Sunday, October 10, 2010

'पार्थक्य' और 'एकांत' और मेरी कविताएं



('पचास कविताएं' :  किताब की भूमिका)
कविताएं बचपन से ही मेरे सबसे निकट रही हैं। वे मेरे अस्तित्व के एकांत, निस्संग सन्निकटता और नीरवता की सबसे भरोसेमंद और अटूट साथी रही हैं। कई बार जब यह गहरा संदेह पैदा होता है कि इस समय और स्थान में, जहां चारों ओर अनगिन सत्ताओं का सर्वव्यापी साम्राज्य है, क्या सचमुच मेरी भी कहीं कोई मौलिक सत्ता और कहीं कोई प्रामाणिक अस्तित्व  है, क्या मैं भी कहीं ‘उपस्थित’ हूं, तो कविता ही उसका, कमज़ोर ही सही, पर सबसे पहला और शायद अंतिम प्रमाण होती है।
जब सारी सत्ताएं साथ छोड़ जाती हैं, या उनके फैसलों का शोर चारों ओर गूंज रहा होता है, तो वह कविता ही है, जहां अपनी आवाज़  साफ सुनाई देती है। कविता कभी भी, पराजय, विध्वंस, आत्महीनता और गहरे दुखों के पल में भी हाथ और साथ नहीं छोड़ती। वह एक ऐसे निरापद दिक-काल का निर्माण करती है, जहां पूंजी से लेकर राजनीति, धर्म, नस्ल, जाति, मास-मीडिया और तकनीक की तमाम संगठित सत्ताओं की हिंसा और अन्याय के विरुद्ध किसी वंचना या विराग में डूबा एक गरीब या फकीर अपना कोई सबसे मानवीय, नैतिक और पवित्र फैसला सुनाता है। दिक और काल, समय और यथार्थ, निजता और समूह, व्यक्ति और सत्ता-प्रणालियों के बारे में कोई धीमा, मंद, निजी निर्णय। एक ऐसा अस्फुट एकालाप, जो बहुत करीब से, ध्यान लगाकर ही सुना जा सकता है।
कविता समूची प्रकृति और मनुष्यता के उत्पीड़न और विनाश में लगी सबसे बलशाली ताकतों के ‘पाप’ (नैतिक) और ‘अपराध’ (सामाजिक-संवैधानिक) के खिलाफ़ हमेशा  कोई न कोई ‘फतवा’ जारी करती रहती है और अपने जीवन को बार-बार दांव पर लगाती है। वह हर बार कोई न कोई जोखिम या खतरा मोल लेती है और हर बार किसी संयोग या चमत्कार से बच निकलने पर अपना पुनर्जीवन हासिल करती है और एक बार फिर सांस लेना शुरू करती है। फिर से किसी नये जोखिम भरे दायित्व का बोझ उठाने के लिए।
मुझे याद है, जब मैं बहुत छोटा था और मां कैंसर में मर रहीं थीं। डाक्टरों ने जवाब दे दिया था और उन्हें मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल से गांव के घर में वापस ले आया गया था। पिता जी के पास सारे पैसे और जेवर खत्म हो चुके थे। अब कोई भौतिक और बाहरी मदद मां के लिए निरर्थ हो चुकी थी। वे सिर्फ अनार का रस पी रहीं थीं। तब भी वह कविता ही थी और चित्र, जिनके जरिये मैं अपनी मां को बचाने के लिए कैंसर से पूरे भरोसे के साथ लड़ रहा था। मां की मृत्यु के वर्षों बाद तक उस कमरे की दीवारों पर, जिसमें मां अपने जीवन में रहतीं थीं, मेरी बनाई अनगिनती आकृतियां थीं और उतने ही शब्द, जो उस समय मेरी समझ में अबूझ शक्तियों से भरे थे और वे मृत्यु को कहीं दूर रोक कर, मां को मेरे लिए बचा सकते थे।
ऐसा लेकिन नहीं हुआ। शब्द और दीवारों या कागज़ों पर, किसी अकेले निर्बल कलाकार या कवि द्वारा उकेरे गये अक्षर या आकार अक्सर प्रत्यक्ष और प्रबल भौतिक शक्तियों के हाथों पराजित होते हैं, मिटा दिये जाते हैं। लेकिन जिसके पास कोई और बल न हो, दूसरा कोई विकल्प ही न हो, तो बार-बार अपने इन्हीं उपकरणों की ओर लौटने के, कोई दूसरा चारा भी तो नहीं होता।
तमाम सारी बाहरी ताकतें जब भाषा पर आक्रमण करती हैं और स्मृतियों का विनाश करने के अपने राजकर्म या वणिककर्म में संलग्न हो जाती हैं, तो कविता मनुष्य या किसी व्यक्ति की स्मृतियों को बचाने के प्राणपन संघर्ष में मुब्तिला होती है। विस्मरण के विरुद्ध एक पवित्र और ज़रूरी संग्राम की शुरुआत सबसे पहले कविता ही करती है, अगर वह अपने किसी अन्य हितसाधन में नहीं उलझ गयी है, और सबसे अंत तक वही उस मोर्चे पर रहती है। सबसे पहले और सबसे अंत में यह मोर्चा भाषा का ही होता है। कविता की एक ऐसी निजी कवि-भाषा, जो जीवन के अनुभवों से अपना अर्थ प्राप्त करती है, प्रचलन, प्रयोग और मुहावरों से नहीं। कविता भाषा के चालू प्रत्ययों, मुहावरों और वागाडंबरों (रेटरिक या डेमागागी) को नष्ट करती है। उन्हें प्रश्नांकित करती है। .....और जो कविता जितना अधिक यह काम करती है, वह अपने विरुद्ध उतना ही विस्मरण का विरोध एकत्र करती है।
एक तरफ वह स्मृति की रक्षा करती है, दूसरी ओर वह भाषा में शब्दों के अर्थ की भी रक्षा और उनका पुनरुद्धार करती है। वह शब्दों में नये अर्थों को आविष्कृत भी करती है। वह शब्दों को उनकी विनषट स्मृतियों के साथ बचाते हुए उन्हें किसी शरणार्थी शिविर तक पहुंचाती है। उनके घावों पर मलहम लगाती है और पट्टियां बांधती है। हमारे समय में, भाषा का अलग-अलग गैर-मानवीय या मनुष्य-विरोधी परियोजनाओं में जैसा ‘इस्तेमाल’ किया गया है, उसके संदर्भ में मुझे पोलिश भाषा के अपने प्रिय कवि ताद्युश रोज़ेविच की कविता 'शब्द’ की याद आ रही है -‘‘बचपन में शब्द मलहम की तरह घावों पर लगाये जा सकते थे/ हम दे सकते थे उसे/ जिसे हम प्यार करते थे/’’(इस कविता का अनुवाद इस ब्लाग पर पहले मैं दे चुका हूं।)
हर सच्चे कवि को संसार की बाहरी सत्ताएं भाषा और अपने समाज से हमेशा बेदखल करती हैं। वह विस्थापन और उत्पीड़न की यातना उसी तरह भोगता है जैसे कोई आदिवासी या संस्कृति और समाज का सबसे निचला वर्ग और वर्ण।  वह कविता या रचना ही है, जो उसे करुणा और सहानुभूति से भरे, एक पवित्र और अपेक्षाकृत सुरक्षित शरण्य में आश्रय देती है। ......और वह थोड़ी-सी गरिमा जो हर मनुष्य और हर तरह की कला के लिए अभीष्ट है।
कहीं पढ़ा था कि कविता किसी अनजान देश के किसी छोटे-से स्टेशन के निर्जन प्लेटफार्म में देर रात खड़ी किसी रेलगाड़ी की तरह होती है। बिल्कुल खामोश। अपनी अगली यात्रा को फिलहाल कुछ समय तक स्थगित करती हुई। बीच-बीच में, कभी-कभी इंजन से निकलती भाप से ही पता चलता है कि सांस अभी कायम है। .....और अभी आगे कुछ स्टेशन और हैं, जहां तक यात्रा जारी है।
राजनीतिक सत्ताएं कभी भी किसी कविता को ईनाम नहीं देतीं। क्योंकि वे हमेशा पिछली कुछ सदियों में कविता विरोधी सिद्ध होती आई हैं। मेरा अभिप्रेत गहन मानवीय संपृक्ति और प्रतिबद्धता की कविता से है। आज तक के इतिहास में किसी भी धार्मिक या व्यापारिक या राजनीतिक सैद्धांतिकी या  विचारधारा की कोई भी राज्यसत्ता ऐसी नहीं पाई गई है, जिसने प्रतिपक्ष की या किसी अकेले मनुष्य की अपने से असहमत, विसंवादी स्वर में बोलती कविता को बर्दाश्त किया हो। बेदखली, दण्ड, निर्वासन, उपेक्षा, उत्पीड़न, प्रताड़नाएं और अंतत: कवि की मृत्यु ही अक्सर ऐसी कविता का ईनाम हुआ करता है। मैं आपसे पूरी पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ कह रहा हूं, कि मैं ऐसा ही कवि हूं और यही बने रहना चाहता हूं।
जैसा मैंने पहले कहा, अपने बचपन से शब्दों और रंगों को मैंने अपने सबसे अधिक करीब पाया। बहुत निकट। यदि बाहर का संसार मुझे निराश और दुखी करता था, या अगर वहां रहते हुए मुझे अपने,(मुक्तिबोध के शब्दों में) ‘अकेलेपन और पार्थक्य’ का बोध होता था, या अगर वहां की सत्ताओं के सामने मैं स्वयं को बहुत निर्बल और असहायता से भरा पाता था, तो वे शब्द और रंग ही होते थे, जो मेरा संबल और मेरे सहचर बनते थे। वे बहुत नैतिक, निर्दोष, गहरी संवेदनात्मकता और सहानुभूति से भरे होते थे। मैंने उनके साथ और उन्होंने मेरे साथ बहुत-सा समय बिताया है। लगभग एक जीवन भर। इस साथ-साथ के समय का बहुत रोमांचक, कौतुक भरा, स्वप्नों और शोक-हर्ष से भरा एक अलग आख्यान है, जिसे कभी संभव हुआ तो मैं लिखूंगा। .....और आज जब मैं ये पंक्तियां लिख रहा हूं, तब भी, सिर्फ वही मेरे साथ हैं। लेखक होने के अतिरिक्त मेरी कोई अन्य अस्मिता नहीं है। नागरिक, पारिवारिक संबंघ-संज्ञाएं, कौटुंबिक-जातीय सूत्र, सांस्थानिक, धार्मिक-राजनीतिक संबंद्धताएं आदि जो अन्य प्रचलित-परिचित अस्मिताएं होती हैं, उनमें से अधिकांश से मुक्त होने, उन्हें छोड़ने की मैंने या तो स्वयं कोशिश की है, या फिर उनमें से बहुतेरी प्रत्यक्ष बाहरी निरंकुश और भ्रष्ट सत्ताओं द्वारा अन्यायपूर्वक मुझसे छीन भी ली गई हैं। ......और मैं एक ऐसे एकांत में घिर गया हूं, जो भाषा के तमाम सामूहिक-औपचारिक संरचनाओं और उद्यमों-व्यवसायों से बने एक शोर-ओ-गुल से भरे समाज से निर्वासन का एकांत है। यह प्रीतिकर नहीं, पीड़द है। पर यह निर्वासन इतिहास के एक बहुत विराट~ सभ्यतामूलक अनुभव के साथ भी  मुझे जोड़ता है। इसीलिए यह एक ‘प्रिवेलेज’ भी है। यह एक ऐसी अवस्थिति है जो मेरे अनुभवों और अवस्थिति को, मेरी चेतना और संवेदना को इस देश की उस विराट~ वंचित मनुष्यता की नियति के साथ जोड़ देती है, विस्थापन और उत्पीड़न, संघर्ष और छलनाएं ही जिसका इतिहास है।
मुझे यह मानने में कत्तई हरबार यह दिक्कत होती है कि अपने इस ‘निर्वासन’ का निर्माण मैंने स्वयं किया है। या जैसे कि यह निर्वासन मेरी कोई अपनी चुनी हुई चीज है और अपनी इस नियति और अवस्थिति का समूचा उत्तरदायित्व मेरे अपने ऊपर ही है। ऐसा अगर कोई कहता है, तो सीधे-सीधे उस पर संदेह किया जाना चाहिए । निश्चयात्मक संदेह। क्योंकि जिस समय और यथार्थ में हम हैं, उसमें ऐसे लोग स्वयं उस सत्ता के ही प्रच्छन्न प्रतिनिधि हैं,  जो इस समय के हर विस्थापित और उत्पीड़ित समूह, वर्ग, जाति या व्यक्ति की नियति का उत्तरदायी किसी उत्पीड़क सत्ता-प्रणाली को नही, बल्कि स्वयं उसी को मानते हैं, जो उसका शिकार है। वे अपराधी हैं और अलग-अलग महावृत्तांतों के मृत वागाडंबरों के पीछे छुपे अनैतिक आतताई हैं। आज के मुहावरे में वे सत्ताओं के दलाल हैं।
लेकिन यह जो निर्वासन या विस्थापन है क्या यह कोई ऐसा अलगाव है, जिसने मुझे मेरे समय और यथार्थ से काट दिया है, पृथक कर दिया है और उसकी सारी सूचनाएं मुझ तक पहुंचनी बंद हो गई हैं? मुझे लगता है वास्तविकता इसके ठीक उलट है। इस दूरी से संभवत: मुझे वह सारा प्रपंच अधिक साफ दिखाई देता है, जो निकट होने पर ओझल और अगोचर हो जाता था। मुक्तिबोध ने अपने एक निबंध में ‘एकांत’ और ‘पार्थक्य’ का महत्वपूर्ण विश्लेषण किया था -
‘‘यह पार्थक्य घनघोर है। यह मेरा किया नहीं है। मैं इस पार्थक्य का विधाता नहीं। वह मेरे ज़माने की बदनसीबी है। जिस चबूतरे पर मैं खड़ा हुआ हूं, उसके पाये का वह पाप है। आज से दस-बीस साल पहले यह कहा जाता था कि कलाकार हमेशा अकेला होता है। इस पर मेरी टिप्पणी केवल इतनी ही है कि हर आदमी को, सोचने-विचारने के लिए, मनो-मंथन के लिए, एकांत चाहिए, जिसमें केवल वह ही हो और कोई न हो। कलाकार का जीवन चूंकि अधिकतर मनोमय है (व्यस्त रहते हुए भी) इसलिए मुझे एकांत आवश्यक है। अपने मनोमय जीवन में प्रत्येक व्यक्ति अकेला होता है। यह स्वभाव-सिद्ध है। (लेकिन) अकेलापन और पार्थक्य में अंतर है।’
मुझे नहीं लगता कि मुक्तिबोध की तरह किसी अन्य लेखक-कवि ने अकेलेपन के ऐसे दुर्निवार एकांत का सामना कभी किया हो। निर्मल वर्मा या अज्ञेय का एकांत और अकेलापन अलग तरह का था। मुक्तिबोध के वे पत्र, जो उन्होंने अंग्रेज़ी में अपने गहरे मित्र नेमिचंद जैन को लिखे, उनके निर्वासन और पार्थक्य-बोध की सांद्र-सघन तीव्रता को सामने लाते हैं। यह अकेलापन अपनी अनुभूतिपरक बनावट में, सतह से देखने पर, पहली दृष्टि में,  निर्मल वर्मा, काफ्का या किसी भी विलक्षण रचनाकार के एकांत के भले करीब लगता हो, लेकिन यह उस अप्रतिम बौद्धिक का भी अकेलापन है, जो अपने समस्त स्नायुतंत्र के साथ आत्मस्थ नहीं, मूलत: विश्वचेतस या कालचेतस है। वह तिलक की तरह जेल में रहते हुए ‘गीता-रहस्य’ भी लिख सकता है, नेहरू की तरह ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ भी और जूलियस फ्यूचिक की तरह ‘फांसी के फंदे से’ भी। हमारे समय के किसी भी सच्चे रचनाकार के पास असंख्य आंखें और असंख्य ‘एंटिना’, ‘राडार’ और  ‘स्कैनर’ होने चाहिए। यह उसका संकटग्रस्त जीवन ही उसे दे सकता है, कोई विनिर्मित भाषिक भंगिमा नहीं। आप यातनाग्रस्त  और अन्यायी दोनों एक साथ नहीं हो सकते। वंचित और लुटेरा दोनों कोई अगर एक साथ होने का दावा करता है, तो उसके पीछे का कोई रोचक विडंबनाओं से भरा-पूरा वृत्तांत भी ज़रूर  होगा। ऐसा आज के समय में होता भी है। इसकी खोज़  मैं अक्सर कथाकार बन कर किया करता हूं और आप सब वह किस्सा तो जानते ही हैं .....।
मुक्तिबोध ने अपने इसी निबंध में एक जगह लिखा है -
‘‘किनारे रह कर, तटस्थ रह कर, (डिसएंगेज्ड रहकर, अनकमिटेड रहकर) जिंदगी जीना भद्रलोक के सफ़ेद कुर्तों के आरामकुर्सीदार वातावरण में भले ही पहुंचा दे, भले ही हम भद्रलोक की शानदार सादगी तथा आरामदेह चमकीलेपन के रंगों से अपने आसपास के अल्प-भोजियों को अपनी महत्ता का बोध करा दें, भले ही हम अपने मित-भाषण द्वारा बौद्धिक संस्कृति और कलात्मक अभिरुचि की की धाक जमा दें, किंतु हम वह ज़िंदगी नहीं जी सकते जिसे मैं, अपने शब्दों में, बिजली की  तड़पदार ज़िंदगी कहता हूं। ऐसी ज़िंदगी जिसमें अछोर, भूरे, तपते मैंदानों का सुनहलापन हो, जिसमें सुलगती कल्पना छूती हुई भावना को पूरा करती है, जिसमें सीने का पसीना हो और मेहनत के बाद की आनंदपूर्ण थकन का संतोष हो। बड़ी और बहुत बड़ी ज़िंदगी जीना (इम्मेंस लिविंग) तभी हो सकता है, जब हम मानव की केंद्रीय  प्रक्रियाओं के अविभाज्य और अनिवार्य अंग बन कर जियें। तभी ज़िंदगी की बिजली सीने में समाएगी।चाहे प्रगतिवादी हो या प्रयोगवादी, जिसने भी उच्च-मध्यवर्ग की सफेदपोश भद्रता के महत्व की कुर्सियों पर आराम किया कि वह गया, मर गया। ऐसा मेरा खयाल है। यह खयाल कुछ लोगों के लिए खतरनाक है-चाहे वे कितने ही प्रगतिवादी या इसके विपरीत बंगले के निवासी तकली-कातू गांधीवादी क्यों न हों! हमारे बहुत से साथी इसी ज़िंदगी में स्वर्ग देखना चाहते हैं और अपने बाल-बच्चों को स्वर्ग दिखाना चाहते हैं।’

विख्यात पोलिश कवि, जिनका अपना जीवन भी सतत निर्वासन और यंत्रणाओं के बीच गुज़रा, अदम जगाजेयेव्स्की की कविता की पंक्तियां याद आती हैं :

'‘मैं अब पहले की तरह दर्शन शास्त्र, कविता और
दूसरी जिज्ञासाओं का छात्र नहीं रह गया हूं
मैं वह युवा कवि नहीं हूं अब
जिसने कविता की तमाम पंक्तियां लिखीं
जो भटका किया असंख्य संकरी गलियों-सड़कों
और विभ्रमों की सुरंगों में


घड़ियों की सत्ता और अंधेरे की परछाइयां ही
मेरी बरौनियां अपने हाथों से छूती थीं


लेकिन आज भी
किसी नक्षत्र का थोड़ा-सा उजाला
मुझे मेरी राह सुझाता है
और वह थोड़ा-सा उजाला ही है
जो मुझे नष्ट कर सकता है


या बचा सकता है ।''

मैं आपसे, अपने पाठकों और मित्रों और शुभेच्छुओं से बहुत भावुकता और साफगोई के साथ यह कहना चाहता हूं कि ‘वह थोड़ा-सा उजाला' मेरी कविताओं को आज तक आपसे मिला है, जिसने मुझे हमेशा नष्ट होने से बचाया है। शायद यही कारण है कि मेरे दो-तीन दशक पूर्व प्रकाशित कविता संग्रहों से लेकर हाल-फिलहाल के संग्रह तक, अपने नये-नये संस्करणों में लगातार आते रहे, भले ही मैं आलोचकों-आचार्यों की कवि-कुल- सांस्थानिक सूचियों में अनुपस्थित पाया जाऊं। यह सब आप सबके कारण ही संभव हुआ। यह सच है। मैं बहुत सहज होकर, समूची विनम्रता के साथ यह सच भी कह रहा हूं कि मैंने कवि होने के लिए कोई अन्य उपक्रम कभी नहीं किये।
आप सबके प्रति गहरी कृतज्ञता से भरा मैं अपने अलग-अलग संग्रहों की पिछली पचास कविताओं के साथ इस किताब में एक जगह उपस्थित हूं।


वैशाली, सोमवार, 4 अक्तूबर, 2010

(‘भारत भूषण अग्रवाल सम्मान’ की 25 वीं वर्षगांठ के समय इसका किंचित- तात्कालिक और संक्षिप्त रूप लिखा गया था। प्रस्तुत संकलन की भूमिका  के लिए मैंने उसे अधिक  परिवर्धित और कुछ विस्तृत किया है। यह किताब वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित हो रही है।)

2 comments:

Saini Ashesh said...

प्रिय उदय जी,

जहां-तहां की सारी बेचारी
असुंदरताओं के दरम्यान
यह उपस्थिति सुंदर है :
तमाम असहजताओं के बीच
असहज होने की अविराम यात्रा...

अनहोने में इस होने को
कौन रोक सका है?

हर दहकते शब्द के पीछे
निश्शब्द के सितारे चमकते हैं

Uday Prakash said...

आपका आभार सैनी अशेष जी, कि आपने इसे सहानुभूति के साथ पढ़ा......! बहुत सारी शुभकामनाएँ ॥!