'आवेग'दिनकर कुमार
आवेग ने किसी को बनाया प्रेमी
किसी को क्रांतिकारी,
किसी को हत्यारा,
किसी को शिकारी.
आवेग में ही चुनी गयी गलत राह
लिए गए ग़लत फ़ैसले
बुने गए सपने
रचा गया संशय का अरण्य.
यह आवेग गर्भ से ही संग रहा है
गर्भ से बाहर के जगत में भी
इसी के सम्मोहन में
मुसाफ़िर भूल जाते हैं अपनी राह
इसी के सम्मोहन में
इतनी पीड़ा, इतना हाहाकार !!
(एक और कविता देखिये, इसका अनुवाद भी जल्द आपके सामने होगा.)
लोकतंत्र का धोखा बना रहे
विचारधाराओं के मुखौटे लगाकर
कारोबार करने वाली राजनीतिक पार्टियां
असल में निजी कंपनियां हैं
जो हमें शेयर की तरह उछालती हैं
बेचती हैं खरीदती हैं निपटाती हैं
निजी कंपनियों के जैसे होते हैं मालिक-मालिकिन
वैसे ही इन पार्टियों के भी हैं मालिक-मालिकिन
जो विग्यापनों के सहारे
हमें डराती हैं कि अगर हमने प्रतिद्वंद्वी कंपनी का
दामन थाम लिया तो हम कहीं के नहीं रहेंगे
ये कंपनियां संकटों को प्रायोजित करती हैं
उसी तरह जैसे दंगों को प्रायोजित करती हैं
मुखौटे उतारने पर इन सभी कंपनियों के चेहरे
एक जैसे लगते हैं
एक जैसी ही विचारधारा
एक जैसी ही लिप्सा
एक ही मकसद
कि लोकतंत्र का धोखा बना रहे
लेकिन हम बने रहें युगों-युगों तक गुलाम॥




The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled
12 comments:
दोनो कवितायें दो अलग अलग स्वरों को लिये हुए हैं । आवेग के सम्मोहन को परिभाषित करती पहली कविता निस्सन्देह आवेग के अनेक अर्थ प्रस्तुत करती है । यही आवेग का सम्मोहन दूसरी कविता जिसे हम कमोबेश राजनीतिक कविता कह सकते हैं के भीतर भी अपने नये आयाम में उपस्थित होता है जहाँ राजनीतिक पार्टियाँ इसे एनकैश करती दिखाई देती हैं ।
खरी खरी कहती हुई दिनकर कुमार की यह कविता आपकी सूअर वाली कविताओं की याद दिलाती है ।
आवेग में ही पढ़ गयी कवितायेँ. सचमुच कमाल!
बहुत बेहतरीन प्रस्तुति। धन्यवाद।
'आवेग' का मूल पाठ ! अद्भुत !!! दोनों कविताओं मे अर्थ भिन्नता है ...अलग स्वर हैं पर दोनों जगह
ही 'आवेग' को परिभाषित करने का मकसद सिर्फ आदमी है और आदमी आज की सत्ता व्यवस्था मे किस जगह है यह सोचने का विषय है,इस अराजक हिंसक और बस्तुवादी समय मे आदमी की पहचान क्या है ? हमारे बीत जाने के बाद हम कहाँ खोजेंगे खुद को ?
...बेहतरीन,प्रभावशाली व प्रसंशनीय रचनाएं!!!
नए कवि से परिचय करवाने के लिए आपका आभार।
बेहतरीन कविता...। कोई लफ्फाजी नहीं , सिर्फ कविता।
भाई दिनकर कुमार को बधाई.. और उनसे परिचय कराने के लिए आपका आभार..
विमलेश त्रिपाठी, कोलकाता
आवरण गजब का है और कविताएँ भी
दोनों कविताएं गहरी बात कह रही है। कमाल का लिखा दिनकर जी। बहुत पसंद आया उनका लिखा।
अलग स्वर सम्मोहन के साथ,निसंदेह आवेग की परिभाषा को चरितार्थ करती है।धन्यवाद।
सच मे दोनो कविताये सच को ही बता रही है
khoob kaha dimkar bhai.... kitaab chahiye aap ki...
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