साहित्य एक घर : विस्थापित लेखक
आपका यह लेखक पिछले एक सप्ताह से जर्मनी में हैं. आज दोपहर १.४५ पर मेरी रेलगाड़ी फ्रैन्क्फुर्ट के लिए रवाना हो जायेगी. आज ही शाम यहाँ की सुप्रसिद्ध साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था `लिट- प्रोम' द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय साहित्योत्सव शुरू होगा जो ४ जून तक चलेगा . इस समारोह में १२ अलग-अलग देशों के १२ महत्वपूर्ण और अपने अपने समाज में साधारण मनुष्य की आकांक्षाओं- संकटों- अनुभवों को अपनी-अपनी भाषाओं में व्यक्त करने वाले और स्थापित व्यवस्थाओं के सम्मुख विपक्ष की मानवीय आवाज़ बन चुके लेखक अपनी-अपनी रचनाओं का पाठ करेंगे और विमर्श में हिस्सा लेंगे.
इस बार इस अंतरराष्ट्रीय सेमीनार का विषय हैं ``साहित्य एक शरण्य''. उदघाटन समारोह के बाद आपके इस लेखक का कार्यक्रम आज ही प्रस्तावित हैं. इस कार्यक्रम में आपके इस लेखक के अलावा बुल्गारिया से विस्थापित हो चुके और जर्मनी में रह रहे विख्यात साहित्यकार इलिया त्रोजानोव तथा मोरक्को की विख्यात लेखिका फातिमा मेरिसीनी हिस्सा लेंगी.
बहुत से लेखकों के लिए, जिनके पास भाषा के अतिरिक्त सांस्थानिक समाजव्यवस्था में अन्य कोई वैकल्पिक जगह बाकी नहीं हैं, साहित्य या सृजन उनके लिए किसी अंतिम निरापद घर की तरह होता हैं. किताब के भीतर, अपने वाक्यों, अपने शब्दों के साथ वे अपने जीवन और समय के अनुभवों की एक पूरी अलग दुनिया बनाते हैं. यह दुनिया सत्ताहीन मनुष्य या नागरिक-अनागरिक की एक निरापद-सी हो सकने वाली दुनिया हो सकती हैं. किसी राजनीति, वैभव, पूंजी या राज्य की दखल से बाहर एक पवित्र, एकान्तिक, अलग, निजी दुनिया. एक घर. अपने समय की हिंसाओं और द्वेषों से दूरी बनाते हुए, अपनी खिड़की-झरोखों से झांकते हुए, आक्रान्त समय से पलायन और प्रतिकार का एक अलग प्रति-संसार. अपने जीवन और इस बहाने समूचे साधारण मनुष्य के जीवन और उसकी स्वतंत्रताओं के पक्ष में भाषा को बरतने का एक जोखिम भरा अकेला घर. अडोर्नो ने कहा था कि एक लेखक के लिए घर कोई दूसरा नहीं, उसकी भाषा से बनी चारदीवारी ही होता हैं.
लेकिन आज के समय में, धरती का कोई छोर, कोई कोना, कोई जंगल, कोई पहाड़ तक ऐसा निरापद नहीं रहने दिया गया हैं, जिसमें सत्ता और उपभोग, वैभव और लोभ से निस्संग कोई नागरिक कहीं रह-बस सके. आज के मामूली मनुष्य का हर ठिकाना, हर मकान, हर घर आज उजाड़ दिए जाने के कगार पर हैं. उस पर चौतरफा हमले हैं. एशिया, अफ्रीका, कैरेबियाई और लातीनी अमेरिकी देशों में यह संकट भूमंडलीकरण के बाद सबसे अधिक बढ़ा हैं. अपनी धरती का कोई भी ``आदिवासी'' या मूल निवासी आज राज्य, वैश्विक बाज़ार, टेक्नालाजी और पूंजी के आक्रमणों को हर रोज़ झेल रहा हैं.
कोई सच्चा लेखक भी अपनी भाषा का एक ``आदिवासी'' ही होता हैं. कोई हाकिम,राजनेता, व्यापारी नहीं. इसीलिए इस समय अलग अलग सत्ताओं के आक्रमणों के द्वारा पैदा ऐतिहासिक मानवीय विस्थापन के पल में उसकी नियति और उसकी अस्मिता विस्थापन, निर्वासन को झेल रहे समुदायों के साथ जुडी हुई हैं.
यह एक गहरे संकट का समय हैं. सभ्यता के नए औजारों द्वारा गढ़ा जा रहा मानवीय सभ्यताओं के अब तक के इतिहास का सबसे बड़ा और अपूर्व वैयक्तिक , नागरिक और सामाजिक संकट.
इस चार दिन के समारोह में यूरोप की विख्यात शहरजाद संस्था ने ``जीवन की कहानियां: जीवन भर की कहानियां'' के अन्तरगत अलग अलग देशों के कथाकारों- रचनाकारों का पाठ और उनसे संवाद भी आयोजित किया हैं.
अगर संभव हुआ तो मैं यहाँ से मौक़ा मिलते ही आप सबके लिए कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ पोस्ट करता रहूँगा.
अभी तो इजाज़त दें. गाडी बुला रही हैं.
अगले समय की मुलाक़ात तक के लिए विदा. जल्दी में लिखा हैं, सुधार कर पढियेगा. )
(ब्लॉग के साइड पेनल पर आप इन कार्यक्रमों से संबंधित लिंक देख सकते हैं.)
Tuesday, June 1, 2010
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The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled
19 comments:
उदय जी जर्मनी यात्रा सकुशल रहे........लौट कर तफसील से सफ़र के बारे में बताईयेगा.....साहित्य के कौन से सरोकार जुड़े- टूटे ,यह जान्ने की तीव्र उत्कंठा है.......फिलहाल सफ़र और गोष्ठियों का आननद लीजिये....!
1 nirmal verma ji the, 1 rajendra awasthi... aur aapko bhi khoob mauka milta hai...desh se bahar ke anubhavon ka...बधाई। वैसे जहां भी अपने गिरेबां में सिर डाल लें, वो जगह निरापद हो सकती है... निरापद भौतिक या सांस््कृतिक परिवेश की जरूरत है क्या ????
उदय प्रकाशजी,आपका देश के बाहर जाकर अपनी रचनाओं का पाठ करना,अपनी बातों को रखना,इस देश के उस वंचित वर्ग का ईमानदार प्रतिनिधित्व लगता है जिनकी आवाज देश क्या खुद उसके मोहल्ले तक में भी नहीं सुनी जाती। आप जब-जब भी बाहर जाने का जिक्र करते हैं,एक सुखद अनुभूति के साथ-साथ टीस भी होती है कि आखिर हम आपकी इस बात को,इस आवाज को सुनने के लिए मानसिक रुप से क्यों नहीं तैयार नहीं है। जिसकी अनुभूति की जमीन इस देश के भीतर की है लेकिन अभिव्यक्ति का आकाश सिकुड़ा हुआ है। बहरहाल,आपसे केवल एक अनुरोध,आप लिखने के अंत में अभी तक के लिए विदा जैसे शब्द का प्रयोग न करें तो ही अच्छा। एक अजीब किस्म की भावुकता से आक्रांत हो जाता हूं।
लगातार शुभकामनाओं के साथ..
उदय प्रकाशजी,आपका देश के बाहर जाकर अपनी रचनाओं का पाठ करना,अपनी बातों को रखना,इस देश के उस वंचित वर्ग का ईमानदार प्रतिनिधित्व लगता है जिनकी आवाज देश क्या खुद उसके मोहल्ले तक में भी नहीं सुनी जाती। आप जब-जब भी बाहर जाने का जिक्र करते हैं,एक सुखद अनुभूति के साथ-साथ टीस भी होती है कि आखिर हम आपकी इस बात को,इस आवाज को सुनने के लिए मानसिक रुप से क्यों नहीं तैयार नहीं है। जिसकी अनुभूति की जमीन इस देश के भीतर की है लेकिन अभिव्यक्ति का आकाश सिकुड़ा हुआ है। बहरहाल,आपसे केवल एक अनुरोध,आप लिखने के अंत में अभी तक के लिए विदा जैसे शब्द का प्रयोग न करें तो ही अच्छा। एक अजीब किस्म की भावुकता से आक्रांत हो जाता हूं।
लगातार शुभकामनाओं के साथ..
Tumhaari har yatra ek naya aakaash ho...
Jahaan bhi Uday ho tumahara
wahaan ek naya Prakash ho...
-Sainny Ashesh and Snowa Borno
from Manali
फिर भी एक उम्मीद है .....के शब्द जिंदा रहेगे ......अपने मायनों के साथ....भले ही थोडा ठहरे.सुस्ताये........ .पर जिंदा रहेगे
आपको मिलने वाले विश्वस्तरीय स्वीकार से बहुत खुशी मिलती है। आप वहां जो बोलेंगे उम्मीद है उसे हमारे लिए भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
aap sabhi doston kaa aabhaar. vineet ji aapane to khud mujhe bhaavuk ar diyaa. hum log apani-bhaashaaon ke sattaaseenon dvaaraa baahar kar diye gaye log hain.
kal subah gootingen univesity chalaa jaaungaa. 6-10 june ke beech Berlin me avasar miegaa net par aane kaa. tabhi aap sabase baat hogi...
salaaaam...!
यात्रा सकुशल . यही कामना ।
उदय जी, जर्मनी प्रवास की इतनी सारी बातें रोमांच पैदा कर रही हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि जिस लेखक को कुछ लोगों ने विस्थापित करने की कोशिश की है, वह अपनी भाषा और साहित्य में रोज ही संबर रहा है..उसे हिंदूस्तान ही नहीं बल्कि बाहर के लोगों ने कृतज्ञता से गले लगाया है...
मैं फिर दुहराउं कि सचमुच यह लेखक अपने लेखकीय व्यक्तित्व से असंख्य लोगों को निरंतर प्रेरित कर रहा है...
विमलेश त्रिपाठी, कोलकाता
१३ दिनों की तिरुपति ,चेन्नई , रामेश्वरम ,कन्याकुमारी की यात्रा से आज ही लौटी हूँ , .....आपकी जर्मनी की यात्रा शानदार होगी .....और साहित्य के अनोखे ,अद्भुत घर में आप पूरे सम्मान और सुकून से होंगे ....इसके प्रति मै ईश्वर की प्रार्थी हूँ .
किताबों पर आधारित इस ब्लॉग की शुरूआत आपसे की है।
http://akshar-desh.blogspot.com
उदयजी बहुत बधाई खूबसूरत विचार
लेकिन आज के समय में, धरती का कोई छोर, कोई कोना, कोई जंगल, कोई पहाड़ तक ऐसा निरापद नहीं रहने दिया गया है ............
भाषा की चहारदीवारी अभिव्यक्ति की इस अद्भुत क्षमता से ही तो संवरती भी है.... आपकी जर्मनी की यात्रा वंचित समुदाय की आवाज़ पहुंचाने के अपने मकसद में कामयाब हो.... शुभकामनाओं सहित....
Nice blog, i will visit ur blog very often, hope u go for this website to increase visitor.Happy Blogging!!!
शुभ यात्रा...
आपके ब्लाग पर पहली बार आय हू और आजकल आपकी "...और अन्त मे प्रार्थना" पढ रहा हू।
काफ़ी कुछ ’पहला’ ही है.. आपका लिखा पढना भी.. कोशिश रहेगी की ब्लाग पर साथ बनाये रख सकू..
इतना बौखला देने वाली कहानियो के लिये शुक्रिया ...
Apse us din bat huai acha laga apko allah bahuta umar da.aapka Salim Maniyar
"lit-prom" me shirkat ke liye badhaai.
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