Friday, April 3, 2009

अमरावती की विदेश यात्रा ; मेरा दागिस्तान -२

अमरावती की यह यात्रा अब तक की मेरी खानाबदोश भटकावों-अजनबी पड़ावों से भरी यात्राओ से अलग एक मूलगामी उलट-फेर करने वाली यात्रा साबित हो जायेगी, यह मैंने तब भी नहीं सोचा था, जब नागपुर के एयरपोर्ट से दो-ढाई सौ किलोमीटर दूर इस शहर के एक होटल में प्रेस कांफ़्रेंस में बैठा था। बमुश्किल १५-२० पत्रकार थे। एक अंग्रेजी (हितवाद) और दो हिंदी (प्रतिदिन और लोकमत) को छोड़ दें तो बाकी सभी मराठी के अखबारों के पत्रकार। एक दो टीवी न्यूज़ चैनल वाले भी थे। मेरे साथ सतेश्वर मोरे थे, जिन्हें मैं कुछ देरसे धीरे-धीरे जान रहा था। आपके इस लेखक के लिए खुशी और संतोष की बात यही थी, कि वहां अधिकतर युवा पत्रकारों ने कोई न कोई रचना अवश्य पढ़ रखी थी। इस ब्लाग पर ताक-झांक करने वाले भी कुछ उन्हीं में थे।
मैं वर्षों से जिन हताश और अंधेरे दिनों में लगातार गुज़रने के लिए अवैधानिक रूप से धकेल दिया गया हूं, उसमें इस प्रेस कांफ़्रेंस का 'डिप्रेसिव' हो जाना और अवसाद से भर जाना स्वाभाविक था। लेकिन मैंने पाया कि वे सभी बहुत ध्यान से सुन रहे हैं। शायद उन्हें इसी की उम्मीद थी। 'यह शब्दों और लेखक का नहीं अनैतिक सत्ताओं और उनकी बर्बर हिंसाओं का दौर है '..... ऐसा ही मेरे कहने का कुल आशय वहां रहा होगा।
कुछ ही मिनट पहले, होटल के रूम में मैंने २० फरवरी का अखबार देखा था। उसी दिन पूर्व सूचना-सम्पर्क केंद्रीय मंत्री पंडित सुखराम को हाइकोर्ट ने भ्रष्टाचार का दोषी पाया था और सज़ा सुनाई थी। एक भ्रष्ट सत्तावान को सजा सुनाने में' उच्च अदालत' को लगभग सात साल लगे, लेकिन इन सात सालों में एक कहानी 'दिल्ली की दीवार' लिखने की सजा के बारे अगर मैं बताऊं, तो साहित्य-संस्कृति और मौज़ूदा राजनीतिक भ्रष्ट सत्ता के असली रिश्ते उजागर होंगे। (इस कहानी के प्रकाशित होते ही यह अफवाह ज़ोरों से फैलाई गयी कि यह एक ऊंचे पुलिस अफसर के खिलाफ़ लिखी गयी 'निजी राग-द्वेष' की कहानी है। यह झूठ था। ऐसे झूठ जातिवादी सत्ताकेंद्र बार-बार फैलाते हैं। 1976 में, आपातकाल के अंधेरे दौर में, महज़ 24 साल की उम्र में लिखी गई 'टेपचू' जैसी कहानी से लेकर 'पीली छतरी वाली लडकी', 'पाल गोमरा का स्कूटर', 'मोहन दास' और 'मैंगोसिल' तक यही कहानी बार बार दोहराई जाती है। मध्यकालीन जातिवादी घृणा और समकालीन मीडियाकर महत्वाकांक्षी लोलुपता इसके पीछे सक्रिय रहता है। तो....
यह झूठ था। सच यह था कि कालेधन (black money/ unaccounted wealth) के वर्चस्व के सामने एक निचली जाति के गरीब स्वीपर (सफाई कर्मचारी) के सपनों और उसकी त्रासदी की यह गंभीर कहानी थी दिल्ली के एक जिम सेंटर की दीवाल के खोखल में छिपाए गए करोडों रुपये का भेद जान लेने के बाद गरीब रामनिवास अमीर बन जाता है। 'स्लम डाग मिलिनेयर' के कई साल पहले लिखी गयी यह कहानी थी। मैंने बताया कि अब इसी अप्रैल में यह कहानी न्यूयार्क के एक सबसे बड़े प्रकाशक के द्वारा एक महत्वपूर्ण संकलन मेंप्रकाशित हो रही है। (इसके बारे में विस्तृत सूचना मैं ज़ल्द दूंगा) मेरी अन्य कहानियों की तरह ही इस कहानी ने भी मेरे जीवन में कई संकट खड़े किए। मुझे लगता है कि ये सात साल ही नहीं, आज़ादी के बाद के साठ से ज़्यादा साल का इतिहास इस देश के नागरिक और इस देश की भाषा के हर सच्चे और ईमानदार आधुनिक नागरिक लेखक के निरंतर हाशिये में चले जाने का इतिहास है। भाषा और समाज , दोनों पर भ्रष्ट अनैतिक जातिवादी राजनीतिक ताकतों और नवऔपनिवेशिक पूंजी के शासन का विजय पर्व। लेखक और नागरिक दोनों के निरस्त हो जाने का उत्तर-औपनिवेशिक इतिहास।
मैंने जनवरी में राजस्थानी के महान कथाकार विजय दान देथा (यह महान भारतीय साहित्यकार निचली 'चारण' जाति से संबंधित है, इसलिए उनके विरुद्ध भी एक लंबे समय तक कुत्सित अभियान जोरों से चलाया गया) पर बनायी एक लघु फ़िल्म के बारे में भी बताया, जिसमें वयोवृद्ध और अपनी स्मृति को दुबारा हासिल करने के विकट संघर्ष में लगे इस अस्वस्थ किस्सागो का कहना था कि 'अब यह कलम का नहीं, 'मोबाइल' का युग है।' क्योंकि बोरुंदा नामक जिस गाँव में वे रहते हैं वहां की ६००० की आबादी में कलम-किताब रखने वाले लोग बमुश्किल ६ व्यक्ति होंगे, जब कि मोबाइल-धारक एक हज़ार से ऊपर होंगे। (ताज़ा आंकडों के मुताबिक इस समय देश में ३४ करोड़ सत्तर लाख मोबाइल उपभोक्ता हैं, जिनसे कुल मिलाकर ३२० करोड़ की कमाई की जाती है। )

बहरहाल प्रेस कांफ्रेंस जब ख़त्म हुई तो सतेश्वर जी ने कहा ''आप शाम ६ बजे तैयार रहें। 'अभिवादन रैली' में चलना होगा। '' मैं थका हुआ था। छह बजने में एक-डेढ़ घंटे ही बचे थे। पिछली रात भी सोया नहीं था। यात्रा की थकान भी थी। मैंने तो सोचा था होटल के कमरे में सबसे पहले अपनी नींद पूरी करूंगा। इसीलिये मैंने कहा - 'लेकिन मोरे जी, सेमीनार तो कल है न ?सुबह १० बजे से ?''
'वो तो है ही। लेकिन आज यह भी है। .....आप तैयार रहिये,हम लेने आएँगे'' उन्होंने हंसते हुए कहा और चले गए। इस हंसी के पीछे दृढ़ता भी थी और आग्रह भी ।
कितनी पारदर्शी हंसी है यह। जैसे कोई बादल हंस रहा हो। या कोई पेड़! इस हंसी में कोई सिक्का गिरा दो, तो वह इसके तल तक पहुँचने पर भी चमकता हुआ दिखता रहेगा। कितना साफ़ जल है इसमें ?
मैंने वर्षों से अपने समय में किसी मनुष्य को इस जैसा हंसते नहीं पाया। यह बात मैंने अपने बचपन के दोस्त नामदेव लाघवे से कही। वह मेरी बात से पूरी तरह सहमत थे। जब यह आदमी हंसता है तो उसकी आँख और चेहरे के साथ उसका पूरा शरीर हंसता है। जब कोई भी सामाजिक विचार इस आदमी तक पहुंचता होगा तो वह ज़रूर एक शरीर में बदल जाता होगा। ....विचार..... एक जीता-जागता .....मानवीय शरीर ।
शाम को एक कार लेने आयी और हम अमरावती की सड़कों से होकर ६-७ किलोमीटर दूर गए। अमरावती भी एक छोटा-मोटा सुंदर सा शहर है। किसी बिलासपुर, इलाहाबाद, ग्वालियर, झांसी जैसी मंझौली कद-काठी का शहर। आधुनिकता और पश्चिमीकरण वहाँ भी आ रहा है। दूकानों के शो विन्डोज़ बता रहे थे।
एक ज़गह पर बहुत भीड़ थी। एक रथ सजा हुआ खडा था। ऊँचे कद के साफ़.सफ़ेद घोडे, जैसे किसी राजभवन या महाकाव्य की मिथिकीय शौर्यगाथा से निकल कर आए हों! इसका मतलब, ज़रूर किसी नियो-रिच के बिगडैल शाहजादे, अनाप-शनाप की नंबर दो की कमाई से ' बिलियानायर-ट्रिलियानायर'बने किसी 'बिग-बुल' या राजनेता के 'राजकुंवर' का शुभविवाह ! ग्लोबल मंदी के इस दौर ने भी इस गरीब भारत के इन अमीरों के तामझाम पर असर नहीं डाला। मै सोच रहा था।
खैर, हमलोग एक छोटे से मैदान तक पहुंचे, जहाँ शामियाना लगा हुआ था। यहां वैसी रोशनी नहीं थी। प्रोफेसर बाघमारे जी साथ थे।
मुझे ले जाकर एक कुर्सी पर बिठा दिया गया। शायद कोई 'कोल्ड ड्रिंक' पिलायेंगे। 'पेप्सी' या 'कोक'। या कोई और एम एन सी ब्रांड ...मैंने सोचा।
लेकिन तीन-चार नौजवान लड़कों ने मुझे घेर लिया। उनकी आंखों में वही आत्मीयता की झलक थी, उसी ऊष्मा का ताप, जिसे मैं अपने बेटों सिद्धार्थ और शांतनु में पाता हूँ । 'हम आपके सर पर पगडी बांधेंगे'- उनमें से एक ने हंसते हुए कहा । उसके हाथ में एक लंबा-सा नीले रंग का साफा था। जब वे पगडी बाँध रहे थे, उनकी हथेलियाँ और उंगलियाँ मेरे अतीत के उन घावों पर धीरे धीरे अपने स्पर्श का मरहम लगा रहीं थीं, जिनकी पीडा मुझे अक्सर घेर लेती है। ईश्वर इन्हें वह सब कुछ दे, जिसके ये हकदार हैं और जो इनसे इस अन्यायी व्यवस्था ने छलपूर्वक छीन लिया है। मैं चुपचाप प्रार्थना कर रहा था।
'लेकिन मैंने तो अपनी शादी में भी पगडी नहीं बांधी थी। आग के फेरे भी नहीं लगाए थे!' मैंने मज़ाक किया।
'आज आप बच नहीं सकते' ...वे बच्चे हंस रहे थे। उन्होंने देखते-देखते मेरे माथे पर नीले रंग की पगडी बाँध दी सारा आकाश अब मेरे माथे पर था। लिपटा हुआ। बी हैप्पी मोहन दास एंड फील प्राइड इफ देयर आर पीपुल हू हैव स्टिल लेफ्ट विद सम रेस्पेक्ट फार एन आथर लाइक यू !
'इन में से दो लड़कों ने सिविल सर्विसेज़ मेंस में क्लियर कर लिया है' सो...दे आर हियर.... । मैं लगातार उन बच्चों के चेहरे देख रहा था। संघर्ष, अपमान, बाधाओं और मुश्किलों के बीच अपना रास्ता बनाते नौजवान लडके। प्रतिभा और साधना की कौंध और आभा उनकी आंखों में थी ।
तभी मैंने देखा,वे बहुत बड़ी संख्या में थे। नीली बर्दी पहने हुए। जैसे छोटा-मोटा समुद्र उस मैदान में उतर आया हो। वे सब ज्योति राव फुले, बाबा साहब अम्बेडकर की संतानें थे। बुद्ध, नामदेव, तुकाराम, ज्ञानेश्वर की संताने ....! 'यह समता सैनिक दल है''. किसी ने बताया।
खैरलांजी में दलितों के साथ जो हुआ, उसके प्रतिकार में अब यह नए सिरे से दुबारा संगठित हो रहा है। सवर्ण राजनीतिक सामाजिक हिंसा के प्रतिरोध में एक उत्पीडित लोक-समुदाय की आत्म-रक्षा के लिए गठित एक अहिंसावादी लोकतांत्रिक निरस्त्र सेना। एक नयी 'युवा वाहिनी'।
क्या यह मेरे जैसे लेखक को भी मुक्ति दिलायेगी ? क्या दक्षिण में, विदर्भ और महाराष्ट्र से उठने वाली इस लहर के आघात, इस समुद्र के ज्वार-भाटे उत्तर की 'गौ-ब्राह्मण पट्टी' तक भी पहुंचेंगे?
और इसके बाद उस घटना की श्रृंखला शुरू हुई, जिसकी कल्पना मैं कर नहीं सकता था। jabaran विवादित, बेरोजगार, सत्ता-संस्थानों द्वारा बार-बार अपमानित हिन्दी के एक स्वतंत्र लेखक की असली ज़िंदगी की एक अदभुत फैंटेसी वहाँ घटित हो रही थी।
मुझे और प्रोफ बाघमारे जी को उसी भव्य दैवी रथ में बिठा दिया गया। नामदेव लाघवे भी थे। रथ के आगे नीले घुड़सवार थे। .....रथ में पीछे अनगिनत महिलायें थीं....नीले झंडे उठाये हुए...!और फिर उनके पीछे दूर-दूर तक कतार बद्ध समता सैनिक दल के नौजवान थे..! और फिर उनके पीछे थे लोग महिलाएं, पुरूष, बच्चे, बूढे..!'जय भीम !' अमरावती का आकाश गूँज रहा था। नीला.... विस्तृत...दशों दिशाओं तक फैला हुआ आकाश.. निरभ्र प्रशांत आकाश...उसी आकाश का रंग मेरे माथे पर लिपटा हुआ था.... । मेरी चेतना में धीरे धीरे वह आकाश छाता जा रहा था।
लेट दि ब्लू कवर एवरीथिंग वी कुड सी अराउंड
लेट दि ब्लू ओवरव्हेल्म माइ फोरहेड
लेट दि ब्लू स्पीक

एंड लेट दि ब्लू सिंग सांग्स आफ दि सॉरो
आफ अवर वुंड्स एंड अवर डिफीट्स ...

मेरे दिमाग में ऐडम जगाजेव्स्की की कविता की अनुगूंज थी ....

''I heard the dream of the bark from which /boats, ships and sails will arise। Then, slowly, birds joined in, /goldfinches, thrushes, blackbirds/ on the balconies of branches, each of them spoke differently,/ in his own voice, not asking for anything, with no bitterness and regret.

And I realized you are in singing,/ unseizable as music, indifferent as musical notes,/ distant from us as we are from ourselves.''
(इसके आगे ज़ल्द..)