Wednesday, July 21, 2010

साहित्य एक अंतिम शरण्य : विस्थापन के विरुद्ध कुछ फुसफुसाहटें

''मैं चाहता हूं
कैसे मैं किस तरह उड़ जाऊं, वहां जहां मुझे कोई न देख सके
उजाले की उस किरण के उस पार
पीछे अपना कोई निशान छोड़े बिना.

लेकिन तुम -
तुम तो उजाले को अपने चारों ओर से घेर लेने दो,
वही एक खुशी है
रोशनी या उजाले का मतलब
तुम नक्षत्रों की टिमटिमाहट से सीखो

अगर यह कोई किरण है, अगर यह सचमुच कोई रोशनी है
तो सिर्फ़ इसलिए क्योंकि
प्यार करने वालों की फुसफुसाहटों और सरगोशियों ने इसे
गर्माहट दी है....आंच और ज़रा सी ताकत

और मैं तुम्हें बताना चाहता हूं 
कि मैं भी फुसफुसाहटों में कुछ कह रहा हूं,
मैं तुम्हें उजाले को सौंप रहा हूं,
एक छोटी सी किरण को, फुसफुसाहटों के बीच.''



क्या आपने कभी 'होप अगेंस्ट होप्स' पढी हैं? विश्व विख्यात रूसी कवि ओसिप माम्देल्स्ताम की वह जीवनी, जो उसकी पत्नी नादेज्दा ने लिखी थी. मैंने इसे १९७६-७७ में तब पढ़ा था, जब देश में 'आपातकाल' घोषित था. मेरी राय हैं कि आप उसे 'अघोषित आपातकाल' के इस कठिन समय में ज़रूर पढ़ें. उसे पढ़ कर यह जाना जा सकता हैं कि सर्वसत्तावादी या किसी लक्ष्य के उन्माद में ग्रस्त राजनीतिक सरकारें किस निर्ममता से अपने से असहमत किसी स्वतंत्र लेखक या नागरिक का उत्पीडन करती हैं. यह जीवनी कई मायने में एक वास्तविक लेखक के जीवन में हमेशा और हरबार घटित होने वाले 'होलोकास्ट' या त्रासदी का बयान करती हैं. महान प्रतिभा और रूस में सर्वाधिक प्रतिष्ठित और लोकप्रिय कवि होने के बावजूद ओसिप माम्देल्स्ताम को बार बार यंत्रणाओं, कैद , विवादों, लांछनों से  गुज़रना पडा, इसके पीछे कई वजहें थीं. एक तो (शायद सबसे पहली) वह उस जाति और धर्म का नहीं था, जिसके हाथ में  समाजवादी सोवियत रूस की सत्ता थी. (महा-वृत्तांतों के परदों के पीछे छुपे ऐसे 'लघु और क्षुद्र वृत्तांतों' को हमेशा छुपाया जाता है. आज तक.) ओसिप यहूदी था. दूसरे, वह जिस तरह की कवितायेँ लिख रहा था, वह ज़्यादातर उस समय की मुख्यधारा की रूसी कविता से अलग तरह की कवितायेँ थीं. ये किसी 'यूटोपिया' या विचारधारा के वाग्जाल (रेटरिक) को नहीं रचती थीं. ये किसी सामूहिक विकल्प, राजनीति या सामाजिक दर्शन को समर्पित नहीं थीं. बल्कि अपने और अपने जीवन के इर्द गिर्द के असली रोज़मर्रा अनुभवों को किसी नैतिक पीडा के साथ, कविता कही जा सकने वाली संरचनाओं में बदलती थीं. विख्यात रूसी 'प्रतीकवाद' के वर्चस्व को तोडने वाली इस कविता को 'पराकाष्ठावादी' या 'एक्मिस्ट' कविता का नाम दिया गया था. अन्ना अख्मातोवा भी ऐसी ही कवितायेँ लिख रही थी और उसका जीवन भी बहुत छिन्न-भिन्न, अनिश्चयों से भरा और यातनापूर्ण रहा. ये ऐसी कवितायेँ थीं, जो अपने होने और अस्तित्व में आने के लिए बाहर की किसी सैद्धांतिकी, एजेंडे या पूर्व प्रस्तावित काव्य-विधानों का सहारा नहीं लेती थीं, बल्कि अपने समय और स्पेस में अपने जिए जा रहे जीवन के ब्यौरों से जिस तरह की विनिर्मितियाँ प्रस्तुत कर रहीं थीं, वह उस राजनीति और संस्कृति के सारे 'महावृत्तांतों' के धुर्रे चुपचाप, पूरी खामोशी के साथ बिखेर रही थी, जिसको छुपाने ढकने के लिए सारा राज्यतंत्र, मीडिया, संस्थान, अभिजन, ताकतें और प्रशासन-प्रणाली लगी हुई थी. ये अकेली कविताएं सामूहिक महानताओं के भव्य स्थापत्यों, गुंबदों और मज़बूत किलों के भीतर पहुंच जाने वाली  वाली सत्य और आवयविक यथार्थ की विस्फोटक सामग्री की तरह थीं. निजी हताशाओं, नैतिक पीड़ा और अक्सर विषाद से भरी ये निर्बल, 'आफ़बीट' कविताएं, किसी भी तरह की मुख्यधारा के लिए, इसीलिए खतरों की तरह थीं. संभवत: इसीलिए इनको विस्थापित और अपदस्थ करने में, उस समय की मुख्यधारा की राजनीति, संस्कृति और साहित्य ने एक जैसी 'उत्पीड़क' की भूमिका निभाई. ऐसा ही हमेशा हुआ करता है. होता आया है.
ऐसा नहीं था कि ओसिप मान्देल्स्ताम या अन्ना अख्मातोवा कोई क्रान्तिविरोधी गतिविधियाँ चला रहे थे. बल्कि उनका जीवन तो बहुत एकान्तिक और अकेले का जीवन था. ओसिप मान्देल्स्ताम ने तो १९१७ की सोविएत क्रान्ति का स्वागत और समर्थन भी किया था. लेकिन समस्या सबसे बड़ी यही थी, और जो हर उस सच्चे और अभागे लेखक के साथ होती हैं, जो अपने समय में राज्य और 'अदृश्य सरकारों' द्वारा दण्डित होता हैं, कि वह ईमानदार था. वह समाजवाद और मार्क्सवाद के साथ तो था, लेकिन उसे स्टालिन और उसके आसपास मौजूद सरकारी लगुओं-भगुओं (जिन्हें हम शालीन और स्वीकृत भाषा में 'एलीट', 'अभिजन' या 'भद्र-लोग' या फिर 'बुद्धिजीवी' कहते है) पर संदेह था. यह 'भद्र वर्ग', जिसे ई.पी. थांपसन ने अपनी विख्यात किताब ' दि एलीट पावर' में बहुत अच्छी तरह से विश्लेषित किया हैं, स्वयं को वामपंथी और मार्क्सवादी कहता था. 'इतिहास', 'वर्गचेतना' और 'विचारधारा' के महावृत्तांतों के भीतर यह अपने असली 'लघु और क्षुद्र वृत्तांतों' को छुपाता था. यही वह लोग थे, जिन्होंने मान्देल्स्ताम समेत कई महान रचनाकारों के जीवन को असह्य बनाया और ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित कीं कि इनमे से कई को आत्मह्त्या करनी पडी, कुछ विक्षिप्त हो गए, कई को लेबर कैम्प भेज दिया गया. और कुछ को तो गोली से उड़ा दिया गया. ओसिप मान्देल्स्ताम और अन्ना अख्मातोवा कविता के जिस 'पराकाष्ठावादी' स्कूल से जुड़े हुए थे, उसके व्याख्याकार और अगुआ बुद्धिजीवी गुमिलेव को तो बाकायदा १९२१ में फायरिंग स्क्वैड ने गोली मार दी.
ओसिप मान्देल्स्ताम को कई बार लेबर कैम्प भेजा गया. कई तरह की क्रूर चालाकियों में उसे ठगा गया और फंसाया गया. उससे बार-बार सरकार के समर्थन वाले काम करवाए गए. उससे बार-बार उसकी वफादारी पूछी गयी. जीवित रहे आने के दुर्निवार लोभ में वह अपनी अंतरात्मा के साथ यह धोखा फुटकर गद्य में तो अक्सर करता रहा लेकिन कविता में वह ऐसा नहीं कर पाता था. वह हर देश और हर तरह के सर्वसत्तावादी तंत्र में पाए जाने वाले उन 'अदृश्य सरकारों' (invisible governments) के लिए संदिग्ध हो चुका था, जिसके लिए अख्मातोवा, राहुल सांकृत्यायन, वैक्कुम मोहम्मद बशीर, अत्तिला योजेफ़, नज़रुल, नागार्जुन, मुक्तिबोध, ब्रेख्त, लोर्का आदि सभी सच्चे और ईमानदार  लेखक संदिग्ध हुआ करते हैं. अफसरों, पुलिस अधिकारियों, मंत्रियों, सचिवों, संस्थानों आदि सत्ताकेंद्रों के इर्दगिर्द हमेशा बनने वाली ये 'अदृश्य सरकारें' ऐसे लेखकों को हमेशा अपने लिए असुविधाजनक मानती हैं.
अनुवाद, छिट-पुट लेखन, अनियत पत्रकारिता और सरकारी दिहाड़ी पर किसी तरह जीवित रहने वाले इस महान कवि के बारे में पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों और प्रकाशनों को चेतावनी दी जा चुकी थी. अपने अकेले दैनिक जीवन के ब्यौरों में खोये ओसिप मांदेल्स्ताम को पता भी नहीं था कि वह सत्ता-तंत्र द्वारा 'वर्ग शत्रु' घोषित किया जा चुका था. १९३८ में उसे एक बार फिर साइबेरिया के लेबर कैंप में भेजा जा रहा था, तब तक उस पर बीच-बीच में स्मृतिहीनता के दौरे पड़ने लगे थे. अपनी आख़िरी चिट्ठी में उसने अपनी पत्नी नादेज्दा से कुछ गर्म कपडे और रुपये भेजने को कहा था.
आज से लगभग ७२ साल पहले, २७ दिसंबर १९३८ को उसके भाई अलेक्सांद्र मान्देल्स्ताम को सरकार की और से चिट्ठी मिली कि ओसिप की मृत्यु 'हार्ट फेल' हो जाने से हो गयी. यह जीवनी भी इसलिए संसार के सामने आ सकी कि उसकी पत्नी में अपूर्व हिम्मत और शब्दों की शक्ति थी वर्ना महान कथाकार मिखाइल बुल्गाकोव या जर्मनी की महान आलोचक प्रतिभा वाल्टर बेंजामिन की तरह उसका जीवन भी अंधेरे में रहा आता.
मै दरअसल, आप सबके लिए अपनी जर्मनी तथा फ्रांस की यात्रा और वहां फ्रैंकफुर्ट में आयोजित होने वाले अत्यंत महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सेमीनार के बारे में और अपनी लगभग दो महीने तक चली इस यात्रा में अलग-अलग शहरों, विश्व विद्यालयों और संस्थानों में रचना पाठ और संवाद -व्याख्यानों के अनुभवों के बारे में बताने बैठा था कि ओसिप मान्देल्स्ताम का जीवन चुपचाप सामने आ गया. ऐसा शायद इसलिए हुआ कि सिर्फ अपनी भाषा और अपनी रचना के लोक में जीने वाले अकेले हर लेखक के जीवन की स्थितियां बहुत कुछ मिलती-जुलती होती है. पिछले पोस्ट में मैंने लिखा था कि एक स्वतन्त्र  (यहाँ स्वतन्त्र का उपयोग मैं सिर्फ 'फ्रीलांस' के अर्थ में नहीं, बल्कि लगभग समग्र अर्थों में कर रहा हूँ. यानी उन्हीं 'एक्मिस्ट' या 'पराकाष्ठावादी' अर्थों में, जैसा अन्ना अख्मातोवा और ओसिप मान्देल्स्ताम ने किया था. यानी 'धर्म', 'नस्ल', 'जाति', 'राजनीति' आदि अन्य सामूहिक अधिरचनाओं के वर्चस्व से मुक्ति, तटस्थता और निस्संगता के अर्थ में. ) लेखक अपनी भाषा का मूल निवासी होता हैं. लेखक भाषा का 'आदिवासी' या 'अबोरिजिन' होता है. वह भाषा का उपयोग पूरी तरह से प्राकृतिक और मानवीय परियोजना में करता है. भाषा एक तरफ़ उसकी वैयक्तिक व्यावहारिक चेतना का निर्माण करती है, तो दूसरी ओर भाषा ही उसके बाहरी मानवीय सामुदायिक समाज को भी बनाती है. जो लोग सिर्फ़ इस 'क्लीशे' को मानते हैं कि 'भाषा एक सामाजिक उत्पाद है' (Language is a social product) वे यह समझने में असफल हो सकते हैं कि दरअसल इसका उल्टा अधिक सच है. यानी भाषा ही समाज का निर्माण करती है. भाषा समाज को बदलती और रूपांतरित भी करती है. (आज के 'कंज्यूमरिस्ट' नव-धनाढ्य मध्यवर्ग का नया समाज मीडिया, नेट, विग्यापन, टेक्नोलाजी के नव-साम्राज्यवादी आक्रामकता के ज़रिये बनाया और बदला गया है.) भाषा ही स्वतंत्र अकेले लेखक का पहला और अंतिम शरण्य होती हैं. उसका ठौर-ठिकाना. उसका देश. जल-जंगल-ज़मीन. उसका खेत और कुआं. उसकी छत और उसका शहर. (याद करें, विट्गेंस्टाइन ने भाषा को अतीत से लेकर आज तक की असंख्य सभ्यताओं वाला 'शहर' या 'मानवीय 'बस्ती' कहा था.) भाषा के बाहर लेखक की कोई अन्य सत्ता नहीं होती. आज के सत्ताकेंद्रिक अर्थों में वह सत्ताहीन होता है, किसी आदिवासी या वंचित मनुष्य की तरह. अगर उसका कोई समुदाय होता भी है, तो वह सिर्फ़ अपनी प्राथमिक ज़रूरत और अनिवार्य आत्मरक्षा के लिए बना हुआ 'सत्ताहीन समाज' होता है. वह 'लेखक', जिसकी सत्ता अगर उसकी भाषा से ज़्यादा कहीं बाहर है, राजनीति, जातीयता, पूंजी की तमाम संरचनाओं, गुट, झुंड, संगठन, संस्थान आदि में, तो इसके मायने हैं कि वह लेखक कम और भाषा की सरहद पर मौज़ूद कोई बाहरी कोई हमलावर, अतिक्रमणकारी या फिर भाषा के भीतर दाखिल कोई बाहरी सत्ताओं का एजेंट, भेदिया, आतंकवादी होता है. ऐसे लोग अपनी-अपनी ताकतों का निर्माण जिन स्रोतों से करते हैं, वे स्रोत भाषा के कत्तई नहीं होते. उन्हें भाषा की सत्ता पर भरोसा ही नहीं होता जबकि (मैंने पहले भी कई बार कहा है कि रोलां बाथ भाषा को ऐसी 'सत्ता' मानते हैं, जहां अन्य सत्ताएं निसर्जित हो जाती हैं. शब्द को वह 'उत्कीर्णित सत्ता' (power inscribed) मानते हैं.हमारे अपने देशी भाषा चिंतन में भी शब्द-सत्ता की तुलना सर्वोच्च सत्ता (ब्रह्म) से की गयी है.) भाषा सर्वोच्च सत्ता होती है. अन्य सत्ताएं जहां स्मृति और स्वप्न को नष्ट करती हैं, या कृत्रिम स्मृतियों और स्वप्नों का सामूहिक उत्पादन (mass production) करती हैं, वहां किसी लेखक की भाषा निजी, भिन्न और वैयक्तिक स्मृति और स्वप्नों को रचती है, इसीलिए 'इतिहास' की सामूहिक संरचनाओं से वह हरबार मुठभेड़ करती है और अक्सर 'फेक-एनकाउंटर' में 'ताकतवर' पूंजी-तकनीकी और राजनीति की 'ऐतिहासिक' सत्ताओं द्वारा मार दी जाती है.
फ़्रैंकफ़ुर्ट में १ जून से ४ जून तक चलने वाले इस सेमिनार का विषय था 'साहित्य एक शरण्य और लेखक का विस्थापन'. मैंने इसे हमारे देश में बड़े पैमाने पर इस समय चल रहे आदिवासियों, वंचितों, दलितों और सत्ताहीन वर्गों के विस्थापन और उत्पीडन से जोड कर देखा. आप ध्यान से देखें तो जिस भाषा (हिंदी) में बुनियादी रूप से मैं लिखता हूं, उस भाषा पर जिन वर्गों-जातियों-समूहों का  वर्चस्व या आधिपत्य है, वे ठीक वही वर्ग-जाति-समूह हैं, जो वास्तविक समय और यथार्थ में, हमारे देश के आदिवासियों-जनजातियों, दलितों, अल्पसंख्यकों को उनकी जगहों, उनके घरों या 'शरण्यों' से बेदखल करने में पूरी मुस्तैदी के साथ लगे हैं. उनमॆ कोई खास अंतर नहीं है. हां, उनकी राजनीतिक 'विचारधाराएं' (आइडियोलाजी) अलग-अलग पाठ (टेक्स्ट) में प्रस्तुत हो सकती है. लेकिन अगर आप चोम्सकी की प्रसिद्ध किताब, 'आन लैंगुएज़' याद करें, जिसमें उसकी भाषा पर विचार की अन्य कृतियां भी शामिल हैं, (लैंगुएज़ एंड रिस्पोंसिबिलिटी' तथा 'रिफ़्लेक्शंस आन लैंगुएज़) तो उसने कहा था : ''For the analysis of ideology, which occupies me very much, a bit of open mindedness, normal intelligence and healthy skepticism will generally suffice.'' इसका मतलब ही यह हुआ कि हम जिस समय में आज हैं, उसमें प्रदत्त 'आइडियोलाजी' के पाठ को नये सिरे से हमें 'स्वस्थ संदेह', 'खुले दिमाग' और 'सामान्य-स्वाभाविक विवेक' के साथ देखना होगा. ...


.(बाकी अगली पोस्ट में फ़्रैंकफुर्ट के महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के बारे में कुछ जानकारियां और गोटिंगन विश्वविद्यालय, कोलोन, बोन और हाइडेलबर्ग के दक्षिण एशियाई अध्ययन संस्थान आदि में व्याख्यान और रचनापाठ के बारे में कुछ बातें और बर्लिन, फ़्राइबुर्ग, ट्युबिंगन, स्त्रासबुर्ग, स्टुटगार्ड की यात्राओं के कुछ ब्यौरे.)

17 comments:

शरद कोकास said...

ओसिप माम्देल्स्ताम , एक अकेली जान और इतने सारे दुश्मन ?"वह उस जाति और धर्म का नहीं था, जिसके हाथ में समाजवादी सोवियत रूस की सत्ता थी ". यह सही है कि यह वृतांत अब तक छुपा रहा लेकिन अब अन्ना अख़्मातोवा , ओसिप माम्देल्स्ताम ऐसे ही कई कवियों के बहाने प्रकट हो रहा है । हमारे देश में इन स्थितियों के लिये आपने यद्यपि आपातकाल की ओर ध्यान दिलाया है लेकिन उस दौर में ऐसे लेखक कम से कम घोषित तो हो चुके थे । इस अघोषित आपातकाल में तो ऐसे लेखकों के चेहरे पहचानना मुश्किल है और इस आपातकाल के पोषकों के चेहरे पहचानना तो और भी बहुत मुश्किल ।
बहरहाल ओसिप माम्देल्स्ताम की जीवनी के बहाने आपने समय और समाज की अनेक विसंगतियों की ओर हम सबका ध्यान आकर्षित करवाया है । इसी सन्दर्भ में समाज और भाषा पर आपका चिंतन भी महत्वपूर्ण है ।
फ़्रैंकफुर्ट के यात्रा विवरण में हम सिर्फ विवरण पढ़ना भी नहीं चाहते । हमे उम्मीद है इसी तरह देश और काल की नब्ज़ पर हाथ रखते हुए आप इतिहास के उन अलिखित पृष्ठों को हमारे सामने रखेंगे जिन्हे आपकी पारखी नज़र ने विगत दिनों देखा है । धन्यवाद उदयप्रकाश जी ।

Farid Khan said...

"जिस भाषा (हिंदी) में बुनियादी रूप से मैं लिखता हूं, उस भाषा पर जिन वर्गों-जातियों-समूहों का वर्चस्व या आधिपत्य है, वे ठीक वही वर्ग-जाति-समूह हैं, जो वास्तविक समय और यथार्थ में, हमारे देश के आदिवासियों-जनजातियों, दलितों, अल्पसंख्यकों को उनकी जगहों, उनके घरों या 'शरण्यों' से बेदखल करने में पूरी मुस्तैदी के साथ लगे हैं."

इस 'अघोषित आपातकाल' को समझने की कोशिश कर रहा हूँ।

शेखर मल्लिक said...

मुझे आपकी जर्मनी यात्रा के संस्मरणों का इन्तजार है.
आपकी बातों से प्रभावित हुआ.

डॉ .अनुराग said...

एक दूसरे संसार से गुजर कर वापस तो आ गया हूँ पर दिमाग पर उसका असर अब भी है.....

अजेय said...

# डॉ. अनुराग ,कभी कभी हम दूसरे संसार मे जीना पसन्द करते हैं. वर्ना यह क़तई दूसरा संसार नहीं है. हमारा अपना ही है. *उदय प्रकाश* ने हमें अपने ही संसार से परिचित कराया, आभार.

संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...

सच कहूँ तो अरसे बाद 'उदय प्रकाश' को पढ़ा...

Rangnath Singh said...

आपकी पीड़ाएं-चितांए हम सभी के दुख को साझा करती हैं। भाषा में मुक्ति खोजने की विवश कातरता को हम सभी कभी न कभी महसूस करते हैं। अभी किसी साथी ने ओरहान पामुक का माइ फादरस सुटकेस के अंश भेजे। मैं समझ नहीं पाया कि ये आप बोल रहे हैं कि पामुक बोल रहे हैं या माम्देल्स्ताम या कोई और लेख !!

शायद अनुचित लगे लेकिर कहुंगा कि ऐसा लगता है कि सभी लेखक किसी एक पीड़ित वृहत आत्मा के लघु अंश हैं !!

यह भी लगता है कि,ईसा के शाश्वत पाप का बोझ लेखकों ने मानवता की रक्षा के लिए अपने सिर पर ले लिया है।

लेखक होता जाना संभवतः भीतर ही भीतर से और छिलते जाना है। लिखना उस छिलन के कष्ट से मुक्ति पाने का एक असहाय प्रयास भर रह जाता है। इन पंक्तियों को लिखते वक्त मुझे बेवजह स्वेदश दीपक याद आ रहे हैं !!

जिस व्यक्ति को मैंने कभी नहीं देखा,वो अक्सर मेरे तसव्वुर में आ जाता है। मैं अक्सर सोचता हूं कि,स्वेदश कहां होंगे ? कैसे होंगे ? होंगे या नहीं भी होंगे ? और उनके साथ ऐसा क्यों हुआ ?

हिंसक मनुष्यों के समूह में एक कृशकाय जीव (लेखक) अपने को कैसे बचाए रखे, मैं अक्सर सोचता हूं ??

अनहद/aNHAD said...

आप हर बार नए सिरे से झकझोरते हैं...काश की इतना ही जेनुईन गुस्सा समय के हर लेखक के पास होता....

सुशीला पुरी said...

''और मैं तुम्हें बताना चाहता हूं
कि मैं भी फुसफुसाहटों में कुछ कह रहा हूं,
मैं तुम्हें उजाले को सौंप रहा हूं,
एक छोटी सी किरण को, फुसफुसाहटों के बीच.''

मेरी उम्मीद मुझे वहाँ तक ले जा रही है जहाँ से आपकी 'फुसफुसाहटों' ने एक ऐसी नई दुनिया की नीव डाल दी है जहाँ न सत्ताओं के दलाल जा पायेंगे और न ही अघोषित आपात की हवा प्रवेश पा सकेगी, आपने भाषा के जिस अंतिम शरण्य की ओर इशारा किया ....एक जीवित मनुष्य के जिस आखिरी सदन की बात की वह निश्चितरुप से आज के इस बहुरूपिया समय मे ऐसी छांव है, जहाँ न उसकी चालाक चाल चल पाएगी और न ही वहाँ दलालों की दाल गल सकेगी । भाषा के भीतर आपकी फुसफुसाहटों से एक दिन ऐसा सिंहनाद होगा कि बहरे और गूँगे समय के कान के पर्दे फट जायेंगे और उसकी बोली फूट पड़ेगी ,इस अघोषित आपात के विरुद्ध ...........,

अजेय said...

well said Susheela ji, isee ummeed par ham kavita ko jari rakkhenge.

DR. SHASHI KANT said...

अपनी भाषा, अपनी अभिव्यक्ति और अपने सरोकारों के प्रति सच्चे, नैतिक और संवेदनशील एक लेखक को जब बार-बार यंत्रणाओं, विवादों और लांछनों से गुज़रना पड़ता है तभी ऐसी तकलीफ़ भरी आह निकलती है. राजनीति, जातीयता, पूंजी की तमाम संरचनाओं, गुट, झुंड, संगठन, संस्थान आदि से दूर रहने के बाद भी बार-बार उत्पीड़ित किया जाना अन्याय और अत्याचार की पराकाष्ठा है. विडंबना यह है कि रूसी कवि ओसिप माम्देल्स्ताम के साथ घटित यह त्रासदी आज हमारे हिन्दी समाज के भीतर दोहराई जा रही है. ऐसे में उम्मीद की सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही किरण दिखती है, वह है- पाठक :

"अगर यह कोई किरण है, अगर यह सचमुच कोई रोशनी है
तो सिर्फ़ इसलिए क्योंकि
प्यार करने वालों की फुसफुसाहटों और सरगोशियों ने इसे
गर्माहट दी है....आंच और ज़रा सी ताकत."

DR. SHASHI KANT said...

अपनी भाषा, अपनी अभिव्यक्ति और अपने सरोकारों के प्रति सच्चे, नैतिक और संवेदनशील लेखक को जब बार-बार यंत्रणाओं, विवादों और लांछनों से गुज़रना पड़ता है तभी ऐसी तकलीफ़ भरी आह निकलती है. राजनीति, जातीयता, पूंजी की तमाम संरचनाओं, गुट, झुंड, संगठन, संस्थान आदि से दूर रहने के बाद भी बार-बार उत्पीड़ित किया जाना अन्याय और अत्याचार की पराकाष्ठा है. विडंबना यह है कि रूसी कवि ओसिप माम्देल्स्ताम के साथ घटित यह त्रासदी आज हमारे हिन्दी समाज के भीतर दोहराई जा रही है. ऐसे में उम्मीद की सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही किरण दिखती है, वह है- पाठक :

"अगर यह कोई किरण है, अगर यह सचमुच कोई रोशनी है
तो सिर्फ़ इसलिए क्योंकि
प्यार करने वालों की फुसफुसाहटों और सरगोशियों ने इसे
गर्माहट दी है....आंच और ज़रा सी ताकत."

अभय तिवारी said...

"अघोषित आपातकाल.."

"वास्तविक लेखक के जीवन में हमेशा और हरबार घटित होने वाले 'होलोकास्ट' .."

"जिस भाषा (हिंदी) में बुनियादी रूप से मैं लिखता हूं, उस भाषा पर जिन वर्गों-जातियों-समूहों का वर्चस्व या आधिपत्य है, वे ठीक वही वर्ग-जाति-समूह हैं, जो वास्तविक समय और यथार्थ में, हमारे देश के आदिवासियों-जनजातियों, दलितों, अल्पसंख्यकों को उनकी जगहों, उनके घरों या 'शरण्यों' से बेदखल करने में पूरी मुस्तैदी के साथ लगे हैं .."

मेरे प्रिय लेखक जिस तरह की अतिरंजित बातें कहते रहे हैं उसे पढ़ कर दुखी होता रहता हूँ। इस वक़्त वर्चस्व और बदलाव पैदा करने वाली भाषा सिर्फ़ अंग्रेज़ी है। जिस हिन्दी की बात हो रही है वह तो उसके अपने समाज में सहज रूप से हो रहे बदलावों को भी पकड़ नहीं पा रही है। न तो वो ठीक-ठीक विचार की भाषा है और व्यवहार की; विचार की भाषा बनने की कोशिश में व्यवहार की भाषा की सारी तरलता और सुगमता भी उसके हाथ से जाती रही है। इस लेख की भाषा भी उसका अपवाद नहीं बन सकी है। लेकिन इस रोग के लिए जिधर निशाना लगाया जा रहा है, वो दिशा सही नहीं है..

'स्वतंत्र' लेखन स्वतंत्र चिंतन के बिना कैसे मुमकिन है?

अमरेन्द्र: said...

उदय जी,

आपके विचार प्रासंगिक और समीचीन हैं । व्यक्ति, लेखक और समाज के संकट सदियों पुराने हैं । संकट की पहचान भी लगभग उतनी ही पुरानी है। मेरे विचार में आज के समय में संकट के समाधान पर जोर अधिक होना चाहिये । दैनिक जागरण पर प्रेमचंद पर आपके विचार भी अच्छे लगे ।
सादर,
अमरेन्द्र

vikram7 said...

स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

क्षितिज के पार said...

और मैं तुम्हें बताना चाहता हूं
कि मैं भी फुसफुसाहटों में कुछ कह रहा हूं,
मैं तुम्हें उजाले को सौंप रहा हूं,
एक छोटी सी किरण को, फुसफुसाहटों के बीच.'
...गजब लिखा है भइया। साहित्य है।

Raviratlami said...

आपकी चर्चित कहानी मोहन दास के फ़िल्म, गाने के लिंक तो इस ब्लॉग के बाजू पट्टी में हैं. परंतु वो पूरी कहानी शायद इस ब्लॉग में नहीं है और न ही उसका लिंक. यदि असुविधा न हो तो कृपया पूरी कहानी यहाँ छापें और उसकी लिंक भी बाजू पट्टी में लगाएँ, ताकि पाठकों - खासकर नए पाठकों को सुविधा हो.