ये तीनों पत्र आज से लगभग चौथाई सदी पहले (२५ साल के आसपास) लिखी गयी कहानी 'तिरिछ' से संबंधित हैं। इनमें से एक पत्र तो मेरे दोस्त और साथी सफ़दर हाश्मी का है और अन्य तीन पत्रों में से दो इसी कहानी की एक पाठिका पूनम वर्मा के पत्र हैं। उनके कुल चार पत्र मुझे मिले थे, जिनमें से एक तो मेरे जन्मदिन की बधाई (१ जनवरी) का कार्ड था, दूसरा कहीं खो गया। उस खोये हुए पत्र की कुछ यादें अभी भी बाकी हैं। तीसरा पत्र एक अप्रत्याशित-सा पत्र था।

कई बार लगने लगता है, किसी लेखक का जीवन, समय के साथ-साथ बीतते हुए, किसी किस्से जैसा ही होता जाता है।
इसे अपने ब्लाग में इसलिए भी प्रस्तुत कर रहा हूं कि किसी भी रचना की गरिमा, उसके अर्थ और महत्व का असली आधार उसके पाठकों की स्वीकृति और उनकी प्रतिकृया ही होती है। ऐसे लेखक, जो अपनी भाषा में कुछ नया और प्रचलन से हटकर कुछ करने का जोखिम उठाते हैं, उन्हें शक्ति, प्रेरणा और संबल हमेशा अपने पाठकों से ही मिलता है। सांस्थानिक और जिसे 'मुख्यधारा' की आलोचना के नाम से जाना जाता है, वह प्रचलित और वर्चस्वशील आलोचना अपनी ताकत भर इसे अस्वीकृत करती है।

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इन पत्रों को मैं अपने दोस्तों और अपने प्रियजनों के लिए ही यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। क्योंकि सच यही है कि वही मेरे शब्दों को शक्ति और उन पर मुझे भरोसा देते हैं। इन पत्रों पर या इन्हें यहां प्रस्तुत करने पर लेखकों की बहस वगैरह से मुझे प्रसन्नता नहीं होगी। एक फ़िल्म कभी देखी थी, उसका एक पात्र अदालत में न्यायाधीश से यह प्रश्न पूछता है: 'ऐसा क्यों होता है हमेशा कि जो भी व्यक्ति अपने देश के लोगों से प्यार करता है, और लोग भी जिसे अपना लेते हैं, उस देश की 'सरकार' (गवर्नमेंट) या सत्ताएं उसकी शत्रु हो जाती है?'
(इस पोस्ट को ब्लाग में लगाने के कुछ ही देर बाद कुछ मित्रों ने कहा कि अब तो ऐसे पत्र ही लिखे जाने बंद हो गये हैं। ईमेल और एस.एम.एस. का ज़माना आ गया है। संयोग ही था कि तीन साल पहले इसी कहानी के कन्नड़ अनुवाद पर 'संस्कार' जैसे कालजयी उपन्यास के रचनाकार, सुविख्यात महान साहित्यकार यू.आर.अनंतमूर्ति जी का एक' ईमेल' भी मुझे मिला था, जो बाद में किसी पत्रिका में छपा था, उसे भी पोस्ट कर रहा हूं। )











The department of Indian theatre is ready with its annual production and this time it is history vis-à-vis modern times. The play titled
12 comments:
उदयजी,
इन शब्दों के साथ हमारी भावना को भी सम्मिलित मानें !
अब तो पत्र लिखने की आदत ही छूटती जा रही है... इंटरनेट और ईमेल है ना :)
'तिरिछ' को मैंने कितनी बार पढ़ा होगा मुझे खुद याद नहीं .... किन्तु जब जब पढ़ा और ज्यादा ही मिला....!!! इन इतने पुराने पत्रों मे आज का समय साँस ले रहा था ! सचमुच जितनी भाषाओं मे भी इस कहानी का अनुवाद हुआ होगा वह भाषा और समृद्ध हुई होगी । स्वर्गीया पूनम वर्मा के पत्रों को पढ़कर आँखेँ नम हो गईं.... आपके द्वारा इतने पुराने पत्रों को सहेजना और उनसे इतना अपनापन बिल्कुल एक सुंदर कहानी का हिस्सा है.... । 'मुख्यधारा' की आलोचना क्या पाठको की इतनी आत्मीय स्वीकृति के बाद कोई मायने रखती है ?
आप सबका आभार।
*cmpershad जी, आपने ईमेल की याद दिला दी. संयोग से अभी तीन साल पहले इसी कहानी पर एक ईमेल मिला था। उसे पोस्ट में सम्मिलित कर रहा हूं।
सुशीला जी ने अन्य भाषाओं में अनुवाद की बात की है। वह अनुवाद 'कन्नड़' भाषा में हुआ था।
पार्थेश्वर जी आपका भी आभार।
वाकई तिरिछ कालजयी कहानी थी। मुझे भी सौभाग्य प्राप्त है उस अन्दर तक थरथरा देने और खूब रूलाने वाली कहानी को पढ़ने का। पाल गोमरा स्कूटर, वारेन हेस्टिंग्स का सांड और तिरिछ वे कहानियां हैं, जिन्होंने आपकी रचनाधर्मिता का दीवाना बना दिया था। तिरिछ के बारे में पढ़कर अच्छा लगा।
puraane patra purani yaadon ko taaza aur kai guna utsaah-vardhak hote hain....
पत्रों के साथ उन पलों की यादें भी सहेजी गईं जिन पलों ने इन पत्रों को पढ़ा होगा। पाठकों के स्नेह को सहेज कर रखना सही मायने में लेखक के लिए जरूरी होता है। पाठकों का प्यार उन्हें संबल प्रदान करता है।
दुर्भाग्य से मैने यह कहानी नहीं पढ़ी..इस पोस्ट को पढ़कर ढूंढ कर पढ़ने की इच्छा हो रही है।
..आभार।
ऐसे लेखक, जो अपनी भाषा में कुछ नया और प्रचलन से हटकर कुछ करने का जोखिम उठाते हैं, उन्हें शक्ति, प्रेरणा और संबल हमेशा अपने पाठकों से ही मिलता है। सांस्थानिक और जिसे 'मुख्यधारा' की आलोचना के नाम से जाना जाता है, वह प्रचलित और वर्चस्वशील आलोचना अपनी ताकत भर इसे अस्वीकृत करती है।
aur kahne ko kya bacha ! sab aap bhi jaante haiN, maiN bhi aur shaayad hamaare baaqi mitra bhi.
उदयजी,
पूनम वर्मा और आलोक रंजन के पत्र 'तिरिछ' संकलन में भी थे, पत्र आए कहाँ से थे, पता वहाँ नहीं था,आज देखा... मेरे शहर से,हाजीपुर से ये थे। तब से कुछ अलग ही महसूस कर रहा हूँ । पहले से विशेष, ऐसा नहीं कहूँगा; लेकिन कुछ अलग जरूर
उन शब्दो को छूना चाहता हूँ, बार-बार।
मेरा आदर।
अचानक मेरे कुछ नए मित्रों में आपकी इस कहानी को लेकर खासी उत्सुकता आई है... आज सुबह से मैं आपकी यह कहानी कई दोस्तों को मेल कर चुका हूँ. मुझे इस कहानी का tretment बहुत अच्छा लगा है शायद यही इसे सबसे अलग भी करती है.
आज ही आपकी कहानी 'तिरिछ' पढ़ी . मैं शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता कि इसे पढने के बाद कैसा अनुभव कर रहा हूँ...
'तिरिछ' आपका अकेला संग्रह था, जो मुझसे छूट गया था। यह पोस्ट पढ़ने बाद ले आयी। कई दिनों से फिर पहले की तरह सोच नहीं पा रही हूं। सब कुछ बदल गया। 'तिरिछ' एक महानतम कहानी है। इसे हर कोई नहीं लिख सकता। पूनम वर्मा ने सही लिखा था, जो सहेगा नहीं, वह लिखेगा कैसे। हर शब्द में आत्मा है। सोचती हूं आपने कितने कष्ट झेले होंगे।
ये पत्र भी यहां एक कहानी अपने आप कह रहे हैं। आपको हम सबने अपना लिया है क्योंकि आप लिखते ही हमारे बारे में हैं।
प्रणाम !
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