( यह पोस्ट ४ दिन पहले लिखी गयी थी. आज लगा पा रहा हूं.)आज बुद्ध पूर्णिमा है. आज से अच्छा और कौन सा दिन हो सकता है, जब मैं अमरावती के उन चार दिनों की अमिट स्मृतियों की अंतिम कडी़ प्रस्तुत करूं. बुद्ध ने कहा था-'जीवन स्वयं में एक यंत्रणा है.' .....'मुक्ति का रास्ता आकाश में नहीं, हमारे हृदय में है, हमें स्वयं इसे खोजना होगा.''
....'अन्यायों को जब हम क्षमा करते हैं, तो हम अन्याय को और अधिक समझने की शुरूआत करते हैं...'
....और....उन्होने यह भी कहा था (जैसा शताब्दियो के बाद अस्तित्ववादियों ने, कांट, कीर्कगार्द,सार्त्र आदि ने कहा - 'हम वही हैं, उसी के परिणाम, जो हम सोचते हैं.'
इसलिये सबसे पहले हमें अपने 'सोचने' को बदलना होगा...!
आज हमारे पास ऐतिहासिक सर्वेक्षण हैं कि मानव सभ्यता के समूचे इतिहास में सबसे अधिक यंत्रणा बुद्ध के अनुयाइयों को झेलनी पड़ी है. बुद्ध के बाद वे बौद्ध ही हैं, जो इतिहास में बार-बार तमाम तरह की सत्ताओं की हिंसा के सबसे बडे़ शिकार रहे हैं. तक्षशिला, नालंदा, सारनाथ, मगध और कोसल में ब्राह्मणवाद की हिंसा के ही नहीं, आधुनिक समय में भी - हिरोशिमा, नागाशाकी, विएतनाम, तिब्बत, लद्दाख....कोरिया ...और कांधार के बामियान तक.
अगर आप याद करें तो विएतनाम में जब अमेरिका ने नापाम बम गिराया था, तो वह माइ लाइ गांव के उस बौद्ध मंदिर पर ही गिराया गया था, जिसमें उस गांव के निर्दोष गांव वासियों ने शरण ले रखी थी.
तथ्य यह है कि अर्ध-इतिहास से लेकर मध्य और आधुनिक इतिहास ही नहीं, आज तक संसार में सबसे अधिक जो मारे गये हैं... वे बौद्ध ही हैं. यहूदियों से भी ज़्यादा...(माफ़ करेंगे ऐसे 'वर्गीकरण' के लिये, जो किसी मानव समुदाय को उसकी आस्थाओं के चिह्न से पुकारता है.)
शायद यही कारण रहा होगा कि बाबा साहब अंबेडकर ने दलितों और देश की अन्य उत्पीड़ित जातियों-समूहों से उसी बौद्ध मार्ग को अपनाने के लिए कहा...क्योंकि हिंदुओं (या ब्राह्मणवादियों) द्वारा जितना उत्पीड़्न और दमन उनका हुआ और आज तक हो रहा है, वह नैसर्गिक रूप से बौद्ध-यंत्रणा और उनकी नियति के साथ स्वयं को जुड़ा हुआ पाता है.
मेरी बड़ी इच्छा थी कि मैं अमरावती के बौद्ध स्तूप को देख सकूं, जिसके बारे में पहले बहुत सुन रखा था. कहते हैं कि यह स्तूप देश के अन्य बौद्ध केंद्रों की तरह हिंदू ब्राह्मणवादियों के भय से वीरान नहीं हुआ बल्कि १५वीं-१६वीं सदी तक लगातार यहां साहस के साथ लोग आते रहे. आस्था और ध्यान का केंद्र यह बना रहा. कुछ ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों की कोशिशों से यहां कुछ विलक्षण मूर्ति-शिल्प भी खोजे गये. उन्हें भी देखने का मन था.
बाद में पता चला कि अमरावती एक और भी है. यहां नहीं, आंध्र में. वह बौद्ध स्तूप वहीं है.
लेकिन फ़िलहाल इस अमरावती में जो कुछ हो रहा था और मेरी चेतना हर पल जिस तरह उससे प्रतिकृत हो रही थी, उसमें चुपचाप अपने आपको बह जाने देने के अलावा और कुछ अच्छा भी नहीं लग रहा था.
मैं उस रोज़ राव साहेब कस्बे को बोलता हुआ सुन रहा था. हज़ारों लोग मंत्र-मुग्ध बैठे थे. सुनने में ऐसी तल्लीनता कि कागज़ की एक सरसराहट भी शोर पैदा करती थी. मैंने ऐसा रिस्पांसिव आडिएंस कहीं मुश्किल से देखा होगा. मराठी ठीक- ठीक पूरी तरह नहीं समझ पाता, लेकिन यही वह भाषा है, जिसने हिंदी में हावी कट्टर बर्बर भ्रष्ट और मानवविरोधी ब्राह्मणवाद की दमन भट्टी में झुलसते मेरे जीवन की ओर पहली बार अपना हाथ बढा़या...! मदद का हाथ ! आत्मीयता और सहकार का हाथ. सबसे पहला हाथ मेरी तरफ़ मराठी और उर्दू का ही बढ़ा. यह एक तथ्य है.
क्या वह हाथ बुद्ध का था...? ....या क्राइस्ट का ? या मेहबूबे इलाही ख्वाज़ा का ? औलिया का....? या विठोबा का ?
या मेरे जैसे ही अपनी यंत्रणा से गुज़रते किसी अन्य मानवीय समुदाय का हाथ?
किसी उत्पीड़ित कैदी का हाथ, जो एक टार्चर कैंप से दूसरे मकतल तक पहुंचता है..!..और दोनों अपनी-अपनी मुक्ति की उम्मीद में कांपते हैं....!
एक यातना, जो दूसरी यातना का हाथ थामती है..!
एक दुख जो दूसरे दुख का कंधा सहलाता है।
एक पीड़ा जो दूसरी पीड़ा के तपते हुए माथे को छूती है।
मैं जीवन भर के लिए अंग्रेजी, उर्दू, मराठी और अब जर्मन भाषा-भाषियों का कृतग्य रहूंगा...
अब कन्नड़, तेलुगु और मलयालम का भी. ..जो लगातार मेरी तरफ़ आते जा रहे हैं. मेरी बात सुनने के लिए. मैं अगर कभी गुस्से और दुख में ज़ोर से बोलूं तो क्षमा करना ।
मैं समझने की कोशिश कर रहा था कि राव साहेब कास्बे क्या बोल रहे हैं, जिसे इतना डूब कर हज़ारों लोग सुन रहे हैं. तभी अचानक एक अंग्रेज़ी का वाक्य उन्होंने कहा : ' नेचर इज़ एन एक्स्टेंशन आफ़ ओर्गेनिक एंड इनओर्गेनिक बाडी आफ़ मैन'.....
इसका मतलब, यह समूची प्रकृति, यह समूचा पर्यावरण मनुष्य की भौतिक और अभौतिक देह का ही विस्तार है..और जो ताकतें प्रकृति और पर्यावरण के शोषण और विनाश मे शामिल हैं, वे दर असल मनुष्य के ही विनाश और शोषण में लगी हुई हैं.
सताहीन, निर्बल, अशक्त मनुष्य की तरह प्रकृति भी सत्ताहीन, निर्बल और अशक्त है. वह भी दलित और उत्पीड़ित और पराजित है.
यानी यही वह वजह है कि जहां-जहां प्राकृतिक संसाधन हैं, प्रकृतिक गैसे हैं, तेल है, खनिज हैं, धातु और उनके अयस्क हैं, कोयला और जल और पेड़ हैं, उन सभी जगहों के गरीबों, दलितों, आदिवासियों, वंचितों को हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। गांधी जी ने कभी कहा था -'यह धरती इतनी संपन्न है कि अरबों-खरबों की जनसंख्या को लाखों-करोड़ों सालों तक कभी कोई अभाव नहीं होगा। लेकिन सिर्फ़ एक आदमी के लालच के सामने इस धरती की समूची संपदा भी कम है!' इसका मतलब हुआ हमारे समय की हिंसाओं के पीछे लालच की सभ्यता का हाथ है? लालच का पागलपन, एक उन्माद ..एक न्यूरोसिस ! मानसिक रोग !
मैं चौंक गया. राव साहेब कास्बे तो उन हज़ारों साधारण जनों को समाज, प्रकृति, समाजिक वर्गों का निर्माण, जाति-व्यवस्था, धर्म और मिथ्या चेतना का वर्चस्व ही नहीं, हमारे आज के समय में पूंजी और सत्ता की नयी संरचनाओं और शोषण-दमन के नये रूपों की जटिल से जटिल सैद्धांतिकी को बिकुल सरल शब्दों में समझा रहे थे. इतने सरल शब्दों में, रूपकों, उदाहरणों और कथाओं के साथ कि वहां उपस्थित विशाल जन समुदाय उसमें बहा चला जा रहा था. ..
वे लगातार समझा रहे थे कि विदर्भ और महाराष्ट्र में दूर-दूर तक आई इस नयी जागृति को एक बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण में तब्दील किया जाय, जिसका सपना बुद्ध, फ़ुले और अम्बेडकर ने देखा था. यह किसी जातिवादी प्रतिहिंसा और प्रतिशोध भर में सिमट कर न रह जाय.
वे भारतीय समाज की सांस्कृतिक संरचनाओं को उत्तर-औद्योगिक वर्गीय बनावटों और आज के समूचे संकट के बीच रख कर देख रहे थे.
मार्क्स के विचारों की आंच में वे वंचितों-दलितों की चेतना का नया क्रांतिकारी यौगिक बना रहे थे. बहुत ही सरल और प्रभावी भाषा में...!
कहने की अलग से ज़रूरत नहीं कि यह एक कमाल था.
मैं सोच रहा था, काश हिंदी में भी ऐसे लोग होते, जो मामूली सी बात को भी जटिल, असंप्रेष्य तरीके से कहने की बजाय उसी सरलता के साथ साधारण लोगों के सामने रखते, जिस सरलता से हाकिंस 'समय का इतिहास' बताते हैं. या जैसे आइंस्टीन अपने सापेक्ष्य सिद्धांत को बताते थे. जैसा हिंदी में नार्लीकर ने लिखने की कोशिश की थी. जैसी कोशिश मध्यकाल के संत कवियों -कबीर, नानक, तुकाराम, रविदास, मीरा, अक्का महादेवी, अल्लम महाप्रभु आदि ने की थी.
जैसा प्रयत्न बुद्ध ने बहुत पहले किया था. संस्कृत को त्याग कर और पालि या प्राकृत को अपना कर.
सचमुच महानता सरलता में ही अंतर्निहित होती है. सरल होना इसीलिए सबसे कठिन माना जाता है.
एक वैदिक उक्ति है : ' जो बोलता है, वह अग्यानी है. ग्यान तो उसके पास है, जो सुन रहा है.' (दोस्तो, मैं बोल रहा हूं, इसलिए अग्यानी हूं. माफ़ करना.)
हमारे साथ दाहिनी ओर मंच पर एक ११-१२ साल का उदास सा बालक बैठा था. वह अश्वजित था. अश्वजित वानखेड़े. उस दिनेश वानखेडे़ का छोटा भाई, जिसे खैरलांजी की घटना के विरोध में उठे आंदोलन में गोली का शिकार होना पड़ा था. दिनेश जब मारा गया, उस वक्त उसकी उम्र सिर्फ़ १९ साल की थी. (सतेश्वर जी ने बाद में बताया कि उस रोज़ उन्होने उसके पिता नरहरि और मां मनोरमा वानखेड़े को बुलाया था, लेकिन उनके सुबह-सुबह काम पर निकल जाने से यहां अश्वजित ही आ सका.)
मैं बार-बार अश्वजित वानखेडे़ को देख रहा था। उसकी आंखें शून्य में खो जाती थीं। उसका भाई तो अब वापस नहीं लौटेगा ! कभी भी।
खैरलांजी में २९ सितंबर २००६ को जिस प्रियंका को उसकी मां सुरेखा के साथ मारा गया, उसकी उम्र सिर्फ़ १७ साल की थी. उसने १२वीं कक्षा के बोर्ड एक्ज़ामिनेशन में मेरिट में जगह बनाई थी. वह पढ़-लिख कर सिविल सेवा या फ़ौज़ में जाना चाहती थी क्योंकि शायद उसे यह लग रहा था कि यह देश और समाज उसका भी है, जिसकी सेवा और निर्माण में उसे अपनी प्रतिभा और श्रम लगाना चाहिए. लेकिन उसके दो भाइयों और मां के साथ उसे वहशी बर्बर जातिवादियों की भीड़ ने मार डाला.
मारने के पहले १७ साल की प्रियंका और ४२ साल की उसकी मां सुरेखा के साथ लगातार बलात्कार किया गया. यहां तक कि मृत्यु के बाद तक. (खैरलांजी की बर्बरता)
सूत्र बताते हैं कि गांव से हट कर बसा हुआ यह दलित परिवार बुद्ध का उपासक था. उसकी २ एकड ज़मीन पहले ही गांव के बाहुबली जातिवादियों ने छीन ली थी और अब वे उसकी बाकी ज़मीन भी छीनने की फ़िराक में थे.
इस ईर्ष्या और द्वेष की एक वजह यह भी थी कि प्रियंका जितनी प्रतिभाशाली थी, पढ़ने-लिखने में जितना तेज़ थी, उसकी तुलना में खैरलांजी के ऊंची जाति के लड़के भी कहीं नहीं थे. फ़िर वह अकेली ऐसी लड़की थी, उस गांव की, जो साइकिल चलाती थी, जिसे उसके पिता भैयालाल ने दिया था, परीक्षा में टाप करने पर.
यानी अंदाज़ा लगाया जा सकता है....एक दलित, फ़िर लड़की, ऊपर से प्रतिभाशाली...? कैसे वह ज़िंदा बचती ?
गुजरात में कौसर बानो के साथ सांप्रदायिक हिन्दू उन्मादियों द्वारा जो किया गया था, उससे कम बर्बर यह नहीं था.
गुजरात और महाराष्ट्र और पाकिस्तान में स्वात घाटी या अफ़्गानिस्तान के कान्धार, सारी जगहों की ये बर्बरताएं एक ही 'धार्मिक-सामाजिक' सोच और परंपरा के गर्भ से जनम लेने वाले, एक ही शैतान की करतूतें हैं. इन्हें अलग-अलग बिल्कुल मत समझना. यह मैं इसलिए भी कह रहा हूं कि इस शैतान की हिंसाओं को किताबों, अखबारों, चैनलों के बाहर ....बहुत करीब से मैने देखा है. अपनी भाषा के समानांतर संसार के भीतर. अपने जीवन में भी.
यह शैतान तमाम तरह के नकाबों, मुखौटों, लबादों में भेस अदल-बदल कर सामने आता है. ऐसा कि तुम उसे बदलाव का अग्रदूत, आधुनिकता का संवाहक, करुणा का अवतार समझ लेने की भूल कर सकते हो!
मंच पर बाईं ओर अश्वजित और ताई जी (नलिनी ताई लढके, जिनकी उम्र ९४ वर्ष की है लेकिन जातिवाद तथा अन्य कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष की ऊर्जा उनमें आज भी मद्धिम नहीं पड़ी है.) के अलावा तिब्बत की निर्वासित जनता के प्रतिनिधि तेनज़िंग लेक्शाय भी उपस्थित थे. और सबसे दायीं ओर एक मां और पिता वे भी मौज़ूद थे, जिनके बेटे को नक्सलवादियों ने गोली मार दी थी. उनका बेटा पुलिस बल का नौजवान अफ़सर था. २७-२९ वर्ष का खूबसूरत. उसका फ़ोटो वहां रखा गया था, नाम मैं भूल गया हूं.
बाद में जवाबी कार्रवाई में वे ४ नक्सल भी मारे गये.
जब राव साहेब कास्बे,प्रो. भीमराव वाघमारे, बी एल नागदिवे, डॉ वामन गवई, कमलाकर पायस, लोकनाथ यश्वंत और बाद में सतेश्वर मोरे इन दुखों में साझा कर रहे थे, तो सभी की आंखें छ्लक रहीं थीं. एक ऐसा घुटता हुआ दर्द था, जो उस पूरे सभागार और मंच पर छा गया था. एक अजब सा भारीपन था जो वहां सभी लोगों की चेतना पर बार-बार छा जाता था.
वहां मौज़ूद हर व्यक्ति किसी न किसी हिंसा का, ताकत के उन्माद और बर्बरता का 'विक्टिम' था. हर किसी की स्मृति में इस हिंसक वक्त के नाखूनों की खरोंचें थीं.
खैरलांजी की प्रतिकृया में पैदा हुए आंदोलन में सतेश्वर जी और उनकी पत्नी को भी तमाम लोगों के साथ धारा ३०७ के तहत जेल में बंद कर दिया गया था.
बाद में नीली बर्दी पहने एक नौजवान लड़के ने, जिसके चेहरे में प्रतिभा और श्रम की आभा थी, मुझसे कहा -' क्या आप यह जानते हैं कि जितने भी लोग मारे गये वे सबके सब दलित ही थे...या आदिवासी. वे नक्सल भी, और वे पुलिस वाले भी. खैरलांजी में जो मारे गये वे भी और उसके प्रतिरोध में जो आंदोलन में उतरे वे भी.'
'वे हमीं होते हैं, जो हर जगह, हर बार मारे जाते जाते हैं'.
उसका कहना सच था. बस्तर और छ्त्तीसगढ़ के इलाकों में यही हो रहा है. दोनों ओर वही. आत्महत्या...आत्म- संहार. सेल्फ़ एनिहिलेशन. वहां तो जो अर्ध-सैनिक दस्ते भी भेजे गये हैं, वे भी उत्तर-पूर्व के आदिवासी ही हैं. नगालैंड, मिज़ोरम, मेघालय के.
कोई फ़ाशिस्ट मास्टर-माइंड ज़रूर है, जो गरीब भारतीय जनता को नस्ल-वादी इन्जीनियरिंग के ज़रिये खत्म कर रहा है....वह भारतीय जनसांख्यिकी की पूरी जातीय और सांस्कृतिक संरचना को बदलना चाहता है. क्योंकि वह लालच से पैदा हुई हिंस्र सभ्यता का बर्बर दौलतखोर है।
क्या वह देशी है....? ...... या विदेशी ?
या कहीं वही तो नहीं जिसने बुद्ध को इस देश के बाहर किया? या जिसने गांधी को गोली मारी?
कुछ नौजवान लड़के, जो समता सैनिक दल की नीली बर्दी में थे, कह रहे थे -'हमारे अंदर ज़रा भी हिंसा नहीं थी। बाबा साहेब की मूर्ति का अंग-भंग जब कानपुर में किया गया, तो हमने सारे महाराष्ट्र में रेल-सड़क का यातायात जाम कर दिया। क्योंकि अगर हम अब भी चुप रहते तो मेमनों की तरह अपने अतीत को दुहराते।..हममें से कई अब प्रशासनिक सेवा में आ जाएंगे। हम जानते थे कि हम कानून को हाथ में ले रहे हैं।..लेकिन आप सच मानिए, हम ऐसा इसलिए कर रहे थे कि हमारे खिलाफ़ जो हिंसा जारी थी, वह राज्य द्वारा संचालित थी। राज्य द्वारा अनुमोदित।'
मैं चुपचाप उन्हें देख रहा था। मुझे पता था कि इनमें से कुछ नौजवानों ने रेल की बोगियों में भी आग लगाई। लेकिन कहीं भी कोई यात्री मारा नहीं गया था, जैसा गोधरा में हुआ था। यह एक अधिकतम अहिंसक अवग्या आंदोलन था, जिसमें न्यूनतम हिंसा का सहारा लिया गया था. अगर ये उतना भी न करते, तो सरकार उनकी मांगों की ओर उसी तरह बहरी बनी रहती जैसी किसानों और मानव-नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष करते दूसरे लोगों के प्रति है.
मुझे खुशी थी कि अब वे जाग गये थे. उनके अंदर 'करो या मरो' का आत्मविश्वास पैदा हो चुका था.
मैं उनके लिए, उनकी कामयाबियों के लिए सच्चे मन से प्रार्थना करता हूं. मैं जानता हूं, एक दिन वे मुझे भी, मेरी भाषा को भी मुक्त करेंगे.
बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था -'जब कोई आदमी पोप बन जाता है, तो क्रांतिकारी बनने की उसकी आकांक्षा खत्म हो जाती है. इसीलिए असली और बुनियादी सामाजिक सुधार के लिए किसी ब्राह्मण से क्रांतिकारी बनने की आशा करना बेकार है. उतना ही बेकार, जितना ब्रिटिश शासन से यह आशा करना कि (जैसा लेस्ली स्टीफ़न ने कहा था) वह ऐसा अधिनियम पारित करेंगे, जिसके अनुसार सभी नीली आंखों वाले बच्चों की हत्या कर दी जायेगी.'
'प्रत्येक देश में बुद्धिजीवी वर्ग सर्वाधिक प्रभावशाली वर्ग रहा है, भले ही वह शासक वर्ग न रहा हो. अगर बुद्धिजीवी वर्ग ईमानदार, स्वतंत्र और निष्पक्ष है तो उस पर भरोसा किया जा सकता है. वह पथ भ्रष्ट लोगों को सही रास्ते पर लाने के लिए प्रतिबद्ध रहता है. लेकिन आपको यह जान कर खेद होगा कि भारत में बुद्धिजीवी वर्ग असलियत में ब्राह्मण जाति का ही दूसरा नाम है. आपको धक्का लगेगा इस सच्चाई से कि ये दोनों एक ही हैं. इसी ने शेष हिंदू समाज पर अपना नियंत्रण कर रखा है. यह जाति-प्रथा के बदलाव का विरोधी है. इसीलिए मुझे जाति-प्रथा समाप्त करने वाले आंदोलनों की कामयाबी असंभव दिखाई देती है.''
वहीं मैने एक दुबले-पतले लेकिन तेजस्वी नव युवक को और देखा. उसने पूरे जोश से मुझसे हाथ मिलाया. उसकी उम्र मेरे बेटों से भी शायद कम रही होगी. अरुण भेलगे. साथ में उसकी पत्नी भी थी. उतनी ही सकृयता और जोश से भरी हुई. 'हम इस संघर्ष को आगे तक ले जाएंगे. रास्ते में जितनी भी दुश्वारियां हों, परवाह नहीं. अगर हमने अब भी कुछ नहीं किया तो फ़िर तो बहुत देर हो जाएगी.'
'दस महीने के बाद जेल से छूटा हूं. मुझे माओवादी या नक्सलवादी होने के आरोप में चंद्रपुर के इलाके से गिरफ़्तार किया गया था.'
'आप कर क्या रहे थे?' मैंने पूछा.
'कुछ नहीं. सिर्फ़ गरीबों और दलितों को मार्क्स, अंबेडकर और भगत सिंह का साहित्य बांट रहा था.' उसका उत्तर था.
उसका जवाब किसी तेज़ आर्क-लाइट की तरह सब कुछ उजागर कर गया. सब कुछ साफ़.
मार्क्स ने कहा था -' कोई विचारधारा जब जनसमूहों द्वारा अपना ली जाती है, तो वह सिर्फ़ विचार न रह कर एक भौतिक ताकत में बदल जाती है.'
यानी देश के उन लोगों के बीच, जहां वंचना, गरीबी और उत्पीड़न है, उन ७० प्रतिशत लोगों के बीच मार्क्स, गान्धी, अंबेडकर और भगत सिंह के विचार आज भी सामाजिक बदलाव के कारगर भौतिक औज़ार बन सकते हैं, इसीलिए वहां वे खतरनाक माने जाते हैं. इसीलिए राज्य अरुण भेलगे जैसे युवकों को 'माओवादी' होने के संदेह में जेल में डाल देती है. विनायक सेन जैसे जन-सेवा के काम में लगे शांतिवादी समाजसेवी चिकित्सक गिरफ़्तार कर लिए जाते हैं.
अगर आज गरीबों-दलितों के बीच कोई गरीब और दलित जाकर मार्क्स या गांधी के विचारों का प्रचार करेगा तो वह किसी सलवा जुडुम में एनकाउंटर हो जाएगा.
हमारा दोस्त परशुराम हरने पाल उसी चंद्रपुर के इलाके में काम कर रहा था. अगर आपको याद हो तो मेरी अंतिम किताब 'मैंगोसिल' जिन तीन दोस्तों को समर्पित है, हरने पाल उनमें से एक है. चंद्रपुर में ही दलितों-आदिवासियों की एक मीटिंग के दौरान उसकी मृत्यु हुई.
मैं चुपचाप अरुण भेलगे के अभी भी उत्साह में दमकते चेहरे को देख रहा था. उसने बताया कि पत्नी का अभी हार्ट आपरेशन हुआ था. लेकिन लगता है, कहीं कोई खामी रह गयी थी क्योंकि 'पस' अभी तक आ रहा है.
मैं उसके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना कर रहा हूं. उन दोनों को बहुत लंबी उम्र मिले. उससे भी लंबी, जितनी लंबी यह शताब्दियों की गुलामी और अन्याय की रात है.
जब मैं दिल्ली, भोपाल, लखनऊ, पटना, कोलकाता आदि राजधानियों के मार्क्सवादियों को देखता हूं, जिनमें बडे़-बडे़ अफ़सर, नेता, मंत्री और उनके दरबारी, प्रोफ़ेसर ...वगैरह शामिल हैं तो मेरे सामने अरुण भेल्गे का चेहरा कौंध जाता है. और उस जैसे हज़ारों नौजवानों का, जो महान विचारों की महानता को बचाने के काम में पूरी हिम्मत और प्रतिबद्धता के साथ लगे हैं.
विचारधाराओं को उन्होंने हिंदी के ब्राह्मणवादी-जा्तिवादी ठगों और दलालों की तरह पुरस्कार, पद, प्रतिष्ठा और पैसा कमाने के षटकर्म में नहीं बदला....
मेरा बचपन का दोस्त नामदेव लाघवे बता रहा था कि पुलिस उसके और कुछ दूसरे अध्यापकों के घर भी कई बार पूछ-ताछ करने आ चुकी है. क्योंकि विनायक सेन एक-आध बार वहां आकर चाय पी चुके थे.
और इसलिए भी कि नागपुर और चंद्रपुर के इन प्राध्यापकों के नात-रिश्तेदार दूर-दराज़ के गावों में रहने वाले गरीब ही हैं.
आज का सच यही है कि जो भी गरीब है, वह यहां इस देश में, संदेह के घेरे में है.
आज देश का हर गरीब और दलित, बेरोजगार और न्याय मांगने वाला व्यक्ति संदिग्ध हो चुका है.
ऐसे लोग इस चमकदार इंडिया में 'विदेशी' हैं.
ऐसे लोग उस राष्ट्र के हैं, जो अभी भी पराधीन है. जहां के प्राकृतिक संसाधन और मानवीय श्रम औपनिवेशिक लूट-खसोट के लिए है.
लेकिन यही वह राष्ट्र भी है जहां विचार अभी भी एक भौतिक-सामाजिक शक्ति में तब्दील होने की क्षमता रखते हैं.
जहां जाकर शब्दों पर एक बार फिर भरोसा जागता है:
I am signaling you through the flames.
The North Pole is not where it used to be.
Manifest Destiny is no longer manifest.
Civilization self-destructs.
Nemesis is knocking at the door.
What are poets for, in such an age?
What is the use of poetry?
The state of the world calls out for poetry to save it.
If you would be a poet, create works capable of answering the challenge of apocalyptic times, even if this meaning sounds apocalyptic.
You are Whitman, you are Poe, you are Mark Twain, you are Emily Dickinson and Edna St. Vincent Millay, you are Neruda and Mayakovsky and Pasolini, you are an American or a non-American, you can conquer the conquerors with words....
by Lawrence Ferlinghetti
मैं बार-बार अमरावती को याद करता हूं. संभा जी के गीत तो अब जीवनभर स्मृतियों में गूंजेंगे.
मैं फिर कहता हूं, उस 'महा-राष्ट्र' से लौट कर मैं वह नहीं रह गया, जो वहां जाने से पहले था.
वहां जाना तिब्बत या फ़िलिस्तीन जाना है.
वहां जाना १९४७ के पहले के 'ब्रिटिश इंडिया' जाना है.
वह एक उत्पीड़ित भारत की यात्रा है.
जहां 'पोलिटिकल इंडियन नेशन-स्टेट' की ७०-७५ प्रतिशत आबादी बोट, बूट और बंदूक वाली डेमोक्रेसी के साये में निवास करती है.
जय भीम !



The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled