Friday, May 14, 2010

एक और बाघ

अभी अभी युवा कवि फ़रीद खान की यह कविता 'एक और बाघ' पढी़। बहुत देर तक और अभी तक यह कविता ज्यों की त्यों अपने पूरे अस्तित्व के साथ मेरे मस्तिष्क में है। पिछले साल मार्च में आगरा में हुए SAARC देशों के लेखक सम्मेलन में एक अमेरिका में रह रहे भारतीय अंग्रेज़ी कवि ने एक कविता सुनाई थी :'वे लोग जो बाघ को बचाने का दावा कर रहे हैं/ वे लोग झूठ बोलते हैं/ क्योंकि वे घास के बारे में चुप हैं...''
 फ़रीद की इस कविता के अभागे बाघ के स्वप्न में भी घास है। अपनी हत्या के ठीक पहले।


'बाघ' कवियों के लिए एक बहुत प्रिय विषय रहा है। होर्खे लुइस बोर्खेज़ की प्रसिद्ध कविता 'बंगाल टाइगर' के बिंब कभी विस्मृत नही होते। 'रेत की किताब' (दि बुक आफ़ सैंड) संग्रह में वह लंबी कविता बार-बार अपनी ओर खींचती रहती है। कुछ साल पहले अपने उपन्यास 'लाइफ़ आफ़ पई' (या पी) के लिए बुकर पाने वाले यान मार्टेल के उस उपन्यास में भी समुद्र में भटकते 'लाइफ़ बोट' में भी लगातार सोते हुए बंगाल टाइगर (सुंदर वन का बाघ) के जाग जाने का भय लेकिन साथ ही उसकी भव्य, गरिमापूर्ण उपस्थिति उस कथा का एक अपूर्व वातावरण बनाती है। केदारनाथ सिंह की बहुचर्चित कविता 'बाघ' पर तो मैंने लिखा भी था। वह कविता भी हिंदी की महत्वपूर्ण कविताओं में से एक है। फ़रीद की कविता की तरह ही केदारनाथ सिंह की कविता में भी कई तरह के आख्यानात्मक काव्य-रूपक है। बाघ गुर्राया और आश्रम के सारे शिष्य भाग गये लेकिन पाणिनि ने बाघ को उसकी भाषा में अशुद्धि के लिए डांटना शुरू किया, और बाघ इसीलिए उन्हें खा गया।


लेकिन फ़रीद की कविता बिल्कुल आज के समय और संदर्भ में अपनी अर्थव्यापकता में बहुत दूर तक जाती है।


अभी-अभी कुछ ही देर पहले, इस कविता पर मेरे प्रिय लेखक और अपने लेखन के लिए दुनिया भर में विख्यात अमितावा कुमार की भी टिप्पणी आयी है। उनका कहना है कि फ़रीद की इस कविता को छत्तीसगढ़ के जंगलों के पेड़ों पर टांग देना चाहिए। जिससे लोग समझ सकें अपने समय की सच्चाइयां..कि उन्हें भी अब संग्रहालय या चिड़ियाघरों में रखने की परियोजना ज़ोरों से चल रही है!


आप भी यह कविता पढ़ें !






एक और बाघ


फ़रीद खान


गीली मिट्टी पर पंजे के निशान देख कर लोग डर गये। 
जैसे डरा था कभी अमेरिका ‘चे’ के निशान से।
लोग समझ गये,
यहाँ से बाघ गुज़रा है।

शिकारियों ने जंगल को चारों ओर से घेर लिया।
शिकारी कुत्तों के साथ डिब्बे पीटते लोग घेर रहे थे उसे।
भाग रहा था बाघ हरियाली का स्वप्न लिये।
उसकी साँसे फूल रही थीं,
और भागते भागते
छलक आई उसकी आँखों में उसकी गर्भवती बीवी।

शिकारी और और पास आते गये
और वह शुभकामनाएँ भेज रहा था अपने आने वाले बच्चे को,
कि “उसका जन्म एक हरी भरी दुनिया में हो”।

सामने शिकारी बन्दूक लिये खड़ा था
और बाघ अचानक उसे देख कर रुका।
एकबारगी सकते में धरती भी रुक गई,
सूरज भी एकटक यह देख रहा था कि क्या होने वाला है।

वह पलटा और वह चारों तरफ़ से घिर चुका था।
उसने शिकारी से पलट कर कहा,


“मैं तुम्हारे बच्चों के लिए बहुत ज़रूरी हूँ, मुझे मत मारो”।

चारों ओर से उस पर गोलियाँ बरस पड़ीं।

उसका डर फिर भी बना हुआ था।

शिकारी सहम सहम कर उसके क़रीब आ रहे थे।

उसके पंजे काट लिये गये, जिससे बनते थे उसके निशान।
यह ऊपर का आदेश था,
कि जो उसे अमर समझते हैं उन्हें सनद रहे कि वह मारा गया।




आने वाली पीढ़ियाँ भी यह जानें।
उसके पंजों को रखा गया है संग्रहालय में।

34 comments:

जयकृष्ण राय तुषार said...

Bahut hi behtreen kavita.uday prakashji aur fareedji ko badhai

सागर said...

भाग रहा था बाघ हरियाली का स्वप्न लिये।
उसकी साँसे फूल रही थीं,
और भागते भागते
छलक आई उसकी आँखों में उसकी गर्भवती बीवी।

शानदार कविता... वाकई इसे हर पेड़ पर लगा देना चाहिए.

singhsdm said...

फरीद खान की यह कविता और उस पर आपकी भूमिका दोनों लाजवाब.......बाघों को बचने के लिए जिस संवेदना की जरूरत है वो आपने बिलकुल स्पष्ट कर दी है......संवेदनशील पोस्ट लिखने का शुक्रिया.

Niraj said...

साहित्यकार और प्रकृतिविद की यह मिली-जुली संवेदना है तो प्रशंसनीय पर कामना यही करूंगा कि यह प्रशंसा के स्तर को पार करती हुई उन शिकारियों की संवेदना को भी छू सके ।

अनिल कान्त : said...

इसे यहाँ पोस्ट करने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया

सचमुच इसे टांग देना चाहिए वहाँ...

प्रीतीश बारहठ said...

इस कविता को सभी को अपने दिलों पर टांग लेना चाहिये और उन भेडियों को भी जो बन्दूकें लिये दौड़ रहे हैं हरियाली और उसके भविष्य को नष्ट करते हुये।

Rangnath Singh said...

जितनी संदवेदनशील कविता है उतनी ही मौजूं आपकी लिखी भूमिका है।

kshama said...

सरल शब्दों में सशक्त अभिव्यक्ति ...

rakeshindore.blogspot.com said...

Ab bhut see cheejen shayad kavitaa men hee bachee reh payengee .

dimple said...

फ़रीद की कविता बिल्कुल आज के समय और संदर्भ में अपनी अर्थव्यापकता में बहुत दूर तक जाती है।

आने वाली पीढ़ियाँ भी यह जानें।
उसके पंजों को रखा गया है संग्रहालय में।
संग्रहालय में ही जानवरों की तस्वीरे ही रह जायेंगी या फिर कहानियो में,निर्दोष वन्य प्राणियो की हत्या कर हम अपना निजी स्वार्थ सिद्द करते है ज़ो अन्याय है.इन जंगली जानवरों को आदमखोर बनाने के लिए कही हम ही तो जिम्मेदार नहीं? सभ्यता की दौड़ में हमने अपनी सुविधा के लिया जंगलो का कटान कर दिया.अपने सुखद आवास निवास के लिए हमने उनको और उनके आवासों को उजाड़ दिया.हम मकान बंगलो वाले बन गये और वे बेघर होकर बस्तिओ के आसपास भटकने के लिए विवश हो गये.भाग रहा था बाघ हरियाली का स्वप्न लिये पर उसपे बरसती गोलियो से दिल पसीज जाता है.पर्यावरण का दोहन अगर सयंम से न किया गया तो परिणाम गंभीर हो सकते है.

आशुतोष पार्थेश्वर said...

मैं कहूँ कि यह बाघ केवल जंगल का बाघ भर नहीं है,और हरे पेड़ भी हरे पेड़ भर नहीं हैं । अजन्मे बच्चे को भेजी शुभकामनाओं पूरी इंसानियत की चिंता समोई है । हरियाली का केवल स्वप्न में बचना हमारी सचाई है, और विकट स्थिति तो यह है कि शिकारियों से घिरे होने पर भी सूरज ,धरती सब के सब एक टक देखते रह जाते हैं, बाघ की लाचारगी, उसकी निरीहता, को कम क्या समझने वाला कोई नहीं । बेहद चुनौतीपूर्ण कविता ।

Dr. Amarjeet Kaunke said...

bahut hi bhapurat kavita....apki tippni ne is kavita ke arthon ko aur adhik vastaar de diya.....

अजेय said...

आह !
मुझे एक लकड्बग्घे की याद आ गई, जो चाह कर भी बुद्ध न बन सका था....

" सभी को कुछ न कुछ चाहिए
ज़िन्दा रहने के लिए
जैसे मुझे माँस
और इस हिरन को घास्"

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

बाघ से ज्यादा भूख शायद जरुरी है .

प्रदीप कांत said...

गीली मिट्टी पर पंजे के निशान देख कर लोग डर गये।
जैसे डरा था कभी अमेरिका ‘चे’ के निशान से।
लोग समझ गये,
यहाँ से बाघ गुज़रा है।

सचमुच बहुत व्यापक अर्थ समेटे है यह कविता

Arif said...

bhai farid ki kavita padh ker kankrit ke jangal ke beech gum hoti manviya samvedna ke yatharth ka aabhas hota. yeh kavita manviya samvedna ko puner jeevan pradaan karne mein meel ka pathar sabit hogi.
arif shahdoli
jhansi

Nasiruddin said...

लाजवाब कविता। नया बिम्‍ब। इस कविता को पढ़ते- पढ़ते बाघ से प्‍यार हो जाए। बाघ और हरियाली का स्‍वपन। बाघ और चे। बाघ और गर्भवती बीवी की याद। बाघ का ऐसा चित्रण भी मुमकिन है। बधाई फरीद को और बधाई उदय जी को इसे जग जाहिर करने के लिए।

rajivlochan said...

क्या कविता है! बाघ की नज़रों से!!

devendra sahu said...

लम्बे समय बाद कोई कविता चीकर दिल तक पहुंची है. "खानदानी" कवियों को मुह चिढाती हुई . विषय और बिम्ब तो हैं ही लाजबाब..
ये कविता ही इस कवि का मीटर है. हम तक इसे पहुँचाने वाले हर सौर्स का शुक्रिया. ये कविता जिनते किलोमीटर तक जाएगी उतना ही सफ़र ऐसे कवि तय कर सकेंगे.

purwa said...

Shibboo,vakai achchhi kavita hai !

Jammu Art Scape said...

Thanks Uday ji for sharing such a wonderful/ meaningful poem with your friends.It is just amazing.

प्रदीप चौधरी said...

badi aachi line ye ki bagh apne nam aakho se ye kehta hai,aur apni garvhwati patni ko yaad karta hai.bahut hi marmik drishya aakho ke saamne aata hai,wakai sach jab apne auket pe aata hai to achoo achoo ki.......

प्राची पाठक said...

"आने वाली पीढ़ियाँ भी यह जानें।
उसके पंजों को रखा गया है संग्रहालय में"।

ये पंक्तियाँ वास्तव में कविता को पूर्ण करती हैं। अपने एक प्रखर अन्दाज़ भरी सादगी के साथ। सचमुच मेरे रोएँ खड़े हो गये। अद्भुत है।

manjushree said...

बहुत मार्मिक कविता है। फ़रीद को शुभकामनाएँ और उदय जी का आभार !!!

richa.arianveda said...

bahut hi seedhe saral shabdo me kahi gayi ek behad samvedansheel kavita......
gr88t job sir......

Amit Kumar Jaiswal said...

नासिर सर की पोस्ट पर यह कविता काफी पहले पढी थी और आज फिर पढी। हर बार दिल दहल जाता है। बेचैनी होने लगती है। मन मसोस कर रह जाते हैं।

pragya pandey said...

भाग रहा था बाघ हरियाली का स्वप्न लिए ...... बाघ कि यह याचना कि मुझे मत मारो मै तुम्हारे बच्चों के लिए बहुत ज़रूरी हूँ .... बड़े सन्देश का वहन करती कविता . आज के समय को उकेरती .. मार्मिक और बेहद संवेदनपूर्ण है ! कवि को बहुत बहुत बधाई

Kumar Vishnupad Manu said...

sabse pahle farid ko badhai. itani acchi rachana ke liye. uspar uday ji ki jabardast tippani ke liye unhe bhi.
abhi jitne log ho halla macha rahe hain dher sare samaik muddon par unhe ye kavita jarur padhani chahiye.
mera matlab sirf bagh se nahi. jeevan se aur vartaman paristhityon ke sangharshon se bhi hai.
jangal me kyun ise har jagah tangani chahiye.
farid fir se badhai.

rupa said...

फरीद को किन शब्दो मे शुक्रिया कहा जाए..अपनी तीन साल की बेटी को बाघ की कितनी सारी कहानियाँ और कविताएँ बताई हैं और वो उन सबमें बाघ के बल और बहादुरी से मोहित होती जाती है..आज घर जाकर सबसे पहले ये कविता जो सबसे जरूरी कविता है -बाघ, मेरी तीन साल की बेटी और मेरे लिए..

सुशीला पुरी said...

शिकारी और और पास आते गये
और वह शुभकामनाएँ भेज रहा था अपने आने वाले बच्चे को,
कि “उसका जन्म एक हरी भरी दुनिया में हो”।
......
फरीद जी की यह कविता छत्तीसगढ़ के जंगलों मे ही नही दिल्ली की हर दीवार पर लगाने लायक है ... जहाँ पल -पल हरी भरी दुनिया का सपना पालने वालों की आँखों से नोच ली जाती है नींद । आभार !

GIAN HADA said...

This is a nice collection up on Bagh. I like it very much .

GIAN HADA said...

What a nice picture presented by the poet through simple words in his poem.It lefts a deep effect upon

GIAN HADA said...

What a nice picture presented by the poet through simple words in his poem.It lefts a deep effect upon

GIAN HADA said...

kavi ji bachaa baghin ke pet main hota hai bagh ke nahi.