प्रतिलिपि के प्रतिभाशाली संपादक और संवेदनशील समकालीन कवि गिरिराज किराड़ू ने यह खबर अभी भेजी है। क्या अभी भी जानना-समझना बाकी है कि पूंजी, बाज़ार, तकनीक, राजनीति और मनुष्य-विरोधी हिकमत से गढे़-बनाए गये इस तथाकथित लोकतांत्रिक यथार्थ में असली सृजनात्मक प्रतिभाओं की नियति और जगह क्या है?
भोपाल.
शास्त्रीय संगीत के महान पुरोधा स्व.कुमार गंधर्व के पुत्र और प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक मुकुल शिवपुत्र इन दिनों भोपाल में दो-दो रुपए की भीख मांगते फिर रहे हैं। खयाल गायकी में कम उम्र में ऊंचा मुकाम हासिल करने वाला यह कलाकार समय के फेर में गुमनाम जिंदगी जी रहा है।
राजधानी में शास्त्री नगर का साईं बाबा मंदिर और जवाहर चौक स्थित देशी शराब दुकान का अहाता इन दिनों शास्त्रीय संगीत के महान पुरोधा स्व.कुमार गंधर्व के पुत्र मुकुल शिवपुत्र के जीवन का अहम पड़ाव बन गया है।
मटमैली हो चुकी नीले और सफेद चेक की हाफ शर्ट, गहरे नीले रंग की पेंट और पैरों में चप्पल डाले मुकुल शिवपुत्र मंदिर में आने-जाने वाले हर व्यक्ति से सिर्फ दो रुपए मांगते हैं। जेब में दस-बीस रुपए इकट्ठे होते ही वे जवाहर चौक डिपो के पास शराब अहाते का रुख करते हैं।
मयखाने में कुछ वक्त बिताने और गला तर करने के बाद मुकुल वापस मंदिर की बेंच पर लौट आते हैं। बुधवार रात को भी वे इसी बेंच पर बेसुध पड़े मिले। कई बार उनका नाम और यहां होने की वजह पूछे जाने पर वे हाथ जोड़कर चिढ़ते हुए बोले, मैं गायक हूं साहब. संगीतकार। नाम?
कई बार पूछने पर बुदबुदाते हैं, मुकुल..मुकुल शिवपुत्र। घर कहां है? इस सवाल पर कुछ देर खामोशी ओढ़ने के बाद जवाब मिलता है देवास, लेकिन साथ में यह समझाइश भी कि, 17 साल की उम्र में घर छोड़ दिया था, आज 53 साल का हूं समझे आप। .शास्त्रीय संगीत की दुनिया में अपने पिता की विरासत को साथ लेकर खयाल गायकी में अपना खास मुकाम बनाने वाले मुकुल की दयनीय हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भोजन करने का प्रस्ताव देने पर वे कातर निगाहों से कहते हैं, नहीं खाना नहीं खाना, कहीं सुला दो मुझे। मैं सोना चाहता हूं।
भोपाल में उनके कई मित्र और परिचित हैं। लेकिन उन्हें किसी के पास जाकर हाथ फैलाना गवारा नहीं। बकौल मुकुल, मैं क्यूं जाऊं उनके पास। इस बारे में और ज्यादा पूछने पर वे बिदक जाते हैं और झिड़कते हुए कहते हैं, तुम मुझे कहीं ले जाकर ठीक से सुला सकते हो तो बताओ नहीं तो जाओ यहां से। वैसे भी मुकुल एक आजाद पंछी की तरह दीन-दुनिया की ज्यादा परवाह किए बगैर अपनी तन्हाई में ही खुश रहने वाले कलाकार हैं।
मुकुल के नाम पर डालर की वसूली लेकिन खुद पाई-पाई को मोहताज
अपने ही तौर- तरीकों से जीने वाले मुकुल शिवपुत्र इन दिनों पाई-पाई के मोहताज हैं। लेकिन इंटरनेट पर कई वेब साइट उनकी गायकी सुनने के इच्छुक श्रोताओं से उनकी एक परफारमेंस के 8 से 15 डालर ( 392 से 735 रुपए) तक वसूल रहीं हैं। इन वेब साइट्स पर यह दावा किया जा रहा है कि वे श्रोताओं से वसूली जाने वाली शत प्रतिशत राशि संबंधित कलाकार को दी जाती है।
स्वभाव से फक्कड़ और घुम्मकड़ हैं मुकुल
मुकुल शिवपुत्र स्वभाव से फक्कड़ और घुम्मकड़ हैं। हालत यह है कि वे पिछले कुछ सालों से देवास स्थित घर में कुछ दिन ही रहते हैं। बाकी समय वे देश भर में घूमते रहते हैं। हाल ही में देश के अलग-अलग शहरों की यात्रा कर भोपाल आए हैं। उन्हें भीड़-भाड़ से दूर तन्हा जीवन भाता है। संगीत ही उनका दोस्त है और उनके जीवन का हमसफर भी। कलाकारों की तड़क-भड़क वाली जीवनशैली से दूर साधारण जीवनशैली पसंद करने वाला यह कलाकार पिछले कुछ सालों से साल में सिर्फ दो या तीन म्युजिक कंसर्ट ही कर रहा है।
मुकुल जी पिछले महीने मेरे श्यामला हिल्स स्थित निवास पर आयोजित एक घरेलू संगीत गोष्ठी में शामिल हुए थे। उसके बाद से ही उनके बारे में कोई खबर नहीं मिली कि वे कहां हैं
-अखिलेश,चित्रकार
(अखिलेश समकालीन चित्रकला के चर्चित और महत्वपूर्ण कलाकार हैं। यह खबर संभवत: कल 'भास्कर' में प्रकाशित हुई थी।)
मुकुल शिवपुत्र
मुकुल शिवपुत्र का जन्म 1956 में हुआ। पिता शिवपुत्र सिद्धरमैया कोमकली यानी पं.कुमार गंधर्व ने उन्हें छोटी उम्र में ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पारंगत कर दिया। इसके बाद मुकुल ने केजी गिंदे से ध्रुपद- धमार और एमडी रामनाथन से कर्नाटक संगीत सीखा। खयाल के अलावा वे भक्ति और लोगगीत गाना भी पसंद करते हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत के इक्कीसवीं सदी के गायकों में उन्हें संस्कृत में भी संगीत रचनाएं तैयार करने के लिए जाना जाता है।



The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled