Wednesday, August 18, 2010

नये कहानी संकलन की भूमिका :

पाठ से पहले एक पूर्व-पीठिका  

यह निर्णय ले पाना सचमुच बहुत कठिन है कि अब तक, लगभग तीन दशकों के कालखंड में लिखी जा चुकीं बहुत-सी कहानियों में से, अपनी कौन-सी दस कहानियां सबसे अधिक प्रिय हैं ?
सबसे पहली बात तो यही कि किसी भी लेखक द्वारा सारी कहानियां एक साथ, एक ही समय में, एक जैसी स्थितियों-परिस्थितियों में नही लिखी जातीं। हर कहानी के जन्म या निर्माण की अपनी अलग कथा होती है। हर कहानी अलग-अलग समय और यथार्थ की कोख से पैदा होती है और फिर अपना एक अलग जीवन जीती है। सिर्फ इस प्रकट संयोग और प्रमाण के चलते कि इन कहानियों को लिखने वाला कथाकार कोई एक व्यक्ति है, सभी कहानियों की अपनी अलग विशिष्ताओं, भिन्नताओं, चरित्र और निजताओं को सपाट नहीं किया जा सकता।
आलोचना अक्सर ऐसा करती है क्योंकि उसका ध्यान लंबे समय से रचनाकेंद्रित नहीं रहा। वह एक खास तरह की व्यवहारमूलक गड़बड़ी और प्रचलन से ग्रस्त रही है। जब पश्चिम के एक आलोचक ने अपना बहुपठित और बहुचर्चित निबंध-‘लेखक की मृत्यु’ (दि डेथ ऑफ दि ऑथर) लिखा तो उसने यही संकेत देने की पहली कोशिश की थी कि किसी रचना की आलोचना और व्याख्या के लिए उसके लेखक के संस्मरण, डायरी, जीवनी या उसके वैयक्तिक-सामाजिक संदर्भों से जुटाए गये साक्ष्य रचना को समझने में बहुत उपयोगी नहीं होते। क्योंकि लेखक और उसकी हर रचना के बीच हमेशा एक विभाजक रेखा खिंची होती है, भले ही वे किसी दिक् और काल की एक ही सरल रेखा में उपस्थित हों। ‘लेखक अपनी किताब का व्यतीत होता है। उसके और उसकी किताब के बीच ‘पहले’ (पूर्व) और ‘बाद’ (पश्चात) की हमेशा एक रेखा होती है। लेखक अपनी किताब से पहले उसी तरह जीवित रहता है, जिस तरह कोई पिता अपनी संतति के पहले जीवित होता है।’
जाहिर है संतान का जीवन उसके पिता का जीवन नहीं होता। दोनों अपना पृथक और भिन्न जीवन जीते हैं। और जिस तरह किसी संतान का जन्म या भ्रूण में उसका प्रतिस्थापन किसी पिता (या मां) की ‘अभिव्यक्ति’ नहीं बल्कि एक ‘प्रक्रिया’ या ‘कर्म’ है, उसी तरह लेखन का कर्म भी सिर्फ कोई ‘अभिव्यक्ति’ नहीं है। लेखक के हाथ गणेश और उसका सिर (मस्तिष्क) व्यास नहीं हैं, जहां कोई एक बोल रहा है और एक दूसरा लिख रहा है।
इसीलिए उस आलोचक-विचारक ने माना था कि रचना के पाठ का जन्म किसी ‘रिकॉर्डिंग’, ‘नोटेशन’ या ‘टाइपिंग’ की तरह नहीं है, बल्कि सच तो यह है कि आज का रचनाकार लिखे जाने की तात्कालिक, त्वरित, नश्वर, स्फूर्त, क्षणभंगुर प्रक्रिया में रचना के पाठ के साथ ही, उसी पल में जन्म लेता है और ‘पाठ’ के पूरा होते ही, खत्म हो जाता है।
 इसके बाद का उसका जीवन उत्तर-पाठ का अलग जीवन है। पाठ के पहले और बाद के उसके जीवन का रचना से पृथक् अर्थ और संदर्भ है। किसी रचना के पाठ का बनना उसी क्षण उसके लेखक का स्थगन और उसकी अनुपस्थिति है। पाठ की उपस्थिति के साथ ही लेखक की विलुप्ति या उसकी अनुपस्थिति तय और मुकम्मल हो जाती है। यह एक तरह से कुछ-कुछ वैसा ही ‘अलगाव’ (एलियनेशन) है, जिसकी चर्चा बीसवीं सदी के प्रमुख मार्क्सवादी विचारकों (जॉर्ज लुकाच आदि) ने औद्योगिक-पूंजीवादी समाज में व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में की है। रचयिता और रचना, हुनरमंद और उत्पाद के बीच का अलगाव।  श्रमिक और उसकी रचना के बीच का अलगाव।    
हमारी हिंदी भाषा में आलोचना अभी तक विकास की प्राथमिक अवस्थाओं में ही डगमग करती दिख रही है और इसका खामियाजा इस समय लिखी जा रही नयी रचनाओं को भुगतना पड़ता है। यह आलोचना किसी भी रचना को किसी व्यक्ति (लेखक) की अभिव्यक्ति या उसके विचार का ‘भाष्य’ अथवा ‘संप्रेषण’ मानते हुए, पाठ को छोड़ कर लेखक की गर्दन पकड़ लेती है। ऐसी आलोचना की व्याख्या या दुर्व्याख्या से रचना के पाठ की क्षति जितनी होती है, उससे अधिक उस व्यक्ति की हो जाती है, जो निर्दिष्ट संयोग से उस पाठ की निर्मिति के पूर्व उसका ‘लेखक’ हुआ करता था। रचना पीछे रह जाती है क्योंकि उसके पाठ को ‘पाठक’ की स्मृतियां और उनकी प्रज्ञाएं तो बचा लेती हैं, उत्पीड़न असल में लेखक का होने लगता है। किसी विकलांग ‘विकल-मस्तिष्क’ (एक अननुपातिक, असंयमित और अनैतिक विभ्रांत गुटबाज  लेखक का 'पद'-'जनसत्ता' से उद्धृत)  वाली आलोचना की तानाशाही के दौर में किसी लेखक का जीवन उस सूफी या संत जैसा होता है, जिसके पद और साखियों को तो सचेत जन-समुदाय बचा लेता है, लेकिन उस पाठ के रचनाकार की नियति उसे किसी मकतल या सलीब की दिशा की ओर ही अक्सर ले जाती अब तक इतिहास में दिखी है। हिंदी समाज में जितनी जातीयताएं, अस्मिताएं, वर्ग और उनसे संबद्ध जितनी तरह की राजनीतिक सत्ता-संरचनाएं हैं, उसके चलते लेखक और पाठ का संकट और गहरा हो जाता है। मैंने इसीलिए, समय-समय पर, मौका मिलते ही, सुजा़न सोंटाग, मुक्तिबोध या रोलां बाथ के विचारों का हवाला दिया है।
आप आज के समूचे समकालीन साहित्यिक परिदृश्य को देखिए। आत्मकथाओं, साक्षात्कारों, वक्तव्यों, डायरियों, संस्मरणों, आरोपों-प्रत्यारोपों से सब कुछ अंटा पड़ा है। कवि डायरियां लिख रहे हैं, कथाकार आत्मकथाएं और संस्मरण, जैसे उनका यह कर्म उनकी रचनाओं की ही निरंतरता का कोई जैविक-भौतिक साक्ष्य और सबूत हो। जब कि लिखना भाषा के भीतर घटित और संपन्न होती एक ऐसी प्रक्रिया या कर्म है जिसकी शुरूआत के पहले क्षण के साथ ही उस भाषा के समस्त कूटों, संकेतों, प्रतीकों के सभी बाहरी उद्गम-सूत्रों का विनाश शुरू हो जाता है। किसी भी रचना का भाषिक पाठ उस भाषा के बाहरी सूत्रों से उसके पृथक होने का, स्वतंत्र और मुक्त होने का पहला प्रमाण है। अगर ऐसा नहीं है, तो वह रचना अपने अनिवार्य एस्थेटिक्स में, रचना हो पाने से चूक जाती है।

(हांलाकि ऐसे समय में अपनी किसी आने वाली किताब की ऐसी भूमिका लिखना सत्ता और महत्वाकांक्षाओं के उन्माद में ग्रस्त सत्ता-समाज के 'कौरव-कोहराम'  या 'कुरु-कलरव' के बीच एक विगलित-विचलित हो चुके अकेले लेखक की 'फुसफुसाहट' से अधिक कुछ नहीं है, फिर भी इसका अगला बाकी हिस्सा कल या परसों आप यहां देखेंगे। यह भूमिका 'किताब घर' प्रकाशन से शीघ्र आने वाली  किताब 'मेरी प्रिय दस कहानियां' का  पहला तात्कालिक अंश है।)

19 comments:

Rangnath Singh said...

आपकी यह पोस्ट पढ़कर मंत्रबिद्ध सा हूं। विचारोत्तेजक, प्रेरक और मौलिक। निश्चय ही, मैं सहमति-असहमति के मकड़जाल से आगे बढ़कर इस पोस्ट को पढ़ रहा हूं।

फिरदौस, बात बोलेगी हम नहीं said...

KUCHH ACHHA PADHA PATA NAHI.N KAB HINDI AALOCHNA APNE STARIYA MANAK TAY KAREGI APNI GUTBAZION SE UPAR UTH PAYEGI....

Farid Khan said...

"....... आलोचना किसी भी रचना को किसी व्यक्ति (लेखक) की अभिव्यक्ति या उसके विचार का ‘भाष्य’ अथवा ‘संप्रेषण’ मानते हुए, पाठ को छोड़ कर लेखक की गर्दन पकड़ लेती है"।

कई अवसरों पर तुलसीदास की गर्दन आज तक पकड़ी जाती है। असल में हमारी अलोचना की 'ट्रेनिंग' ही ग़लत है। हमें तो यही पढ़ाया गया कि पाठ को समझने के लिए लेखक के व्यक्तिगत जीवन को समझना बड़ा ज़रूरी है। जबकि मैं हमेशा यह महसूस करता रहा हूँ कि 'निराला' के जीवन को यदि हम न जानें तो भी "राम की शक्ति पूजा" स्वतंत्र रूप से एक महान रचना है।

हिन्दी समाज का सही आकलन है।

डॉ .अनुराग said...

फिलहाल तो मै इस भूमिका का ही किसी कहानी सा आनंद ले रहा हूँ...वो कहते है न ...मामूली सी बात को दिलचस्प बना देना ...आपके जींस में उस अमीनो एसिड को ऊपर वाले ने फिट कर दिया है

अभय तिवारी said...

बहुत ही अच्छा, बहुत ही संतुलित लिखा है, उदय जी.. बस एक जगह आप एक आलोचक की शिनाख़्त करते हुए थोड़ा सा उन्ही भावनाओं को रस्ता देते से लगे जिन से हिन्दी समाज और हिन्दी लेखक दोनों पीड़ित हैं..

आप न जाने क्यों अपने लेखन को दीन मानते हैं? आप भले अपने लेखन को फ़ुसफ़ुसाहट समझें मगर पढ़ने वाले उस फ़ुसफ़ुसाहट को बड़े ध्यान से सुनते हैं, गुनते हैं।

अनिल कान्त : said...

आनंद आ गया.
उन पढने, सुनने वालों में हम भी शामिल है.

आशुतोष पार्थेश्वर said...

प्रतीक्षा है उदयजी !

Pepito said...

nice..i hope so your visit my blog..www.mypepito.info

शेखर मल्लिक said...

आपकी बातें पाठशाला हैं... किय्ना कुछ सिखाती हुईं. अप्पकी किताब की प्रतीक्षा है. शुभकामनायें.

शेखर मल्लिक said...

आपको पढ़ना पाठशाला जाने समान है... कितना कुछ सीखना... आपकी किताब की प्रतीक्षा है.. शुभकामनायें.

सुशीला पुरी said...

प्रेमचंद जी ने कहा है ---'' मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी लालसा है कि वह कहानी बन जाय । '' 'कहानीकार' कहानी लिखते लिखते कहानी बन जाय और कहानी बन जाय वह पाठक भी,उन कहानियों को पढ़ते पढ़ते । कहानियाँ लिखते वक्त आप जिस सृजन पीड़ा से गुजरते हैं उससे कहीं अधिक हम उसे पढ़ते हुये भी उसी प्रक्रिया से साक्षात करते हैं..., सार्त्र ने कहा है ----'' कहानी पढ़ने का मतलब है आईने मे कूदना '' आपकी कहानियाँ पढ़ते हुये मुझे बिल्कुल ऐसा ही महसूस होता है । मै अपने सहज अनुमान के सहारे आपकी कई कालजयी कहानियों के नाम मन मे दुहरा रही हूँ -- 'कि हाँ यह भी होगी ,वो भी होगी ,या ये तो जरूर होगी ....' कल मैंने 'दरियाई घोड़ा' पुनः पढ़ी ,और बहुत देर तक मुझे मेरे पिता याद आते रहे ...मेरा गाँव याद आता रहा........।

Uday Prakash said...

आपका आभार।
पहले एक असमंजस जैसा था कि ऐसे अति-उत्तेजित अतिरेकी समय में अपनी नयी किताब की ऐसी भूमिका लिखकर मैं अफ़्रीका में हिब्रू या बनारस-इलाहाबाद में यिद्दिश तो नहीं बोल रहा हूं, यानी कुछ ऐसा, जो सामूहिक उत्पाद बन चुकी व्यक्तिविहीन भाषा के अनगिनत उद्योगों-संस्थानों के शोर में किसी डरे हुए बच्चे का रोना या किसी अप्रासंगिक हकीर की आत्म-बड़बड़ाहट (स्वगत या सोलिलाक्विस) जैसा 'अनर्गल' लगे। लेकिन जब टिपाणियां देखीं, तो 'मोगांबो' (यानी एक्टर जोगिंदर सिंह, जो अब नहीं रहा) खुश हुआ!'
*अभय जी, आपकी बात से सहमत हूं। मैं उस शिनाख्त को हटा दूंगा। शायद लिखते-लिखते संयम कहीं फिसल गया था। संकेत के लिए आभार!
(लेकिन एक बात 'privately' मैं आपसे साझा करना चाहता हूं। आपसे इज़ाज़त लेकर! इसे बस एक हलका-फुलका व्यंग्य या मज़ाक ही समझियेगा..!....वो क्या है कि....जो है सो...अक्ख! अक्ख ! ...कि...मुझे पिछले कुछ सालों से एक 'फोबिया-सा' कुछ-कुछ हो गया है। आप तो जानते ही हैं कि मैं या तो लिखाई-पढ़ाई करता रहता हूं या इधर-उधर किसी खानाबदोश-सा घूमता-फिरता रहता हूं। (अदृश्य सरकार ने ऐसा ही बना दिया है)...तो..अक्ख !..उग्घ्घ..हुक्क्क... वो 'फोबिया-सा' यह है कि मुझे ना...'वि'-'वर्णधारी' व्यक्तिवाचक या व्यक्तिसूचक संग्याओं (proper nouns) से बहुत भय होता है। वे मुझे विकराल लगते हैं और मैं 'विकल-मस्तिष्क' हो जाता हूं और 'विधुर-विलाप'करने लगता हूं!... भा..भा..भा...भा..
आप नहीं समझे? चलिये इसे 'डिकोड' करे देता हूं..!
'वि-वर्णधारी'अर्थात उन पुरुषों-महापुरुषों के नाम, जिनके नाम का पहला वर्ण 'वि' से बनता है। 'व' व्यंजन जिसके साथ स्वर 'इ' की मात्रा छतरी की तरह पहले ही लग जाती है, बस फिर हनुमान चालीसा के बौराये पाठ से लेकर औलिया की दरगाह में अपनी सलामती की दारुण दुआ मांगते आप मुझे कभी भी देख सकते हैं। और जिसे 'हिंदी-समाज' कहते हैं, उसकी तख्ती देखते ही अक्सर चुपचाप.. जंगल, गांव, पहाड़ या फिर लोटा लेकर दिशा-मैदान का रुख कर लेता हूं। क्योंकि मेरे को ऐसा लगता है कि 'हिंदी-समाज' और कुच्छ नहीं, 'वि-वर्णधारियों' के दरबार की ही चाकर-चौपाल है। 'वि-वर्णी' सरदारों-श्रीमंतों-सामंतों का दरबार-ए-आम!...जो 'वि' वर्ण के धारक 'सवर्ण'महाजन-मठाधीश हैं वे हमेशा एक-दूसरे के साथ दरबार-ए-खास में विमर्श रत रस-सिक्त रति-रत होते हैं। सारा हिंदी समाज और उसका साहित्य इन्हीं 'वि' वर्णधारी विभूतियों के विपुल विरुद-गायन-वादन, भोजन-पादन, सृजन-प्रजनन से पटा पड़ा है। स्वयम शोध करिये..आप अचानक उस 'वि-वर्ण' सूची यानी V-index तक पहुंच जायेंगे।
तो...अब असल मेडिकल डायग्नोसिस पर आते हैं और हिंदी-समाज अर्थात हिंदी-साहित्य के 'वि' वायरस की शिनाख्त करते हैं, जिसने समस्त वैचारिक-विमर्शों के सताकेंद्रों को सांस्कृतिक'स्वाइन-फ्लू' की तरह संक्रमित कर रखा है। यह हमारे विकासवादी बौद्धिककाल का एच-वन एन-टू वायरस है! (छोड़े गये स्थान की पूर्ति आप ही कर लें। मेरे को चक्कर में ना डालें।)
(सर्व-श्री)(एक) विभूति ...(दो) विश्वरं,...(तीन) विश्वना......(चार) विष्णु .... (पांच) विद्या...(छह).....विमल आदि...इत्यादि..वगैरह...एट्सेटेरा!
विग्यान, साहित्य, अर्थशास्त्र आदि में इस देश को नोबल सम्मान जुटाने वाली भाषा 'बंगला' की ओर देखता हूं तो वहां 'वि' से विवेकानंद और विभूति भूषण वंद्योपाध्याय दिखाई देते हैं। दुर्भाग्य से हमारी भाषा का समाज विभूतिभूषण और विवेकानंद जैसे 'वि-वर्ण' धारकों का नहीं, 'V-viruses' का है।)
सलाम !
(हंसेंगे..तो अच्छा लगेगा और इस टिप्पणी के बाद अगर वाइरस के पालतू कीटाणुओं के मुझ पर हमले में साथ देंगे तो और भी अच्छा लगेगा)

प्रभात रंजन said...

आपकी भूमिका बहुत अच्छी लगी. आज मेरा एक आईएफएस दोस्त मुझसे पूछ रहा था कि हिंदी में उदयप्रकाश जैसे और लेखक हैं कि नहीं. आपसे बड़ी इर्ष्या हो रही थी. अभी भी आपके शब्दों का जादू बरकरार है. पढकर सुकून मिला.
सादर.

विनीत कुमार said...

हम चाहकर भी,लाख कोशिशों के वाबजूद भी पता नहीं क्यों आपको भरोसा दिला नहीं पाते,असमर्थ हैं कि आप अकेले हो गए लेखक नहीं है। पाठक को पूरी लेखन प्रक्रिया में शामिल करते हैं तो हमें अपना हिस्सा मानें। आपको बता नहीं सकता कि बरबस जब आपका नाम जिस सम्मान के साथ मैं उन लखटकिया टीचरों के आगे लेता हूं तो इर्ष्या से उनका चेहरा कैसे झुलस जाता है।..हमारी तकलीफ ये है कि हम इस भाव को,इस पूंजी को रॉ फार्म में आपके सामने पेश नहीं कर सकते।

सुनील गज्जाणी said...

uday jee ,
saadar pranam !
aaj sahitya ka roop sahyad badalta jaa raha hai . sahitya kaar achche lekhan karne ki bajaay shayad raaj neety karne lag gaye , ye main padha hai dekha hai agar kisi groop se aap belog karte hai to aap ko naye aayam milenge baaki aap ka bhagya hai . vakai aap jaise vyaktitav kam hi hai , aap ki post padh kar achcha laga .
saadar

प्रदीप कांत said...

आलेख में उठा सवाल कौनसी कहानी प्रिय है? और फिर रचना के काल और यथार्थ को लेकर सवाल। गम्भीर और विचारणीय आलेख है।

अनहद/aNHAD said...

पुस्तक का बेसब्री से इंतजार है.... बधाईयां....

vikram7 said...

विचारणीय आलेख,पुस्तक का से इंतजार है.

vikram7 said...

विचारणीय आलेख,पुस्तक का इंतजार है.