मुंशी प्रेमचंद को मध्यकालीन सामंती मानसिकता के आलोचकों ने 'कथा-सम्राट' (Monarch/ King of Fiction) कहा. कुछ उच्च मध्य-वर्गीय या पेटी-बोर्ज़ुआ, राज्यसत्ता और उसकी दमनकारी संस्थाओं में अपना हित और सुरक्षा देखने वाले आलोचकों ने 'कलम का सिपाही' (Police constable/ Army-man of State of Letters) कहा. हो सकता है किसी सर्व-सत्तावादी ने उन्हें 'कथा का तानाशाह' (Dictator of Stories) भी कह डाला हो. लेकिन प्रेमचंद खुद को 'भाषा का मज़दूर' ही कहते थे.१८४८ के 'कम्युनिष्ट मनिफ़ेस्टो' में जब 'दुनिया के मज़दूरो एक हो' का नारा दिया गया था, तब दुनिया भी दूसरी थी और 'कम्युनिस्ट' भी और थे.
चलिये आज २००९ की इस पहली मई को हम एक दूसरे को मुबारकबाद देते हुए नारा दें -'कलम के मज़ूरो एक हो'!
मई दिवस ज़िंदाबाद !



The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled