Sunday, May 23, 2010

वह एक मशाल-सा कोई

तीन दिन पहले 'भास्कर' दैनिक में काम करने वाले अपने पुराने मित्र और पत्रकार विमल झा के कहने पर मैंने बहुत जल्दी में हिंदी के सुविख्यात आलोचक-चिंतक डा. रामबिलास शर्मा की  पुण्य तिथि  (३० मई) के अवसर पर यह एक टिप्पणी लिखी थी, जो संपादित होकर शनिवार, २२ मई के भास्कर समय में प्रकाशित हुई थी। अरसे से मैं हिंदी के अखबारों आदि में कम ही लिख रहा हूं। इच्छा भी नहीं होती। कुछ दूसरे अधिक ज़रूरी कामों में लगा हूं।  यह आलेख भी 'संपादित' हो कर कुछ भिन्न अर्थ देने लगा था। मैं इसके मूल पाठ को आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूं।  शायद आप जानते होंगे कि कुछ साल पहले मैंने डा. रामबिलास शर्मा पर एक वृत्तचित्र 'कालजयी मनीषा' के नाम से बनायी थी, जो कई बार, कई अवसरों पर प्रदर्शित हो चुकी है। उसके कुछ अंश भी  जल्द प्रस्तुत करूंगा।  (इस पोस्ट के साथ भास्कर में प्रकाशित इस लेख के 'संपादित' अंश को भी जे.पी.जी. फार्मेट में   हासिल होते ही संलग्न करने का प्रयत्न करूंगा। )
कल  आप पायेंगे एक ज़रूरी पोस्ट और। 
 
कुछ साल पहले का वह दिन अब एक अविस्मरणीय दिन बन चुका है, जिस दिन उन्नाव जिले के, बैसवाड़ा कहे जाने वाले इलाके के उस छोटे से गांव-ऊंचगांव सानी में मैंने उस टूटे-फूटे, ,खपरैल वाले इंटहे घर को देखा। इस घर में १० अक्टूबर , 1912 को डा. रामबिलास शर्मा का जन्म हुआ था। कच्ची-अधपकी ईंटों वाला वह पुराना घर अब भीऊंचगांव  सानी की उसी संकरी गली में है। कहते हैं कि इस घर के लकड़ी के चौखट-दरवाज़ों की चीर-फाड़ ही नहीं, इसकी नींव और दीवारों पर लगने वाली ईंटें भी रामबिलास शर्मा के बाबा ने अपने हाथों से पारी थीं। वे फौज में सिपाही हुआ करते थे और रिटायर होकर गांव लौट आए थे।
छोटा-सा आंगन, आंगन के बीच में छोटा-सा चौरा और बींचोबीच तुलसी का बिरवा। और ठीक कुछ कदम आगे खपरैल की संकरी-सी वह धुआंई मलीन कोठरी, जिसमें उनका जन्म हुआ था। एक दरिद्र ब्राह्मण का जर्जर घर। दैन्य और अभिमान, वंचना और विद्या, अभाव और प्रतिभा के प्रकट विरोधाभासी द्वंद्वों को साकार करता हुआ। वह कोई अजब-सा अनुभव था। मैंने कुछ साल पहले केरल के गांव कलाडी का वह घर भी देखा था, जहां से लाठी में अपनी छोटी-सी गठरी लटका कर एक और प्रतिभा बाहर निकल पड़ी थी। बिल्कुल ऐसा ही घर, जैसा उस रोज ऊंचगांव  सानी में सामने था।
उस गांव में ट्रांसफार्मर और बिजली के खंभे होने के बावजूद बिजली नहीं आती। लालटेनें आज भी जलती हैं। नाखून नाई नहन्नी से काटता है। बच्चे बीते हुए जमानों के खेल खेलते हैं।
जब आप लखनऊ से बैसवाड़े की ओर चलते हैं और शहरी इलाकों से दूर होते जाते हैं, तो धीरे धीरे एक किसी दूसरे नये देश की सीमा में दाखिल हो जाते हैं। उस देश की वह भाषा भी आपको चारों ओर से घेरने लगती है, जिसे आप हिंदी प्रदेश के नाभिस्थल या ‘एपिसेंटर’ की भाषा कह सकते हैं। अवधी।
संयोग से वह उतरते आषाढ़ का महीना रहा होगा। गलियों और खेतों में पानी भरपूर था। आकाश में गहराते बादल। मेरे सहायक ने कहा-‘सर, वो देखिए सारस। लालसर।’ वर्षों बाद मैंने वह राजहंस प्रजाति का पक्षी देखा। सफेद बगुले वहां कतारों में बैठे हुए क्षितिज-रेखा बना रहे थे।
औरतें झुंड की झुंड धान की रोपाई में लगीं थीं और गा रही थीं। सुना तो लगा जैसे वे रामचरित मानस से निकल कर बाहर आयीं स्त्रियां हों। ‘गीतावली’ गाने वाली, तुलसी की चौपाई को गद्य में बदलकर आपस में बोलने वाली आज की औरतें। दिगंबरविष्णु पलुस्कर का बचपन में सुना गीत बार-बार याद आ रहा था -‘कउन से पथिक, कहां कीन्ह हौ गमनवां?’
कहीं ये स्त्रियां हमसे भी उसी तरह न पूछने लगें, जैसे अवध छोड़कर दंडकारण्य जाने वाले राम, सीता और लक्ष्मण से पूछ रही थीं। -‘सांवरो से सखी रावरो को हैं?’
डा..रामबिलास शर्मा या आदि शंकर (संकर) से सहमत या असहमत होना एक बिल्कुल अलग मुद्दा है। विमर्श, असहमति और विरोध का एक अलग परिक्षेत्र। लेकिन वह धरती तो फिलहाल सामने थी, जो धरती निस्संदेह दरिद्रता, अभाव, वंचना और तमाम कठिनाइयों की थी, जहां से इन प्रतिभाओं के बीज अंकुरित हुए थे और जहां उनकी जड़ें हमेशा थीं। केरल के कलाडी, उन्नाव के ऊंचगांव  या बांदा के राजापुर या सोरों जैसे गांव इसी का साक्ष्य हैं। प्रतिभाएं चांदी का चम्मच मुंह में लेकर नहीं जन्मतीं। लखनऊ विश्विद्यालय में भरती होने के लिए किसी उदार रिशतेदार से मांगी गई साइकिल के कैरियर में राशन-कपड़े रख कर 80 मील बिना कहीं सुस्ताए पैडल मारना पड़ता है। सात साल की उम्र में अपने गरीब मुनीम पिता के लिए रोटियां सेंकनी-बेलनी पड़ती हैं और तेरह साल की उम्र में इसलिए किसी अदेखी लड़की से शादी कर लेनी पड़ती है कि मां बीमार है और खाना बनाने के लिए एक ‘स्त्री’ उस घर को चाहिए। फिर उसी स्त्री के साथ जीवन भर का ‘लालसर’ या राजहंस पक्षी जैसा लोक-दृष्टात बन चुका वह पुरबिया दांपत्य, जिसमें कहीं विवाद-प्रमाद का कोई हलका-सा दाग तक नहीं। किसी निरमा या सर्फ एक्सेल की ज़रूरत नहीं। स्त्री और पुरुष, पति और पत्नी दोनों की गुलामी और संघर्ष का वह जिम्मेदार साझा सामाजिक संग्राम, जिसे देख कर (शायद) अर्नेस्तो कार्देनाल की प्रेम-कविता याद आती है -‘तुम हथकड़ी और मैं बेड़ी, तुम भूख और मैं प्यास, तुम खेत और मैं हल जोतने वाला ट्रैक्टर....!’
जब हम आज हिंदी में चल रहे नव-धनाढ~य वर्ग के ‘स्त्री-विमर्श’ को देखते हैं, जिसमें कांट्रासेप्टिव गोली को एफ.एम. रेडियो ‘फ्रीडम फाइट’ (स्वाधीनता संग्राम) बोलता है, तब लगता है कि सचमुच ऊंचगांव  या बैसवाड़ा या गढ़ाकोला हमारी दिल्ली और दूसरे मेट्रो महानगरों से कितनी दूर हैं। एक अलंघ्य दूरी, जो गरीबी और अमीरी, गांव और शहर, लोक और नागर, आदिवासी और हिंदू सवर्ण, परंपरा और अपसंस्कृति के बीच बढ़ती जाती खाई के साथ हर रोज़ और चौड़ी होती जाती है।
जब रामबिलास जी गौना कराने अपनी अनदेखी पत्नी के घर  यानी अपनी ससुराल पहुंचे तो वह कछौंटा मारे, बांस की नसैनी में चढ़ कर, घर की दीवार की पोताई करने में लगीं थीं। ‘कउन हो?’ के उत्तर में उस शर्मीले किशोर के मुंह से- ‘पाहुन हैं इस घर के !’ सुन कर, नसैनी से कूद कर, मुंह में पल्लू दबा कर वह लड़की जिस तरह घर के भीतर की ओर भागी, वह बिंब बार-बार कौंध जाता है। गढ़ाकोला ही नहीं, जहां निराला, नंददुलारे वाजपेयी, महावीर प्रसाद द्विवेदी या अशोक वाजपेयी के पूर्वजों जैसी कई प्रतिभाएं हुईं, बल्कि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड आदि के अनगिनत गांव ऐसे आज भी हैं, जहां ऐसे बिंब अब भी टीवी के बाहर जीवन के वास्तविक यथार्थ में बनते रहते हैं। कैमरों से बाहर। वे किसी सीरियल या विज्ञापन के लिए शूट करने के लायक नहीं। वे तो किसी अन्य लोक या परलोक के हैं।
पिछले कुछ अरसे से, जब से पुरस्कारों की लूट-खसोट और उन पर अखबारबाजी साहित्य के हलके से आने वाली अकेली सूचनाएं बन चुकी हैं, ऐसे में रामबिलास जी फिर से याद आते हैं। सैमसुंग टैगोर, साहित्य अकादेमी या हिंदी अकादेमी पुरस्कार को लेने वाले और न लेने वाले ‘नायक-नायिकाओं’ की परस्पर बयानबाजियों से भरी इन तारीखों में वह लगातार चुप रहने वाला धीरोदात्त, स्थावर लेखक बार-बार याद आता है, जो जीवन भर अवध के किसान की ही तरह कागज़ के खेत पर कलम के हल चलाता रहा। एक ऐसा अनासक्त धुनी-मेहनतकश किसान, जो नगदी के लालच में मोसांटों के बीज नहीं खरीदता और इसीलिए उसके पांव कभी आत्महत्या की पगडंडी की ओर नहीं जाते। वह कोई भी पुरस्कार खुद लेने कभी कहीं नहीं गया। पुरस्कार उसके पास चल कर आए। जब उन्हें हिंदी अकादेमी का शलाका सम्मान दिया गया, तो उन्होंने इसे लेने के लिए कहीं जाने से इंकार किया और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को चल कर उनके घर विकासपुरी जाना पड़ा। जब व्यास सम्मान मिला, तो बिड़ला को उनकी ड्योढ़ी पर हाज़िर होना पड़ा। राजनीति और पूंजी, दोनों सत्ताओं को उस अनासक्त शब्दयोगी ने अपने सामने विनम्र बनाया। ‘अदब से आओ कि गालिब की है मज़ार यहां ....तुम इसको तेग के होठों से छू नहीं सकते!’
 हर बार पुरस्कारों की राशि उन्होंने साक्षरता के लिए दान कर दी।
आगरा का वही केंद्रीय हिंदी संस्थान, जो पिछले दिनों पुरस्कारों  और तमाम तरह के विवादों के लिए सुर्खियों में आता रहा, वहीं रहते हुए डा. रामविलास शर्मा ने भाषा और समाज’ और ‘मार्क्सवाद और भारत में अंग्रेज़ी राज’ जैसी किताबें लिखीं। उन्हें किसी मंत्री या अफसर की जीवनी लिखते कभी नहीं पाया गया। उन्होंने तो दारागंज की गली में किसी औघड़ हकीर की तरह रहने वाले एक महाप्राण कवि की जीवनगाथा लिखी और उसे आधुनिक कविता के केंद्र में स्थापित किया। प्रेमचंद और भारतेंदु को विस्मरण और उपेक्षा के हाशिये से निकाल कर साहित्येतिहास की  ज़रूरी पुनर्व्याख्या की और आधुनिकता को उनके माध्यम से नये सिरे से परिभाषित किया। आज भी अगर वे होते और उनसे कोई दिल्ली का पत्रकार राष्ट्रमंडलीय खेलों के बारे में पूछता तो वे कहते-‘कामनवेल्थ से भारत को अलग हो जाना चाहिए। यह हमारी औपनिवेशिक गुलामी की यादगार है।’ मुझे याद है, जब 1981-82 में उन्हें मध्यप्रदेश के भारत भवन में आमंत्रित किया गया था, तब वे अकेले ऐसे आलोचक थे, जिनका दो-टूक जवाब आया था कि पहले आप फोर्ड फाउंडेशन से अपने संबंधों को स्पष्ट कीजिए, उसके बाद ही मैं इस पर विचार करूंगा।
उनसे असहमति के एक नहीं सैकड़ों मुद्दे हैं। उन्होंने हिंदी जाति के बारे में एक ऐसी महा-अवधारणा प्रस्तुत की, जिसके पीछे हिंदी समाज की अनेक महत्वपूर्ण अस्मिताओं को छुपाने का प्रयत्न साफ था और इसकी भावी परिणतियां देश के एकीकरण नहीं बल्कि विखंडन और दूसरी भाषाई-क्षेत्रीय अस्मिताओंकी टकराहट को जन्म दे सकती हैं। रेणु और मुक्तिबोध को समझने में उनकी व्यावहारिक आलोचना से ऐतिहासिक चूक हुई। कबीर के महत्व को वे उस तरह नहीं समझ सके, तुलसी में रमे रहे और उनकी वर्णवादी चेतना की आलोचना उतनी नहीं की, जितनी उन जैसे निष्कंप मार्क्सवादी आलोचक से अपेक्षा थी। उनके शोध, शोध-पद्धति और उसकी वस्तुपरकता की तमाम सीमाएं थीं, राहुल सांकृत्यायन या कोसांबी की तरह। लेकिन यह भी याद रहे कि वे हिंदी साहित्येतिहास लेखन का प्रारंभिक काम कर रहे थे। अपने ऊंचगांव वाले फौजी सिपाही बाबा की तरह ईंट अपने हाथों पाथ-पार और पका रहे थे। वे हिंदी नहीं, अंग्रेज़ी के अध्यापक थे और उनकी पीएच.डी. थीसिस अंग्रेज़ी भाषा में यूरोप की चित्रकला के अध्ययन पर थी। उनके पास दिल्ली, बनारस या इलाहाबाद के प्राध्यापकों की तरह संदर्भ पुस्तकालय और तमाम दूसरी सुविधाएं नहीं थीं। आगरा के जसवंत सिंह राजपूत कालेज की छोटी-सी लाइब्रेरी की तुलना किसी भी तरह सप्रू हाउस, जे.एन.यू., दिल्ली वि.वि., ब्रिटिश काउंसिल या दूसरे ऐसे ग्रंथागारों से नहीं हो सकती थी। उनके साथ यह एक प्रकट सीमा थी, जिसे ध्यान में रख कर ही इस बारे में कोई फतवा देना चाहिए।
लेकिन इसके बावज़ूद उन्होंने सौ से अधिक ऐसी पुस्तकें लिखीं, जिनका दायरा साहित्य से लेकर इतिहास, समाज विज्ञान, सभ्यता शोध और भाषा विज्ञान तक जाता है। सीमाएं चाहे जितनी हों, उनसे बड़ा, धुनी और परिश्रमी शोधकर्ता हिंदी में न पहले कोई हुआ और न अब तक कोई है। कह सकते हैं कि भले ही उनकी मेधा डा. अंबेडकर की तरह प्रखर और संभवत: आधुनिक नहीं थी, अंबेडकर जैसे शोध और निर्मम तटस्थ विश्षलेण के उपकरण भी उनके पास नहीं थे, तब भी यह याद रखना होगा कि भारत में किसी भी सामाजिक क्रांति के लिए सिर्फ शहरी औद्योगिक मज़दूरों की जगह, गांवों के गरीब किसान और ‘अंत्यज’ दलित वर्ग की अनिवार्यता को उन्होंने सबसे पहले समझा और यूरो-कम्युनिस्टों से बहुत पहले साम्यवाद को लोकतांत्रिक और संसदीय बनाने की बात एक बार नहीं कई-कई बार की।
जैसा जीवन उन्होंने जिया, वह किसी ऋषि का ही जीवन होता है। एक ऐसा स्थावर जो कई आमंत्रणों के बाद भी विदेश जाने से कतराता रहा। पहले चेकोस्लोवाकिया इसलिए नहीं गये, कि ‘पत्नी की तबियत ठीक नहीं है’ और फिर सोवियतलैंड नेहरू सम्मान लेने मास्को इसलिए नहीं गये कि सरकारी महकमों और दूतावासों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
आज के हिंदी साहित्य के उठाईगीर लोलुप-लंपट समय में उनका स्मरण किसी अतीत में अब भी जलती मशाल जैसा लगता  है। अपनी निष्कंप निष्काम लौ के साथ जलती हुई।
इस दिशाहारा अराजक समय में प्रेरणा का कोई ऐसा महान लाइट हाउस, जिसके उजाले में भले ही हम उसकी ओर नहीं, अपनी अलग दिशा की ओर बढ़ें।
(पुनश्च : मैंने आपसे वायदा किया था कि 'कल एक ज़रूरी पोस्ट' और लगाऊंगा, लेकिन दिन भर ऐसी भागदौड़ रही कि यह संभव नहीं हो सका। आज मैं आपसे विदा लेता हूं। दो महीने तक देश से बाहर रहूंगा लेकिन वहां से महत्वपूर्ण सूचनाएं आप सब तक पंहुचाने की कोशिश करूंगा। ....आप सबका बहुत-बहुत शुक्रिया, सचमुच। )

23 comments:

गिरिजेश राव said...

चरम संतुष्टि मिली - वैसी ही जैसे कई दिनों तक उटपटांग खाने के बाद दुपहर में घर का भात दाल चभक कर खाने पर मिलती है। आभार।
'शंकर' को आप ने 'संकर' भी क्यों कहा है? और यह शीर्षक में 'उदय प्रकाश' के बजाय 'UDAY PRAKASH' क्यों है?
अभी कुछ देर पहले एक ब्लॉगर साथी ने पॉल गोमरा का ज़िक्र किया था।

singhsdm said...

उदय जी
सादर नमस्कार
राम विलाश शर्मा जैसे व्यक्तित्व के विषय में जो भी लिखा है ,उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है. उन्होंने जो अनुकरणीय उदहारण प्रस्तुत किये हैं वो हम सबको राह दिखने में समर्थ हैं

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

रामविलास जी के कृतित्व के आगे सदैव माथा झुक जाता है।

Rangnath Singh said...

रामविलास जी के लिए इससे बेहतर श्रद्धांजलि नहीं हो सकती। अपने व्यक्तिगत जीवन में रामविलास जी जिस गरिमा के साथ जिए वो हम सभी के लिए अनुकरणीय है। उन्हें हमारी श्रद्धांजलि।

Rangnath Singh said...

भाष्कर अखबार को लिए शर्म की बात है कि हिन्दी का दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा अखबार होने के बावजूद वो हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक के जन्मदिन पर समकालीन हिन्दी के सर्वप्रिय लेखक के लेख को भी पूरा-पूरा न प्रकाशित कर सका। कटनी-छँटनी के संपादकीय अधिकार के इस दुष्प्रयोग की हमें भर्त्सना करनी चाहिए।

चैन सिंह शेखावत said...

राम विलास शर्मा के बारे में पढ़ कर ह्रदय में उनके प्रति एक श्रद्धा भाव जागृत हो उठा. हिंदी के इस महा-मनीषी को सादर नमन.

Uday Prakash said...

date Mon, May 24, 2010 at 6:48 AM
subject Re: [UDAY PRAKASH] New comment on वह एक मशाल-सा कोई : जन्मदिन ३० मई पर विशेष.
mailed-by gmail.com
signed-by gmail.com

6:48 AM (4 hours ago)

मेरे प्रश्न अनुत्तरित हैं।

सादर,
गिरिजेश

Uday Prakash said...

eg
date Mon, May 24, 2010 at 8:42 AM(2 hours ago)

प्रिय गिरिजेश जी,
आदि संकर मैंने इसलिए लिखा है कि मलयालम में विशेष रूप से और अन्य द्रविड़ भाषाओं में भी 'शंकर' का उच्चारण 'स' के रूप में है। केरल में आप लोगों से पूछिये तो वे 'आदि संकर' कहेंगे।
मेरे ब्लाग का शीर्षक 'UDAY PRAKASH' क्यों है. सच मानिए, इसका स्पष्ट उत्तर मेरे पास भी नहीं है। शायद इसकी एक वज़ह यह है कि हिंदी के सत्ताकेंद्रों और सांस्थानिक व्यवस्थाओं द्वारा निर्वासित होने के बाद, मैं हिंदी का उस तरह से 'सम्मानित' या 'प्रतिष्ठित' (established) लेखक नहीं हूं। फिर शायद इसलिए भी कि मेरे पाठक बहुत बड़ी संख्या में अन्य भाषाओं में भी हैं, जिनकी लिपि देवनागरी नहीं है।
आशा है मेरे उत्तर से आपको निराशा नहीं हुई होगी।
शुभकामनाओं के साथ

उदय प्रकाश

rakeshindore.blogspot.com said...

आदरनीय ,

रामविलास जी का जन्म १० ,अक्टूबर, १९१२ है.

आप ने ३० मई लिखा है . कृपया सुधार कर लें

pragya pandey said...

आदरणीय राम विलास शर्मा जी के बारे में इतने गरिमापूर्ण और भावपूर्ण प्रसंगों कि जानकारी देकर आपने ज्ञानवर्धन किया . उदय जी आपको बहुत बधाई. शुभकामनाओं के साथ!!

Uday Prakash said...

aapka bahut bahut aabhaar. jaldi me yah badi bhool hui.sudhar kar liya hai.lekin uday prakash videsh jaa chuke hain.
kumkum

rangbaaz said...

पिछले कुछ समय से रामबिलास जी पर योजनाबद्ध तरीके से बहुत छुद्र और दुष्ट किस्म के प्रहार हो रहे हैं. ऐसे में आपका यह संस्मरण ’वह एक मशाल-सा कोई’ उस धुन के पक्के निष्काम साधक को सच्ची और मर्मस्पर्शी श्रद्धांजलि है.

अब कुछ भूल सुधार :

१. ‘कउन से पथिक, कहां कीन्ह हौ गमनवां?’ यह गीत विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने नहीं उनके बेटे दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर यानी पलुस्कर जूनियर ने गाया है. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर और उस्ताद अल्लादिया खां के समय रिकॉर्ड्स बनने शुरू हो गए थे पर तकनीक के प्रति संदेह के चलते उन्होंने रिकॉर्डिंग से साफ़ मना कर दिया. इस तरह उनका संगीत उपलब्ध ही नहीं हैं.

२. रामबिलास जी केन्द्रीय हिंदी संस्थान,आगरा के नहीं, के.एम.मुंशी हिंदी एवं भाषाविज्ञान संस्थान,आगरा के निदेशक रहे हैं. और यह आक्षेप सुनकर कि साहित्य के आदमी को भाषाविज्ञान के संस्थान का निदेशक बना दिया गया है,उन्होंने वह काम किया जो तथाकथित भाषावैज्ञानिक भी नहीं कर सके.

३. ’पुरबिया दांपत्य’ में पुरबिया से आपका अभिप्राय ’ओरिएंटल’से है या पूर्वी उत्तरप्रदेश से ? रामबिलास जी का बैसवाड़ा, कनौजी और अवधी के बीच का इलाका है.इसलिए अवधी प्रभाव तो ठीक,ज्यादा पूरब की ओर मत धकेलिए.बल्कि इधर हिंदी आलोचना की पुरबिया लॉबी ही तो उनको काट-छांट कर ठीक कर देना चाहती है .

आशुतोष पार्थेश्वर said...

जी भर गया,रामविलासजी पर लिखने की तैयारी कर रहा था, पर अब नहीं;
उस महासाधक को प्रणाम ।
इस जीवन में उन्हें पूरी तरह पढ़ लूँ, यह भी एक साध ही है ।
मेरा आदर स्वीकारें ।

डॉ .अनुराग said...

शुक्रिया आपने उस व्यक्ति का परिचय अपनी नजरो से कराया जिसके प्रति भीतर मन में बहुत आदर है......

अरुणेश मिश्र said...

डाँ 0 शर्मा को श्रद्धाञ्जलि ।

Farid Khan said...

मैंने रामविलास जी की पुस्तक 'निराला की साहित्य साधना' ही पढ़ी है और वह भी काफ़ी पहले पटना में। पर जितना कुछ आपके लेख से पता चलता है, उन सब से मैं बिल्कुल अनभिज्ञ था। इस महत्वपूर्ण लेख के लिए आभार।

Uday Prakash said...

aap sabakaa bahut bahut aabhaar. itane lagaav ke saath aapne yak tippani padhi. jaldi hi Germany se kuchh soochanaayen post karoongaa.
dheron shubhkaamnaaon ke saath.

sunil mishra said...

sukriya aap sab ko

अनहद/aNHAD said...

आज के हिंदी साहित्य के उठाईगीर लोलुप-लंपट समय में उनका स्मरण किसी अतीत में अब भी जलती मशाल जैसा लगता है। अपनी निष्कंप निष्काम लौ के साथ जलती हुई।
इस दिशाहारा अराजक समय में प्रेरणा का कोई ऐसा महान लाइट हाउस, जिसके उजाले में भले ही हम उसकी ओर नहीं, अपनी अलग दिशा की ओर बढ़ें।
ek dam sach kaha hai sir...padh ke sakun mila

AAINA said...

रामविलास जी के बारे में यूं तो मैं ज्यादा कुछ नहीं जानता.... लेकिन गोरखपुर के अपने छात्रावासी दिनों में अपने अभिन्न मित्र डॉ. आशुतोष के शोध विषय के बाद आपके जरिए इतना सबकुछ जानकर उनके प्रति जी श्रद्धा से भर गया.... आपके बारे में भी आशुतोष जी के जरिए ही जाना सुना है... आशुतोष जी के संस्मरणों में आप अक्सर शामिल रहते हैं.... और उनके जरिए हमारी चर्चाओं में भी.... रामविलास जी के बारे में इतना सबकुछ बताने के लिए आपका और अपने मित्र आशुतोष दोनों का बहुत बहुत शुक्रिया....

AAINA said...

रामविलास जी के बारे में यूं तो मैं ज्यादा कुछ नहीं जानता.... लेकिन गोरखपुर के अपने छात्रावासी दिनों में अपने अभिन्न मित्र डॉ. आशुतोष के शोध विषय के बाद आपके जरिए इतना सबकुछ जानकर उनके प्रति जी श्रद्धा से भर गया.... आपके बारे में भी आशुतोष जी के जरिए ही जाना सुना है... आशुतोष जी के संस्मरणों में आप अक्सर शामिल रहते हैं.... और उनके जरिए हमारी चर्चाओं में भी.... रामविलास जी के बारे में इतना सबकुछ बताने के लिए आपका और अपने मित्र आशुतोष दोनों का बहुत बहुत शुक्रिया....

संजीव गौतम said...

uday ji pranaam
jaswant nahin balwant rajput college purana naam ab raja balwant singh college.

aanand aa gaya padhkar.

अवनीश मिश्र said...

हिंदी साहित्य जगत के साथ एक बड़ी समस्या एकांगी हो जाने की है....जिस और ढर गए ढर गए...इसी हिन्दी समाज से आपको तमाम शिकायतें हैं.....प्रायोजित लेखन के दौर में तथ्यों के सहारे नहीं, विद्वता के सहारे भी नहीं..बल्कि चीजों को सही सन्दर्भ में समझ सकने की ईमानदारी के सहारे लिखा गया आपका यह लेख रामविलास जी पर एक अच्छी सामग्री तो है ही....अपने लिए साहित्य के भीतर भी जगह तलाश करता है...लेख में ऐसा ज्यादा कुछ नहीं जो पहले नहीं पढ़ा नहीं गया....लेकिन तथ्यों को मानवीय बना देने और स्मृति के साथ कदमताल करने से लेख काफी पठनीय बन गया है....वैसे हिदी समाज पर लगातार आपकी जो टिप्पणिया सहज प्रवाह से बहती हुई आती हैं..वह अब प्रोपगैंडा लगने लगी है.....आप उस और गए बिना भी अपनी बात पूरी या ख़तम कर सकते है....जो आजकल आप प्रायः नहीं करते.....बहुत सारे पाठक ऐसे हैं जिन्हें साहित्यकारों के बीच सत्ता संघर्ष से कुछ लेना देना नहीं....उन्हें कला से मतलब है जिसके बीच साहित्यकारों का सत्ताप्रेमी या मध्यवरगीय चरित्र बाधा नहीं बनता...अंत में एक बेहतरीन ढंग से लिखे गए लेख के लिए धन्यवाद....