मेरी एक बहुत पहले लिखी गयी कहानी का शीर्षक है 'खंडित स्त्रियां, नेहरू जी और अस्ताचल'। आज २७ मई है और यह कहानी २७ मई १९६४ की स्मृति में लिखी गयी थी। तब जब मैं १२ साल का था। उस कहानी को अगर आप पढे़ तो इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पं. जवाहरलाल नेहरू के साथ कितना गहरा संवेदनात्मक लगाव दूर-दराज़ के गांवों के साधारण लोगों में भी था। मेरे पिता उस समय के समाजवादी और गांधीवादी थे, लेकिन २७ मई को दोपहर जब आकाशवाणी से देवकीनंदन पांडे की कांपती हुई आवाज़ ने नेहरू की मृत्यु की खबर दी, तो वे रो रहे थे। उस दिन हमारे घर ही नहीं, गांव के कई घरों में चूल्हा नहीं जला था। आकाशवाणी में समाचार पढ़ते हुए उस दिन देवकीनंदन पांडे भी रो पड़े थे। कहते हैं इस पर उन्हें आल इंडिया रेडियो के अफ़सरों ने नोटिस दी थी कि यह 'उदघोषक' के 'प्रोफ़ेशन' के खिलाफ़ है और यह एक ग़लती है। लेकिन बाद में यह माना गया कि ३० जनवरी १९४८ की खबर की तरह, २७ मई १९६४ की सूचना भी भारतीय इतिहास के उस भावनात्मक आघात की अभिव्यक्ति थी, जिसे समाचारवाचक देवकीनंदन पांडे की कांपती और सिसक पड़ने वाली आवाज़ ने प्रामाणिक बनाया था। वे एक महान 'प्रोफ़ेशनल न्यूज़रीडर' थे। (आप शायद जानते हों कि फिल्म और टीवी अभिनेता सुधीर पांडे उन्हीं के बेटे हैं और दिलचस्प बात यह कि आपके इस लेखक की एक कहानी 'हीरालाल का भूत' पर आधारित फ़िल्म 'उपरांत' से उन्होंने अपना अभिनय का सफ़र शुरू किया था।)
आपमें से अगर किसी ने मेरी कहानी 'खंडित स्त्रियां, नेहरू जी और अस्ताचल' पढ़ रखी हो तो मेरे बचपन में नेहरू जी की उपस्थिति को भी जानते होंगे। सनलाईट साबुन की बट्टियों को चाकू से छील-तराश कर नेहरू जी का बस्ट और प्रोफ़ाइल बनाना, उन दिनों के प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर (जो नेहरू जी के दोस्त भी थे) के कार्टूनों से नेहरू की नाक, अचकन, चूड़ीदार पाज़ामा और बाईं ज़ेब में लगे सुर्ख़ गुलाब की आउट-लाइन कापी करना, मेरे उन दिनों के शगल में शामिल था। (बाद में 'नौनिहाल' फिल्म का वह गाना -'मैंने इक फूल, जो सीने पे लगा रक्खा था, उसके परदे में तुम्हें दिल पे छुपा रक्खा था, .....था जुदा सबसे मेरे इश्क़ का अन्दाज़ सुनो। मेरी आवाज़ सुनो...।' बच्चों के प्रति या अपने बाद आने वाली नयी पीढ़ी के प्रति उनके लगावों को जिस तरह प्रगट करती थी, कि नेहरू के बारे में कोई भी राजनीतिक मूल्यांकन व्यर्थ और अप्रिय लगने लगता था। वैसे कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि वह सुर्ख़ गुलाब तो उस बिछड़े हुए 'प्यार' की स्मृति में नेहरू ने अपने दिल से लगा रखा था, जिसका संबंध लेडी एडविना से था। जो भी हो, लेकिन कई बार मुझे एडवर्ड सईद की बात सही लगती है कि पूरब के लोग साधारण तौर पर 'भावुक' या 'जज़बाती' लोग हैं। योरोप की तरह औपचारिक आधुनिक राजनीतिक लोग नहीं। जब वे किसी से जुड़ते हैं तो 'जी' और 'जान' से जुड़्ते हैं। 'दिमाग़' वे उठाकर कहीं कोने में डाल देते हैं। वे धुर 'सेरेब्रल' कभी नहीं होते। जिस समय की बात मैं आपको बता रहा हूं, उस पूरे दौर में -नेहरू, राज कपूर, गुरुदत्त, शैलेंद्र, साहिर, टैगोर, निराला, महादेवी, पी.सी. जोशी ...सब अपनी बनावट में 'नियो-रोमांटिक' थे। साहित्य ही नहीं, राजनीति में भी 'रोमांटिकता' की 'छायाएं' गहरी थीं। वह 'छायावादी' या दूसरी तरह से 'उत्तर-छायावादी' दौर ही था, जिसमें मेरे जैसे 'सर्किट' लेखकों की बचपन की स्मृतियों का निर्माण हुआ होगा।)
२७ मई के बाद जब मैंने अपने घर की दीवाल पर सूर्यास्त के समय, अस्ताचल की ओर जाते नेहरू जी का वाटर कलर चित्र बनाया तो मेरी मां ने कहा था -'तुमने नेहरू जी की पीठ क्यों बनाई? इतना सुंदर उनका चेहरा था, वह तो इस चित्र में छुप गया है।'
१९६४ में ही, ३० दिसंबर को मेरी मां की भी मृत्यु हो गयी थी कैंसर से। यानी २७ मई से लगभग सात महीने बाद। उस दिन उन्होंने यह भी कहा था:' तुम हमेशा दुख वाले चित्र ही क्यों बनाते हो? वैसी ही कविताएं भी? दूसरी तरह की चीज़ें भी बनाया करो।'ओह! मैं क्या लिखने जा रहा था और किन स्मृतियों में चला गया।
तो अब आज की पोस्ट के बारे में।पिछले साल, २००८ में, इसी मौसम में मैं इटली गया था। एक साहित्यिक समारोह में भाग लेने। कभी उसके बारे में लिखुंगा। (इस यात्रा के लिए मैं सुविख्यात लेखिका अर्चना वर्मा और लोकप्रिय लेखक, समाजकर्मी और 'कल्पना' के ब्लागर सुनील दीपक जी का आभारी हूं। क्या आप जानते हैं कि सुनील दीपक 'जन' पत्रिका के संपादक और सुप्रसिद्ध समाजवादी चिंतक स्व. ओमप्रकाश दीपक जी के पुत्र हैं। अपने युवा दिनों में, ए.आइ.एस.एफ़. में होने के बाव्ज़ूद हम लोग 'जन' के नियमित पाठक होते थे और हमारी पीढी पर उन विचारों का बहुत असर भी था।)
खैर, तो उस यात्रा के समय भी आज की ही तरह दिल्ली का तापमान ४६-४७ डिग्री से. था। बिजली की कटौती भी ऐसी ही। १२-१४ घंटे बिना कूलर-पंखे के। लेकिन जब मैं इटली के शहर टूरिन के ऊपर था तो देखा कि वहां के दूर-दूर तक फैले हुए पहाड़ सफ़ेद बर्फ़ से ढंके थे। अपने कैमरे से मैंने उनके चित्र उतारे। एयरपोर्ट पर उतरा तो तूरिन शहर माइनस १५ डिग्री की ठंड में कांप रहा था।
तूरिन उत्तरी इटली में पो नदी के किनारे बसा एक ऐतिहासिक शहर है। एकीकृत इटली की राजधानी रह चुका तूरिन 'आटो-मोबाइल सिटी' के रूप में जाना जाता है। व्यापार और संस्कृति दोनों के लिए प्रसिद्ध। यहां अगर जर्मन दार्शनिक फ़्रेडरिक नीत्शे रह चुके हैं तो यहीं के विलक्षण मार्क्सवादी विचारक और इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य अंतोनियो ग्राम्शी भी थे। इटली की विख्यात फ़ुट्बाल टीम के रोसिनो और पिएरे जैसे कई सुपर स्टार यहीं बसते हैं। मेरे प्रिय लेखक और कथाकार इतालो काल्विनो भी इसी शहर के थे, पिछले साल ही मैंने उनकी एक कहानी 'केक शाप में चोरी' का अनुवाद किया था, जो 'शब्द संगत' में प्रकाशित हुआ और चर्चित भी।और हां....! सबसे रोचक जानकारी तो छूटी ही जा रही थी। मशहूर कार निर्माता कंपनी 'फ़िएट' का शहर भी यही है। यहां से कुछ ही दूर उनका कारखाना है। पता चला, अब 'फ़िएट' के अधिकांश शेयर टाटा ने खरीद लिए हैं।
बहरहाल, मेरी बहुत इच्छा उस घर और दर को देखने की थी, जिसका संबंध एक महान भारतीय महिला से है। तुरिनो या तुरिन, आप जो भी कहें, से बस ५५-६० किलोमीटर दूर, अराबासानो नामक एक छोटे से कस्बे में उस महान भारतीय का घर है, जो आज आम भारतीयों की उम्मीदों और आशाओं की प्रतीक है। कहा जाता है कि जब हम किसी को अपना वोट देते हैं, तो उसे हम संविधान द्वारा प्रदत्त अपनी संप्रभुता और शक्ति सौंपते हैं। है ना कितनी विलक्षण बात यह भारतीयों के बारे में, जिन्हें जाति, धर्म, नस्ल, भाषा के नाम पर बार-बार बांटने की कोशिश की जाती है, लेकिन जब चुनाव का समय आता है तो यहां की जनता इन सारी संकीर्णताओं को ठोकर मार कर अपनी उस विशाल मानवीय हार्दिकता और चेतना का सबूत देती है, जो सियासत के तमाम खिलाड़ियों, दिग्गजों और मीडिया के अटकलबाजों की हर भविष्यवाणी को झूठा साबित करती है।अरबासानो (orbassano) एक छोटा-सा कस्बे जैसा शहर है। १५-२० हज़ार की आबादी। ज़्यादातर यहां कामगार और मध्यवर्ग के साधारण लोग रहते हैं। बहुत से लोग दूसरे विश्वयुद्ध के आसपास बाहर से आये हुए लोग हैं। 'फ़िएट' कार का कारखाना इसी कस्बे के पास है।
बहुत पूछना पड़ा और बहुत खोजना पड़ा। कोई ठीक-ठीक नहीं बता पा रहा था। फिर एक अखबार और मैगज़ीन बेचने वाली लगभग ७५-८० साल की महिला से पता चला। 'ओह! वो..सोनिया अंतोनिया मैनो...? उसे तो मैं तब से जानती हूं जब वह छोटी-सी बच्ची थी।'
उसी बू्ढी़ महिला ने पता बताया और थोड़ा भटकने के बाद हम उस घर के दरवाज़े पर थे। धूसर कत्थई और गहरे सलेटी रंग का वह बिल्कुल साधारण-सा दोमंजिला घर बिल्कुल चुप था। अकेला और उदास। पता चला यहां सिर्फ़ सोनिया गांधी की सबसे छोटी बहन अनुष्का रहती है। लेकिन वे भी अपनी छोटी-सी दूकान में चली जा्ती हैं। किसी ने बताया उस दूकान का नाम 'गणपति' है।
उस घर की साधारणता से मैं चकित था। हमारे यहां अगर कोई विधायक भी बन जाता है, तो देखते-देखते उसकी भव्य कोठी खड़ी हो जाती है। और दूसरी तरफ़ यह मामूली-सा घर ?
इसी घर में वह लड़की रहती थी, जिसने २० साल की उम्र में अपने पिता के विरोध के बावज़ूद एक शर्मीले-से भारतीय लड़के से प्यार किया और फिर वह जीवन भर के लिए उस देश में चली आयी जहां एक के बाद एक त्रासदियां और चुनौतियां उसकी प्रतीक्षा में बैठी थीं।
मैं जब उस घर को देख रहा था तो एक अजब-सी उदासी बारबार घिर आती थी। ....और जब मैंने नेमप्लेट पर जमी धूल को उंगलियों से पोंछा तो सोच रहा था उसी नेहरू परिवार की विरासत को इतनी संलग्नता के साथ, पीड़ाओं और निजी दुखों के एक के बाद एक आघात के बाद, सहेजने वाली इस 'भारतीय' महिला को आखिर 'भारतीय' राजनीति ने दिया क्या है?
मेरे दिमाग में यह सवाल भी था कि क्या वैभव और सत्ता को इतनी बार 'नहीं' कहने वाला कोई दूसरा व्यक्तित्व आज के राजनीतिक परिदृश्य में, देश और दुनिया में है क्या?
उस घर को देख कर मन सचमुच भारी था।
आप सब जानते हैं कि मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं। आपसे भी मेरा अनुरोध है कि इस पोस्ट का कोई राजनीतिक पाठ तैय्यार न करें। २२ मई राजीव गांधी की पुण्यतिथि थी और पांच दिन बाद २७ मई को नेहरू जी की। मेरे पास डीवी कैसेट में ये छवियां बंद थीं। सोचा आज आप सबके साथ शेयर करता हूं।
तो देखिये तूरिन और आरबासानो की कुछ छवियां।......और, सोनिया अंतोनिया मैनो .....नहीं....सोनिया गांधी का घर।



The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled