Friday, August 27, 2010

पाठ से पहले एक पूर्व-पीठिका (दो)

बहुत पहले, आकाशवाणी से प्रसारित रघुवीर सहाय द्वारा लिए गये एक लंबे साक्षात्कार में अज्ञेय ने रचना और रचनाकार के बीच के इस अंतराल या अलगाव को बहुत संलग्नता और गंभीरता के साथ विश्लेषित किया था। इसके लिए उन्होंने टी.एस. इलिएट के निबंधों और कविता-आलोचना की पुस्तक ‘दि सैक्रेड वुड’ का संदर्भ दिया था। इलिएट की इस पुस्तक से स्वयं उनकी अपनी आलोचना बहुत गहरे स्तर तक प्रभावित थी, यह उन्होंने इस साक्षात्कार में स्वीकार भी किया था।
संभवतः उस बातचीत के समय, इसी पुस्तक में संकलित इलिएट का बहुपठित निबंध ‘पंरंपरा और वैयक्तिक प्रतिभा’ उनकी स्मृति में रहा होगा। इस निबंध में इलिएट ने लिखा है कि ‘मृत लेखक हमें अपने से बहुत दूर इसलिए लगते हैं क्योंकि उनकी रचनाओं के जरिये हम उन्हें (बाद में) ज़्यादा नज़दीकी से जान चुके होते हैं।’ उसके अनुसार ‘कलाकार (या लेखक) का कर्म या प्रगति उसका निरंतर आत्मबलिदान और अपने व्यक्तित्व का निरंतर विलोपन (Extinction) या संहार है।
यानी लेखक नही, उसकी रचनाओं के पाठ ही उसकी निकट अस्मिता या पहचान के शेष सबूत या साक्ष्य होते हैं, स्वयं लेखक और उसका निजी जीवन नहीं।
विलक्षण कला-चिंतक वाल्टर बेंजमिन का भी कथाकार के बारे में मत था-‘भले ही कथाकार का नाम हमारे लिए परिचित हो, लेकिन अपने जीवन की सन्निकटता में वह किसी भी अर्थ में एक समकालिक शक्ति नहीं होता। वह तो हमसे दूर हो चुका कोई व्यक्तित्व है, जो हर पल हमसे और अधिक दूर होता जाता है।
दुर्भाग्य से हिंदी के हर आलोचक के पास उसकी राजनीति, धर्म, संघ-संगठन या क्षेत्रीय-जातीय हितों से जुड़ा प्लेटो जैसा कोई न कोई ‘रिपब्लिक’ पहले से रहता है, जिसमें से वह ‘विधर्मी-विजातीय’ कवि को बलात् निर्वासित कर देना चाहता है। इसके लिए वह कोई भी औज़ार चुन सकता है। ऐसा आलोचक पाठ के विरुद्ध दरअसल एक अघोषित ‘युद्ध’ छेडता है, और युद्ध में तो वैसे ही ‘सब कुछ जायज’ माना जाता है। उसके पास यथार्थ की कोई न कोई बनी-बनाई अवधारणा पहले से रहती है और भले ही बदले हुए दिक और काल द्वारा निरस्त किया जा चुका एक ऐसा पूर्वग्रह भी, जिसे वह ‘विचारधारा’ या किसी दूसरी सैद्धांतिकी के नाम की छद्म वैधता देते हुए, उससे रचना के पाठ का ‘विश्लेषण’(?) करता है।
बस ठीक यही वह बिंदु है जहां से समस्या, संकट, संदेह और सवाल जन्म लेते हैं। क्या वह आलोचक, उसकी आलोचना और उसकी प्रणाली सचमुच पाठ के ‘विश्लेषण या व्याख्या  के लिए उपयुक्त और वैध है? और क्या वह पाठ के साथ जो व्यवहार कर रहा है, वह सचमुच ‘व्याख्या’ ही है? या कुछ और ?
 कहीं ऐसा तो नहीं, जैसा कि एक विख्यात आलोचक ने कहा था, कि आलोचक का यह कार्य वर्चस्वशील सांस्कृतिक-राजनीतिक सत्ता के औज़ारों-उपकरणों द्वारा रचना के ‘पाठ’ का उत्पीड़न और उस पर विजातीय आक्रमण है। पाठ की जबरिया खुदाई, बलात् उत्खनन। पाठ में सहज रूप से उपस्थित मूल अर्थों-अभिप्रेतों का वैसा ही विस्थापन, जैसा किसी बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट के लिए आदिवासियों या मूल निवासियों का उनकी नैसर्गिक ‘मातृ-भूमि’ से होता है।
पाठ के साथ यह व्यवहार आलोचना जिन प्रचलित-चालू पारिभाषिक पदों और पद्धतियों के ज़रिये करती है, अगर आप उन्हें चिन्हित और प्रश्नांकित करें, उन पर संदेह करें, तो उसके द्वारा की गई सारी व्याख्या अपनी आलोचना के साथ धराशायी हो जाती है।
प्रख्यात आलोचक सुज़ान सोंटाग, जिनका हवाला मैं पहले भी देता रहा हूं, ने कहा है - ‘व्याख्या या आलोचना स्वयम् में कोई चरम मूल्य नहीं है, कोई ऐसा पवित्र-तटस्थ बौद्धिक कर्म, जिसकी उपस्थिति किसी ऐसी क्षमता के भीतर है, जो कालातीत हो। वह (आलोचना) स्वयम् संदिग्ध है। अब ज़रूरत स्वयं व्याख्या की व्याख्या और मनुष्य की चेतना के ऐतिहासिक परिसंदर्भ  में आलोचना के मूल्यांकन और पड़ताल की है। कुछ भाषाओं-संस्कृतियों में आलोचना अपने समाज के मृत और जड़ हो चुके अतीत को बदलने, संशोधित करने और उसका पुनर्मूल्यांकन करने का प्रयत्न करती है, या उससे मुक्ति के लिए संघर्ष करती है लेकिन कुछ भाषा-संस्कृतियों में यह पुरातनतावादी, कायर, भोंथरी और दमनकारी होती है।’ 
हिंदी में यही दूसरी स्थिति है। वह अधिकांश रचनाकारों और पाठकों के सम्मुख आज की राजनीति (जिसका वह स्वयम् आवयविक विस्तार और अनुषग है) की ही तरह अपनी वैधता और विश्वसनीयता खो चुकी है, उसके मुखौटे उतर चुके हैं, वह बेपर्दा हो चुकी है। लेकिन शायद अभी तक उसे या तो इसका बोध नहीं है, या फिर सत्तांध हो कर वह फाशीवादी विचार के जनक कहे जाने वाले दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे   की इस उक्ति पर अभी भी विश्वास रखती है कि ‘सत्य अपने आप में कुछ और नहीं होता, सत्य की व्याख्याएं ही सत्य हुआ करती हैं।’ या गोएबेल्स की वह कुख्यात उक्ति कि ‘झूठ को इतनी बार बोलो कि वह सच लगने लगे।’ इसका अमल हिंदी की फ़र्ज़ीआलोचना ने खूब किया है। (विडंबना बस यही है कि इसका सबसे अधिक लाभ स्वयं को परिवर्तनकामी और अग्रगामी कहने वाले कवियों-लेखकों ने उठाया है।)
इन दिनों सर्वत्र दिखाई देती आलोचना की दबंगई, अहंकार, निर्लज्जता और उसकी सनक के पीछे शायद यही धारणा काम कर रही है। वह कभी मनमाने और कभी किसी सोची-विचारी साजिश के तहत किसी रचना के ‘पाठ’ के पक्ष या विपक्ष में ऐसी आधारहीन, अनैतिक और अननुपातिक (हाइपरट्रॉफिकल) (दुः)‘व्याख्या’ को अंजाम देती है, जिससे किसी उत्कृष्ट रचना का अर्थ और महत्व नष्ट हो तथा उसके स्थान पर उसके अभीप्सित, उसके गुट के किसी ओछे या निम्नतर पाठ (और इसकी आड़ में उसके लेखक) को प्रतिस्थापित किया जा सके।
खुद सोचिये, एक एक ऐसे जटिल और बहुजन-समाज की संस्कृति, जिसकी सबसे बड़ी विडंबना उसकी लगातार बढ़ती अतिसंवेदी असहिष्णुता, अतिरेकी, हिंस्र और अराजक होती मानसिकता और प्रतिहिंसात्मक वृति है, उसमें आलोचक की यह अतिरंजित निहद्द ‘हाइपरट्रॉफी’, उसका फुफकारता-फुंसेटता, फेंचकुर फेंकता उद्दंड प्रलाप क्या विकल-उन्मादी मस्तिष्क का किसी निहत्थी रचना और उसके पाठ पर लंपट ‘हमला’ नहीं ? ....और उसके द्वारा की जाने वाली ‘व्याख्या’ क्या वही नहीं है, जिसकी शिनाख़्त सुजा़न सोंटाग ने इन शब्दों में की थी -‘ऐसी व्याख्या अतिरेकी बुद्धि द्वारा, रचनात्मक ऊर्जा और ऐंद्रिक संवेदनशीलता की कीमत पर,  कला के साथ की गई एक प्रतिशोधात्मक कार्रवाई है।’
मैं अपनी कहानियों के इस संचयन के पहले ऐसा इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मेरी कहानियों के ‘पाठ’ के साथ ही नहीं, स्वयं मेरे निजी जीवन के साथ भी हिंदी की प्राध्यापकीय या सत्ताकेंद्रित आलोचना तथा उनसे अनिवार्य रूप से संबंद्ध साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थानों ने यही ‘प्रतिशोधात्मक कार्रवाई’ पिछले कई दशकों से, बार-बार की है। इसके द्वारा उसने रचना के पाठ और उसके अर्थाशयों को क्षतिग्रस्त तो किया ही है, एक नागरिक लेखक के बतौर उसने इन कहानियों के लेखक को एक गरिमाहीन, सामाजिक-आर्थिक अनिश्चयात्मकताओं से  भरे निर्वासन की ओर धकेलने की लगातार कोशिश की है। इसमें वह एक हद तक कामयाब इस मायने में रही है कि उसने इस जीवन की वास्तविक सूचनाओं को अपनी सामूहिक-सांगठनिक ताकत के ज़रिये या तो सेंसर किया है या उन्हें अफवाहों से विस्थापित किया है। मेरी ही एक कविता की पंक्ति है-‘जो यथार्थ को व्यक्त करता है, वह मार दिया जाता है अफवाहों से।’ 
अगर आप मेरी कहानियों-कविताओं और उनसे संबंधित हिंदी की आलोचना आदि से परिचित हैं तो ‘टेपचू’ और ‘तिरिछ’ जैसी प्रारंभिक कहानियों से लेकर ‘वारेन हेंटिंग्स का सांड’, ‘पॉल गोमरा का स्कूटर, ‘और अंत में प्रार्थना’ जैसी बीच की, और ‘पीली छतरी वाली लड़की’, ‘मोहन दास’ और ‘दिल्ली की दीवार या ‘मैंगोसिल जैसी हाल-फिलहाल की कहानियों-लघु-उपन्यासों को लेकर हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं में आलोचकों-संपादकों द्वारा चलाये गये ‘विवादों’ से भी परिचित होंगे। उन विवादों के स्तर और उनके ‘मकसद’ को लेकर, या उनके पीछे उपस्थित सत्ता-केंद्रों के बारे में मैं अलग से कुछ कहना नहीं चाहूंगा। यहां मुझे अपने प्रिय और अत्यंत प्रतिभाशाली आलोचक वाल्टर बेंजमिन की फिर याद आती है, जिन्होंने ‘कहानीकार’ शीर्षक से अपने प्रिय कथाकार निकोलोइ लेस्कोव (The Storyteller:Reflections on the works of Nikoloi Leskov) के बहाने किसी किस्सागो की रचना और उसके जीवन में आने वाले संकटों-चुनौतियों का गंभीर और अविस्मरणीय विश्लेषण किया था।
बीसवीं सदी में, प्रथम विश्युवद्ध की हिंसा और अमानवीय विभीषिका में से होकर और बचकर जो लेखक लौटा था, उसके आत्मानुभव इतने आक्रांत करने वाले थे कि वह स्वयं को लंबे समय तक ‘निर्वाक्’ पाता रहा। उसके भीतर यह आशंका निरंतर थी कि वे ताकतें जो उस हिंसा और संहार में सम्मिलित थीं, वे प्रच्छन्न रूप से संस्कृति और समाज में, हार या जीत से अलहदा, ज्यों की त्यों मौज़ूद हैं।
आप स्वयं सोचिये बेंजामिन यह तब लिख रहे थे, जब यूरोप में नाजीवाद मानवता को दूसरे विश्वयुद्ध की ओर धकेल रहा था। वहां का नस्लवाद, जो किसी भी मायने में हमारे देश के जातिवाद और सांप्रदायिकता से कमतर नहीं है, बीसवीं सदी के मध्य में जिस भय और आतंक को रच रहा था, उसमें बेंजमिन जैसे अत्यंत संवेदनशील कला-चिंतक की पहली चिंता यही थी कि ‘क्या अब कोई कथाकार कहानी में सच लिखने का साहस दिखा पाएगा? क्या कहानी अपने अंत के कगार तक पहुंच गई है? हमें अब (अपने समय की) कहानी कहने वाले कथाकार कम से कम क्यों दिखते हैं? वह जो अब से कुछ समय पहले तक हमसे अविच्छिन्न था, उसे हमसे अचानक किसने छीन लिया है?’
जब मैं अपनी कहानियों और जीवन के बारे में सोचता हूं, तो वाल्टर बेंजमिन का निबंध अक्सर याद आता है।

मुझे खुशी यही है कि पाठकों ने, जिनमें हिंदी ही नहीं अन्य भारतीय और अंतरराष्ट्रीय भाषाओं के पाठक बहुत बड़ी संख्या में शामिल हैं, मेरी रचनाओं को अपनाया। अन्य भाषाओं के विद्वानों और वैश्विक  प्रतिष्ठा प्राप्त आलोचकों-विचारकों ने भी इन रचनाओं को महत्व और अपूर्व सम्मान दिया। मैं आज गर्व से कह सकता हूं कि जिन रचनाओं के कारण हिंदी सत्ता-केंद्रों और प्रतिष्ठानों ने, जातीय तथा राजनीतिक पूर्वग्रहों के चलते, मुझे प्रताड़ना, लांछनाएं और कष्टप्रद ओछे विवाद दिये, उन्हीं रचनाओं के अन्य भाषाओं में अनुवादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति मिली।
मैंने इस संग्रह में जान-बूझ कर उन कहानियों को भी सम्मिलित किया है, जिनकी ‘व्याख्याएं’ अनेक रूपों में हिंदी की प्रचलित आलोचना में आपको यहां-वहां मिलेंगी। अब इस संकलन के माध्यम से आपके पास उन कहानियों का मूल ‘पाठ’ है, आप स्वयं इस पर अपना मत देंगे।
कहानी एक ऐसी जनप्रिय कला है, जिस पर समय-समय की तमाम सत्ताओं द्वारा लगाए गये अभियोगों पर अंतिम फैसला, पाठकों की ‘जन-अदालत’ ही देती है।
तो आपके कठघरे में अपनी दस प्रिय कहानियों को खड़ा करते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है। उम्मीद है आप इस चयन को पसंद करेंगे।

18 comments:

डा.सुभाष राय said...

उदय प्रकाश जी, आप की पाठ से पहले पूर्वपीठिका के दोनों भाग पढ़कर आप की चिंता में सहभाग का मन हुआ। मुझे याद है बहुत पहले, शायद दो दशक से भी पहले आप की टेपचू कहानी पढ़्कर मैं बहुत प्रभावित हुआ था और आप से टेपचू का पता मांग बैठा था. तब आप का पोस्टकार्ड आया, जिसमें आप ने लिखा था, देखो वह हर जगह मिल सकता है. आप के जवाब को बाद में समझ पाया. पर मैं इतना तो समझ सकता हूं कि एक अच्छी कहानी किस तरह बेचैन कर देती है. इस बात में किंचित संदेह नहीं कि आलोचकों की एक जमात गोयबल्स की तरह झूठ को सच की तरह पेश कर अपना निहित मंतव्य पूरा करने में लगी है, पर पाठकों की भी अपनी सत्ता है और वह हर अफवाह पर भरोसा करने को तैयार नहीं. आप ने साहित्य के खिलाफ षडयंत्र करने वालों को लतियाकर ठीक किया है, पर इतना डर भी ठीक नहीं कि बात अपने रास्ते से भटक जाय. मैं आज की कहानी और आप की कहानी पर आप की बात ढूंढता रहा पर आप लगातार शत्रुओं से सावधान करते नजर आये. खैर स्वागत है आप के नये संकलन का. पढ़्ना चाहूंगा.

Farid Khan said...

आपके कहानी संग्रह की यह भूमिका 'आलोचना' के लिए एक बहुत ज़रूरी लेख है। संग्रह का इंतज़ार है। बधाई और शुभकामनाएँ।

सुशीला पुरी said...

गोएबेल्स के कुख्यात कथन को जितना भी 'अतिरिक्त बुद्धिजीवी आलोचक' अमल मे लाएँ वह रहेगा झूठ का झूठ ही ...। और 'जो यथार्थ को व्यक्त करता है , वह मार दिया जाता है अफवाहों से'......के बदले मै कहना चाहती हूँ कि --
'फुसफुसाहटों ने रच दिया ऐसा इतिहास
जिसकी आँधी मे 'अफवाहें' आफत मे हैं
दशों दिशाओं मे गूँज रही हैं फुसफुसाहटें
पुरवाई चलती है तो वे पूरब से आती हैं
पछुवा चलती है तो वे पश्चिम से आती है
और जब बंद होती है हवा
तो बजतीं हैं वे हमारे सीने मे
साँसों के सरगम की तरह,
वह जो यथार्थ था !
वह कालातीत है
वह अभी अभी जन्मा था
वह अभी अभी जन्मा है
वह अभी अभी जन्मेगा'
................. ।
आपके इस प्रिय संकलन की प्रतीक्षा मे ---

आशुतोष पार्थेश्वर said...

उदयजी !
मेरे एक अग्रज मित्र हैं, उर्दू के; पढ़ते-लिखते रहते हैं, भागलपुर के हैं । कहानियों पर बात करते-करते एक दिन, कुछ पुरानी बात को याद करते हुए उन्होंने कहा-" अरे वो कौन कथाकार है हिन्दी का बहुत पहले पढ़ी थी कहानी उसकी,क्या नाम था कहानी का, हाँ 'टेपचू';क्या कहानी थी, छोड़ना चाहता था, कब ख़त्म हो कहानी पर वह कहानी छोड़ती ही नहीं थी और न ख़त्म हो रही थी, वह रहस्य और तिलिस्मी कहानी नहीं थी, ठेठ ज़िंदगी की-पर ज़िंदगी भी क्या ऐसी होती है ! लाजवाब कहानी थी । ज़िंदगी ऐसी भी हो सकती है, और होती है । अरे, क्या नाम था लेखक का, नाम भूल रहा हूँ ।" मैंने कहा- उदय प्रकाश । "हाँ, उदय प्रकाश"-दुहराया उन्होंने । बड़ा लेखक है वह। "अरे,सालों बीत गए,क्या कहानी थी, एक एक परत उघाड़ती जाती थी ।" फिर कहा उन्होंने । "कुछ और पढ़ाना उदय प्रकाश का । बड़ा लेखक है ।"

उदयजी,आप हमारे प्रिय लेखक हैं ।
शुभकामनाएँ ।

संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...

10 kahaniyoN wali is qitaab ke sath rahna, ghar me 24 ghaNte ek samajhdar aur samvedansheel dost ke sath rahne ki tarah hoga..

सुनील गज्जाणी said...

आदरणीय उदय प्रकाश जी
सादर प्रणाम !
आप ने बहुत ही ज्ञान वर्धक जानकारी हमे प्रदान कराई ,
साधुवाद ,
सादर !

cmpershad said...

"यानी लेखक नही, उसकी रचनाओं के पाठ ही उसकी निकट अस्मिता या पहचान के शेष सबूत या साक्ष्य होते हैं, स्वयं लेखक और उसका निजी जीवन नहीं"

सही है, ओ हेनरी की कहानियां आज भी प्रचलित हैं जबकि लोग यह भूल गए कि चोरी के इल्ज़ाम में उन्हें जेल भी हुई थी !!

डॉ .अनुराग said...

दरअसल शब्द किसी लेखक की पहचान होते है ...सूचनायो की इस भीड़ में लेखक कही ना कही अपने तय किये हुए शब्दों का इस्तेमाल ना कर अपनी उस सोच का भी इस्तेमाल करता है जहाँ वह केवल एक व्यक्ति भी है .लेखक से इतर...शायद वही उसके व्यक्तित्व का निरंतर विलोपन (Extinction) या संहार का कारण भी बनता है .या दस्तावेज के रूप में जमा रहता है

शशिभूषण said...

बहुत ज़रूरी भूमिका.
जिस तरह आपकी कहानियों को अभियुक्त बनाया जाता रहा है उसे देखते हुए यह लेखकीय चिंता वैसी ही लगी जैसे माँ समझाती है बेटी,अच्छे से रहना,खुद ही अपना खयाल रखना...किसी मां की यह सीख भी संसार का पूरा पता देती है अगर हम ठहरकर सोच सकें.
यह बाँटते हुए थोड़ा संकोच लग रहा है पर यहाँ आपको पढ़ते हुए मैं थोड़ी देर के लिए खुद को रोक नहीं पाया और यह भी लिख गया

देश में कोई दोस्त नहीं रहा
किसी का भरोसा नहीं किया जा सकता
आलोचना में भी सच नहीं रहा
दुआएँ झूठ हो गईं
सब हुए हत्यारे सुखों के साथ
ज़हर मिले दूध जैसी हो रही है दुनिया
यह कहते हुए
भीतर बादल फटते हैं
धसकते हैं पहाड़
पुराने झिर सूख जाते हैं
पेड़ों को लग जाती है लू
निर्जन हो जाता हैं संसार
पर कहे बिना नहीं रहा जाता.
ज़िंदा रहने के लिए फुसफुसाता है मन
इसी देश में है मेरा प्यार...
फूल जैसे बच्चे.

शशिभूषण said...

बहुत ज़रूरी भूमिका.
जिस तरह आपकी कहानियों को अभियुक्त बनाया जाता रहा है उसे देखते हुए यह लेखकीय चिंता वैसी ही लगी जैसे माँ समझाती है बेटी,अच्छे से रहना,खुद ही अपना खयाल रखना...किसी मां की यह सीख भी संसार का पूरा पता देती है अगर हम ठहरकर सोच सकें.
यह बाँटते हुए थोड़ा संकोच लग रहा है पर यहाँ आपको पढ़ते हुए मैं थोड़ी देर के लिए खुद को रोक नहीं पाया और यह भी लिख गया

देश में कोई दोस्त नहीं रहा
किसी का भरोसा नहीं किया जा सकता
आलोचना में भी सच नहीं रहा
दुआएँ झूठ हो गईं
सब हुए हत्यारे सुखों के साथ
ज़हर मिले दूध जैसी हो रही है दुनिया
यह कहते हुए
भीतर बादल फटते हैं
धसकते हैं पहाड़
पुराने झिर सूख जाते हैं
पेड़ों को लग जाती है लू
निर्जन हो जाता हैं संसार
पर कहे बिना नहीं रहा जाता.
ज़िंदा रहने के लिए फुसफुसाता है मन
इसी देश में है मेरा प्यार...
फूल जैसे बच्चे.

Rangnath Singh said...

बहुत ही प्रभावी और अर्थवान भूमिका है। आपके इस संकलन का इंतजार रहेगा।

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi said...

उदय जी, आप जितना ज्ञान तो नहीं मुझे, लेकिन आपकी बातों से मैं व्‍यक्तिगत तौर पर सहमत हूं। पाठालोचन के बजाय हमारे यहां प्रारंभ से ही यानी शुक्‍लजी के जमाने से ही व्‍यक्ति आधारित आलोचना चली आ रही है। इसीलिए शुक्‍लजी ने कबीर को सधुक्‍कड़ी कह कर नकार दिया था। ...अंत में रचना ही बचती है, शायद लेखक भी मर जाता है, भले ही रचनाकार के तौर पर उस रचना के साथ उसका नाम जिंदा रहे।... विवादों से लेखक क्‍या आम आदमी भी विचलित हो जाता है। लेकिन साहसी रचनाकार और व्‍यक्ति 'चलो एकला' हो जाता है।...एक सच्‍चा रचनाकार हमेशा ज्ञात-अज्ञात भयों से ग्रस्‍त रहता है। समकालीन फ्रांसिसी लेखिका एलफ्रीडे जेलेनीक, जिन्‍हें नोबल पुरस्‍कार मिल चुका है, अपने घर से बाहर तक नहीं निकलतीं, उन्‍हें विमान में बैठने तक से डर लगता है। उनके नाटकों और उपन्‍यासों पर जबर्दस्‍त विवाद हुए, क्‍योंकि वे उस समय को अपनी रचनाओं में व्‍यक्‍त कर रही हैं, जो अत्‍यंत विद्रूप और घ़णास्‍पद है। छद्म नैतिकता और भयानक प्रपंच-वितण्‍डा के दौर में कोई भी संवेदनशील व्‍यक्ति आत्‍म-निर्वासन के लिए मजबूर हो सकता है। कई साल पहले ना जाने किस परिस्थिति में मैंने 'आत्‍म-निर्वासन' कविता लिखी थी, जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-
स्मृतियों में जीना साम्प्रदायिक होना है
और विस्मृति में जीना धर्म विरूद्ध
दीपक जलाना आधुनिकता के खि़लाफ़ है
और अंधेरे को अंधेरा कहना बेहद ख़तरनाक

आप मौन और वाणी से लेकर
किसी भी चीज़ का
हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते

किसी भी प्रकार का प्रतिरोध
अन्ततः एक राष्ट्रद्रोह है

मानव सभ्‍यता कहते हैं कि हमेशा ही खतरनाक दौरों से गजरी है, हर पीढी यही कहती आई है। हमने ना 'रामराज' देखा और ना ही इतिहास का कोई स्‍वर्णकाल। लगता है मनुष्‍य सभ्‍यता आरंभ से ही ऐसे किसर राज या काल की कल्‍पना में जीती रही है, जिसे रचनाकार झुठलाते रहे हैं।...स्‍वर्णिम काल या रामराज सिर्फ सत्‍ताकामी या सत्‍ताधीशों का होता है। बाकी लोग अपने अस्तित्‍व के लिए संघर्ष करते रहते हैं और काल कलवित हो जाते हैं।... आपके संग्रह की प्रतीक्षा रहेगी।...कुछ गलत कह गया होउं तो क्षमा करें।

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi said...

आदरणीय उदय जी, आपकी यह पूर्व पीठिका भारतीय साहित्‍य में एक बेहद जरूरी हस्‍तक्ष्‍ेाप है। सच में हम एक अत्‍यंत आत्‍मकेंद्रित समाज के नागरिक हैं, जिसमें असहमति का कोई स्‍थान नहीं।... आपकी चिंता जायज है और मैं आपकी बातों से व्‍यक्तिगत रूप से सहमत हूं और कहना चाहता हूं कि हिंदी आलोचना शुक्‍ल जी के जमाने से ही व्‍यक्ति-केंद्रित और संदिग्‍ध तौर पर 'बायस' रही है। इसीलिए कबीर जैसे महाकवि को शुक्‍लजी ने 'सधुक्‍कड़ी' कह कर नकार दिया। शायद हिंदी आलोचना के इस प्रस्‍थान बिंदु से ही गड़बड़ी शुरु हो गई थी, जो आज प्रछन्‍न रूप में दिखाई दे रही है। ...रचना को व्‍यक्तिवादी तौर पर जांचने-परखने का श्रेय हिंदी समाज की जातिवादी मानसिकता को जाता है, जिसने कहने भर को सफाई करने वाली मेहतरानी को बुआ, दीदी, चाची, ताई आदि संबोधन तो दिए पर उसका स्‍पर्श त्‍‍याज्‍य और गृहप्रवेश निषिद्ध रखा। क्‍योंकि रचनाकार भी अंतत: समाज में मेहतर ही होता है, जिसका काम समाज की सफाई करना होता है। हिंदी समाज अंतत: एक सामंतवादी समाज है जहां व्‍यक्तिपूजा और पंथपूजा प्राथमिक दायित्‍व है। ... हम बहुत संगीन माहौल में जी रहे हैं। संभवत: हर काल ऐसा ही होता है। हम जब किसी भी कालखंड के रचनाकार को पढते हैं तो लगता है कितने तनावों से गुजरकर लिखी गई होगी यह अनमोल कृति। संभवत: ऐसे ही किसी तनाव में कवि ने 'निंदक नियरे राखिए' कह कर, उसकी कथित सहानुभति चाही होगी। क्‍योंकि हम जानते हैं कि इतिहास में निंदक या आलोचक प्राय: सत्‍ताकेंद्र के निकट रहा है।...हर रचना को लिखने के बाद लेखक मर जाता है। लेखक का नाम रह जाता है। लेखक के जीवन से रचना का संयोग भर होता है, इसलिए किसी रचना को लेखक के जीवन से जोड़कर देखना बिल्‍कुल गलत है।... महात्‍मा गांधी तोलस्‍तोय को गुरु मानते थे, लेकिन गांधीजी भी नहीं जानते थे कि उनके गुरु ने अपनी नौकरानी से बच्‍चे पैदा किए।...तोलस्‍तोय की रचनाओं से तोलस्‍तोय को नहीं जाना जा सकता। क्‍योंकि एक ईमानदार आदमी ही जानता है कि बेईमान होने के कितने तरीके हैं और बेईमान ही बेहतर बता सकता है कि ईमानदारी से कैसे रहा जा सकता है।... हर दौर में संवेदनशील रचनाकार के साथ विवाद हुए हैं उदय जी, आम आदमी साथ भी। लेकिन सच के साथ रहने वाला कभी घबराता नहीं और अपनी राह चला चलता है। .... एक अराजक समय में आपकी उत्‍कृष्‍ट रचनाओं का स्‍वागत है। ... कुछ गलत या अतिरिक्‍त कह दिया तो क्षमा चाहता हूं। ...इन दिनो फ्रेंच कवि, नाटककार और उपन्‍यासकार एलफ्रीडे जेनेलीक को पढ़तें हुए महसूस हुआ कि अपने समय से चिंतित रचनाकार कितना भयग्रस्‍त रहता है। एलफ्रीडे तो इस कदर भयग्रस्‍त रहती हैं कि अपने घर से बाहर नहीं निकलतीं, उन्‍हें विमान में बैठने तक से डर लगता है। वो नोबल पुरस्‍कार लेने के लिए नहीं गईं। उनके नाटकों और उपन्‍यासों पर जितने विवाद हुए हैं वो तो आपसे शायद कम हैं। .... पर आपके साथ हम जैसे पाठक हैं, जो हर सच्‍चे लेखक के साथ होते हैं। नई किताब का स्‍वागत है और आप आपके लिए हमारी शुभकामनाएं कि आप हमेशा हमारे रहगुजर बने रहें।

dimple said...

अच्छी रचनाएँ समय काल से परे होती है और अपनी जगह अपने आप बिना किसी परिश्रम से बना लेती है...

dharmendra said...

Uday G i am waiting for it

dharmendra said...

Uday G i am waiting for it.

niranjan dev sharma said...

उदय जी ,आपके कथा लेखन को मिल रही व्यापक पाठकीय स्वीकृति से जड़ और प्रपंची आलोचना की प्रासंगिकता पर अपने आप सवालिया निशान लग जाता है। जहाँ किसी रचनाकार की नई रचना का पाठकों को बेसब्री से इंतजार रहता है उन विरले रचनाकारों में आप हैं।

नए संग्रह का इंतजार है।

शेखर मल्लिक said...

उदय जी, आपकी बातें ज्ञान की रौशनी में ले जाती हैं. हमारे लिए ये गर्व की बात है कि आप हमारे समय में हैं. आपके इस संग्रह के लिए शुभकामनायें और प्रतीक्षा में.