अभी कुछ ही रोज़ पहले एक दोस्त ने यह क्लिप भेजा था। तब तक वह एक बड़े व्यावसायिक अखबार में एक अच्छे ओहदे पर था। लेकिन वह अपने आपको कभी प्रबंधन का हिस्सा नहीं मानता था। उसके सरोकार दूसरे थे और वह कहता था कि मैं मालिक को अपना हुनर और अपनी मेहनत बेचता हूं, मासिक पगार पर।
आज आपके लिए जब उसका भेजा यह क्लिप लगा रहा हूं, तब तक वह नौकरी के बाहर है। उसे इस्तीफ़ा देना पड़ा है। नियम ही ऐसा है कि इस व्यवस्था में मालिक कभी इस्तीफ़ा नहीं देता। उसकी कोई गलती भी कभी नहीं हुआ करती।
गलतियां और अपराध हमेशा वे करते हैं, जो अपनी मेहनत, ज़िंदगी के अहम उत्पादक साल और अपना हुनर बेचते हैं।
बहरहाल, यह क्लिप देखिए।
यह क्लिप एक किसी आमफ़हम कांस्ट्रक्शन मज़दूर का है। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, बंगलोर कहीं पर कुछ बन रहा होगा ....। कोई होटल, शापिंगमाल, हाउसिंग कालोनी, फ़्लाईओवर, पार्क, शापिंगप्लाज़ा, मेट्रो या रिसार्ट...। यह आदमी किसी हमारे जैसे गांव से आया होगा। इसे दिहाड़ी के पूरे पैसे भी नहीं मिलेंगे। यह कांस्ट्रक्शन साइट के आसपास किसी अनधिकृत जगह पर कुछ दिन गांव से अपने साथ आये परिवार के साथ रहेगा।
इसके बच्चों को कोई शिक्षा नहीं मिलेगी।
इसके पास 'सैनिटेशन' की कोई सुवधा नहीं होगी।
इसकी पत्नी या बहन या बेटी कहीं भी खुली ज़गह में, चलती सड़क के किनारे, हज़ारों आंखों की घृणा और लोलुपता को सहते हुए 'दिशा-फ़राकत' करेंगी।
बच्चे चौराहों पर भीख मांगेगे या अनाप-शनाप चीज़ें बेचेंगे। मोबाइल चार्जर, प्लास्टर आफ़ पेरिस के गणेश, रूमाल, डस्टर, नारियल, सिर हिलाता कुत्ता या कमर हिलाती बार्बी डाल....!
वे भुट्टे बेचते हुए ही नहीं वह अखबार और उसी व्यापारिक समूह की रंगीन पत्रिकाएं बेचते हुए भी मिल जाएंगे, जिनमें नये-नये मंत्रिमंडल के सदस्यों की रंगीन तस्वीरें होंगी। उन अखबारों-पत्रिकाओं में नये रियल्टी-शो के चित्र होंगे। क्रिकेट के नये स्टार्स और उनके रोमांस के किस्से होंगे। वही अखबार या पत्रिका, जिसके मालिक कभी गलती नहीं करते और जो इस्तीफ़ा नहीं देते।
इन लोगों के पास पता कर लीजिए, कोई मतदाता पहचानपत्र नहीं होगा।
नयी टेक्नाला्जी को धन्यवाद कि उनके पास 'दुनिया को मुट्ठी में कर लेने वाले' किसी कार्पोरेट हाउस की बदौलत मोबाइल नंबर तो है, जहां से झारखंड, छत्तीसगढ, मध्याप्रदेश के किसी गांव से उनके पास कोई फोन आ जाता है -'चाचा, कोसी लगता है..इस साल फिर उमड़ेगी !'...या....'अम्मा को भरती करा दिया है। लेकिन...खेत का मेड़ टूट गया है। ...सिन्नी तो दो दिन के बुखार में चल बसी।'
अब इस क्लिप को देखते हुए ज़रा इस ईंट ढोते आदमी की 'मार्फोलाजी' पर गौर कीजिये। क्या वह 'फ़ेयर कलर' का है और इसकी संतानें 'लवली' होंगी? क्या वह किसी एंगल से ऊंची जात और ऊंची नस्ल का लगता है? क्या उसका हुलिया उन १०-१५ प्रतिशत लोगों से मेल खाता है, जो चुनावों में 'पप्पू' नहीं बनते? और जिनके लिए कम दरों पर बैंकें 'हाउस लोन' और 'कार लोन' देती हैं? 'अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष' ने इक्कीसवीं सदी की 'नयी दुनिया' के विकास के लिए 'वाशिंगटन आम सहमति' के तहत जो नयी योजनाएं बनाईं थीं, जिसका पालन सारे विकासशील देशों की सरकारें करती हैं और 'आर्थिक उदारवाद' या 'एकानमिक रिफ़ार्म' की मूल आत्मा जिसमें निवास करती है, क्या उसमें इस 'हुनरमंद मेहनतकश' की ज़िंदगी के बारे में कोई सपना देखा गया है?
क्या इसी आदमी के बच्चे 'स्लम डाग' होते हैं, जो बिना शिक्षा के 'कौन बनेगा करोड़पति' के लकदक शो में क्विज़ का जुआ खेलते हैं और करोड़पति बन जाते हैं, क्योंकि इस अर्थव्यवस्था में अपने इस क्लिप में मौज़ूद बाप के 'हुनर' और 'श्रम' और 'ईमानदारी' का वह हश्र जानते हैं?
क्या इसी ईंट ढोते आदमी के बच्चों को निठारी का कोई आदमखोर अमीर उठा कर ले जाता है, उनसे अपनी हवस मिटाता है और फिर उन्हें 'रोस्ट' या 'ग्रिल' करके, कबाब बना कर खा जाता है? या किसी गुड़गांव हास्पिटल में उनका गुर्दा निकाल कर, 'ग्लोबल' हो चुके 'मार्केट' में, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा (डालर या यूरो) में किसी 'उपभोक्ता' को बेच देता है?
क्या यह एक या दो डालर प्रति दिन से भी कम आय में जीने वाला इस 'शाइनिंग' मुल्क का वह ७०-७२ प्रतिशत मनुष्य नहीं है, जिसकी एफ़.आइ.आर. ज़्यादातर मामलों में कहीं किसी थाने में लिखी नहीं जाती, क्योंकि उसके पास कोई स्थानीय पता नहीं होता और जिसके पास ईंट ढोने, मज़दूरी करने के अलावा कोई 'पावर' नहीं होता?
गौर से देखिये कहीं यही तो वह आदमी नहीं, जिसके कुनबे की किसी औरत को निराला ने, इलाहाबाद के आसपास की किसी सड़क पर देख कर अपनी मशहूर कविता लिखी थी या जिसके बुढ़ापे पर 'पेट-पीठ दोनों मिल कर हैं एक, चल रहा लकुटिया टेक ' जैसी दूसरी प्रसिद्ध कविता लिखी थी, जिसे हम अपने बचपन में प्राइमरी स्कूल की 'बाल भारती' नामक पाठ्य पुस्तक में पढ़ते थे और परीक्षाओं में 'स-संदर्भ व्याख्या' किया करते थे?
क्या यही वह आदमी तो नहीं, जिसे गांधी जी ने 'अंतिम मनुष्य', मार्क्स ने 'सर्वहारा', अंबेडकर ने 'दलित' कहा था और हमारी आज की सभ्यता जिसे 'धारावी या जे.जे. कालोनी का कुत्ता' (स्लम डाग) कहती है और जिसके आह्वान में गाना गाती है -'आजा आजा नीले आसमाने के तले ...आजा ज़री वाले शामियाने के तले?'
धन्यवाद मोबाइल....इन्हें 'नंबर' तो देदिया वर्ना इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनका कोई 'एड्ड्रेस' भी नहीं होता।
कमाल का हुनर है ना ... इस आमफ़हम मज़दूर में?
आज तक के मानव सभ्यताओं के इतिहास में हर सभ्यता की नींव की ईंट यही रखते हैं, जिनमें खुद उनका पता ठिकाना कभी नहीं होता।
और अगर आप सोचें तो ठीक यही बात लगभग भाषा में 'हुनर' और 'मेहनत' करने वाले भाषा के मज़ूर' यानी 'लेखक' पर भी लागू होती है।



The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled