पिछले दिनों, मार्च के महीने में १७ तारीख से लेकर २१ तक अमेरिका के प्रमुख शहर और शिक्षा-संस्कृति केंद्र वर्जीनिया का प्रसिद्ध पुस्तक मेला संपन्न हुआ था. इस अवसर पर वहां दक्षिण एशियाई भाषाओं, हिंदी और उर्दू के अनुवादकों द्वारा अपने अनुवादों के अंश पढ़े गये और अनुवाद के संबंध में आने वाले कुछ मसलों पर बातचीत भी की गई। वहां शिकागो से आये मेरे प्रिय मित्र और अनुवादक जेसन ग्रूनबाम ने अपने अनुवाद 'The Girl With the Golden Parasol' का आंशिक पाठ किया. जेसन को आप सब, जो इस गली में आते रहे हैं, अच्छी तरह से जानते हैं. उन्होंने ही 'पालगोमरा का स्कूटर' का भी अनुवाद किया था और पिछले दिनों उनका किया गया 'दिल्ली की दीवार' का अनुवाद 'Walls of Delhi' भी बहुत सराहा गया हैं, जो कि अकाशिक पब्लिशर्स, न्यूयार्क ने हिर्ष सानी के अपूर्व सम्पादन में प्रकाशित किया था और पिछले दिनों 'हार्पर कालिंस', दिल्ली ने इसका भारतीय संस्करण भी प्रकाशित किया हैं| दिल्ली के १४ लेखकों ने इस कथासंग्रह 'Delhi Noir' में इस शहर के बारे में अलग-अलग कहानियां लिखी हैं। आपके इस लेखक को छोड़ कर बाकी अन्य अंग्रेज़ी के कथाकार हैं।
सन २००० में 'पीली छतरी...' लिखने के बाद से यहां हिंदी-सत्ता-समाज द्वारा उस पर चलाए गए विवादों से संबंधित कुछ क्लिपिंग्स मैं शीघ्र ही प्रस्तुत करूंगा| लेखक का जीवन, अगर वह अपने समय का कोई ऐसा यथार्थ प्रस्तुत कर रहा हैं, जिसे हर संभव छुपाए रहने की कोशिशें अन्यायी, जनद्रोही और भ्रष्ट शक्तियां निरंतर करती हैं, तो उसे संकटों की जिस सुरंग में से गुजरना पड़ता हैं, वह विकट होता हैं| जेसन ग्रूनबाम को जब इस अनुवाद के लिए PEN Grant मिला था, जिसका निर्णय उस जूरी मंडल ने किया था जिसमें चेकोस्लोवाकिया के अद्भुत कथाकार मिलन कुंदेरा की सुप्रसिद्ध अनुवादिका और उनके साहित्य की विदुषी एस्थर एलन भी एक सदस्य थीं और जिसके अध्यक्ष सलमान रश्दी थे, उस समय मैं एक नागरिक और लेखक के रूप में कई तरह के संकटों के बीच घिरा हुआ था। इस जूरी मंडल में पहले सुप्रसिद्ध आलोचक सुसान सोंटाग भी हुआ करती थीं| बहरहाल जेसन मेरे गाँव भी आये, मेरे साथ छत्तीसगढ़ भी गए और फिर बाद में मै उनके घर और विश्वविद्यालय शिकागो गया| आप जानते ही हैं कि पेंगुइन द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास का लोकार्पण शिकागो में ही हुआ था। उस समारोह की स्मृतियां अभी तक हैं। जेसन के साथ बिताये गये दिनो की स्मृतियों के साथ । जेसन अब अपने नए उपन्यास के अलावा 'मैंगोसिल' के अनुवाद पर भी काम कर रहे है|
इसी तरह प्रख्यात और विलक्षण कथाकार मनोहरश्याम जोशी के अनुवादक राबर्ट ए. ह्युक्सटेड (जिन्हें हम सब प्यार से 'बाब' कहते है) भी मेरे बहुत पुराने मित्र और अनुवादक है| उनसे पहला परिचय १९८७-८८ में तब हुआ था जब वे 'तिरिछ' कहानी का अनुवाद करने भारत आये थे| वे हिन्दी, उर्दू और संस्कृत, तीनों भाषाओं के विलक्षण-प्रकांड विद्वान है और वर्जीनिया विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर है. मेरी कहानियों के दो संग्रह 'Rage Revelary and Romance' (सृष्टि पब्लिशर्स, नयी दिल्ली) तथा 'Short Shorts Long Shots' (प्रकाशक कथा, नयी दिल्ली) उनके द्वारा किए गए अनुवाद ही है| इससे पहले प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय कथा-संचयन (Anthology), 'The Pig Iron', जो तीसरी दुनिया के श्रेष्ठ समकालीन साहित्य का चयन और संकलन होता है, में उनके द्वारा अनुदित 'तिरिछ' प्रकाशित हुई थी (१९९०) और उसे बहुत महत्त्व मिला था |
मुझे इसकी बहुत खुशी है कि मनोहरश्याम जोशी के अनुवाद के लिए मैंने बाब को प्रेरित किया और जोशी जी से अपने आवास पर उनकी अविस्मरणीय भेंट कराई| आपको याद होगा 'इंडिया टुडे' में प्रकाशित उन दिनों जोशी जी की 'हरिया हरक्युलिस की हैरानी' को (और कुछ समय बाद 'हमज़ाद' को) लेकर भी लगभग वैसा ही अनर्गल, रचनाविरोधी माहौल बनाया जा रहा था, जैसा पिछले दिनों हिन्दी कथा साहित्य के एक और विलक्षण वरिष्ठ कथाकार कृष्ण बलदेव वैद को लेकर शुरू किया गया था| आज जोशी जी होते तो पेंगुइन द्वारा प्रकाशित अपनी कृति को देख कर बहुत खुश होते|
हमलोग आपस में 'हरिया हरक्युलिस की हैरानी ' को 'ह.ह.है.' कहा करते थे, जिस तरह 'पीली छतरी वाली लड़की' को 'PCWL' कहा करते है|

बाब ने बाण के शैली विज्ञान पर भी एक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी है -'Stylistics of Bana' और वे पतंजलि के सूत्र पर काम कर रहे है| बहुत पहले उन्होंने वरिष्ठ कथाकार-नाटककार मुद्राराक्षस के उपन्यास 'दंड विधान' का भी अनुवाद किया था, जिसे पेंगुइन ने ही प्रकाशित किया था| यह एक मार्मिक संयोग ही है कि जब सफ़दर हाशमी सरदार पटेल स्कूल में अपने अंतिम नाटक 'मोटेराम का सत्याग्रह' का रिहर्सल कर रहे थे तब बाब मेरे साथ वहां गए थे और सफ़दर से मिल कर बहुत खुश थे| वह एक अलग तरह का ईमानदार समय था| तब तक विचारधाराएं बची हुई थीं| कुछ ही दिनों के बाद जब बाब लखनउ में थे, तब उन तक सफ़दर की शहादत की खबर पहुँची| आज वह, उस गहरे शोक का समय अचानक याद आता है|
पिछले दिनों, बाब ने एक बहुत ही विचारोत्तेजक आख्यानात्मक निबंध लिखा था -'Why I want to become a Terrorist?' (मैं आतंकवादी क्यों बनना चाहता हूं) जो हिंदी की समकालीन साहित्यिक पत्रिका 'पक्षधर' (सं: डा. विनोद तिवारी) में खराब हिंदी अनुवाद के साथ प्रकाशित हुई है। यह आख्यानात्मक-निबंध वर्जीनिया वि.वि. में अमेरिकी मां और पाकिस्तानी पिता के एक बेटे, जो वि.वि. में नये सेमेस्टर के लिए अपना विषय चुनना चाहता है, से बातचीत पर आधारित है। इसकी बहुत चर्चा वर्जीनिया में हुई। जेसन की तरह ही बाब (राबर्ट) भी संसार भर के मानवाधिकारों, दबी-कुचली अस्मिताओं और अन्याय की मार झेल रहे लोगों के साथ गहरा सरोकार रखते हैं और समूची निर्भयता के साथ अपनी बात कहते हैं। जेसन की एक कहानी, जो कोसावो के उनके अनुभवों पर आधारित थी, सलमान रश्दी की अध्यक्षता मे बनी जूरी ने अमेरिका का सुप्रतिष्ठित सम्मान 'ओ हेनरी सम्मान ' दिया है। कहने की ज़रूरत नहीं कि बाब और जेसन अमेरिका की उसी महान लोकतांत्रिक परंपरा की संतान हैं, जिसके नोम चोम्स्की, माइकेल अल्बर्ट, हार्वर्ड ज़िन, क्रिस स्पानोस, राबर्ट फ़िस्क, क्रिश्चियन पेरेंटी आदि अन्य कई बौद्धिक-लेखक-पत्रकार हैं। मैं यह कहते हुए थोड़ा-सा भावुक हो रहा हूं कि आप सब पाठकों की तरह ही इन अनुवादकों ने भी, जिन्होंने बिना मेरे कहे, स्वेच्छा से मेरी रचनाओं के इतने सुंदर अनुवाद किये, उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलाई...लेखक के रूप में मेरे आत्मविश्वास को लगातार बनाये रखा, मै हमेशा आपकी ही तरह, उनके प्रति भी लगाव और रागात्मकता अनुभव करता हूं। वे अभी भी मेरे लिए किसी दोस्त या परिजन की तरह चिंतित रहते हैं। मैं उनका कृतग्य हूं...उनसे प्रेम करता हूं।
खैर, यह किस्सा लंबा होता चला जाएगा। आप नीचे चाहें तो 'पीली छतरी वाली लड़की' और 'हरिया हर्क्युलिस की हैरानी' के सा्थ साथ उर्दू के विख्यात आलोचक और रचनाकार शम्सुर्रहमान फ़ार्रुखी की वर्जीनिया पुस्तक मेले में हुई रचना-पाठ की रिकार्डिंग सुन सकते हैं। मैं यह बताना भूल गया कि वर्जीनिया वि.वि. में ही मेहेर फ़ार्रुखी भी प्राध्यापिका हैं और वे भी उर्दू से अंग्रेज़ी की जानी-मानी अनुवादिका हैं। अपने पिता शम्सुर्रहमान फ़ार्रुखी की रचना का अनुवाद और पाठ उन्होंने ने ही किया है।
तो आप इन तीनो रचनाओं के आंशिक पाठ सुनिये और देखिये कि हमारा साहित्य, हमारी भाषा का साहित्य, बिना किसी सताकेंद्रित राजनीतिक बैसाखी या बिना किसी नौकरशाही और सांस्थानिक सहायता के, अनेक मुश्किलों, लांछनों, विवादों की लपटों और दुरभिसधियों के जाल-जंजाल से निकलता हुआ, कहां-कहां तक पहुंचता है और प्राणपन के साथ सच कहने की चेष्टा करता है! ...और इस चेष्टा के पीछे जो शक्ति हैं, वह आप सबके द्वारा दी गयी हैं...|
(एक) 'पीली छतरी वाली लड़की' का अंश :'खाओ..खाओ..खूब खाओ...वूगी..वूगी!' अर्थात 'यह भाषा किसकी जागीर हैं ?' : जेसन ग्रूनबाम
(दो) 'हरिया हर्क्युलिस की हैरानी' : राबर्ट ए. ह्युक्सटेड का रचनापाठ
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(तीन) शम्सुर्रहमान फ़ार्रुखी की रचना का पाठ : मेहेर फ़ार्रुखी
(चार) ....और अंत में - सवाल-जवाब ....मुद्दे और चुनौतियां ...परंपराएं और आधुनिकता...






The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled
6 comments:
आपको बहुत बहुत बधाई सर जी.
सच ही कहा है सर जी, अपनी भाषा के साहित्य की पहुँच और प्रसिद्धि बिना किसी बैसाखी के होना एक सुखद एहसास देता है.
‘पीली छतरी विवाद’ को मैं भूल नहीं सकता। उसी दौरान आपको पत्र लिखा था और आपको निकट से जानने का मौका मिला था। आप चाहें तो इसे मेरी महत्वाकांक्षा समझ लें कि ‘पीली छतरी...’ को दुनिया का बच्चा-बच्चा पढ़े और एक ‘इमेजवादी’ समाज के खतरों को पूरी तरह से जान ले।
कितनी खुशी की बात है !!! अपने देश की सीमा को फलांगते हुये आपकी कलम का लोहा पूरा विश्व मान रहा है ....और फिर क्यों नही मानेगा ! आपने अपने समय के सच को कहने का साहस किया है ..., आपकी तरह ही अप्रतिम लेखक कृष्ण बलदेव बैद जी के साथ भी जो ड्रामा खेला गया वो बेहद शर्मनाक है और हिन्दी -सत्ता -समाज को इसके लिए शर्मिंदा होना चाहिए पर उन्हे शर्म तो आने से रही ...खैर हमारी 'पीली छतरी वाली लड़की' दुनिया की सारी भाषाओं मे अनुवादित हो और उस अनुपम कृति के द्वारा सारी भाषायें समृध हों ऐसा ही सपना मै भी देखती हूँ । हार्दिक बधाई ।
मैंने 'पीली छतरी वाली लड़की' कुरुक्षेत्र युनिवर्सिटी के हास्टल में पढ़ी थी. एक बार नहीं कई-कई बार. फिर तो आपकी किताब पारी-पारी गर्ल्स हास्टल के हर रूम में घूमती रही. मेरी शादी दो साल पहले हुई और पता चला मेरी ससुराल में भी उसके फैन हैं. सबसे बड़े फैन तो नीरज जो मेरे पति हैं।
आपकी भाषा और आपकी शैली सबसे अलग और अनूठी है। बधाई !
आप हिन्दी के सम्मान को विदेशो मे खूब बढा र्हे . इस उपल्ब्धि के लिये बधाई .
राकेश शर्मा
uday g yah dekhkar sukhad anubhooti hoti hai ki calo koi to is desh me hai jo hindi ko antarrastriya astar par pratistha dila raha hai. hindi k mathadeeso ne to iske sath BALATKAAR PE BALATKAAR hi kiye hain aur karte cale ja rahen hain
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