तारीखें २०, २१, २२ और २३।
महीना फरवरी ।
साल २००९|
स्थान अमरावती|
यह बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि ये चार दिन ऐसे होंगे, जो मेरे भीतर की बनावट, मेरी चेतना में इस हद तकबदलाव लायेंगे|
सुबह फ्लाईट थी| इंडिगो के काउंटर पर रोक दिया गया। आपका टिकट किसने किसने पे किया? अजीब सवाल था| इतना घूमता हूँ, कभी किसी ने नहीं पूछा। मैंने बहस की तो काउंटर गर्ल ने बताया 'ये नया सर्क्युलर है हमारे पास। ये फ्लाईट बम्बई जा रही है। २६/११ के बाद इन्स्ट्रक्शन्स हैं कि पैसेंजर का टिकट किसने पे किया है, उसको भीआइडेन्टिफ़ाइ करो| देखा बगल में गंगा प्रसाद विमल खड़े हैं। उनका तो महात्मा गांधी विश्व विद्यालय वर्धा ने पेकिया था। उनको दिक्कत नहीं आई। मुझे ख़ुद पता नहीं था कि किसने मेरे टिकट का भुगतान किया है। ज़्यादातरतो औलिया ही किया करते हैं। विमल जी चले गए। प्लेन लेट हो रहा था। काउंटर गर्ल ने कहा आप फोन करकेपेमेंट करने वाले के क्रेडिट कार्ड के शुरू और आखीर के तीन-तीन नंबर बताइये। प्लेन टेक आफ में डिले हो रहा है।
मैंने परेशान होकर सतेश्वर मोरे जी को फोन लगाया। गनीमत थी कि उनका नंबर मेरे मोबाइल में था। वरना मेरेजैसा खानाबदोश कौन कौन सा असबाब सम्हाले।
लेकिन..ऑफ़ ! फोन किसी और ने उठाया। 'मोरे जी सो रहे हैं'। ठीक भी था .. ५.३० बजे सुबह बाबा रामदेव केअनुयायियों और हेल्थ कांशस खाते-पचाते लोगों के अलावा भला और कौन जागता है? अब क्या किया जाय? वापस ? वैशाली? देर भी हो रही थी। जिन्हें उसफ्लाईट से जाना था वे सिक्योरिटी चेक करा के पहले ही जा चुके थे। काउंटर की लड़की भी सब समेटते हुए मुझेलाचार निगाहों से देख रही थी -'सोरी अंकल, आई कुड्न्ट हेल्प यू ----
मैं लौटने को ही था कि सतेश्वर मोरे जी का फोन आया। उन्हें मैंने सारा माज़रा समझाया। वे उलझन में थे ---। उसलड़की को रोकिये --मैं अपने क्रेडिट कार्ड का नंबर पता करता हूँ ..... । बहरहाल, जब तक मोरे जी ने अपना क्रेडिट कार्ड खोज कर उसके शुरू औरआखीर के तीन-तीन नंबर नहीं बता दिए, मै किसी आतंकवादी टिकटधारी की तरह 'फ़िल्म एंड राइटर्सएसोशियेशन' और 'ड्राइविंग लाइसेंस' की आईडी चमकाता अड़ा रहा।
इस सारे वाकये का सुखद पहलू यह था कि सेक्योरिटी चेक इन से लेकर बोर्डिंग तक हर कोई मेरी मदद में लगारहा। बल्कि इंडिगो की फ्लाईट तक मै अकेला कार में बैठा आराम से गया।
पौने दो घंटे की यात्रा के बाद जब नागपुर पहुंचा तो वहाँ आयोजकों के अलावा मेरे बचपन के साथी नामदेव लाघवे भी मौजूद थे। सागर वि वि के मेरे रूम मेट।
नागपुर से अमरावती की दूरी तीन घंटे की है।
सतेश्वर मोरे जी से पहली भेंट होटल की सीढियों पर हुई। वे मेरे स्वागत में खड़े थे। उनके साथ प्रोफ। नागदिवे औरप्रोफ, बाघमारे जी थे। कुछ और लोग भी थे शायद।
लेकिन मैं प्रोफेसर मोरे को ही देखता रह गया।
कुछ ही मिनटों के बाद प्रेस कांफ्रेंस थी और फिर शाम को 'अभिवादन रैली'...... !
यहीं से उन घटनाओं की शुरुआत हुई , जिन्हों ने मुझे झकझोर कर रख दिया.....
बाबा साहेब अम्बेडकर ने कहा था -'हिन्दू और दलित दो अलग-अलग कौमे हैं...दो अलग-अलग राष्ट्र '..मैं कहसकता हूँ कि वे चार दिन मेरी एक दूसरे राष्ट्र की ..एक उत्पीडित उपनिवेश की विचलनकारी और उद्वेलित करने वाली 'विदेश-यात्रा' में बीते .... अपने ही देश के भीतर का एक बड़ा और वृहत्तर देश...
शायद मेरा अपना भी देश...
यह सच है कि अमरावती से लौटने के बाद मैं अब वह नहीं रहा, जो वहाँ जाने के पहले था....(जारी....)
(कल सुबह मैं मुंबई चला जाउंगा। लौटकर पोस्ट लिखूंगा। एक ख़बर भी दूंगा लौटकर । तब तक के लिए विदा। )
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The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled