(पांच)
वहां एक पहाड़ी नदी चुपचाप रेंगती हुई पानी बना रही थी
पानी चुपचाप बहता हुआ बहुत तरह के जीवन बना रहा था
तोते पेड़ों में हरा रंग भर रहे थे
हरा आंख की रोशनी बनता हुआ दसों दिशाओं में दृश्य बनाता जा रहा था
पत्तियां धूप को थोड़ी-सी छांह में बदल कर अपने बच्चे को सुलाती
किसी मां की हथेलियां बन रहे थे
कुछ झींगुर सप्तक के बाद के आठवे-नौवें-दसवें सुरों की खोज के बाद
रेत और मिट्टी की सतह और सरई और सागवन की काठ और पत्तियों पर उन्हें
चींटियों और दीमकों की मदद से
भविष्य के किसी गायक के लिए लिपिबद्ध कर रहे थे
पेड़ों की सांस से जन्म लेती हुई हवा नींद, तितलियां, ओस और स्वप्न बनाने के बाद
घास बना रही थी
घास पंगडंडियां और बांस बना रहे थे
बांस उंगलियों के साथ टोकरियां, छप्पर और चटाइयां बुन रही थी
टोकरियां हाट, छप्पर परिवार और चटाइयां कुटुंब बनाती जा रहीं थीं
ठीक इन्हीं पलों में आकाश के सुदूर उत्तर-पूरब से अरुंधति की टिमटिमाती मद्धिम अकेली रोशनी
राजधानी में किसी निर्वासित कवि को अंतरिक्ष के परदे पर कविता लिखते देख रही थी
उसी राजधानी में जहां कंपनियां मुनाफे, अखबार झूठ, बैंकें सूद, लुटेरे अंधेरा
और तमाम चैनल अफीम और विज्ञापन बना रहे थे
जहां सरकार लगातार बंदूकें बना रही थी
यह वह पल था जब संसार की सभी अनगिन शताब्दियों के मुहानों पर
किसी पहाड़ की तलहटी पर बैठे सारे प्राचीन गड़रिये
पृथ्वी और भेड़ों के लिए विलुप्त भाषाओं में प्रार्थनाएं कर रहे थे
और अरुंधति किसी कठफोड़वा की मदद से उन्हें यहां-वहां बिखरे
पत्थरों पर अज्ञात कूट लिपि में लिख रही थी
लोकतंत्र के बाहर छूट गए उस जंगल में
यहां-वहां बिखरे तमाम पत्थर बुद्ध के असंख्य सिर बना रहे थे
जिनमें से कुछ में कभी-कभी आश्चर्य और उम्मीद बनाती हुई
अपने आप दाढ़ियां और मुस्कानें आ जाती थीं।
(अभी मैंने ऊपर का चित्र बदला हैं| यह सं जीवे की अद्भुत छाया-कृति हैं। डिजिटल | सुप्रसिद्ध वृत्त फ़िल्मकार माइक पांडे ने इसे 'फ़ेस बुक' में पोस्ट किया था। इसका शीर्षक हैं 'डेथ आफ ट्री'| उम्मीद हैं आपको भी पसंद आयेगी |)




The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled
21 comments:
अद्भुत ! चिरन्तन जारी रहे !
कविता-रानी से निवेदन है की आपकी अनियतकालिकता बनी रहे ..
बात के कहने के अंदाज में ही आप कविता सृजित कर देते हैं ..
मनुष्येतर द्वारा लिखित लिपियाँ भी मेरे लिए सौन्दर्य का हेतु
बनती है;कविता बनती है ..
पत्थरों से बुद्ध के सर बन रहे हैं , मुस्काने और दाढ़ियाँ भी आ रही हैं , यानी
चैतन्यता अमूर्त को मूर्त करने की चाह में है , पर क्या होता है ? शेष है !
अनियतकालिकता के छठे अंक की प्रतीक्षा है !
सुन्दर कविता , आभार !
''उसी राजधानी में जहां कंपनियां मुनाफे, अखबार झूठ, बैंकें सूद, लुटेरे अंधेरा और तमाम चैनल अफीम और विज्ञापन बना रहे थे''........
उदय जी ! आप से ज्यादा वक्त के बारे मे कौन जान सकता!!! ....जो है तो पर मुकम्मल अभाव की तरह ....,जबकि कुछ लोग उसे रौंद रहे हैं ....किन्तु वह वक्त जो आज कुछ सिरफिरों का सहचर है ,एक दिन वह लौटेगा और तब वह कवि जिसकी एक भाषा हुआ करती है ....रचते हुये एक नया सूरज एक नया चाँद, बनाएगा एक नई दुनिया ....जहाँ हर पत्थर से बुद्ध मुस्कराएगा ,और तब अरुंधति सिर्फ देखेगी नही ,वहाँ से खिलखिलाएगी और धरती पर आने के लिये मचलेगी ।
''यह वह पल था जब संसार की सभी अनगिन शताब्दियों के मुहानों पर
किसी पहाड़ की तलहटी पर बैठे सारे प्राचीन गड़रिये
पृथ्वी और भेड़ों के लिए विलुप्त भाषाओं में प्रार्थनाएं कर रहे थे...''
उदय जी, क्या उन प्राचीन गड़रियों के यही नाम हैं (१.) कृष्ण, जिन्हें गोपाल, यदुनाथ और गिरिधारी भी कहा जाता है (२) जीसस, जिन्हें क्राइस्ट, इमेनुएल और 'मुक्ति का सेनापति' भी कहा जाता है और (३) हज़रत मोहम्मद जिन्हें नबी, रसूल, नूर, हाफ़िज़ और आदिल भी कहा जाता है ? अद्भुत कविता ....! आगे की कड़ियों के लिए आपने कड़ी शर्त लगा दी है..! खैर !
किसी बड़े लेखक की चेतना का विस्तार दिखाना हो तो आपकी यह कविता सटीक उदाहरण बन सकती है।
समय की सच्चाइयों के अपहरण को अभिव्यक्त करने का यही सशक्त तरीका है , अनियतकालीनता , अ योजित , ऐसी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए जहां भाषा लगभग गूंगी अनुभव करती है । फिर भी यहां वह स्वयं की सीमाओं का अतिक्रमण कर सम्प्रेषित हो रही है , इसी समय में, लोगों तक, और पिघला देती है उनके मन में जमें हुए किसी पदार्थ को ।
हां, हम भी यही महसूस करते हैं बिना जाने हुए ।
पूरी कविता के साथ ही यह
लोकतंत्र के बाहर छूट गए उस जंगल में
यहां-वहां बिखरे तमाम पत्थर बुद्ध के असंख्य सिर बना रहे थे
जिनमें से कुछ में कभी-कभी आश्चर्य और उम्मीद बनाती हुई
अपने आप दाढ़ियां और मुस्कानें आ जाती थीं।
शुक्रिया ।
नींद,तितलियाँ, ओस, स्वप्न और फिर घास को रूप देने में हवा को भी वक़्त लगा होगा. शीघ्रता की बेचैनी प्रोडक्ट दे सकती है, सृजन नहीं, मौलिक नहीं. जीवन नहीं.
कविता नहीं.
ये ईमानदार और करुण प्रार्थना की पंक्तियाँ हैं. जो इस वक़्त में कम ही सुनाई पड़ती हैं, या कि बिलकुल नहीं, आपके शब्दों में समाई पीड़ा और चिंता उन सब के लिए है जो पता नहीं कब सिर विहीन कर दी जायेंगे.
आदर!
आभार. चलिये 'प्रोडक्ट' ही मान लें. पूर्व-सर्ग 'शुरूआती ड्राफ्ट' शब्द पर विचार करते हुए. लेकिन 'चटाइयों को कुटुंब' बनाने में कम समय लगा होगा क्या?
वैसे किसी 'मुकम्मल कविता ' की तलाश हर ईमानदार कवि को रहती होगी ! ..लेकिन ....क्या हुआ करती हैं सचमुच कहीं कोई ऐसी मुकम्मल रचना ? ...और कोई ऐसा मुकम्मल कवि?
अगले ड्राफ्ट्स में भी आपकी प्रतिकृयाओं की प्रतीक्षा रहेगी...
यह एक बहुत सुन्दर कविता है .आप कविताओन का चयन समयानुकूल कर्ते है. बधाई .
उदयजी आपकी कवितायेँ 'प्रोडक्ट' नहीं होती हैं, उनमें आदमी के आदमी और इस दुनिया के दुनिया के रूप में बचे रहने की मुसलसल तलाश होती है. इस पूर्व सर्ग के प्रति भी मेरी यही समझ है.
udayprakash saheb,i hope your poetic genius will make ,in this poems'later draft, the content ideas more complex without loosing simplicity of narrative.
apologies for using English. regards,
Alok Bajpai
सुन्दर बहुत सुन्दर रचना
आपकी कविता को पढना समझना अपने आप को गौरवान्वित करना होता है ! आप निपट ईमानदारी के धूसर रंगों के साथ सम्वेदना को बचा ले जाते हैं ! व्यंग्य का ताना बाना ऐसे चलता है मानो हवाई सर्वेक्षण हो रहा हो !आभार !
अनियतकालिकता के साथ ही हम आपकी हर रचना की प्रतीक्षा करते हैं ....हिन्दी हो या कोई अन्य भाषा,आपने अपने समय के तीखे सच को लिखा है और यहाँ आपकी चिंताएँ भाषाओं के अनगिनत पहाड़ों को लांघकर तमाम अज्ञात कूट लिपि मे हमारे चिंतन की अगुआई करती हैं और करेंगी ।
very nice
बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 08.05.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/
तोते पेड़ों में हरा रंग भर रहे थे
हरा आंख की रोशनी बनता हुआ दसों दिशाओं में दृश्य बनाता जा रहा था
काश तोते पेडो में हरा रंग भरते ही रहें।
इस पांचवीं कविता में, लगा कि आपने ख़ुदको खुला छोड़ दिया है, बह गए हैं। आनंद था। कि बीच में अख़बार, बैंक, सूद, लुटेरे, अफ़ीम और विज्ञापन आ गए। ख़लल पड़ा। लो, अरुंधति आ गयीं। बुद्ध के सिर आए, दाढ़ियां और मुस्काने आ गयीं। मैं फिर बह चला।
हर बार और-और कायल करते हो हे कवि....तुमको अशेष प्रणाम
ईमानदारी और निष्ठा के साथ लिखी जाने वाली बेहतरीन कविताओं के क्रम में आपकी ये रचनाएँ उपस्थित रहेंगी. ढेरों शुभकामनाएं.
अगर मैं 'आभार' कहूंगा...या और भी कुछ तो वह मेरी खुशी और आपके प्रति मेरी भावनाओं-कृतग्यताओं को व्यक्त नहीं कर पाएगा। बस आप सब मेरे साथ बने रहे....आपके शब्द साथी रहें!
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