
(तीन)
लुटियन के टीले से कभी नहीं दिखती अरुंधति
वहां अक्सर दिखता है पृथ्वी के निकट आता हुआ
अमंगलकारी रक्ताभ मंगल
या अंतरिक्ष में अपनी कक्षा से भटका कोई
गिरता हुआ टोही खुफि़या उपग्रह
रोहतक या मथुरा से देखो तो सूर्योदय के ठीक पहले
राजधानी के ऊपर हर रोज़ उगता है किसी गुंबद-सा
कोहरे का रहस्यपूर्ण रंगीन छाता
वर्णक्रम के सारे रंगों को किसी डरावनी आशंका में बदलता
संसद या केंद्रीय सचिवालय के आकाश में
नक्षत्र नहीं दिखते आजमा लो
न सात हल-नागर, न शुकवा, न धुरु, न गुरु
वहां तो चंद्रमा भी अपनी गहरी कलंकित झाइयों के साथ
किसी पीलिया के बीमार-सा उगता है महीने में कुछ गिनी-चुनी रात
नत्रजन, गंधक और कार्बन में बमुश्किल किसी तरह अपनी सांस खींचता
कभी-कभी आधीरात टीवी चैनल ज़रूर दिखाते हैं
टूटती उल्काओं की आतिशबाजी
किंग खान और माही के करिश्मों के बाद
दिल्ली से नहीं दिखता आकाश
यहां से नहीं दिखता हमारा गांव-देश, हमारे खाने की थाली,
हमारे कपड़े, हमारी बकरियां और बच्चे
दिल्ली से तो दादरी के खेत और निठारी की तंदूर तक नहीं दिखते
यहां के स्काइस्क्रैपर्स की चोटी पर खड़े होकर
गैलीलियो की दूरबीन से भी
लगभग असंभव है
अरुंधति की मद्धिम लाल
टिमटिमाती रोशनी को देख पाना।
(चार)
नोआखाली के समय मेरा जन्म नहीं हुआ था
मुझे नहीं पता चंपारण में निलहे बंधुआ मज़दूरों को
इंडिगो कंपनियों के गोरे मालिकों और उनके देशी मुसाहिबों ने
किस कैद में रखा
महीने में कितने रोज़ भूखा सुलाया
कितना सताया कितनी यातना दी
उन तारीखों के जो विद्वान आज हवाले देते फिरते हैं मेलों-त्यौहारों नें
उनके चेहरे संदिग्ध हैं
उनकी खुशहाली मशहूरियत और ताकत के तमाम किस्से आम हैं
मैं जब पैदा हुआ उसके पांच साल पहले से
प्राथमिक पाठाशाला में पढ़ाया जाता था कि मुल्क आजा़द है
कि इंसाफ़ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के
कि दे दी हमें आजा़दी बिना खडग बिना ढाल
मैंने रामलीलाओं से बाहर कभी खडग असलियत में नहीं देखे न ढाल
साबरमती आज नक्शे में किस जगह है इसे जानते हुए डर लगता है
रही आजा़दी तो मेरे समय में तो गुआंतानामो है अबुग़रेब है
जालियांवाला बाग नहीं जाफना है
चौरीचौरा नहीं अयोध्या और अमदाबाद है
और यहां से वहां तक फैली हुई तीन तरह की खामोशियां हैं
एक वह जिसके हाथ खून में लथ-पथ हैं
दूसरी वह जिसे अपनी मृत्यु का इंतज़ार है
तीसरी वह जो कुछ सोचते हुए
आकाश के उस नक्षत्र को देख रही है जहां से
कई लाख करोड़ प्रकाश वर्षों को पार करती हुई आ रही है कोई आवाज़
इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि किसी नदी या नक्षत्र
पवन या पहाड़ पेड़ या पखेरू पीर या फ़कीर की
भाषा क्या है ?




The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled
32 comments:
स्तब्ध करने वाली कविताएं! ...समय के सच को इस तरह से दिखने के लिए किसी नक्षत्र की रोशनी ही चाहिए..!
बेहतरीन ....
फर्क पड़ता है. इससे कि मारा जाने वाला डरीं सहमी स्तब्ध आखें किस भाषा में बात करना चाहते हैं
फर्क पड़ता है. इससे कि मारा जाने वाला डरीं सहमी स्तब्ध आखें किस भाषा में बात करना चाहते हैं
दोनो कविताओं में आम जन की पीड़ा है
सर्पदंश है
आक्रोश है
मगर विडंबना यह भी है कि इसे
वे
पढ़-समझ नहीं पाते।
--बेहतरीन कविताएँ पढ़ाने के लिए आभार।
हमें आगे की कड़ियों का इंतजार है।
सचमुच बेहतरीन
इन्हें पढवाने के लिये शुक्रिया
''दिल्ली से नहीं दिखता आकाश
यहां से नहीं दिखता हमारा गांव-देश, हमारे खाने की थाली,
हमारे कपड़े, हमारी बकरियां और बच्चे''
.......... सचमुच वहाँ से कुछ नही दिखता,या फिर देखना ही नही चाहती दिल्ली ?
''और यहां से वहां तक फैली हुई तीन तरह की खामोशियां हैं''........
और उन चीखती हुई खामोशियों मे तैरता है गुजरात ,कराहती है अयोध्या ,या फिर जगह -जगह फैले लालगढों के लाचार आँसू ,.... फर्क पड़ता है !!!!!! बहुत फर्क पड़ता है ...जब आँतें भूख से विलख रही हों ,या कि जिंदा जला दिये जाने के वक्त आस पास गूँज रही हो बेशर्म सी हंसी .... तो फर्क पड़ता है...............
नहीं दिखता. सच मे नही दिखता. देखना चाहने का सवाल ही नही. देखना तो तब चाहेगा कोई, जब थोड़ी भनक हो कि ये चीज़ें भी हैं, होती हैं कहीं.....
पीर या फकीर की भाषा क्या है ? कौन सुनता है ?
बेचैनियों और मुश्किल सवालों से भरी है यह कविता.अपने प्रिय लेखक को पढ़ना और कविता की भाषा में पढ़ना, अलग ही अनुभव देता है.
मेरा आदर स्वीकारें.
ek antaraal bad jab kisi sahi kavi ka likhaa parhaa jataa hai tab lagataa hai shabd bilkul sahi jagah par rakhe huye hai. arth to khair hote hi hai saleeke k saath vahaan. is kathin daur me jab kavita kavitaa se hi bahishkrit ho rahi hai,koi to hai,jo kavita ko uski jagah par sthapit karane ki koshish kar rahaa hai. badhai.
कुछ प्रश्न: .. आप के घर में सुबह काम करने कोई काम वाली आती हैं क्या ? .. हाँ तो आप ने उसके बच्चो की पढाई लिखाई के लिए क्या क्या किया हैं ? .. कितनी बार आप किसी किसान को जा के ये बताये हैं की कैसे उसका जीवन सुधर सकता हैं ( ये नहीं की उसको मारो वो जिम्मेदार हैं .. बल्कि ये की कैसे तुम बेहतर जिन्दगी जी सकते हो बिना किसी का नुकसान किये हुए ) .. अगर ये सब नहीं किया हैं .. तो बेहतर हैं की अपना मुंह और कलम दोनों बंद रखें ..
बेहतरीन कवितायेँ. सोचने पर विवश करने वाली और संवेदनशील.और एक बार फिर, इतिहास और वर्त्तमान की सतत आवाजाही के बीच से निकली रचना. @Prometheus महाशय, आपके प्रश्न का जवाब क्या हम पाठक दे सकते हैं ? लेखक को तो फ़िलहाल अपनी उर्जा लेखन में ही लगाने दीजिये.
आप सबका बहुत बहुत आभार। ऐसी प्रतिक्रियाओं से यह तय है कि आश्वस्ति होती है। कुछ कड़ियां और हैं, उन्हें एक दो दिन में आपके सामने प्रस्तुत करूंगा। हां, आदरणीय उपाध्याय जी(Prometheus) किस बात पर इतना गुस्सा हो गये, समझ में ज़रूर आया। इस वर्ग के लोग अभी तक मानते हैं कि 'समझा' देने से भारतीय किसान अच्छा जीवन जीने लगेंगे। ये लोग न तो मौज़ूदा अर्थनीतियों की विसंगतियों को जानते हैं, न ग्रामीण अर्थव्यवस्था की। १० साल में डेढ़ लाख से अधिक की संख्या में आत्महत्या करने वाले भारतीय किसानों से इन्हें अभी भी 'दूसरों को नुक्सान पहुंचने' का खतरा लगता है। क्या ये कभी सोच सकते हैं कि खतरे में तो (वास्तविकता में) भारतीय किसान और गरीब जनता है, जिसमें बहुत बड़ी संख्या दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, विधर्मियों और असवर्ण जातियों की है। अगर यह समाज आज टूट-फूट और विखंडन के कगार पर ही नहीं आंतरिक युद्ध (गृहयुद्ध) की हालत तक पहुंच चुका है, तो इसके पीछे सत्ताधारी वर्गों और जातियों की यही मानसिकता है। आपने स्वयम देखा कि कितनी आसानी से 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' पर सीधा आक्रमण हो गया। (कलम और मुंह दोनों बंद करने की धमकी।)
वैसे, आपका यह लेखक जिस भाषा में लिखता है, उसमें यह सब इतना जाना समझा है कि अब कोई अंतर नहीं पड़ता। विरक्ति ही होती है।
यह हमारे इतिहास का एक बहुत हिंसक और बुरा दौर है, और ऐसे बुरे दौर में कविताएं ही सच कहने का साहस करती हैं। और लिखी जाती हैं।
आपका शुक्रिया ! बहुत सा !
" इस वर्ग के लोग अभी तक मानते हैं कि 'समझा' देने से भारतीय किसान अच्छा जीवन जीने लगेंगे। ये लोग न तो मौज़ूदा अर्थनीतियों की विसंगतियों को जानते हैं, न ग्रामीण अर्थव्यवस्था की।" नहीं जान पाएंगे वो जिनके बारे में इतनी चिंता आप कर रहे हैं ....और बस exactly यही point हैं मेरा की लुटियन की पहाड़ियों से कुछ देखने के बजाय .. जरुरत हैं/थी तो grass root level पर काम करने की .. आप की ये कवितायेँ .. न तो उस वर्ग तक पहुंचेगी .. न ही उस वर्ग को समझ में आएँगी जिसकी इतनी चिंता हैं आप को ; की आप का दर्द कविता बन कर फूट पड़ा हैं ... ... .. मैंने कम से कम २० मजदूरो/ ऑटो रिक्शा वालो से पुछा .. तुम अरुंधती को .. लुटियन को .. और उदय प्रकाश को जानते हो क्या ? ... जबाब मिला .. ये कौन हैं ... क्या करेंगे जान कर ? .. हमार कौं भला करिहें का? ... तो माननीय प्रकाश जी .. जरुरत कलम और मुंह दोनों बंद रख के .. उनके लिए काम करने की हैं .. किसी एक को सोचने समझने लायक बना दो .. वो दस को बनाएगा ... और मुझें इसीलिए गुस्सा आता आप जैसे लोगो के उस वर्ग से .. जो उनके बारे में सोचता और लिखता तो हैं .. पर रिअलिटी में कुछ करता नहीं हैं .. .. या तो कुछ रियल करो उनके बारे में या pseudo intellectualism छोड कर कलम और मुंह दोनों बंद रखिये ..
आप जो कोई भी हैं मान्यवर !!!(Promtheus) आप ये समझते हैं कि मुंह और कलम को बंद करके किसी भी शोषित को न्याय दिला पायेंगे.....और फिर इशारों की कौन सी भाषा के बूते आप इतना महान काम करने चले हैं ??? उदय प्रकाश के लेखन को चुनौती देकर आप उस समूचे साहित्य को चुनौती दे रहे हैं जो शोषितों वंचितों और हाशिये के मनुष्य की आवाज रही है और जिस साहित्य ने पीड़ित, वंचित को जुबान दी है उसे न्याय की दुनिया तक पहुँचाया है ।
नाम बड़े और दर्शन छोटे !!
अरे प्रोमैथ्युज, तुम "कहां" से आग ला रहे हो जिससे उदय प्रकाश को भष्म कर देना चाहते हो ??
मैंने कई ब्लाग देखे लेकिन उनपर तुम्हारा कमेंट नहीं दिखा !!
विचारधार के बड़े-बड़े ठेकेदार पड़े हैं इंटरनेट पर....तुम वहां नहीं गए......!! तुमने सिर्फ उदय प्रकाश को जला कर राख कर देने का ठेका ले रखा है क्या ?? ऐसा क्यों भला .....??
शर्म की बात तो यह है कि तुम अपना असली नाम भी नहीं दिखा सकते। इतनी शर्मसार हो अपनी पहचान से तो फिर तुम हो ही क्यों ??
तुम मजदूरों और आटोरिक्शा वालों के बीच काफी जनमत सर्वेक्षण करते हो.... है ना..... अरे नामाकुल मैंने भी दस किसानों और खदान मजदूरों से पूछा उनमे कोई मनमोहन,चिदम्बरम या प्रणव को नहीं जानता था !! तुम अपना नाम बता दो तो मैं तुम्हारे बारे में भी पूछ लेता !!
रचनाएँ समय के शर्मनाक दौर की अभिव्यक्ति हैं ।
prometheus जी से,
सिर्फ सडकों पे बहता खून हीं हिंशा का साबुत नहीं होता, जिस्म के अन्दर नशों में खून का सुख जाना हमरे समय की सबसे बड़ी चुनौती है.
आपने नहीं सुना है क्या कई लोग रोज मरे जातें हैं आप जैसे सीधे साधे मजबूर लोगों की मदद करने या उनके साथ सिर्फ पाए जाने पर. इन कविताओं को पढ़कर कर आपकी खून खौलने के बजाय सूखने क्यूँ लग गया.
सुशीला जी और रंगनाथ जी, मैंने तो इन महाशय से पहले भी कहा था कि लेखक को अपनी अशक्त ज़मीं पर क्यूँ न लिखने के लिए अकेला छोड़ दिया जाये. अब तो उदय प्रकाश के हम पाठक भी इतनी हैसियत रखते है कि उनकी कविताओं और कहानियों पर बात कर सकें. ये कोई प्रोमैथ्युज जी हों या उपाध्याय जी हों या कि वर्मा जी, शर्मा जी, वत्स जी या किसी तथाकथित आचार्य के चेले. उदय प्रकाश के लेखन को ख़ैर ये क्या चुनौती देंगे...लेकिन चिंता इस बात कि है कि आखिर हमारे इस लेखक के लेखन पर बात न करके 'ये लोग' हमला करने और धमकी देने पर क्यूँ उतारू हो जाते हैं. ये एक वाजिब चिंता है जिसपर एक गंभीर चर्चा होनी चाहिए.
संजीव जी ! बिल्कुल चर्चा होनी चाहिए....लेखन पर बात न करके बिल्कुल ओछे और असभ्य तरीके से कमेंट करके 'ये लोग' अपने को क्या साबित करना चाहते हैं !!!
Marmsparshi rachna....
Bahatreen prastuti ke liye aabhar...
thank you .. for blocking the comment .. and proving me right .. .. at least between you and me .. the truth will be better known .. salut.. :)
@ Prometheus (उपाध्याय जी)..आपकी कोई पोस्ट ब्लाक नहीं की गयी है। कृपया असत्य का आसरा न लें।
समूची विनम्रता से आपसे निवेदन है कि आप दरअसल एक ऐसी सत्तावान-अहंकारी मानसिकता के शिकार हैं (इसके पीछे पुष्ट प्रमाण हैं) कि आप सत्यजित राय के'पाथेर पांचाली', प्रेमचंद के'गोदान' और 'कफ़न' को (इसमें असंख्य रचनाओं, फिल्मों को जोड़ लीजिये) इसलिए प्रतिबंधित कर सकते हैं कि इन रचनाओं-कृतियों से अकाल और वंचना खत्म नहीं होती। (कितना इंपिरिसिस्ट है आपका आतंकवादी विचार?)
आप मंटो को कहानियां लिखने से डरा कर रोक सकते हैं कि इससे सांप्रदायिकता खत्म नहीं होती। आपके तर्क कोई तर्क ही नहीं हैं। क्या आप इस सब पर कुछ समय बाद विचार करेंगे? कुछ और पढ़-लिख कर?
और सुशीला जी, सुनीति जी, रंगनाथ जी, संजीव जी, अजित जी...और आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद ! आप सब मेरे लिए बहुमूल्य हैं। शुभकामनाएं !
तीसरी वह जो कुछ सोचते हुए
आकाश के उस नक्षत्र को देख रही है जहां से
कई लाख करोड़ प्रकाश वर्षों को पार करती हुई आ रही है कोई आवाज़ !!!
यह आवाज आपकी है उदय प्रकाश जी ! हिंदी साहित्य आपका ऋणी है !आपकी कविताये गहरी सम्वेदना से लिखी हुई होती हैं !जीवन दास की कथा लिखने वाला उपन्यासकार ! साधारण नहीं है ! सुनो कारीगर में आपकी कविताएँ असाधारन हैं ! यह हम लोंगों का सौभाग्य और आपकी असीम विनम्रता है, कि आप हमारे बीच हैं !
This was the one .. which I am talking about ....
whoa!! .. @सुशीला ... , एक प्रश्न का उत्तर दे ..कृपया ....., माना की .. मैंने एक कविता लिखी ... राम भरोसे की झोपडी पर .. और वो कैसे टपकती हैं बरसात में .... और कैसे उसकी झोपडी में पानी घुस आता हैं सीवर का .. आम दिनों में .... और वो कविता छाप दी गयी .. (छप ही जाएगी )... या इन्टरनेट पर अपलोड कर दिया ....., अब क्या राम भरोसे की झोपडी आने वाले मानसून में टपकना बंद हो जाएगी ??!!!! ...उम्मींद करता हूँ की आप जबाब जरूर देंगी इस प्रश्न का ....
@रंगनाथ...... , आग नहीं लानी हैं मुझें किसी की रचना जलाने के लिए ..मेरा कोई interest नहीं हैं उसको जलाने में .. जलने.. जलाने .. मरने मारने की बात आप कर रहे हैं मैं नहीं ... ..... .. मैं अचानक से उदय प्रकाश से साईट पर पहुँच गया .. "by just clicking here and there ... which is called random browsing .. " और कुछ पढने लगा ... और seriously लगा की कहीं कुछ गलत हैं : .. सिर्फ लिख भर देने से काम नहीं चलेगा .. और वो भी तब जब रचनाकार का व्यक्तित्व .. ऐसी रचना को justify नहीं करता हो ..., स्वाभाविक हैं की एक हताशा के साथ साथ गुस्सा भी आएगा की .. यार ये लोग कुछ करते तो हैं नहीं .. सिर्फ कहानी कविता लिखने को बोल दो .. तो अमेरिका इराक लाल सलाम नीला सलाम .. अरुंधती, लुटियन .. सरकार .. सबकी ले लेंगे .... , अब इन सबमें राम भरोसे की झोपडी तो अभी भी टपक रही हैं .... : .. उसका वास्तव में हुआ क्या ? ... तो रंगनाथ जी .. करना क्या था ... कविता लिखनी थी ? या ... मुंह बंद कर-के और कलम रख के .. AC रूम से निकल के ... राम भरोसे को जा के बताना था/ या उसके लिए ऐसा कुछ करना था की .. कैसे उसकी झोपडी इस बरसात में टपकेगी नहीं ?? ...... उम्मींद करता हूँ आप भी जबाब जरुर देंगे इस प्रश्न का .....,
@ संजीव ... लेखन पर ही बात कर रहे हैं .... धमकी नहीं दे रहे हैं .... अब मेरी सीधी से बात नहीं समझ में आ रही हैं ...की भैया .. "कहानी लिखने से उनका कल्याण नहीं होने वाला हैं जिसके बारे में आप कहानी लिख रहे हो ".... तो समस्या आप की हैं ... by the way .. उदय प्रकाश से मैंने पहली पोस्टिंग में बस दो प्रश्न पूछे थे ..... जबाब नहीं मिला .. हाँ सीधी सी बात .. की जिनकी बात कर रहे हो .. उनका कुछ कर नहीं सकते तो उनके बारे में मुंह और कलम दोनों चलातें रहना उनके साथ जो कुछ भी हो .. न्याय तो नहीं ही हो सकता ... को धमकी की तरह जरुर ले लिया गया ....
and that's what is disgusting .
''बीए किया, नौकर हुए, पेंसन मिली और मर गए''
श्रीमान आपके लिए मै उदय जी की ही एक कविता लिख रही हूँ ---------
उस दिन पांडेजी
बुलबुल हो गये थे ।
कलफ़ लगाकर कुर्ता टाँगा
कोसे का असली ,शुद्ध कीड़ोंवाला चांपे का,
धोती नई सफ़ेद ,झक्क बगुला जैसी ।
और ठुनकती चल पड़ी
छोटी-सी उनकी काया ।
छोट-सी काया पांडेजी की
छोटी-छोटी इच्छाएं ,
छोटे-छोटे क्रोध
और छोटा-दिमाग ।
गोष्ठी मे दिया भाषण,कहा-
'नागार्जुन हिन्दी का जनकवि है'
फिर हँसे कि 'मैंने देखो
कितनी गोपनीय
चीज़ को खोल दिया यों ।
यह तीखी मेघा और
वैज्ञानिक आलोचना का कमाल है ।
एक स-गोत्र शिष्य ने कहा-
'भाषण लाजवाब था ,अत्यंत धीर-गंभीर
तथ्यपरक और विश्लेषणात्मक
हिन्दी आलोचना के खच्चर
अस्तबल मे
आप ही हैं एक मात्र
काबुली बछेड़े ।
तो गोल हुये पांडेजी
मंदिर के ढोल जैसे ।
ठुनक-ठुनक हँसे
फिर बुलबुल हो गये
फूलकर मगन !
महाशय आपने प्रोमैथ्युज छद्म नाम धरा है तो इतने नासमझ भी तो नहीं होंगे !
या तो आपकी संवेदना कुंठित और समझ कुंद हो चुकी है या फिर आप के सिर पर बचपना और जबान पर शरारत सवार है। आपके लिखे से तो लगता नहीं लेकिन मान लेता हूँ कि आपकी नीयत नकारात्मक नहीं है। अतः आपको एक संक्षेप में जवाब देता हूँ समझिएगा।
उदय प्रकाश अगर जिंदगी भर झोपड़ा छाते रहे तो भी वो दस-बीस हजार झोपडों से ज्यादा झोपड़े न छा सकेंगे। लेकिन उदय प्रकाश का जिस स्तर का लेखन है( यदि कहना ही हो तो मैं कहुँगा कि उदय आधुनिक कथा साहित्य के सूर्य हैं) उसका प्रभाव लाखों लोगों पर जाहिर है। उदय प्रकाश झोपड़े छाते रहे तो भी एक ही जीवन में यह काम कर पाएंगे। लेकिन उनके अमर लेखन का प्रभाव हिन्दी की सभी नस्लों पर रहेगा। इसे कोई नामवर या प्रबंधक आलोचक भी नहीं झुठला सकता।
उदय का साहित्य(क्या आपने पढ़ा है?) पाठकों को प्रेरित करता है टपकते हुए झोपड़े के भीतर रहने वालों को पीड़ा समझने के लिए,मोहनदास की विवशता समझने के लिए, एक बेहतर इंसान बनने के लिए। एक उदय प्रकाश अपने प्रभावशाली और प्रेरक लेखक ने लाखों-लाख ऐसे लोग पैदा करते हैं जो झोपड़े छाए।
लगता तो नहीं कि आप होलटाइमर या सोशल वर्कर हैं फिर भी आपको बता दूँ कि चे ग्वेरा के पास अंतिम समय में जो एक किताब थी वो पाब्लो नेरूदा का कविता संग्रह था। मुझे लगता है कि यह एक उदाहरण काफी है। विश्व के महान क्रांतिकारियों के साहित्य प्रेम पर आपको random surfing से काफी सामाग्री मिल जाएगी। कभी उधर भी नजर डालिएगा।
एक उदय प्रकाश होने के मायने को वास्वतिक अर्थों में देखना हो तो आपको याद दिलाऊँगा जो बे्रख्ट ने अपने समाधि लेख के लिए लिखा था कि उसने सलाह दी और हमने अमल किया। जिस दिन आप ऐसा कह सकें कि उसने (उदय प्रकाश) सलाह दी और हमने अमल किया उस दिन दुनिया में कोई झोपड़ा नहीं टपकता रहेगा !!
नकली प्रोमैथ्युज जी मुझे यह भी नहीं समझ आता कि आप जो सलाह उदय प्रकाश को दे रहे हैं उसे खुद क्यों नहीं अपनाते ?? आप तो हिन्दी के कालजयी लेखक को कलम और जबान बंद रखने की धमकी दे रहे हैं.... आप खुद ऐसा क्यों नहीं करते.... यहाँ प्रवाद करने के बजाय किसी का टपकता हुआ झोपड़ा छाते।
उदय प्रकाश जो रच रहे हैं उससे हिन्दी की पीढ़ियाँ दर पीढ़ियाँ लाभान्वित होंगी। लेकिन आप जो कर रहे हैं उससे किसी को क्या लाभ होने जा रहा है ??
मुझे पता है कि उदय प्रकाश के संग आपके दुर्व्यवहार से बहुत से लोग प्रसन्न होंगे आपको उसका फल भी मिलेगा लेकिन कुछ तो मानवीयता बचा रखिए !
और आप में सचमुच साहस है, आपकी नीयत साफ है तो अपना असली पहचान जाहिर कीजिए जिससे यह स्पष्ट हो सके कि आपकी उदय जी से कोई निजी रंजिश नहीं है।
इस बहस को कृपया बंद किया जाय। इसका कोई अर्थ नहीं है।
सुशीला जी, जो कविता आपने उद्धृत की है, वह मेरे पहले संग्रह 'सुनो कारीगर' में से है। इसे १९७६ में मैंने तब लिखा था, जब मैं २४ वर्ष का था। जे.एन.यू. का छात्र था। यह दरअसल हिंदी आलोचना पर एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी भर थी। कोई निजी आग्रह-दुराग्रह नहीं था। वरिष्ठ कवि विष्णुचंद्र शर्मा और त्रिलोचन जी समेत कई अन्य कवियों को पसंद भी थी। लेकिन छात्रों के बीच यह लोकप्रिय इतनी हो गयी कि इसकी बहुत बड़ी कीमत मुझे दूसरे रूप में चुकानी पड़ी। इस कविता की जातिवादी व्याख्या जान बूझ कर की गयी और मेरा जीवन हिंदी-साहित्य और अकादेमिक जगत में हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया। अगर आपको याद हो तो अपने 'आत्म तर्पण' में मैंने हंगरी के महान कवि अत्तिला जोज़ेफ़ का जिक्र अपने बचपन के संदर्भ में किया है। अत्तिला जोज़ेफ़ ने विश्व विद्यालय के छात्र जीवन में एक ऐसी ही कविता लिखी थी। शीर्षक था -'शुद्ध पारदर्शी हृदय'। इस कविता ने अत्तिला के जीवन को तहस-नहस कर डाला। उसको कभी अध्यापक की ही नहीं, कोई और भी नौकरी नहीं मिलने दी गयी। विश्व विद्यालय के एक प्रोफ़ेसर अंताल होर्गर उसके पीछे पड़ गये। अत्तिला का कैरियर खत्म किया गया। हाकर बन कर, सफ़ाई कर्मचारी का काम करते हुए उसे अपनी आजीविका चलानी पड़ी। उसने गहरी पीड़ा के साथ लिखा था -'मेरा कोई नहीं है, न मां, न पिता, न कोई ईश्वर, न कोई देश। कोई संबल और छांह भी नहीं। मैंने पिछले तीन दिनों से कुछ खाया नहीं है, न कम, न ज़्यादा। मैं अब अपनी ज़िंदगी के २० साल बेचना चाहता हूं। अगर कोई नहीं खरीदेगा तो शैतान इसे ले जायेगा।''
अत्तिला से इस तरह का प्रतिशोध उस वक्त के संकीर्ण रचनाविरो्धी ताकतवरों ने लिया कि उसे ३२ साल की उम्र में रेल की पटरी से कट कर आत्महत्या करनी पड़ी। आज कोई उस प्रोफ़ेसर अंताल होर्गर का नाम सम्मान से नहीं लेता, जब कि अत्तिला जोज़ेफ़ हंगरी का महान राष्ट्र्कवि माना जाता है। (आप यह न सोचें कि मैं स्वयम को अत्तिला जैसा 'महान' सिद्ध करना चाहता हूं, लेकिन यह सच है कि जातिद्वेष के इतने रूपों का सामना करना पड़ा कि उसने मेरी चेतना को नये रूप में ढाला। मेरे सारे निकट के मित्र और साथी इसे अच्छी तरह से जानते हैं, जिनमें बहुत बड़ी संख्या में सवर्ण भी हैं।
फिर भी हिंदी भाषा में जातिवाद की प्रच्छन्न शक्ति-संरचनाएं इतनी अधिक सक्रिय हैं कि इसमें किसी आधुनिक और जातिवाद विरोधी लेखक-कवि का सम्मानित रह पाना या सामान्य तरीके से जीवित रह पाना लगभग असंभव जैसा है। जातिवाद विचारधाराओं को अतिक्रमित करते हुए अपनी अलग धुरी बनाता है और कई तरह के राजनीतिक-सांस्कृतिक मुखौटों में खुद को छुपाता है। यह एक ऐसा सच है, जिसे हिंदी का हर जागरूक लेखक जानता है, लेकिन अपने हितों-स्वार्थों को ध्यान में रख कर चुप रहता है या छिपाता है। हम सब जानते हैं कि हिंदू धर्म और हिंदी भाषा वास्तविकता में ब्राह्मणवाद के उपनिवेशित इलाके हैं। इसमें मेरे जैसे लेखक की उपस्थिति और सक्रियता के जोखिम और खतरों का अंदाज़ा कोई भी आसानी से लगा सकता है।
ये कविताएं (अरुंधति शृंखला) मूलत: कविता ही नहीं, आज के सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक परिसंदर्भों में भी गहरा हस्तक्षेप करती हैं और आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों के हिंसक दमन के पीछे मौज़ूद हिंदुस्तानी समाज की केंद्रीय धुरी को काव्यात्मक वेदना के साथ उदघाटित करती हैं, इसीलिए इसे इस तरह के विरोध का सामना करना पड़ता है। यह कविता महज कार्पोरेट आक्रमण ही नहीं, उसके पीछे छुपी सांप्रदायिक, जातिवादी/ नस्लवादी संघटकों को भी उजागर करती है। आप मेरी कविता 'एक भाषा हुआ करती है' या 'विरजित खान' देखिये। इन कविताओं को समकालीन कविता की मुख्यधारा में आने से रोकने के पीछे कोई काव्यात्मक, सौंदर्यशास्त्रीय या विचा्रधारात्मक आधार नहीं हैं। या 'पीली छतरी वाली लड़की' जो अपने किसी भी एकार्थी पाठ को संभव होने की इअनुमति नहीं देती। नयी पी्ढ़ी के कवि और कहानीकार, जो भीतर से आधुनिक हो रहे हैं और पिछले कुछ वर्षों में अन्य संस्कृतियों-सभ्यताओं के साथ जिनकी चेतना प्रतिकृत हुई है, वे पूर्व-आधुनिक जातिवादी ग्रंथियों से मुक्त हो रहे हैं और बड़ी संख्या में मेरी रचनाओं के पास आ रहे हैं।
अभी इतना ही। (मैंने Prometheus महोदय के अभी-अभी भेजे गये एक उस जैसे ही पोस्ट को 'माडरेट' किया है। इसका मुझे खेद है। बात अरुंधति कविता शृंखला पर होनी चाहिये थी। और वह होगी। ब्लाग की हदों के बाहर।
आप सबका पुन: आभार। शुक्रिया ।
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