Friday, May 1, 2009

पहली मई : मज़दूर दिवस की बधाई

किसी तकनीकी वजह से 'अमरावती की विदेश यात्रा : मेरा दागिस्तान' की चौथी कड़ी इस पोस्ट के पहले पब्लिश हो गयी है। असुविधा के लिए खेद है कह रहा हूं। पढ़ने के लिए ब्लॉग को स्क्रोल करें और ज़रा-सा नीचे जाएँ। माफी| मुंशी प्रेमचंद को मध्यकालीन सामंती मानसिकता के आलोचकों ने 'कथा-सम्राट' (Monarch/ King of Fiction) कहा. कुछ उच्च मध्य-वर्गीय या पेटी-बोर्ज़ुआ, राज्यसत्ता और उसकी दमनकारी संस्थाओं में अपना हित और सुरक्षा देखने वाले आलोचकों ने 'कलम का सिपाही' (Police constable/ Army-man of State of Letters) कहा. हो सकता है किसी सर्व-सत्तावादी ने उन्हें 'कथा का तानाशाह' (Dictator of Stories) भी कह डाला हो. लेकिन प्रेमचंद खुद को 'भाषा का मज़दूर' ही कहते थे.
१८४८ के 'कम्युनिष्ट मनिफ़ेस्टो' में जब 'दुनिया के मज़दूरो एक हो' का नारा दिया गया था, तब दुनिया भी दूसरी थी और 'कम्युनिस्ट' भी और थे.
चलिये आज २००९ की इस पहली मई को हम एक दूसरे को मुबारकबाद देते हुए नारा दें -'कलम के मज़ूरो एक हो'!
मई दिवस ज़िंदाबाद !

अमरावती की विदेश यात्रा: मेरा दागिस्तान -४

यह एक अलग तरह की फोटो प्रदर्शनी थी। कैमरे का इस्तेमाल मनुष्यों के चेहरों को पढ़ने, देखने और उनकी मार्फोलाजी के अध्ययन के लिए ही नहीं, उन चेहरों के पीछे के जीवन को पकड़ने और उन्हें किसी खास क्षण में वहां प्रस्तुत करने के लिए किया गया था।
सभी चेहरों के पीछे कोई कोई आख्यान छुपा हुआ था। हमारे अपने समय के किस्से, जिन्हें इतिहास में कभी दर्ज नहीं होना है। इतिहास तो सत्ताओं और सत्तावानों का हुआ करता हैं. ये चेहरे उन मनुष्यों के थे, जो हालांकि हमारी आज की जनसंख्या का ८०-८५ प्रतिशत भाग निर्मित करते हैं, लेकिन वे हमें इसलिए किसी अखबार, टीवी, सिनेमा और नेट में नहीं दिखते, क्योंकि धीरे-धीरे वे हमारे 'राष्ट्र' से बाहर होते चले गए हैं। हमने अपने 'राष्ट्र' से उन्हें बेदखल कर दिया हैं. दिल्ली, मुंबई और दूसरे महानगरों में हीं नहीं , मझोले और छोटे -छोटे कस्बाती शहरों से भी वे बाहर होने की प्रकृया में हैं। किसी कांस्ट्रक्शन साईट पर, बस अड्डों, रेलवे स्टेशन, सब्जी बाज़ार या शहर के बाहरी इलाकों में बसी बस्तियों में भले ही ये चेहरे कभी दिखाई दे जांए, वे हमारी मुख्यधारा की सभ्यता और विकास में शामिल मनुष्यों के चेहरे नहीं हैं।
वे इस लायक भी नहीं बचे हैं कि उनकी ओर हम या हमारी व्यवस्था नज़र भी डाले।
हमारा 'राष्ट्र' उन्हें देख कर 'हार्न' बजाता है। वह हर ज़गह को उनसे खाली करवा लेना चाहता हैं
वे ख़बर तब बनते हैं जब हमारा 'राष्ट्र' अपने 'विकास' के लिए उन्हें उनकी जगह-ज़मीन, उनके घर-दुआर से उन्हें बेदखल करता है।
हर चेहरा एक वक्तव्य दे रहा था। हर आकृति अपने समय की साक्षी थी। ये उन अभागे मनुष्यों के चेहरे थे हमारे कारपोरेट राष्ट्र ने जिनका आखेट किया था।
महत्वपूर्ण यह भी था कि डिजिटल कैमरे से खींचे गए इन रंगीन चित्रों के सारे रंग जैसे वहाँ किसी उजाड़ रंगहीनता में निसर्जित हो गए थे। सारे रंगों की मौजूदगी के बावजूद उन चेहरों के पीछे के जीवन की वंचना, उदासी, लाचारगी और विकल्पहीनता की धूसर सलेटी परछाइयां इतनी घनी और गहरी थीं कि सारे फोटोग्राफ स्याह-सफ़ेद दिख रहे थे। शायद वे सारे रंग जिन्हें हम दिन रात विज्ञापनों में, अखबारों और चिकनी ग्लासी पत्रिकाओं में, अपने टीवी और पीसी मानीटर पर नाचते गाते देखते हैं....रायल प्लास्टिक एमल्सन....अपनी दीवारों और मोबाइल के वाल पेपर्स और स्क्रीन सेवर्स में भी ....सैमसुंग के एल सी डी या प्लाज्मा टीवी के वे ऐन्द्रजालिक रंग जिसे देख कर, धोखा खा कर, कोई मधुमक्खी या तितली मोनिटर पर मंडराने लगती है.
वे रंग उस राष्ट्र या उपत्यका के नहीं थे, जहाँ के निवासी इन चित्रों में दिखाई दे रहे थे...!
इनका इन्द्रधनुष तो आकाश में ज़रूर उगता होगा! क्या उसकी भी ह्त्या कर डाली गयी है ? क्या उनकी दाल का रंग भी हल्दिया-पीला होता होगा? क्या उनकी सब्जी में लाल कश्मीरी देगी मिर्च का तड़का होगा...सुर्ख?
पिछले दिनों पंजाब से गायब होते रंगों के बारे में वन्दना शिवा का लेख देखा थालेकिन ये तो वे लोग थे जिनके अतीत में कभी कोई 'ग्रीन रिवोल्यूशन' हुआ ही नहींविदर्भ के गाँवों में, उनके खेत और खलिहानों में कभी गेहूँ, सरसों, मकई, सूरजमुखी के सतरंगे इन्द्रधनुष उगे ही नहीं
याद रखें, यहाँ कोई भटिंडा, लुधियाना या जालंधर नहीं, यहाँ की एक जगह का नाम खैरलांजी हुआ करता हैखैरलांजी, एक ऐसी जगह, जिसे अगर कोई पिकासो होता तो गुएर्निका बनाताया 'मसाकर इन कोरिया' ।
मैं सोच रहा था, क्या एम.डी.एचयानी 'महाशया दी हट्टी' का वो मुक्छड रंगीन पग्गड़ वाला बूढा - केसर, तेजपत्ती, दालचीनी, जावित्री, काली मिर्च की खुशबू बिखेरने उनकी देगची में उतरता होगा?
आंकडों के मुताबिक वे हमारे देश के उन ६२-६५ प्रतिशत लोगों में से थे, जो जब रात में सोते है, तो उनका पेट पूरी तरह भरा नहीं होता
वे पेप्सी, कोक, मिरिंडा पीते होंगे क्या? नेस्ले और अमूल की वेनीला या काजू-पिस्ता आइस क्रीम खाते होंगे? निप्सचाइल्ड की 'चोकोपोलोजी' या ' नोका के 'विन्ताज कलेक्शन' का स्वाद चखा होगा उन्हों ने?
क्या ये लोग ''जायका इंडिया का' में मोटे-थुल-थुल टीवी बुद्धिजीवी विनोद दुआ को लगातार गचागच खाते देखते होंगे कभी? 'सच दिखाते है हम' में है कितना दम?
ये जो दुनिया भर के बैंक और लाइफ इंश्योरेंस कंपनियाँ है, कोई उनकी ज़िंदगी का बीमा करता होगा क्या? क्या उन्हों ने कभी क्रेडिट कार्ड देखा होगा? टी एम ?
लगातार यह सवाल पैदा होता था कि इतिहास के बाहर फ़ेंक दिए गए ये लोग क्या भविष्य में कहीं अपना ठिकाना पायेंगें ?
क्या गांधी जी के 'अन्तिम मनुष्य' .....सीमान्त के इंसान यही थे...
'थे' नहीं 'हैं'...
किसी भी राजनीतिक या कारपोरेट राष्ट्र के 'सरहद के लोग'
मुझे संदेह है कि उनके पास कोई पहचान पत्र या आइडेन्टिटी कार्ड भी होगा ! हो सकता है साल में एक बार कुर्सी पाने के लिए किसी राजनीतिक पार्टी ने उनका मत-दाता पहचान-पत्र बनवा भी दिया हो, लेकिन तय है, उनका वोट कोई और डालता होगा
स्वतन्त्र इंडिया की राजधानी के पास निठारी में जब उनके बच्चों-बच्चियों से अपनी हवस मिटाकर कोई ऐय्याश अमीर उनके गोश्त का कबाब खाता होगा, या गुडगाँव में इंदिरा गांधी अन्तर राष्ट्रीय हवाई अड्डे से थोड़ी ही दूर जब कोई 'किडनी किंग' उनके गुर्दे निकाल कर उन्हें किसी दौलत मंद के जिस्म में फिट करता होगा, तो क्या कोई पुलिस थाना उनकी ऍफ़ आई आर दर्ज करता होगा? फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट ?
इस प्रदर्शनी में दिखते चेहरे इस देश के उस 'महादेश' के थे, इस 'राष्ट्र' के उस 'महाराष्ट्र' के दर--दर, लापता, ला-मकान निवासियों के चेहरे, जिनके साथ हमारी 'खाती-कमाती, नाचती-गाती, सेंसेक्स ताकती 'दुनिया' सिर्फ़ बन्दूक, डंडे और बुलडोज़रों के ज़रिये लोकतांत्रिक संवाद स्थापित करती है
वैसा ही सभ्य संवाद जैसा इस्राएल फिलिस्तीन के साथ या अमेरिका इराक़ और विएतनाम के साथ करता है
बहरहाल, अमरावती के संस्कृति भवन में लगी इस प्रदर्शनी का सब्जेक्ट था -'अनिकेत' यानी 'बेघर'|
'Homeless'।
और इन चित्रों के कैमराकार थे महेंद्र गजभिये
मुझे गहरा पछतावा है कि वे चेहरे मैं आपके सामने प्रस्तुत नहीं कर सकताशायद इसकी ज़्यादा ज़रूरत भी नहीं हैआप इधर-उधर आँखें घुमाइए और अपनी आंखों में टी आर पी की हवस की जगह ज़रा सी ज़रूरी मनुष्यता और करुणा और सच्ची 'देश-भक्ति' पैदा करिए..आप पायेंगे वह 'महाराष्ट्र' आपके सामने खडा हैआँख से आँख मिला कर सवालों के जवाब मांगता हुआलेकिन मुझे शक है कि 'इंडिया टीवी' का लन्दन से प्लास्टिक सर्जरी करवा कर नौजवानी का कायाकल्प कराने वाला चैनल स्वामी, जो अपने गंजे खल्वाट को इम्पोर्टेड विग से ढांक रहा है और आकाश में साईं बाबा की दाढी, खुर्जा में स्वर्ग की सीढियां दिखलाता हुआ 'फर्जी टीवी की जनता की अदालत' चला रहा है, वह हाई टेक सुपर पंडा कभी आपको इसकी इजाज़त देगाइजाज़त तो दारू व्यापारी भी नहीं देगा, जो हमारे 'राष्ट्र-पिता' का चश्मा और चप्पल विलायत-अमेरिका से नीलामी से बचा लाया और गांधी जी का असली इंडियन उत्तराधिकारी कहलाया और जो अब उसी साउथ अफ्रीका में आई पी एल करवा रहा है, जहाँ गांधी जी ने तालस्ताय आश्रम बनवाया और जहाँ से उन्हों ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद और पश्चिमी नस्लवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष और संग्राम की अपनी अपूर्व अहिंसक राजनीति की शुरुआत की....
मेरा मन कहता है कि मैं एक बार विजय माल्या के शिप में खींचे गए ख़ूबसूरत माडलों की तस्वीरों वाले नायाब 'बीच कैलेंडर' के स्कैन्ड इमेजेज, हुसैन साहेब की 'भारत माता' और 'दुर्गा' के साथ साथ, जक्स्टापोज़ करते हुए महेंद्र गजभिये के 'बेघर' चेहरों को एक साथ इस ब्लॉग पर प्रस्तुत करुँ , जिससे आप सचमुच जान लें कि आजादी के ६२ साल बाद हम असल में किस राष्ट्र के नुमाइंदे बन गए है...
और क्यों दिल्ली से अमरावती की यह यात्रा एक विदेश यात्रा है ....
और हमारी सारी राजनीति और सारी डेमोक्रेसी और सारा मीडिया किस 'राष्ट्र' का खेल-तमाशा है..!
(अभी इतना हीक्योंकि एक दुखद ख़बर यह है कि कल रात १२ बजे के बाद से बिजली फिर गायब है और अब मेरा इनवर्टर भी हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी सरीखा बोल रहा हैअब जेनरेटर चलाने के लिए घासलेट यानी केरोसिन यानी मिट्टी का तेल लेने जाना पडेगा. तो कल फिर मिलेंगेअमरावती की यात्रा की अन्तिम कड़ी के साथ )