Saturday, April 25, 2009

अमरावती की विदेश यात्रा : मेरा दागिस्तान -3

१४ अप्रैल का दिन बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के जन्मदिन के रूप में जाना जाता हैं| वे अगर इस रोज़ होते तो ११८ साल के हो गए होते| लेकिन इस तारीख के अखबारों की सुर्खियाँ जो बयान दे रही थीं, वह यह बताने के लिए काफी था कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी दलितों, निचली जातियों और गरीबों-वंचितों के लिए कितनी गहरी घृणा सवर्णवादियों और जातिवादी राजनीतिक तबकों में है| इस रोज़ जौनपुर (उत्तर प्रदेश, जहाँ ख़ुद को दलितों की बेटी कहने वाली और एक जमाने में मनुवादियों के ख़िलाफ़ बहुजन समाज का मोर्चा लगाने वाली मायावती का राज हैं) और भिंड (मध्यप्रदेश, जहाँ दूसरे पिछडे नेता शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री है) में बहादुरलाल सोनकर और माखनलाल जाटव की ह्त्या कर दी गयी| दोनों इन चुनावों में प्रत्याशी थे| सोनकर को मार कर पेड़ से लटका दिया गया और जाटव को मंच पर गोली मार दी गयी| हमारे तथाकथित लोकतांत्रिक समाज का यह ऐसा सच है जिसे ढांकने मूंदने छिपाने की लगातार कोशिश की जाती है और जो पत्रकार या रचनाकार इन पर अपनी कलम चलाता है, उसे अपमानित, बहिष्कृत और दण्डित कराने में यह समाज एक पल की देर नहीं लगाता|
यात्राओं और स्वास्थ्य के चलते इस बार फिर देर हुई इसके लिए माफी के साथ इस श्रुंखला की अन्तिम दो कड़ियाँ पढिये :

..... तो उस रोज़ 20 फरवरी 2009 की शाम नागपुर से लगभग दो-ढाई सौ किलोमीटर दूर अमरावती में कौतुक और अचंभे की शाम थी। वहां अनपेक्षित घटनाएं घट रही थीं। अगर जीवन का पिछला हिस्सा किसी अतियथार्थवादी भयावह और उदास फिल्म का सिक्वेंस था तो अचानक उसमें कोई विरोधाभास पैदा हो गया था। जैसे किसी अब तक चलती हुई फिल्म में किसी अन्य फिल्म का अंश अचानक आकर जुड़ गया हो। जैसे कोई ऐसा उपन्यास आप पढ़ रहे हों जिसका कथानक मृत्यु और शोक के नम अंधेरे में डूबा हुआ हो और एकाएक उसका अगला पृष्ठ पलटते ही आप किसी चमकदार असंख्य रंगों के उल्लास से भरे दृश्य और वृत्तांत के सामने खुद को खड़ा पाएं
मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। अभी कुछ ही घंटों पहले मैं राजधानी दिल्ली के उस यथार्थ में सांसें ले रहा था जहां अकेलेपन और हताशाओं का अंधकार इतना घना था कि अपने शरीर और शब्दों को टटोलकर देखना पड़ता था कि क्या सचमुच इस जीवन का कोई अर्थ बचा भी है। क्या अब तक जो कुछ हमने पढ़ा और जाना वह सब कुछ रद्दी में तब्दील कर दिये गये कागज़ों में छपा निरर्थक पाठ भर था।
मैं दिल्ली में सन् 1975 में ठीक आपातकाल के लागू होने के पांच दिन बाद से था। लगभग चौंतीस साल हो गये। आज की इस शाम के पहले तक हमेशा मुझे लगता था कि पिछले चौंतीस सालों में मेरा जीवन एक दूसरे राष्ट्र की नागरिकता हासिल करने का कोई `सबवर्सिव´ प्रयास है। कोई अवैधानिक कोशिश। मेरी डिग्रियां स्वर्ण पदक अनुभव योग्यताएं मेहनत सब संदिग्ध घोषित हो चुकी थीं मेरी हर रचना और अपनी भाषा में किया गया हर काम सता-केन्द्रों और संस्थानों की तरफ़ से मेरे लिए आपदाएं विवाद और लांछन लेकर आती थी।
मैं छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के सीमांत के सुदूर इलाके के एक बहुत छोटे से गांव से आया हुआ व्यक्ति यहां सबसे अलग-थलग था। चौंतीस साल पहले जनसंख्या का ऐसा पलायन गांवों से नहीं हो रहा था। दिल्ली के जे एन यू में जहां मैं शोध कर रहा था शायद उस क्षेत्र से आने वाला उस समय मैं अकेला छात्र था। मैं ठीक-ठीक उन जातियों, समुदायों और क्षेत्रीय अस्मिताओं से भी संबंधित नहीं था जिनका बोलबाला यहां था। मैं मार्क्सवादी था और जाति-पांति नहीं मानता था तब तक मुझमें यह भोला-सा विश्वास कहीं बचा हुआ था कि मैं उस भाषा में कठिन परिश्रम कर रहा हूं जिसे बोलने वाले संसार की दूसरी सबसे विराट जनसंख्या का निर्माण करते हैं। वह भाषा जो हर रोज़ अपने आपको बदलती रहती है। ऐसी भाशा जिसे कबीर मुक्तिबोध अमीर खुसरो प्रेमचंद मीर गालिब मंटो रेणु निर्मल वर्मा भीष्म साहनी, हरिशंकर परसाई , धर्मवीर भारती आदि बरत चुके हैं वह भाषा जो आधुनिक होने के लिए प्रयत्नशील और परिवर्तनशील है।
लेकिन सच तो यह था कि उस भाषा का अपहरण हो चुका था। वह एक तरफ राज भाषा दूसरी तरफ कारपोरेटृस की भाषा और तीसरी तरफ पुनरुत्थानवादी जातिवादी छद्म -आधुनिक, ठग- राजनीतिक मठाधीशों की भाषा में तब्दील हो चुकी थी। उस भाशा का `एपेक्स´ जनता नहीं, सत्ता के दरबारियों और दलालों द्वारा अधिगृहीत था।
मैं उसी भाषा का निर्वासित अपमानित लेखक था। दर- - दर। एक तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी पहचान और अपना पता खोजता हुआ एक नागरिक (मोहन दास मैंने इसी मानसिकता में लिखी थी)
मेरे पास राजधानी के किसी ताकतवर मठाधीश का संपर्क नहीं था। उनमे से किसी का फोन मेरे पास आता था, मैं अपनी स्थितियों से छुटकारे के लिए उनकी 'मदद' के लिए उन्हें फोन करता था आखिर ये स्थितियां तो उन्ही की बनायी हुई थीं
जिस नौकरी के लिए मैं दरख्वास्त देता था उसमें किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाता था संसार की कोई भी चयन समिति जिसे उचित नहीं ठहरा सकती थी। संसार का कोई भी न्यायालय जिन नियुक्तियों को सीधे-सीधे अपराध की संज्ञा दे सकता था।
मैं और मेरा परिवार दिल्ली और दूसरी राजधानियों के सत्ता के दलालों की अनैतिक और अमानवीय बर्बरताओं का शिकार था।
वर्षों से। अपराध यह कि मैंने ऐसी कवितायेँ और कहानियां लिख दी थीं जो इस समाज की असली संरचना को उद्घाटित करती थीं
.....या फिर शायद मेरे अंदर उतनी मात्रा में बेशर्मी, अनैतिकता, आक्रामकता और लुटेरापन नहीं था कि मैं अपने लिए कोई ठीकठाक-सी जगह यहां खोज़ पाता। लेकिन बचपन से चले आते संघर्षों ने इतना आत्मविश्वास भी दे रखा था कि मैं कह सकूं -`सुनो जातिवादी पाखंडियो! मंत्रियों और अफसरों के चाटुकार दलालो ! सच तो यह हैं कि तुम तो लेखक हो, आलोचक, कवि, दक्षिणपंथी वामपंथी..... एक साफ-सुथरे सीधे सादे मनुष्य ! तुम्हारा संबंध अकादमिकता से है और किसी महान विचारधारा से। तुम सिर्फ अपने स्वार्थों और महत्वाकांक्षाओं के लिए सब कुछ को हड़पने में लगे हो। ......और सुन लो, मेरी और मेरे जैसे तमाम लोगों की शिक्षा और योग्यता तुम्हारे किसी भी दामाद, बेटा या बेटी, चेला या चापलूस, भाई या भतीजे या तुम्हारी ऊंची जात के किसी मेंबर से कमतर नहीं है।
तुम उत्तर दो कि तुम्हारा मैट्रिक का थर्ड डिवीज़न इस व्यवस्था में क्यों इतना चमत्कारी और कारगर है कि वह तुम्हें साहित्य, संस्कृति, अकादेमिकता, पत्रकारिता, मीडिया के शिखर तक ले जाता है और तुम माल उड़ाते हुए क्रांतिकारी होने का खिताब भी पाते हो?
सच तो यह है कि तुम इस भाषा को अपना उपनिवेश बना चुके उस हिंदूवादी वर्णवाद के घाघ भेड़िये हो जिसने मेरे जैसे असंख्य लोगों का जीवन अपनी झूठ और षड्यंत्र से नरक बना डाला है।


....तो मैं टूट चुका था। आत्महीन। अकेला। .....हर रोज़ मृत्यु आकर मेरा दरवाज़ा खटखटाती थी। कोई फोन कहीं से आता था तो मेरी जगह मृत्यु उसे रिसीव करती थी।
मैं उसीके साथ डाइनिंग टेबिल पर बैठकर हर रात खाना खाता था।


लेकिन आज ? 20 फरवरी 2009 की यह शाम ?

क्या यह कोई स्वप्न है या फैंटेसी ?


मेरे माथे पर सारा आकाश और उसका नीला रंग लिपटा हुआ था। एक रथ था जिस पर मैं बैठा था। आगे घुड़-सवार थे। नीली बरदी में अश्वारोही। पीछे महिलाएं थीं फिर समता सैनिक दल के युवाओं की कतार और इसके बाद जन समूह।
और उन असंख्य आखों में मेरे लिए प्यार छलक रहा था। उनमें संघर्षों का उजाला था। आत्मविश्वास से भरा हुआ। वे शतािब्दयों से अपने ऊपर होने वाले अन्याय के विरुद्ध जाग रहे थे। उनके पीछे ज्योतिराव फुले, बाबा साहेब अंबेडकर, बुद्ध, नामदेव, ज्ञानेश्वर की सशक्त पंरंपरा थी।
खैरलांजी में उनके साथ हुई जातिवादी हिंसा ने उन्हें समझा दिया था कि अब बहुत हो चुका। बुद्ध ने कहा था-जातिवाद वह दानव है, जिससे तुम जब जब आगे बढ़ना चाहोगे, हर बार टकराना पड़ेगा। मैंने एक बार इसे परास्त किया था अब तुम्हारी पारी हैं इस राक्षस को मारो

बाबा साहेब अंबेडकर ने कहा था-तुम एक अलग कौम हो, अलग राष्ट्र। तुम्हारी सवतंत्रता का मिशन अभी अधूरा है। अंग्रेजों के चले जाने से तुम्हारी गुलामी खत्म नहीं हुई। तुम अभी भी हिंदुओं-ब्राह्मणों के उपनिवेश हो। उनके दास इसलिए मेरे साथ आओ-धम्म की ओर चलो। बुद्ध जिधर गये थे उधर।


२० फरवरी की शाम मैं उसी दूसरे राष्ट्र में था। विदेश में। अपने देश में। अपने लोगों के साथ। मेरी रचनाएं मेरे अनजाने हमेशा उनके साथ थीं। यह वे सब जानते थे।

दिल्ली में मैं तालिबानी-फासीवादी वर्णवादियों के बीच किसी काफिर की तरह था। अबु गरेब का कैदी या ग्वातेनामा के टार्चर कैंप में रखे गये किसी बंदी की तरह।

रथ अमरावती शहर के हर मार्ग से गुज़र रहा था। दूकानों, छज्जों, बालकनियों, फुटपाथों पर खड़े लोग आश्चर्य और उत्सुकता से इस जुलूस को देख रहे थे। इस रथ पर बैठने वाला कौन है ?


उन्हें क्या इसका अंदाज़ा हुआ होगा कि इस रथ पर समूचे आसमान को अपने अभागे अपमानित माथे पर बांधे हुए राजभाषा हिंदी का एक निर्वासित दंडित बेरोजगार खनाबदोश लेखक बैठा है .....और जिसे अभी तक यह विश्वास नहीं हो रहा है कि इस देश में कोई एक देश ऐसा भी है, जहां उसके लिए सम्मान, अपनापा और प्यार का कोई ओर-छोर नहीं है।


जब बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की मूर्ति पर मैं माल्यार्पण कर रहा था, तो मैं अपनी समूची आत्मा के साथ कृतज्ञता से भरा हुआ भीतर से रो रहा था।
नीचे लोग जमा थे। बाघमारे जी, नागदिवे जी और दूसरे लोग भाशण दे रहे थे। `जय भीम´ के नारे गूंज रहे थे।


बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था -हिंदू और दलित, एक ही धार्मिक संप्रदाय की महज दो जातियां नहीं हैं। इनके बीच का अंतर्विरोध और इनकी टकराहट ब्राहमणवादी वर्णाश्रम व्यवस्था के भीतर की कलह नहीं है। सच्चाई यह है कि हिंदू और दलित दो अलग-अलग कौमें हैं। दो अलग-अलग राष्ट्र।
तो .....इसका मतलब यह हुआ कि आज मैं उस दूसरे राष्ट्र में था, जो मेरा अपना राष्ट्र था। मेरे जैसे किसी भी उत्पीड़ित दलित हिंदी या अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा के सत्ताहीन, निर्बल, कमज़ोर लेखक-रचनाकार का राष्ट्र।


महात्मा ज्योतिराव फुले की मूर्ति पर जब मुझे माल्यार्पण करने के लिए कहा गया तो उनकी बात मुझे बार-बार याद रही थी - `अगर वेद सचमुच उस ईश्वर के द्वारा लिखे गये हैं, जो समूची सृष्टि का निर्माता है, तो उसने उसे उस भाषा में क्यों लिखा, जिसे ब्राहमणों के अलावा कोई और नहीं समझता
जाहिर है, यह हिंदू धर्म, जो ब्राहमणवाद के अलावा और कुछ नहीं, एक ऐसा विराट् षडयंत्र है जिसके तहत चंद सत्ताकामी शैतानों ने करोड़ों निर्दोष और सीधे-सच्चे मनुष्यों के दिमाग को अपना उपनिवेश बनाया।


हिंदी में लिखते और पढ़ते हुए मैं स्वयं उन शैतानों के फासीवादी पंजों के गिरफत में चुका था। क्योंकि अब हिंदी भी मीडिया से लेकर राजनीति और साहित्य तक `राज-भाषा' और `देव-भाषा´ बना दी गई थी। विडंबना यह कि मार्क्सवादी विचारधारा और दर्शन ही नहीं, गांधी, अंबेडकर और फुले के विचार भी इसी देव-भाषा के ब्राहमणवादियों के बीच के बौद्धिक विमर्श की ठग लफ्फाजी में बदल चुके थे।
चूसे गये शब्दों और लफ्फाजियों का विराट भूसा और मलबा।


रात भर मैं अपने होटल के कमरे में सो नहीं सका। थकान के बावजूद। लम्बी अनिद्रा के बावजूद। मेरे दिमाग में कोई फिल्म चल रही थी।
यह एक नया जागरण था। एक बिल्कुल नया अध्याय इस जीवन की सांझ का
अब मैं सोना नहीं चाहता था।
अब मैं उन पीड़ाओं, यातनाओं, अन्यायों को नये सिरे से व्यक्त करना चाहता था, जिसमें मैं भी साझीदार था।


....और दूसरी सुबह संस्कृति भवन का सभागार खचाखच भरा हुआ था। हज़ारों लोग। अखबारों में सुिर्खयां थीं -अमरावती हिल उठी।


उस सभागार में मैंने प्रोफेसर राव साहेब कासबे का भाषण सुना। ऐसी वक्तृता कि हर कोई अपनी जगह पर स्थिर हो गया था। वह आवाज़ सभीके दिल और दिमाग की आवाज़ थी। मैं मराठी अच्छी तरह नहीं समझता, लेकिन उस रोज़ राव साहेब कासबे की एक एक बात समझ में रही थी। मेरे बचपन के दोस्त लाघवे ने बताया था कि उसने उनकी विख्यात पुस्तक `मार्क्स और अंबेडकर´ के एक हिस्से का हिंदी अनुवाद किया था। इसे ज़ल्द ही पूरा किया जाना चाहिए। 'पहल' की पुस्तिका के रूप में शायद उसके प्रकाशित होने की भी बात थी क्यों नहीं हो सकी? इसका उत्तर पाना मुश्किल नहीं हैं
राव साहेब कासबे महाराष्ट्र के उन चिंतकों में से हैं जो विदर्भ और महाराष्ट्र में उत्तर-खैरलांजी जन-उभार को किसी जातिवादी, `एथनिक´ और फकत फौरी राजनीतिक लहर में अवघटित या रिड्यूस नहीं होने देना चाहते। वे इसे एक बड़े और दूरगामी सामाजिक-सांस्कृतिक नव-जागरण की एक बड़ी जनशक्ति और जन-आन्दोलन में चैनलाइज़ करना चाहते हैं। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि आदिवासी, दलित और अन्य वंचित-उत्पीड़ित जातियों और वर्गों के इस असंतोष और उभार को भटका कर अपनी सत्ताखोर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले सियार घात लगाए वर्षों से बैठे हैं।


यह जन-उभार कहीं हिंदी प्रदेशों की तरह कुर्सी के खेल और भ्रष्ट अपराधी सियासत के शतरंज की शातिर चाल में बदल जाय, इसकी चिंता हम सबके भीतर थी ....

लेकिन राव साहेब कास्बे, सतेश्वर मोरे, नागदिवे, ता जी ...सभी के वक्तव्यों में एक नया आत्मविश्वास झलक रहा था

लोकनाथ यशवंत और तमाम दूसरे युवा कवियों में एक नयी सुबह की आहट सूनी जा सकती थी

Your flutes in evening, your seed-awakening

Your dances fill the night with growth; I hear

The sun's sad chorus to your starlit songs

Stroke of justice slice a festive air....

It is the day of reckoning

(अगली अन्तिम कड़ी परसों क्षमा पूर्वक विलंब के लिए सबसे गहरी क्षमा याचना सतेश्वर जी से )