक घिनौना रूप था| उसका धिक्कार ..उसका तिरस्कार होना जरुरी था |जब पय्न्थर में था तब कही बार जेल जाना पड़ा तब एक कार्यकर्त्ता था| अब एक प्रोफेसर हु| पत्नी भी प्रोफेसर है| इतनी अच्छ्ही पंद्रह साल की जिन्दगी मै एक कार्यकर्त्ता था ये भी भूल चूका था पर खैरलाजी ने फिर से जगा दिया| लोग बोले क्यों अछ्ही जिंदगी ख़राब करने पर तुले हो| लेकिन अन्दर की आवाज ने कहा इतिहास ने जिम्मेदारी आप पे डाली है आप को निभाना पड़ेगा बस उतर गए मैदान पे और जो कठनायिया सामने आई मनो उसकी कोई हद नहीं थी
फूले-शाहू - आम्बेडकर के महाराष्ट्र में आंदोलक दंगलखोर होते है | उनपे ३०७ लगाकर जेल में ठूस दिया जाता है | किसी न्यायिक मांग के लिए aandolan करना मनो देशद्रोह करने जैसा है | सरकार उसे नक्श्ली करार देकर अपने ज्याजती का शिकार बनाti है| आंबेडकरी आंबेडकरी आन्दोलन को विशेषता खैरलांजी के आन्दोलन को नक्षली आन्दोलन के साथ जोड़कर कार्यकर्त्ता पे देशद्रोह के तहत अन्दर करके इस आदोलन को नष्ट करना चाहती थी| मै, मेरी पत्नी और हमारे साथी सुदामजी सोनुले उनकी पत्नी हमारी ताई कुन्दाताई जो नजदीक के गाव में शिक्षिका है उनपे ३०७ लगाया| सुदामजी को पकड़कर महिनाभर के लिए जेल में डाल दिया बहोत क्ठानायिया आयी| मैने भी एमर्जंसी में ही गाव छोडा तब १३ का ही था|अपनी पढाई के लीये एइसा करना पडा | खैर छोडो कठ्नायिया अब जिन्दगी का हिस्सा बन गयी है| जिससे जीना रोमांचक बन गया है|
हाँ! मेरे सभी मेल आप के है आप जो चाहे और जहा चाहे रख सकते उसे अनुमति की जरुरत नहीं है

बहोत लिख chuka हूँ | अब rukana चाहिए

आपका सदा लिए
सतेश्वर मोरे

आपको मैंने मैं अपनी लिखी कुछ दो एक कविताए टूटी फूटी हिंदी में करके मेल करुगा शायद आपको पसंद आए!