Wednesday, March 2, 2011

दो साल पहले की एक पोस्ट, जिसे मैने 'डैशबोर्ड' के आर्काइव से निकाला

(यह पोस्ट मैने दो साल पहले लिखी थी। आज अचानक ही अपने ब्लाग के 'डैशबोर्ड'  की सफाई के लिए गया तो यह वहां मिला । ..अक्सर ऐसे पोस्ट को लगाया नहीं जाना चाहिये। किसी खास मूड और हताशा के पलों  में  वे पैदा होते हैं। ..लेकिन फिर भी इसे मैं लगा रहा हूं । इसे स्वस्थ ढंग से लिया जाय और जो हमेशा सत्ता, संपर्क, जोड-तोड, गुट्बाजी आदि में मुब्तिला रहते हैं, वे एक बार ज़रूर सोचें कि उनकी इन गतिविधियों से अकेला उदय प्रकाश ही नहीं, हज़ारों-लाखों लेखक प्रभावित-प्रताडित होते रहते हैं। कई तो गुमनामी और वंचना के अंधेरे में हमेशा के लिए खो जाते हैं।....
यह पोस्ट मैं इसलिए भी लगा रहा हूं कि अब हालात और बिगड चुके हैं...! हांलाकि दूसरी ओर एक ऐसी विराट जागृति भी क्षितिज में उभरती दिखाई दे रही है, जो भ्रष्टाचार, निरंकुशता, झूठ, जाति-नस्लवाद आदि को समूल उखाड फेंकने के लिए मिस्र, लीबिया से लेकर सारी दुनिया में अपनी मौज़ूदगी दर्ज करा रही है।
बस इसे पढिये और इसे लेकर अगर जातिवादी-सत्तापरस्त-राजनीतिक गुटों ने तूल बनाना शुरू किया तो अपने इस लेखक के साथ रहिए। अपनी भाषा, अपने समाज, अपने देश को स्वतंत्र, समतामूलक, बिरादराना और आधुनिक बनाने के लिए लंबी लडाई लडें।
सच मानिये इस सब में मेरा कोई निजी स्वार्थ नहीं है। बल्कि यह एक जोखिम ही है, जिसे मैं  फिर मोल ले रहा हूं।  )


(पुरानी पोस्ट : असंपादित ) 


मैंने आख़िरी पोस्ट जुलाई को लिखी थी और आज २७ नवम्बर हैं|.....बीच का समय यात्राओं और भटकावों से भरा हुआ है| थकान, उलझनों, खुशियों और तनावों में डूबता-उतराता |
जब मैं दिल्ली से जा रहा था , रास्ते में पत्नी कुमकुम ने कहा आपको याद है आज जुलाई है| इसी तारीख को ३१ वर्ष पहले हमने विवाह किया था|
हमारे सामने सड़क थी| एक हज़ार पचास किलोमीटर आगे हमें अपने गांव जाना था | मध्य प्रदेश और छत्तीस गढ़ का सिवान | हम अपना ठिकाना खोज रहे थे | कहीं बसने की कोशिश| 

फिर तीन महीने सात दिन छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में ही बीते | दुर्ग, रायपुर, अम्बिकापुर, रीवा, शहडोल, उमरिया, अनूपपुर ..... और उस इलाके के कई गांव | एक दूसरी उपत्यका| एक और उपग्रह | एक दूसरा हिन्दुस्तान |

जिस दिन मैं वहां अपने गांव पहुचा , उसके अगले दिन १३ जुलाई को ठूनू की मृत्यु हुई | पिछले साल मैं उसे एक चश्मा दे आया था | वह खुश था और वह और जीना चाहता था | लेकिन ७० की उम्र में वह सुबह कुयें के जगत पर दातून करते हुए मर गया |
गांव में हल्ला था कि वह पंचक में मरा है | और अब वह अपने साथ इस गांव के पांच जीवित लोगों को और ले जायेगा |
गांव ऐसे ही भय और अंधविश्वास में जीते हैं | आज भी |

लेकिन यह भय सच था |
सत्रह दिनों में मेरे गांव और उसके आस-पास के टोलों में छः लोगों की मृत्यु हुई | समीरा ने आत्महत्या की| सौरहा टोला की एक औरत रात में सांप काटने से मरी | दो लोग  बुढापे के कारण मरे | लेकिन अगर उन्हें ठीक खाना मिलता और ज़रूरी दवाईयां, तो वे दस-पन्द्रह साल और जी सकते थे | दो मौतें मैलेरिया से हुई | गाजर घास और लन्टिना जैसे खर-पतवारों के बेतहाशा फैलाने से घातक मैलेरिया उस पूरे इलाके में बहुत फैल रहा है | नए किस्म के मच्छर उन्ही की जड़ों में पनपते हैं , ऐसा लोगों ने बताया |

लेकिन वहां की सबसे बड़ी बीमारी का नाम है -गरीबी |

बिजली वहां कुल मिलाकर - घंटे के लिए आती है | मोबाइल के नेटवर्क ठीक से काम नहीं करते | मेरा 'एयरटेल' गूंगा-बहरा हो चुका था |

जब जुलाई को दिल्ली छोड़ कर हम लोग जा रहे थे तब सेंसेक्स २०,००० की गगन चुम्बी उंचाइयां पार कर चुका था | संसद में नोटों की करोडों की गड्डियां बटते हमने वहां कसबे के एक दोस्त के घर पर टी वी पर देखा | यह किसी दूसरी दुनिया से आने वाली खबरें होती हैं | उस दुनिया से जहां से राजनीति और ठेकेदार और बंदूकें आती हैं | जहां से हिंसा और उत्पीडन के सामान आते हैं |

ठूनू , समीरा, सुखानिया सभी की कथाएं हैं | उन सभी का जीवन हमारे समय का ही आख्यान था | मोहनदास की तरह, या टेपचू और वाकणकर की तरह | शायद हम सबकी तरह | पूंजी और राजनीतिक सत्ता के उपनिवेशों में अपनी अपनी त्रासदियां और दुखांत रचते हुए|

मोहनदास १७ -१९ जुलाई को ओसियान फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाई गयी | फ़िल्म के प्रोड्यूसर यानी उत्तर प्रदेश के राज्य परिवहन के अफसर , जो हिन्दी की एक साहित्यिक पत्रिका भी निकालते हैं, सवर्ण हिन्दी के उस तथाकथित  वामपंथी गुट के साथ जुड़े हुए हैं, जिसका हर बडे पुलिस अधिकारी, आई.इ.एस. अफसर, मंत्री आदि से गहरा अनैतिक और बेशर्म संबंध है| अपने ३२ साल के दिल्ली के जीवन में मैंने जिसके किसी भी मेंबर को 'बेरोजगार' कभी नहीं देखा| अखबारों, कारपोरेट घरानों, सरकारी संस्थानों में जो, तमाम लाभ के पद और पुरस्कार बटोरता उसी तरह टहलता है, जैसे ये सभी उसके फ़्लैट के टायलेट हों| 
वह हर जगह मौज़ूद है। वह सबसे ऊंची जातियों का है। 
श्रम से अधिक जुगाड और 'लायज़निंग'  पर वह निर्भर है।  लेकिन वह नाजिम हिकमत, ब्रेख्त, नेरूदा. लोर्का, पाश, फैज़ और तमाम क्रांतिकारी कवियों लेखकों के नाम ऐसे लेता है, जैसे वे उसकी निजी जागीर हों| 
ऐसे लेखकों आप अकेला कभी नहीं देखेंगे। वह गिरोहबंद है। चोम्स्की जिसे 'क्लेप्टोक्रेट' कहते हैं, यानी 'लुटेरा-माफिया समूह', यह वही है। यह किसी को भी हिंदी में तबाह करने की ताकत रखता है। 
लेकिन इसे परास्त करना इसलिए ज़रूरी है क्य़ोंकि बिना इसके अपनी भाषा को स्वतंत्र और आधुनिक नहीं किया जा सकता। 


बहरहाल, 'मोहन दास' फिल्म का यह प्रोड्यूसर पिछले कुछ वर्ष किसी संगीन आरोप में निलंबित भी रह चुका है|  इसी प्रोड्यूसर  और मेरे कई डाक्युमेंटरीज  में कैमरामैं रह चुके और अब मेरे ही कारण पहली बार किसी फ़िल्म के  निर्देशक बने व्यक्ति ने मुझे निमंत्रित नहीं किया था |
वजह ?
मैं इसे समझ पाने में हमेशा असफल रहा करता हूँ|
हद तो यह थी कि  अपने कई इंटरव्यू में निर्देशक ने कहानी को अपनी मौलिक कल्पना घोषित किया था | ये सारे लिंक नेट पर उपलब्ध हैं|
लेकिन पता चला कि तमाम युवाओं ने अपने ब्लॉग पर और कई समीक्षाओं में इन सब कोशिशों की धज्जियां बिखेर दीं| अगर 'मोहन दास' पहले से ही इतना लोकप्रिय न हो गया होता, उसके इतने अनुवाद और इतने मंचन न हुए होते, तो हिंदी साहित्य का  एक पूरा गिरोह इस तैयारी में था कि इसे विवादित कर दिया जाय|
वे ऐसा कई बार कर चुके हैं..! मेरी रचनाओं में व्यक्तियों की खोज, उसे 'नक़ल' आदि कहना और अपने संपर्क के जरिये अखबारों में अभियान चलाना..! यह एक डरावना आतंकवाद है|  एक तरह का  फासीवाद|

लेकिन  हर बार जनता ने, तमाम भाषाओँ के बौद्धिकों-रचनाकारों ने हस्तक्षेप किया है| और हम बचे हैं|

वे मेरे पाठक ही हैं...और वे सारे युवा जो मेरी अस्मिता को बचाए हुए हैं..!
हर बार, अचानक वे कहीं से आते हैं और मुझे अंधेरों में से निकाल लेते हैं..!
पता चला 'जनसत्ता' में कुंवर नारायण जी ने भी लिखा कि कि जब ओसियान में 'मोहन दास' दिखाई जा रही थी, तो उदय प्रकाश कहाँ थे?  कहीं उनके साथ फ़िल्म बनाने वालों ने वही तो नहीं किया, जो इस फ़िल्म में 'मोहन दास' के साथ किया गया?
उनका मैं कृतज्ञ हूँ| 'आत्मजयी' जब अपने बचपन में, गाँव में पढी थी, उसके बाद ही कठोपनिषद खरीद लाया था| उनके अन्दर कोई एक गहरी नैतिक करुना   है, ऐसा मुझे हमेशा  लगता है| 

खैर, अगर आप एक लेखक, कलाकार और कवि का जीवन जीते हैं तो अन्यायी और भ्रष्ट ताकतें आपके साथ वही व्यवहार करती है , जो उन्होंने 'मोहनदास' के साथ किया, या जो वे अपने समय के अशक्त, गरीब, मेहनतकशों और नागरिकों के साथ करती हैं |
 ओसियान में  फ़िल्म के क्रेडिट के डिस्प्ले के साथ भी ऐसा ही हुआ |

जिस दिन दिल्ली में ओसियन फ़िल्म फेस्टिवल में मोहनदास फ़िल्म दिखाई जा रही थी उस दिन मैं अनूपपुर की सब्जी मंडी में दोअपहर और रात के खाने के लिए सब्जी खरीद रहा था| तभी मोबाइल बजा| उधर से अजीत कौर बोल रहीं थीं|  पंजाबी की विख्यात लेखिका, सार्क लेखक संगठन की संयोजिका और अकादमी आफ फाइन आर्ट्स की संचालक|
दिल्ली में एक ऐसी उपस्थिति, जिनसे मैं शायद ही कभी मिलता होउं, लेकिन जब भी, जहां कहीं भी मेरा लिखा कुछ छापता है, उनका फोन ज़रूर आता है| आत्मीयता से भरा| दुलारता-सा| प्रोत्साहित करता|
वही आवाज़ थी| 'उदय जी आप कहां हैं?...मैं अभी मोहन दास देख कर निकली हूं| पूरे अपने जीवन में मैं चार बार रोई थी, आज इस फ़िल्म में सात बार रोई हूँ...!'
..उनकी आवाज़ में वही वत्सलता है|
'मैं अपने गाँव में हूँ और इस वक्त मोहन दास मेरे साथ ही है|' मैं अपनी भावुकता को संभालते हुए कहता हूँ|
थोड़ी ही देर में फोन डेड हो जाता है| ऐसा ही होता है यहाँ|  बात पूरी भी नहीं हो पाई थी|

मैंने लगभग दिल्ली छोड़ने का फैसला कर लिया है|
ज़हालत है, अगर आप ताकतवर नहीं हैं, किसी गिरोह में नहीं हैं, किसी अफसर, मंत्री, व्यावसायिक घराने, माफिया के सदस्य नहीं हैं| आश्चर्य है की यहाँ शायद ही कोई यह सुनने के लिए तैयार हो कि २५ साल बिना किसी नौकरी के रहना कितना मुश्किल और जानलेवा है|
वे सब मुस्कुराहटों से भरे, संतुष्ट, अघाए और आर्थिक रूप से सुरक्षित लोग हैं|
दसवीं दर्जे की शिक्षा है लेकिन वि.वि. और कालेजों के प्रोफेसरों की नियुक्ति करते हैं|  मुश्किल से ग्रेजुएट हैं लेकिन केन्द्रीय विश्व विद्यालयों के एकेडमिक कौंसिल के सदस्य हैं|
वे मेरे समकालीन हैं| वे सब महान हैं| खैर!

यहाँ गाँव में स्थितियाँ विकट हैं|  पहले से भी बदतर|
ग्रामपंचायतों में इतना भ्रष्टाचार और इतनी हिंसा की मैंने कभी कल्पना नहीं की थी| खदानों में नंबर दो का अवैध उत्खन हर जगह चल रहा है और इसमें समूचा राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र शामिल है|

मुझे डर भी लगता है कि अगर मैं यहाँ रहा तो कहीं मुझे भी 'नक्सल' न घोषित कर दिया जाए| अगर ऐसा किया गया तो मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि अपने आप को वामपंथी कहने वाले सवर्ण हिन्दी लेखक, जो अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े 'लेखक संगठनों' को चलाते हैं और राजधानियों में रहते हुए अपने बेटे, दामाद, बेटी, प्रेमिका, पत्नी, जाती-बिरादरी को हर सरकारी संस्थान में फिट कराते रहते हैं और जो अतीत की तमाम महा-वृत्तांतों ..१८५७, गांधी, भगत सिंह, मार्क्स-लेनिन वगैरह का नाम लेते रहते हैं, वे सब मेरी यंत्रणा में सत्ता के और मददगार होंगें|
उनके तो ऐसे बड़े-बड़े पुलिस अफसरों से करीबी रिश्ते हैं, जिनके अध्: पतन के किस्से मैं सुनता रहता हूँ| उन सबको वे मुक्तिबोध, रेणु अदि बताते रहते हैं...!ओह!

लगता है मैं इस पोस्ट को लिख नहीं पाउँगा ..! मैं अपनी उँगलियों को, जो की-बोर्ड पर चल रही हैं..अपने दिमाग से अलग नहीं कर पा रहा हूँ ..!
या हज़रत ...औलिया ...! हे ईश्वर, मुझे शक्ति दे...! सच कहने की शक्ति..! 

23 comments:

Raviratlami said...

ये तो लगता है कि मोहनदास कई कई बार पैदा हुआ और हर बार वही जिंदगी जिया है.
अच्छा किया कि यह आर्काइव से बाहर आई. कुछ और शीशे साफ हुए...

संदीप पाण्डेय said...

इस पोस्ट पर अब तक कवल रवि रतलामी जी की इकलौती टिप्पणी है, इसका कारण समझना कोई कठिन काम नहीं है। इंटरनेट सेवी हो रहा हिंदी जगत इतना अंजान नहीं है कि अब तक यह पोस्ट किसी की नजर के सामने से गुजरी न हो लेकिन ऐसी पोस्ट पर टिप्पणी करने के लिए जिस नैतिक साहस की आवश्यकता है वह बहुत सीमित हो चला है। अरसा पुरानी दिल की बात साझा करने के लिए आपको साधुवाद। मोहनदास को बीते सालों में न जाने कितनी बार पढ़ा फिल्म भी देखी लेकिन जिस घटनाक्रम के बारे में आपने जिक्र किया है उसे अभी आपकी कलम से ही जाना। उदय जी मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य में किसी लेखक के अपना अलग स्टैंड रखने के खतरे हैं। आप वे खतरे उठा रहे हैं, आपका जीवन युवाओं को वह जरूरी साहस बख्श रहा है जो नैतिक शिक्षा की किताबें नहीं कभी नहीं दे सकतीं

cmpershad said...

‘अखबारों, कारपोरेट घरानों, सरकारी संस्थानों में जो, तमाम लाभ के पद और पुरस्कार बटोरता उसी तरह टहलता है, जैसे ये सभी उसके फ़्लैट के टायलेट हों|
वह हर जगह मौज़ूद है। वह सबसे ऊंची जातियों का है। ’

इन वामपंथी ईश्वरों से खुका ही बचाये। अब किया भी क्या जाय.... कोर्ट कचहरी हर समय हर एक के बूते की बात तो नहीं होती और कहा तक व कब तक लड़े :(

Abnish Singh Chauhan said...

"ठूनू , समीरा, सुखानिया सभी की कथाएं हैं | उन सभी का जीवन हमारे समय का ही आख्यान था | मोहनदास की तरह, या टेपचू और वाकणकर की तरह | शायद हम सबकी तरह | पूंजी और राजनीतिक सत्ता के उपनिवेशों में अपनी अपनी त्रासदियां और दुखांत रचते हुए|" आपने गाँव को करीब से देखा है, और वहां की गरीबी, बदहाली को भी. मन को हिला कर रख दिया इस पोस्ट ने. -अवनीश सिंह चौहान

सुनील गज्जाणी said...

आदरणीय उदय जी
सादर प्रणाम ~!
सर्व प्रथम आप को '' ३१ जुलाई' वैवाहिक साल गिरह कि हार्दिक बधाई अब अग्रीम स्वीकार कीजियेगा !ये पोस्ट पुरानी नहीं लग रही आज भी प्रासंगिक है
.दिवंगत पुण्य '' आत्मा ' ठुनू जी '' को श्रधा सुमन !
'' मोहन दास '' का ज़िक्र ध्यान करने योग्य भी है अपितु ये भी आप कि वजह से जो व्यक्ति आप के कारण एक मुकाम हासिल करता है और अपने आयोजन में आप को नहीं निमंत्रित करता है तो एक विचारणीय बिंदु अवश्य होता है मगर आप जैसे विभूति ने बड़ी सहजता से लिया ये बड़प्पन है .
हमारे भारत वर्ष में आज भी ऐसी जगह है आज भी वहा मोबाइल मृत प्राय हो जाता है .. बिजली सिर्फ चंद घंटो के लिए आती है .... भारत वर्ष विकास शील देशो में है ? आदर जोग उदय जी ! हालाकि आप के समक्ष मेरा अल्प ज्ञान है चाहे साहित्य में हो या जीवन में मगर इतना जान गया कि चीहे क्षेत्र कैसा भी हो '' जिसकी लाठी उसकी भैस '' हर जगह देखने को मिलती है ,संत्री से लेकर मंत्री तक आप कि पहुच होतो ... आप के फिर क्या कहने ... ! आप कि पूरी पोस्ट को मैंने तन्मयता से पढ़ा . रोचकता के साथ साथ बहुत कुच सवाल छोड़ दिए .. . पोस्ट कि नवीनीकरण के लिए आप का आभार .
साधुवाद !
सादर !

सुनील गज्जाणी said...

आदरणीय उदय जी !
प्रणाम !
हमे '' मोहन दास '' कैसे प्राप्त हो सकती है ? जिस हमे भी इस सवेदन शील फिल्म को देख स्वयम से मंथन कर सके . आप का प्रत्तुतर चाहुगा , आप के आशीर्वाद को तत्पर !
सादर

गिरीन्द्र नाथ झा said...

उदय जी आपके लिखे से काफी कुछ सोचने-समझने को मिलता है। मैं इस पोस्ट को एक आम आदमी का पोस्ट मानता हूं, जो इस दुनिया की घनचक्करी में जिंदगी गुजारता है और हमेशा कुछ अच्छा करने की कोशिश भी करता है। भले ही लाख मुसीबत आए वो घबराता तो है लोकिन थमता नहीं है। दुख होता है कि यह साहस हम सब में संचारित नहीं हो पाता है। आप में सच कहने की शक्ति.है... ऐसा हम सब में हो ...

SANJEEV JHA said...

aapke har jokhim mein hum aapke sath hain. always and with our heart and soul... hats off to u

Prashank said...

iss post mein self appreciation ke alawa aur kya hai?

anita said...

uday ji Post padhkar hairaan hun... producer saheb ko mai janti hun ..i am shocked & surprised k unhone aisa kiya hai....mai unse jaroor jaankari karunge...its really shameful....

अजेय said...

यदि यह पोस्ट आत्म स्तुति है तो आत्म स्तुति एक बुरी , अवांछित चीज़ नहीं है.

ओ वामपंथी ईश्वर !

हमें बस इंसान बने रहने की ताक़त दे. हम इंसान बन कर जीना चाहते हैं. और तुम्हारे लिए भी यही शुभ होगा.... आमिन !

सुशीला पुरी said...

कितना त्रासद है इसे पढना...! ...किन्तु आपकी कलम की नैतिक करुणा ने ही इतनी हिम्मत दे दी है, कि अब हम झूठ ,निरंकुशता ,गुटबाजी ,फरेब और इस तरह की तमाम दोमुहे , पिलपिले, घिनौने सत्ता -समुदायों के चंगुल से खुद को बचा पाएंगे ....आने वाले समय में किसी भी 'मोहनदास' के साथ वे फासीवादी ताकतें कुछ कर पाने की अपनी साजिशों में खुद ही डूबेंगी ..., आज 'मोहनदास' का सम्मान इस बात का सुबूत है ,कल का समय हमारा है ... हम सब हमेशा साथ -साथ हैं ...!

सुशीला पुरी said...

कितना त्रासद है इसे पढना...! ...किन्तु आपकी कलम की नैतिक करुणा ने ही इतनी हिम्मत दे दी है, कि अब हम झूठ ,निरंकुशता ,गुटबाजी ,फरेब और इस तरह की तमाम दोमुहे , पिलपिले, घिनौने सत्ता -समुदायों के चंगुल से खुद को बचा पाएंगे ....आने वाले समय में किसी भी 'मोहनदास' के साथ वे फासीवादी ताकतें कुछ कर पाने की अपनी साजिशों में खुद ही डूबेंगी ..., आज 'मोहनदास' का सम्मान इस बात का सुबूत है ,कल का समय हमारा है ... हम सब हमेशा साथ -साथ हैं ...!

ZEAL said...

.

उदय जी ,

हिंदी ब्लॉगजगत के मार्फ़त इस पोस्ट तक आना हुआ । इस लेख के माध्यम से आपका परिचय मिला और इस दुखद प्रकरण का पता चला। जिन्होंने आपकी मौलिक रचना को अपना बताने का गुनाह किया है , ऐसे लोग चोरी के साहित्य से कब तक कामयाबी को छू सकेंगे । आपकी लेखनी को नमन । इस लेख को एक लम्बी अवधी के बाद भी यहाँ लगाकर आपने हम सब पर उपकार किया है ।

सादर ,

.

Kajal Kumar said...

"ज़हालत है, अगर आप ताकतवर नहीं हैं, किसी गिरोह में नहीं हैं, किसी अफसर, मंत्री, व्यावसायिक घराने, माफिया के सदस्य नहीं हैं| "

इससे ज़्यादा यच क्या हो सकता है.

dinkar bedekar said...

एका कवीच्या आत्मचरित्रातील काही दुर्लक्षित नोंदी


कवी जन्माला आला तेव्हा
अनेक कारणांनी असेल, पण सगळ्यांचं थोडं दुर्लक्षच झालं
प्रत्येकानं आपापली कारणं सांगितली;
पण सगळ्यांनी मिळून साफ दुर्लक्षच केलं.


भोवती गर्दी होती, कवी त्या गर्दीत हरवून गेला.
भोवती कोलाहल होता, त्यानं अस्वस्थ, घाबराघुबरा झाला.
क्वचित कधी भोवती सारं सामसूम शांत होतं
तेव्हा खिन्नउदास झाला.
दु:खानं व्याकुळ झाला; प्रेमानं गहिवरला ...
मात्र हे सगळं घडत असतांना त्यात फार गुंतायचं नसतं-
एकीकडे आयुष्याची घडी यशस्वीपणे- नीटनेटकी बसवायची असते-
हे शिकून घ्यायचं राहूनच गेलं.


पस्तीसमजली इमारतीच्या पायथ्याशी
ओशाळवाणं अस्तित्व असलेल्या,
त्या जागेवरच्या मूळ चाळीसारखी
कवितेची अवस्था झालीय आता
झगमगणार्‍या साहित्यविश्वात-
आणि कवी प्राणपणानं जपून ठेवतोय
जमिनीच्या मूळ कागदपत्रांबरोबर
एक कवी असण्याचा दाखला...


“लोकांचं काही समजत नाही-”कवी एकदाच म्हणाला.
‘-टीव्ही सिरिअल्स पाहून हसतात;सिनेमा पाहून हसतात;
तीच ती ठराविक गाणी
निरनिराळ्या वयाच्या गायकांकडून पुन्हापुन्हा गाऊन घेतात;
मूळ गाण्याशी ताडून बघतात आणी तेवढं जमलं की खूष होऊन टाळ्या वाजवतात
पुस्तकं, साप्ताहिकं, वर्तमानपत्रं, न्यूजचॅनल्स
ह्या सगळ्यातही ह्सण्याच्या जागा शोधून काढतात
आणि कुणी “-कविता” एवढं नुस्तं म्हटलं
तर फारच जोरात ह्सतात-”
कवी क्षणभर थांबला. मग खिन्नपणे म्हणाला-
“-हे ही एक बरंच असतं- हसण्याची सोय असली
की हसून चटकन विसरून जाता येतं-”













कवीची समजूत घालणं
अलीकडे कठीण होऊन बसलं होतं.
तरीही मी प्रयत्न केला.
इतर काही नसलं तरी सोबतीला कविता तर आहे
असा दिलासा दिला.
बाकिच्यांसारखी ती तर काही मागत नाही ?
असा प्रश्नही विचारला.
कवी काही क्षण गप्प राहिला, आणि
विषण्ण आवाजात म्हणाला-
“-मागते- जीवच मागते-”
जे वाट्याला आलं
त्याबद्दल कवीची तक्रार नव्हती- बहुतेक-
कारण तसं कुठे काही आढळत नाही.
त्याच्या मनात कधी काही आलं असेल-
पण ते आपल्याला कळत नाही.
कवीचं आत्मचरित्र चिकाटीनं वाचलं
तर मात्र भीती वाटते.
आपण एसेमेस केल्यासारखं वागायबोलायला लागू,
दु:खाच्या किंवा आनंदाच्या परमोच्चक्षणी
कमर्शिअल ब्रेक घेऊ,
जगणं इतकं अटीतटीचं करून ठेऊ
की रद्दबातल ठरवलेल्या माणसांची प्रचंड अडगळ
आपल्याभोवती साचत जाईल-
हे सगळं कवी सुचवतो तेव्हा खरंच भीती वाटते.
ते जगणं कसं असेल? आणि मरण?
तेव्हाही कविता असेल?
असलीच तर तिची अवस्था काय असेल?


-दिनकर बेडेकर

mridula pradhan said...

wah. bahut achcha kiye ki yah post yahan dale....hum bhi kuch jaan sake....aaj ki duniyadaree.

Ishwar Dost said...

ईश्वर दोस्त:
दो साल बाद ही सही, यह पोस्ट लगाकर आपने अच्छा किया। पाठक अपने लेखक के अंतर्द्वंद, समस्याओं का राजदार भी हो, यह स्थिति लोकतांत्रिक है।
फ्रीलांसिंग, जिसका अनुवाद मेरे एक मित्र ‘फोकट में तलवारबाजी’ करते हैं, के थोड़े से अनुभव के आधार पर बिना नौकरी पच्चीस साल का तनाव त्वचा पर महसूस कर सकता हूं। राहत यह है कि आप ऐसे तनावों, दबावों का सर्जनात्मक रुपांतरण कर पाते हैं।

अभिनव उपाध्याय said...

उदय जी, मोहन दास कि अभिनेत्री का साक्षात्कार करने का अवसर आज समाज में रहते हुए मुझे मिला था कामरान से भी बात हुई थी.. जब यह फिल्म फिल्मोत्सव में चर्चा का विषय बनी थी, आज आपकी पुरानी पोस्ट में भी एक ताजगी है.और एक गंभीर प्रश्न भी. आजकल कुछ लेखक ही ऐसे जिनकी लेखनी में बेबाकी है, जो इस तरह से लिखते हैं.
एक शिकायत भी है. मोहनदास को साहित्य अकादमी मिलने पर मैंने आपका भी साक्षत्कार लिया था लेकिन आपने इस प्रसंग का उल्लेख नहीं किया. ईश्वर आपका साहस बरकरार रखें. ३२वी सालगिरह कि अग्रिम बधाई.

अमिताभ त्रिपाठी ’ अमित’ said...

हर किसी का पाँव घुटनो तक सना है....
और
इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके ज़ुर्म हैं
आदमी या तो जमानत पर रिहा है या फ़रार

-दुष्यंत कुमार

Prakash Manu प्रकाश मनु said...

बहुत मार्मिक और मन में छटपटहट भर देने वाली टिप्पणी। क्या कहूँ, कैसे कहूँ. समझ नहीं पा रहा हूँ उदय जी। बस यह समझें कि सब कुछ समझ पा रहा हूँ। अत्यंत स्नेहपूर्वक, प्र.म.

sunil umarao said...

Udayji aap nay rula diay.Itni saafgoyi kaha? Aap mahan lehak naih hai.....par insaan bhi! sat sat naman!
mein bhi aisay jeenay ki kosish karta rahata ho.....par ..........

sunil umarao said...

Uday bhai rula diay......itni saafgoi kah milti hai