Sunday, May 3, 2009

एक कविता जो अभी लिखी गयी



।। दुख।।


अंधेरे में जब कोई और नहीं होता था
सबसे अधिक उजाला उनके इर्दगिर्द ही होता
सबसे साफ़ दिखाई देते थे वही

कोहरे या धुएं के पार धुंधले मैले आकाश में
जैसे दिखते हैं सितारे
कोई कोई उनमें से सबसे तेज़ चमकता है
सबसे अलग अपने ही रंग में जलता कोई नक्षत्र

कोई विश्वास करेगा क्या कि वे कभी फाख्ते थे या
भटके हुए आप्रवासी पक्षी
स्मृति के किसी भी पेड़ या पोखर में उतरने के पहले
देर तक मंडराते रहते थे वे कुछ पूछते हुए
लगातार अपनी कमज़ोर आवाज़ में

कौन मानेगा वे अप्रतिम थे
बहुत सुंदर अद्वितीय
हमारे आंसुओं से बार बार धुल कर वे किसी मणि या नक्षत्र की तरह
चमकते थे एकदम युवा और सम्मोहक किसी बच्चे की तरह

उनके डैने भी थे
जब उसे फैला कर वे उड़ते थे हमारे भीतर दूर दूर तक
तो हमारी नींद के तालाब में सिर्फ उनके प्रतिबिंब तैरते थे
हमारे स्वप्नों को कमजोर लावारिस नावों की तरह
एक एक कर डुबाते हुए

हमारे साथ बहुत समय बिताया था उन्होंने
किसी सबसे अच्छे दोस्त या प्रेमिका की तरह

और जब वे गाना शुरू करते थे अपनी ही धुन में
उनकी बंदिशों को सहने की ताब में हमारा शरीर
किसी तार की तरह लगातार कांपता था
टूटने से किसी कदर हर पल बचता हुआ

उन्होंने इस जीवन में हमें सबसे ज्यादा प्यार किया था
इतना कि स्मृतियों की त्वचा में सबसे अधिक
खरोंचें उन्हीं की हैं
आज तक

हम जानते हैं कोई चले न चले
वही चलेंगे हमारे साथ हमारी सारी यात्राओं में

एक वह भी जो सबसे आखिरी होगी ।।