(१९९६ में बरगी बांध के विस्थापितों के लिए किए जा रहे आंदोलन में भाग लेते हुए मेधा पाटकर को वहां के कलेक्टर और एस.पी. ने रुखन जंगल के वन विभाग के रेस्ट हाउस में १३ दिन तक रखा था। इसी में एक तेंदुआ भी पिंजड़े में रखा गया था। कहा जा सकता है कि सरकारी रेस्ट हाउस, जो सिर्फ़ सरकारी अफ़सरों और राजनीतिक नेताओं आदि (तथा उनका खुशामदी, उन पर आश्रित वह वर्ग जिसे हम चोम्सकी जैसे चिंतकों के शब्दों में 'अदृश्य सरकार' (इनविजिबिल गवर्नमेंट) कहते हैं ) के लिए ही ज़्यादातर इस्तेमाल होता है, उसमें मेधा पाटकर और वह तेंदुआ, दोनों कैद में ही थे। मेधा पाटकर ने यह कविता उन्हीं दिनों लिखी थी। पहली बार यह कोलकता से प्रकाशित होने वाली पत्रिका- 'वागर्थ' के सितंबर, २०१० अंक में प्रकाशित हुई है। यह कविता आप भी पढें। लेकिन इस कविता को पढ़ते हुए इसके 'अंतर-पाठ' और 'उत्तर-पाठ' पर ज़रूर विचार करें, यह मेरा आग्रह है। निहायत सहज भाषा में, अत्यंत साधारण सी लगती इस कविता का 'अंतर-पाठ' हमारे आज के समय के गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक संकेतों को अंतर्भूत करता चलता है। इस कविता में आने वाले - 'छंद-मुक्त तेंदुआ और मैं' , 'रक्षा-बंधन में आज/ कल और इस पल भी/ तेंदुआ और मैं..' , 'व्यवस्था के कब्ज़े में अस्त-व्यस्त/ तेंदुआ और मैं/' , बंदूकों की नलियों में ठुसे अंधेरों में/ निद्रित तेंदुआ और मैं/' 'रेस्ट हाउस में एवरेस्ट के पहरेदार / तेंदुआ और मैं..' जैसी सरल और समकालीन हिंदी कविता में प्रचलित भाषिक संरचनाओं में लगभग अनुपयु्क्त या विसंवादी-सी लगती अभिव्यक्तियां वस्तुत: ऐसी अर्थवान कूट-संरचनाएं हैं; जिनके अर्थ कविता, लोकतंत्र, स्त्री अस्मिता, पितृसत्तात्मकता, राजनीतिक -प्रणाली, पर्यावरण और नागरिक अधिकारों की वास्तविक अवस्थितियों की पहचान तक पहुंच कर खुलते हैं या 'डिकोड' होते हैं।
हमारा आज का साहित्य जिन 'जगहों' से संचालित और सम्मानित-प्रतिष्ठित होता है, कविता का 'उत्तर-पाठ' उस 'पद-कूट' को रोज़-रोज़ इस्तेमाल से घिसे हुए 'रेस्ट हाउस' जैसे मामूली संबोधन से अचानक एक ऐसे गहरे और चिंताजनक अर्थाशय से संपृक्त कर देता है, कि यह कविता मामूली नहीं रह जाती, आज के समय के गहरे संकटों और उत्पीड़न के कई 'रूपों' को निर्भयता से खोलने वाली एक महत्वपूर्ण कविता बन जाती है।
यह असंदिग्ध रूप से किसी भी भारतीय भाषा की ही एक 'समकालीन' कविता है, क्योंकि 'मराठी' या 'हिंदी' जैसा साधारण लगने वाला, एक किसी 'भाषा' को संकेतित करने वाला शब्द भी, 'एक वचन' नहीं। अपने कथ्य में हमारे देश में आज के सबसे गंभीर संकट और विडंबना को धारण करने के कारण यह 'विश्व-कविता' का सहज हिस्सा बन सकने की संभावना और सामर्थ्य रखती है। इसका अन्य भाषाओं में भी अनुवाद होना चाहिए।
पर्यावरण और नागरिक-मानवीय अधिकारों के लिए वर्षों से इस संघर्षरत शांतिकामी महान व्यक्तित्व की यह कविता प्रस्तुत करते हुए मुझे गर्व और सार्थकता की अनुभूति, दोनों एक साथ है। आशा है आप भी इसे पढ़ेंगे। )
रेस्ट हाउस, तेंदुआ और मैं
मेधा पाटकर
निर्जन वन के आवरण में 'सुरक्षित'
तेंदुआ और मैं
हरे भरे बादलों और सूरज की धार से
छंद मुक्त तेंदुआ और मैं
बंदूकों की नलियों में ठुंसे अंधेरे में
निद्रित तेंदुआ और मैं
हर सुबह की आहट से दूर
तेंदुआ और मैं
रक्षा-बंधन में आज
कल और इस पल भी
तेंदुआ और मैं
अपनी ही आवाज़ सुनने में व्यस्त
तेंदुआ और मैं
बाहर से भीतर-निडर
तेंदुआ और मैं
व्यवस्था के कब्ज़े में अस्त-व्यस्त
तेंदुआ और मैं
रेस्ट हाउस में एवरेस्ट के पहरेदार
तेंदुआ और मैं।
(अनु. परवीन जहांगीर, इस कविता को उपलब्ध कराने में सिवनी निवासी व्रजकिशोर चौरसिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वे बरगी बांध आंदोलन में मेधा जी के साथ रहे हैं। अगर उन्होंने इस कविता को सुरक्षित न रख लिया होता, तो यह 'वागर्थ ' के माध्यम से हम तक न पहुंच पाती)
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The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled
23 comments:
ये तेंदुए तो किसी भी सरकारी दफ़्तर में मिल जाएंगे और फिर, यह गेस्ट हाउज़ उन्हीं के लिए तो है :)
मेधा जी की संवेदनशील कविता ले लिए आभार॥
कहते है न कवि अपने समय का चौकीदार होता है.....ठीक कहते है
'हिंदी' स्वयम में सामाजिक, जातीय, सांस्कृतिक वास्तविकताओं में 'एक वचन' नहीं है। 'हिंदी' दर असल 'भाषिक-बहुलता' को ढंकने वाली एक राजकीय 'संज्ञा' है। :)
पिछले दिनों हिंदी साहित्य में, एक पुलिस अधिकारी, जो एक वि.वि. का कुलपति बना दिया गया है, ने कुछ लेखिकाओं के लिए 'छिनाल' शब्द का इस्तेमाल किया। ऐसे ही सामंती सोच के पुलिस अधिकारी 'रक्षा-बंधन' के दिन एक स्त्री और वह भी एक महान शख्शियत को 'तेंदुए' के साथ 'रेस्ट हाउस' में कैद करते हैं। लेकिन ऐसे ही रेस्ट हाउसों में हिंदी की चर्चित लेखिकाएं और लेखक, ऐसे ही पुलिस अधिकारियों और कलेक्टरों के निमंत्रण पर आनंद मनाती हैं। सच पूछिये तो सारा हिंदी साहित्य ही आज कल 'रेस्ट हाउसों' और सरकारी 'होटलों' से अफ़सरों-पुलिस वालों द्वारा संचालित हो रहा है।
इतनी सीधी-सच्ची लेकिन अर्थवान कविता को प्रस्तुत करने के लिए आपका आभार।
मेधा जी का एक एक पग कविता की तरह है ... उनके जैसी जुझारू और साहसी यदि हमारे समाज मे 2 प्रतिशत लोग भी हो जाएँ तो शायद भला हो हम सभी का...। उनकी कविता पढ़वाने के लिए आपका आभार ...!
अपनी ही आवाज़ सुनने में व्यस्त
तेंदुआ और मैं
बाहर से भीतर-निडर
तेंदुआ और मैं
व्यवस्था के कब्ज़े में अस्त-व्यस्त
तेंदुआ और मैं
Wah ke alaawa aur kya bachta hai kahne ko...nishchaya hi is wah me aah bhi chhupi hai..
मेधा जी की इस मेधा से परिचय के लिए आभार।
पहली नज़र में साधारण सी दिख्नने वाली कविता शब्द-दर-शब्द जैसे-जैसे अर्थों को खोलती है, वैसे-वैसे महत्वपूर्ण होती जाती है....
शुक्रिया, इस नेक कर्म हेतु
मेधा जी की अद्भुत कविता! आभार "वागर्थ" और आपका कि मेधा जी की काव्य-प्रतिभा से परिचय कराया! लेकिन मेधा जी का यह फोटो तो मैंने खींचा था ...जहाँ तक मुझे याद है....क्या यह वही है...?
बहुत-बहुत आभार !
मुझे हमेशा लगता है कि कविता को जीवन और उसका अनुभव ही लिखता है। वही कवि और वही कविता समय और स्मृति में शेष बचती भी है। सिर्फ़ भाषा की विदग्धता या चतुराई, वह भी किसी तेज़ी से, हर रोज़ बदलती भाषा में ..ऊपर से जैसा अजेय जी ने लिखा कि 'जो भाषा singular नहीं है', जिसकी अनेक जातीय, क्षेत्रीय, आदि बहुलताएं हैं, किसी कवि और उसकी कविता देर और दूर तक नहीं बचा सकती। केशव की कविताई और कबीर की 'फक्कड़' 'सधुक्कड़ी'का अंतर और प्रभाव आज देखिये। कौन बचा? सारे हिंदी विभाग के अचार्य और आलोचक केशव को विस्मृति से नहीं उबार सके। (हालांकि, अगर सिर्फ़ काव्यभाषा की संरचना के अकादमिक 'पाठालोचन' के लिहाज से देखें, तो केशव की अलग जगह हो सकती है। क्लास रूम में।)
मेधा पाट्कर की यह कविता हमारे समय का एक बहुमूल्य कव्यात्मक उत्कीर्णन है। जोसे सारामागो के 'The History of Lisbon Under siege' जैसा, या हजारी प्रासाद द्विवेदी के 'वाणभट्ट की आत्मकथा' और 'चारुचंद्रलेख' जैसा..या फिर 'गोदान' और 'धरती धन न अपना' या 'राग दरबारी' जैसा।
या अधिक उपयुक्त उदाहरण (क्योंकि संदर्भ यहां कविता का प्रस्तुत है) मुक्तिबोध की 'अंधेरे में' और निराला की 'सरोज स्मृति' जैसा, जहां जीवनानुभव का आवेग इतना संघातिक और तीव्र है कि कविता ही अपने को व्यक्त करती है। भाषा की 'चतुराई' और 'विदग्धता' कहीं पीछे छूट जाती है। 'हिंदी' भाषा के साधन-सत्ता- संपन्न 'नव-धनाढ्य' और 'अभिजन' अपने आनंद और अहंकारों में जहां सिर्फ़ 'शामिल-बाजा' का भाषाई 'शोर' या 'तुमुल-कलरव' बन कर रह जाते हैं।
मेधा पाटेकर की यह कविता सिर्फ़ किसी कवि की काव्य-मेधा की नहीं, कबीर, नाजिम, नसरुल, निराला, लोर्का आदि की तरह 'लोकार्पित जीवन' की अमूल्य कविता है। यह सत्ताओं के 'इतिहास' (जिसमें प्रभुत्वशाली कविता और आलोचना सम्मिलित है) के सामने 'प्रति-इतिहास' रचती हैं।
@ हां, निरंजन, सच है. यह आपके द्वारा लिया गया फोटो ही है। बाकी दो फोटो तो मैंने पहले ही अपने ब्लाग पर लगा दिये थे। (लेकिन आप उस 'तेंदुए' का चित्र लेना क्यों बिसर गये? हिंदी-सत्ता समाज' के पुलिस और अफ़सरों द्वारा 'पिंजरे में कैद' किये गये उस बेचारे वन्य-प्राणी को तो आप अच्छी तरह से जानते हैं!)
उदय जी! अब की बार "तेंदुआ" दिखने भर दीजिए! "शूट" कर दूँगा!!
उदय जी, निश्चय ही आपने अति गूढ़ अर्थ वाली कविता से परिचित कराया और उसे समझने की जमीन भी दी. धन्यवाद. कविता भी अन्य कला रूपों की तरह जीवनानुभवों का ही यथार्थपरक, कलात्मक और तीखी अभिव्यक्ति ही है. मेधा जी की यह पहली कविता पढ़ रहा हूँ.
@निरंजन, 'शूट' कैमरे से करेंगे ना? या पिंजड़ा तोड़ के भागूं?
@शेखर जी, 'गूढ़ता' वहां आती है जहां सिर्फ़ भाषा का अपव्यय होता है। यह कविता तो सरल और सहज है..! मैंने तो सिर्फ़ उन संदर्भों को संकेतित किया है, जिन्हें छुपाया जाता है।
आप 'बड़े' समकालीन कवि बनें, इसकी सचमुच शुभकामनाएं!
तेंदुआ और मैं।
.,,,,
एक बेहद सार्थक कविता से साक्षात्कार कराने के लिए आपका आभार, प्रिय उदयप्रकाश जी.
"रक्षा-बंधन में आज
कल और इस पल भी
तेंदुआ और मैं"
कहानी शुरु तो होती है एक सत्य घटना से लेकिन कविता ने अपने लक्ष्य पर परम्परा, संस्कृति, धर्म और समाज सबको ले लिया है। बहुत अच्छी कविता है। उन्हें बहुत बहुत बधाई और उदय जी आपका आभार यहाँ पोस्ट करने के लिए।
उदय भाई, मेधा जैसे लोग, जो मनुष्य के लिये, उसके अधिकारों के लिये निरंतर संघर्ष कर रहे हैं, उनके जीवन का हर क्षण कविता है, कुछ न कुछ रचता रहता है. उनके अनुभव का एक चित्र आप ने प्रस्तुत किया है. ऐसे अनेक चित्र होंगे, अनगढ, अनभिव्यक्त. जिनके बारे में हम अक्सर सुनते रहते हैं. मेधा से मैं आप के जरिये कहना चाहूंगा कि वे उन्हें इसी तरह शब्द देती रहें.
सचमुच खुशी हुई। आपने आज के हमारे समय और यथार्थ के उस दूसरे धरातल पर लिखी जा रही कविता के महत्व को समझा, जिसे आज का संकटग्रस्त, संघर्षरत जीवन लिख स्वयं लिख रहा है। जो किसी आलोचक, समीक्षक, व्याख्याकार अथवा किसी सांस्थानिक सहारे की मांग अपने लिए नहीं करती। इस कविता में अंतर्विन्यस्त अनुभव की परिव्याप्ति ही उन अर्थ-बहुलताओं को खोलती जाती है, जो आह के यथार्थ और समय के समूचे चरित्र को किसी 'कौंध' के साथ उदघाटित कर देते हैं। जैसे किसी ने अंधेरे में डूबे किसी 'स्पेस' में अचानक 'टार्च'की रोशनी डाल दी हो और कोई ऐसा सत्य हमारी आंखों को दिख गया हो, जो अब तक अदृश्य था।
*जी हां सुभाष राय जी, आप सच कह रहे हैं। मेधा जी के जीवन का एक-एक पल कविता की रचना का पल है। उन्हें और कविताएं लिखनी चाहिए।
आलोचना की भाषा के 'क्लीशे' में कहें तो कविता के समकालीन 'पैराडाइम शिफ़्ट'का यह उदाहरण बन सकती है और आने वाली कविता के नये 'कैनन' यहीं से जन्म लेते हैं।
आपका सबका आभार!
आदरणीय उदय प्रकाश जी
आदरणीया मेघा जी ,
सादर प्रणाम !
बेहद सुन्दरता से आप ने प्रस्तुत किया है , मगर मेरी एक नज़र के अनु सार जहा तक मेरी सोच है कि'' तेंदुआ '' में दो प्रतीक मान कर सोच रहा हूँ एक तो '' तेंदुआ ' अथार्थ धूर्त . चालाक . मौका परस्त औ दूसरी और मैं सोचता हूँ कि '' तेंदुआ '' यानी निरिः प्राणी जिसे सरंक्षण कि आवश्यकता है . आज के हालत ही ऐसे है , क्या मेरा dristi कोण सही है या एनी कोई बिंदु है ? सपष्टी करण का कारण है है किजैसे कि आप ने भूमिका में लिखा है कि इस का एनी भाषा में अनु वाद भी होना चहिये जो मेरा करना चाहुगा , सर मैं अपना संक्षपितपरिचय देना चाहुगा कि मैं हिंदी और राजस्थानी में गध्य और पद्य में लिखता हूँ तथा साहित्यक ब्लोह '' आखर कलश '' के संपादक मंडल में हूँ ,
शेष आप का निर्णय आप कि प्रतिक्रिया अपेक्षित है , परन्तु मेरी जिज्ञासा संतुष्ट चाहुगा अगर आप अन्यथा ना लेतो .
बधाई ,
साधुवाद
आभार !
--
*सुनील जी,सचमुच राजस्थानी भाषा में इसके अनुवाद से यह और भी वृहत्तर पाठक -साहित्यिक वर्ग तक पहुंचेगी. मेरी शुभकामनाएं.
जहां तक 'तेंदुए' को एक प्रतीक के रूप में लेकर उसके गुण और चरित्र को समझने या उसके अवबोधन की बात है, मुझे लगता है, दोनों ही मनुष्य द्वारा पशुओं को अपने सामाजिक-नैतिक आदि संदर्भों के लिए, अपने हितों और उद्देश्यों के लिए, उन पर प्रक्षेपित, आरोपित किये गये 'गुण' और 'चरित्र' हैं। विष्णु शर्मा का 'पंचतंत्र' एक अबोध 'राजकुमार' को सामाजिक शिक्षा और दीक्षा देने का एक महान उदाहरण है।
परंतु मनवेतर प्राणी तो प्रकृति में अपने नैसर्गिक 'गुणों' और 'चरित्रों' के साथ ही रहते हैं। अपने सहज स्वभाव के साथ।
इस कविता में आप देखें तो 'रेस्ट हाउस' मे भीतर दोनों ही बंदी हैं। दोनों की स्वतंत्रता छीन ली गयी है। ऐसा मेरा मत है। जहां तक हिंसक और अहिंसक होने की बात है, तो यह बात तो कई व्द्वान कह ही चुके हैं कि सबसे अधिक हिंसा मनुष्य में ही होती है। अन्य प्राणी तो अपनी भूख या अन्य अनिवार्यताओं के लिए हिंसा का उपयोग करते हैम। मनुष्य तो लालच, द्वेष, एषणा आदि के लिए विनाशकारी और व्यापक संहार की हिंसा का उपयोग करता है।
मेधा पाट्कर जैसे व्यक्तिवों का संघर्ष इसी के तो विरुद्ध है।
उदय जी सादर प्रणाम !
आभार
आप ने मुझे इस लायक समझा , मगर इक निवेदन भी है कि क्या आप इक अनुमति पत्र आप मैं करदे तो सुविधा होगी क्यूनी मैं राजस्थानी कि सरकारी पत्रिका '' जागती जोत '' में प्रेषित करूँगा , अनुदित रचना के साथ अनुमति पत्र भी मागते है , प्रतीक्षा है ,
सादर !
प्रिय सुनील जी,
अनुवाद के औपचारिक अनुमति पत्र के लिए आप उसी पत्रिका से संपर्क करें, जहां से मैंने यह कविता ली थी. मुझे उम्मीद है वे आपकी सहायता करेंगे.
जिस सरकारी पत्रिका में आप उसे प्रकाशित कराना चाहते हैं, उसकी वितरण संख्या कितनी है? क्या वह राजस्थान में बहुत लोकप्रिय है? खैर मेरी ढेरों शुभकामनाएं।
'वागर्थ' का ई-मेल मेरे पास है :
vvparishad@yahoo.co.in
आप उनसे संपर्क कर लें।
मेघा जी की इस अमूल्य कविता से परिचय कराने के लिये धन्यबाद..............
उदय जी मैं पहली बार आप के ब्लाग पर आया हू। बहुत अच्छा लगा । वैसे हंस में बहुत बार आपकी कहानियों को पढा हूं। जब मैं हंस का नया नया पाठक बना था तो उस समय किस्तों में छपी आप की पीली छतरी वाली लडकी ने मुझे बहुत प्रभावित किया। वारेन हेसटिंगज का सांड व कई अन्य आपकी कहानियों को पढा तबसे आप मेरे प्रिय कहानीकारों में शुमार है।
हैदराबाद ई टीवी में मेरे इक रिस्तेदार नौकरी ज्वाईन किये तो मैंने सवाल किया इतनी दूर ? तो उनका जबाब था पीली छतरी वाली लडकी से पूछो । मैं आज फिर इस कहानी को दुबारा पढना चाहता हूं क्या नेट पर इसका लिंक है ?
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