Friday, July 22, 2011

लेखक भाषा का आदिवासी है


(१५ फरवरी 2011  को  यह वक्तव्य मैंने लिखा था. तकनीकी असुविधाओं के बावजूद इसे आज अपने गाँव में लगा रहा हूँ. साहित्य अकादमी पुरस्कार का यह औपचारिक  'स्वीकार -वक्तव्य' था. पिछली पोस्ट मैंने २ मार्च को लिखी थी, लगभग चार महीने बाद, दिल्ली से १०५७ (एक हज़ार सत्तावन) किलोमीटर दूर, सारी दूरियां लांघते हुए एक बार फिर आपके पास हूँ.)

मुझसे कहा गया है कि मुझे साहित्य अकादेमी द्वारा ‘मोहन दास’ को दिये गये पुरस्कार को स्वीकार करते हुए, इस संदर्भ में अपनी ओर से कुछ कहना है। यह एक परंपरा रही है। मेरे असमंजस और दुविधा की शुरूआत ही यहीं से होती है। मैं क्या कहूं? 
मुझे लिखते-पढ़ते हुए कई दशक हो चुके हैं। लिखने की शुरूआत बचपन से ही कर दी थी, जब खड़ी हिंदी बोली ठीक ढंग से आती भी नहीं थी। तब कभी यह सोचा नहीं था कि इसी भाषा में एक दिन सिर्फ लेखक बनना है। ऐसा लेखक, जिसकी सामाजिक अस्मिता और जीवन का आधार किसी एक भाषा में लिखने तक ही सीमित होकर रहता है। रोलां बाथ जिसे ‘पेपर बीइंग’ कहते थे। तरह-तरह के कागजों़ पर स्याही में लिखे या छपे अक्षरों-शब्दों में, उन्ही के जरिये किसी तरह अपना अस्तित्व बनाता हुआ प्राणी। आज के समय में वे होते तो कहते आधिभौतिक आभासी व्योम में द्युतिमान अक्षर या शब्द के द्वारा अपने होने को प्रमाणित करता कोई अस्तित्व। यानी 'कहीं नहीं' में 'कहीं होता' कोई अ-प्राणी। ‘ए वर्चुअल नॉनबीइंग।’ यानी ‘ए सोशल नथिंग।’ किसी अप्रकाशित को महाशून्य में प्रकाशित करने की माया रचता भासमान अनागरिक। आकाशचारी ‘नेटजन’। 
बचपन जैसा असुरक्षित और भटकावों से भरा रहा, उसे देखते हुए, आकांक्षा यही थी कि आगे चलकर एक सुरक्षित और अपेक्षाकृत स्थिर वास्तविक जीवन मिले। इसके लिए वास्तविक कोशिश भी की। परिश्रम किया। परीक्षाओं में अंक अच्छे लाए। यह सारा प्रयत्न उसी भाषा में किया, जिसमें लेखक के रूप में उपस्थित और जीवित रहता था। सोचा कोई नौकरी मिल जाएगी तो वास्तविक जीवन गुज़र जाएगा। समाज-परिवार की जिम्मेदारी निभ जाएगी। किसी मध्यवर्गीय नागरिक की तरह। फिर एक समय, जब युवा होने की दहलीज़ पर ही था, यह लगा कि अपने लिए तो सभी जीते हैं। इतना आत्मकेंद्रित क्या होना? जो किताबें पढ़ता था, उनसे भी यही प्रेरणा मिलती थी कि अपने समय को अधिक न्यायपूर्ण, सुंदर, मानवीय और उत्तरदायी बनाना चाहिए। इतिहास ऐसे प्रयत्नों के बारे में, उन प्रयत्नों की सफलताओं-असफलताओं के बारे में बताता था। उपन्यास, कविताएं, दर्शन, विज्ञान और मानविकी की तमाम पुस्तकों में ऐसे संकेत और विवरण थे। कलाएं भी इसका उदाहरण बनती थीं। नितांत अकेलेपन और एकांतिक पलों में उपजने वाली भाषिक-वाचिक अभिव्यक्तियों या अन्य कलाओं में भी यह प्रयत्न दिखाई देता था। लेकिन इन सबमें सबसे प्रगट और शायद अधिक ठोस, साफ और आसान-सा उपक्रम जहां दिखता था, उसे राजनीति या सामाजिक कर्म कहते हैं। तो मैं उधर भी गया। इस सबके पीछे ऐसा लगता है कि कोई महान मानवीय-सामाजिक कार्य करने, बड़ा परिवर्तन लाने का कोई आत्मबलिदानी आदर्श या क्रांतिकारी लक्ष्य किसी समय रहा होगा। जिस पीढ़ी का मैं था, वह पीढ़ी ही कुछ-कुछ ऐसी थी।
आज इस उम्र में, इतनी दूर आकर कह सकता हूं, कि शायद वह सारा प्रयत्न भी मेरी अपनी ही सुरक्षा और अस्तित्व की चिंता से जुड़ा हुआ था। एक स्तर पर वह कहीं गहराई से व्यक्तिगत भी था। शायद हम किसी भी परिवर्तन की कोशिश  में तभी सम्मिलित होते हैं, जब हम उसमें स्वयं अपनी मुक्ति और अपनी स्थितियों में बदलाव देखते-पाते हैं। मेरे पास भाषा और अपने शरीर के अलावा कोई दूसरा साधन और ऐसा माध्यम नहीं था, जिससे मैं दूसरों, और इस तरह अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए ऐसा सामाजिक प्रयत्न कर सकता। तो एक दीर्घ समय तक, बल्कि अपने जीवन के सबसे बड़े हिस्से को, मैंने वहीं खर्च किया। यही सोचते हुए कि एक ऐसे समाज और समय में, जिसमें मेरे जैसे अन्य सभी सुरक्षित और स्वतंत्र होंगे, उसमें मैं भी स्वतंत्रता और नागरिक वैयक्तिक गरिमा के साथ रह सकूंगा। 
आज इतने वर्षों के बाद भी मुझे लगता है कि मैं इस भाषा, जो कि हिंदी है, के भीतर, रहते-लिखते हुए, वही काम अब भी निरंतर कर रहा हूं। जब कि जिन्हें इस काम को भाषेतर या व्यावहारिक सामाजिक धरातल पर संगठित और सामूहिक तरीके से करना था, उसे उन्होंने तज दिया है। इसके लिए दोषी किसी को ठहराना सही नहीं होगा। वह समूची सभ्यता का आकस्मिक स्तब्धकारी बदलाव था। मनुष्यता के प्रति प्रतिज्ञाओं से विचलन की यह परिघटना संभवतः पूंजी और तकनीक की ताकत से  अनुचर बना डाली गई सभ्यता का छल था। मुझे ऐसा लगता है कि इतिहास में कई-कई बार ऐसा हुआ है कि सबसे आखीर में, जब सारा शोर, नाट्य और प्रपंच अपना अर्थ और अपनी विश्वसनीयता खो देता है, तब हमेशा इस सबसे दूर खड़ा, अपने निर्वासन, दंड, अवमानना और असुरक्षा में घिरा वह अकेला कोई लेखक ही होता है, जो करुणा, नैतिकता और न्याय के पक्ष में किसी एकालाप या स्वगत में बोलता रहता है। या कागज़ पर कुछ लिखता रहता है। किसी परित्यक्त अनागरिक होते जाते बूढ़े की अनंत बुदबुदाहट, कभी किसी पुरानी स्मृतियों के कोहरे और अंधंरे से निकलती और कभी किसी स्वप्न के बारे में संभाव्य-सा कुछ इशारा करती। इसे ‘सॉलीलाक्वीस’ कहते हैं। मैं ज़रा-सा भाग्यशाली इसलिए हूं कि इस स्वगत को सुनने वाले बहुत से लोग मुझे अपनी ही नहीं, दूसरी अन्य भाषाओं में भी मिल गये हैं। इसमें हमारे अपने देश  की भी भाषाएं हैं और दूसरे कुछ देशों  की भी।
एक प्रश्न हमेशा मेरे सामने आ खड़ा होता है। वह यह कि जिस धरती पर मैं भौतिक रूप से रहता हूं, जिस शहर, समाज या राज्य में, उसका मालिक आखिर कौन है? किसका आधिपत्य उस पर है? किसी नागरिक, प्रजा या मनुष्य  के रूप में उस मालिक ने मुझे कितनी स्वतंत्रता दे रखी है? उसकी हदबंदियां और ज़ंजीरें कहां-कहां हैं? और ठीक इसी से जुड़ा हुआ, इसी प्रश्न के साथ, इसी प्रश्न का दूसरा हिस्सा भी सामने आ जाता है कि जिस भाषा में मैं लिखता हूं, उस भाषा का मालिक कौन है? वह कौन सी सत्ता है, जिसके अधीन यह भाषा है? जैसा मैंने अभी कहा, लेखक और कुछ नहीं, भाषा में ही अपना अस्तित्व हासिल करता कोई प्राणी होता है। भाषा ही उसका कार्यक्षेत्र, उसका देश , उसका घर और उसका अंतरिक्ष होती है। उसकी संपूर्ण सत्ता भाषा में ही अंतर्निहित होती हैं। लेकिन मैंने अक्सर पाया है कि भाषा और भूगोल, या शब्द और राज्य, दोनों को अपने अधीन बनाने वाली सत्ता एक ही होती है। कई तरह के प्रतिपक्षी और प्रतिभिन्न पाठों में प्रकट होते शब्दाडंबरों या डेमॉगागी के आर-पार वर्चस्व की वही संरचनाएं रहती हैं, जो किसी धरती के नागरिक या किसी भाषा के लेखक की स्वतंत्रता को नियंत्रित, अनुकूलित या अधीन करती हैं। हर तरह की ऐसी सत्ता, मुझे अनिवार्य रूप से लगता है कि अपने मूल चरित्र में सर्वसत्तावादी होती है। इतिहास ने और मेरे अपने ही जीवन की स्मृतियों और अनुभवों ने इस धारणा को पुष्ट ही किया है। यह सत्ता राज्य-व्यवस्था ही नहीं, किसी भी भाषा में विनिर्मित उन विचार-सरणियों को भी अधिगृहीत कर लेती हैं, जिनमें सबकी मुक्ति की कोई संभावना होती है। पिछले दो-ढाई दशकों के मेरे अनुभवों और संज्ञान ने यह बोध मुझे दिया है। इसीलिए, जिस भाषा में मैं लिखता और रहता हूं, वह मेरे लिए, सिर्फ ‘हिंदी’ नहीं रह जाती। वह जीवन और यथार्थ का एक ऐसा जटिल प्रश्न बन कर उपस्थित होती है, जिसे किसी कथा या कविता या अपने किसी बयान में कहता हुआ मैं सत्ताओं के संदेह के घेरे में अक्सर आता रहता हूं।


इसके बाद इस जगह मैं चुप रहूंगा।



मैं स्मरण दिलाना चाहूंगा कि पिछली सदी के ठीक बीतते ही, जब सब नयी सहस्राब्दी के स्वागत की मुद्रा में थे, मैंने एक लंबी प्रेमकथा लिखी थी -‘पीली छतरी वाली लड़की’। आप अगर ध्यान दें, तो लोकरंजक सरलता के उस सहज पाठ में भाषा और मनुष्य का गहरा अनुचिंतन और विखंडन एक साथ विन्यस्त था। अपने नये कविता संग्रह-‘एक भाषा हुआ करती है’ का भी ध्यान मैं दिलाना चाहूंगा। मुझे लगता है कि  हो जाने की अस्मिता हासिल होने के बाद उसकी स्वतंत्रता किसी भी जातीय, सांप्रदायिक, धार्मिक, लैंगिक या राजनीतिक या डेमॉगागिक वर्चस्व से नियंत्रित होती ही है। हर लेखक को, अगर उसने अन्य अस्मिताओं के सारे आवरण और कवच उतार दिये हैं और उसके पास अपने जीवन और अपने आत्म की रक्षा के लिए भाषा के अतिरिक्त कोई दूसरा उपकरण नहीं बचा है, तो उसे हमेशा अपनी इस पराधीनता या औपनिवेशीकरण  से मुक्ति का प्रयत्न करना ही पड़ता है। 



मेरा यह भी मानना है और इसे मैं पिछले लंबे अर्से से कहता आ रहा हूं कि लेखक वस्तुतः अपनी भाषा का मूलनिवासी या आदिवासी होता है। उसकी भाषा ही उसका जल, जंगल, ज़मीन और जीवन हुआ करता है। किसी लालच या अन्य उन्माद में सभ्यताएं हमेशा किन्हीं आदिवासियों को उसके स्थान से विस्थापित करती आयी हैं। यह सिर्फ किसी कोलंबस का ऐतिहासिक वृत्तांत भर नहीं है, बल्कि एक ऐसा सर्वव्यापी सच है, जो आज तक देखी-जानी गई हर तरह की सत्ता-संरचना को शर्मशार कर सकती है। आज जब मैं यहां आपके सामने अपना यह वक्तव्य पढ़ रहा हूं, उस समय आप सब देख रहे हैं कि पूंजी और तकनीक की ताकतों के साथ जुड़ी लोभ की सत्ता ने किस व्यापक पैमाने पर हिंसा और संवेदनहीनता के साथ निरस्त्र मूलनिवासियों को उनकी जड़ों से उखाड़ना शुरू किया है। यह एक तरह का सभ्यता का उन्माद है। एक ऐसा मनोरोग जो किसी खास जगह नहीं, बल्कि संसार के सभी वंचित, वध्य, सत्ताहीन और शांत-अहिंसक मूलनिवासियों के जीवन में ‘होलोकास्ट’ पैदा कर रहा है। कई साल पहले मिशेल फूको की किताब -‘सभ्यता और उन्माद’ पढ़ी थी, उसे इस डरावने ढंग से प्रमाणित होते आज हम अपने सामने देख रहे हैं।
भाषा भी पूंजी और तकनीक के साथ जुड़ी लोभी सत्ता-संरचनाओं की चपेट में है। इसके विस्तार में मैं नहीं जाना चाहूंगा। उतना समय भी नहीं है। लेकिन इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि भाषा भी अब एक जिंस और एक उत्पाद भर मान ली गई है और इससे जुड़े जितने भी अकादेमिक, व्यापारिक और राजकीय उद्यम हैं, किसी सचमुच स्वतन्त्र नागरिक लेखक की उसमें कहीं कोई जगह नहीं है। वह विस्थापन के ठीक उसी बिंदु पर है, जिसमें हमारे समय की वंचित मूलनिवासी मनुष्यता है। 
मैं साहित्य अकादेमी को धन्यवाद देता हूं और उस निर्णायक मंडल के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं, जिसने मेरी लंबी कहानी या आख्यान ‘मोहन दास’ को यह सम्मान दिया। जाहिर है, कोई भी पुरस्कार किसी भाषा और भूमि में किसी मनुष्य का पुनर्वास तो नहीं कर सकता, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मैं अपनी खुशी यहां प्रकट करता हूं। 
यह खुशी इसलिए अर्थ रखती है कि इस राज्य के एक नागरिक के रूप में मैं कुछ अपेक्षाकृत सुरक्षित-सा अनुभव कर रहा हूं।

आप सबका हृदय से आभार।      
                          

21 comments:

शहरोज़ said...

लेखक वस्तुतः अपनी भाषा का मूलनिवासी या आदिवासी होता है। उसकी भाषा ही उसका जल, जंगल, ज़मीन और जीवन हुआ करता है। किसी लालच या अन्य उन्माद में सभ्यताएं हमेशा किन्हीं आदिवासियों को उसके स्थान से विस्थापित करती आयी हैं।

यूँ तो आपसे असहमत होने का कोई जुवाज़ नहीं.लेकिन इन पंक्तियों ने अतिरिक्त प्रभावित किया.

शहरोज़ said...

लेखक वस्तुतः अपनी भाषा का मूलनिवासी या आदिवासी होता है। उसकी भाषा ही उसका जल, जंगल, ज़मीन और जीवन हुआ करता है। किसी लालच या अन्य उन्माद में सभ्यताएं हमेशा किन्हीं आदिवासियों को उसके स्थान से विस्थापित करती आयी हैं।

यूँ तो आपसे असहमत होने का कोई जुवाज़ नहीं.लेकिन इन पंक्तियों ने अतिरिक्त प्रभावित किया.

neelam chand sankhla said...

lekhak kee mul bhasha hee usakee dil ki aavaz ko sunderta se bayan karti hai.

डॉ .अनुराग said...

लेखक इसी समाज का हिस्सा है ..किसी दूसरे व्यक्ति की अपेक्षा उसमे अपने तजुरबो को कहने की बयान करने की कला ज्यादा है ..शायद गोड गिफ्टेड है ...पर उसके कर्तव्य शायद इसी कला में निहित है ...उसे इसी समाज को इसी कला के जरिये अधिक संवेदनशील बनाना है ..अधिक मानवीय .ओर खुद भी कागजो से बाहर मनुष्य होने का निरंतर प्रयास करना है बस

Rangnath Singh said...

इस भाषण में आपने अपनी सतत चिंताओं को बहुत ही सूत्र रूप में प्रस्तुत किया है.बहुत दिनों बाद आपका लिखा पढ़ कर भला लगा.

मनोज कुमार said...

बहुत कुछ सीखने को मिला आपको पढ़कर!

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

लेखक अपनी भाषा का आदिवासी होता है और अंग्रेज़ी उसकी अन्नपूर्णा मां :(

सुशीला पुरी said...

लेखक वस्तुतः अपनी भाषा का मूलनिवासी या आदिवासी होता है। उसकी भाषा ही उसका जल, जंगल, ज़मीन और जीवन हुआ करता है। किसी लालच या अन्य उन्माद में सभ्यताएं हमेशा किन्हीं आदिवासियों को उसके स्थान से विस्थापित करती आयी हैं। यह सिर्फ किसी कोलंबस का ऐतिहासिक वृत्तांत भर नहीं है, बल्कि एक ऐसा सर्वव्यापी सच है, जो आज तक देखी-जानी गई हर तरह की सत्ता-संरचना को शर्मशार कर सकती है।

....बिल्कुल !!!

सुशीला पुरी said...

''लेखक और कुछ नहीं, भाषा में ही अपना अस्तित्व हासिल करता कोई प्राणी होता है। भाषा ही उसका कार्यक्षेत्र, उसका देश , उसका घर और उसका अंतरिक्ष होती है। उसकी संपूर्ण सत्ता भाषा में ही अंतर्निहित होती हैं। लेकिन मैंने अक्सर पाया है कि भाषा और भूगोल, या शब्द और राज्य, दोनों को अपने अधीन बनाने वाली सत्ता एक ही होती है।''

...और वह निरंकुश सत्ता मनुष्य के पूरे अस्तित्व को निगल जाने की ताक में पल पल रहती है ।

niranjan dev sharma said...

आप की चिंताएँ मानव सभ्यता के अस्तित्व से जुड़ी हुई हैं । अकादमी ने आपके लेखन में उभरी चिंताओं और उनके मानवीय सरोकारों का सम्मान किया है । आप एक युग को वाणी प्रदान कर रहे हैं । हम सब आपके शुक्रगुजार हैं ।

आशुतोष पार्थेश्वर said...

अपनी भाषा के इस नागरिक की चिंता और भावनाओं को सलाम !

अमितेश said...

सचमुच लेखक इस भाषा का आदिवासी है जिनके भविष्य को भि निर्धरित करने का अधिकार बाहर से आये चिंतको ने ले लिया है.

Ravikant Sharma said...

kitne dino baad ek lekh jis main sabhyata, samaj aur manavta ke vishay main chintan kiya hua likha hai, padhne ko mila. Aise vishyon par likhne ke sanskriti hi khatm hoti ja rahi hai, sambhavtah bazarikaran ka prabhav humaare chintan tak ko khatm karta ja raha hai. Uday ji ko aabhar avam sadhuvad

अजेय said...

इतने इंटेंस चिंतन को जीने और उसे दर्ज कर लेने के बाद भी एक लेखक बिन्दास, जीता है....आवाज़ मे कोई शैथिल्य महीं, विचारों मे कोई लड़्खड़ाहट नहीं, मेरे लिए यह करिश्मा है.लम्बे अर्से बाद ब्लॉग पर कुछ हलचल हुई है.....

sunny n m said...

"lekhak bhasha ka aadivasi hei" patker budi khusi huyi. udayaparakshji ko hardik badayiyam deta hum. sunny n.m calicut kerala.

संजय ग्रोवर Sanjay Grover said...

अनुज लुगुन और आपको, दोनों को बधाई। आपसे ऐसे ही किसी निर्णय की उम्मीद थी। कुछ ही दिन पहले अनुज की कविताएं कहीं पढ़ीं थीं। यह पुरस्कार सिर्फ एक कविता पर दिया जानेवाला पुरस्कार है और अगर इसी तरह दिया जाए तो मुझे लगता है अपनी तरह का अनोखा है। अगर यह कवि का आगा-पीछा, बायो-डाटा, सम्प्रति-सम्पर्क, अब तक प्रकाशन आदि-आदि को नकार कर कहीं भी अचानक पढ़ने को मिल गयी एक कविता पर ही दिया जाए तो भविष्य में कई विस्मयकारी और इसीलिए सुखद निर्णय देखने को मिल सकते हैं।

लीना मल्होत्रा said...

सबसे आखीर में, जब सारा शोर, नाट्य और प्रपंच अपना अर्थ और अपनी विश्वसनीयता खो देता है, तब हमेशा इस सबसे दूर खड़ा, अपने निर्वासन, दंड, अवमानना और असुरक्षा में घिरा वह अकेला कोई लेखक ही होता है, जो करुणा, नैतिकता और न्याय के पक्ष में किसी एकालाप या स्वगत में बोलता रहता है। या कागज़ पर कुछ लिखता रहता है। किसी परित्यक्त अनागरिक होते जाते बूढ़े की अनंत बुदबुदाहट, कभी किसी पुरानी स्मृतियों के कोहरे और अंधंरे से निकलती और कभी किसी स्वप्न के बारे में संभाव्य-सा कुछ इशारा करती..bahut gahre utar gaye anek bhav... abhaar.

उमा said...

पहले तो यह कह दूं कि मैं जिस उदय प्रकाश को जानता हूं वह अबूतर-कबूतर से शुरू होता है, जबकि इससे पहले कविता ‘सुनो कारीगर’ से काफी चर्चित हो चुके थे। और उसके बाद तो तिरिछ, और अंत में प्रार्थना, मोहनदास, मेंगोसिल, वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ और भी न जाने कहां-कहां किन-किन गलियों और राजमार्ग होते हुए हमारे उदय प्रकाश का सृजन हुआ। हम जिस उदय प्रकाश को जानते हैं वह किसी भी साहित्य अकादमी से ऊपर है। उदय प्रकाश जी आप तो खुद हिंदुस्तान दैनिक के साथ एक साक्षात्कार में कह चुके हैं- आप कैमरा जहां रखते हैं, वहीं से उसका फ्रेम तैयार हो जाता है। तो फिर उस राज्य सत्ता के लिए प्रशंसा के शब्द कैसे निकले जिस राज्यसत्ता को आप भी आततायी मानते हैं। प्रतिबद्धता सिर्फ रचनाओं से ही नहीं दीखाने की चीज नहीं, जीने की चीज है। आखिर अशोक वाजपेयी ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिया जानेवाला सम्मान ठुकराया तो ? यह अलग बहस का विषय हो सकता है कि उन्होंने अपने इस कदम से क्या खारिज किया है और किसे आवाज दी है। पर इतना तो है ही कि संस्कृतिकर्मी अपनी स्वायत्तता खुद ही सिरजता है। ऐसे में व्यावहारिक तौर पर प्रतिबद्धता दीखाने के मौके गंवाना हमारी विचारधारा को ही व्यक्त्त करता है। आपने खुद ही ‘मोहन दास’ को दिए गए सम्मान के लिए अपने वक्तव्य में कहा है - कोई भी पुरस्कार किसी भाषा और भूमि में किसी मनुष्य का पुनर्वास तो नहीं कर सकता। क्या इस मौके पर औपचारिक वक्तव्य देने के लिए आपकी असमंज और दुविधा का हिस्सा यह भी तो रहा होगा। राज्यसत्ता से नाखुश संस्कृतिकर्मी इससे संरक्षण की अपेक्षा जैसे ही पालता है, वैसे ही संस्कृति की स्वायत्तता का खंडन करता है। गाली भी दें और कहें शाल भी ओढ़ाओ। यह कैसे हो सकता है। इस शासन का यह व्यवहार अचरज का विषय नहीं। आखिर प्रतिरोधी चेतना शासन से सम्मानित भी तो नहीं होगी। चोर से सम्मानित होना कहीं न कहीं चोरी को मंजूरी देने के बराबर ही है। मैं कवि नहीं हूं। इधर कथादेश के जून (2011) अंक में मेरी कुछ कविताएं है (उमा नाम से) उसमें से एक कविता ‘यह वक्त’ का एक अंश –

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यह वक्त

जनतंत्र को शौचालय बनानेवालों को
माला से लादने का नहीं है

जनतंत्र के इस सार्वजनिक मूत्रालय में
कोई अपने शब्द पकड़कर
कोई अपने फरमान लेकर
कोई अपनी वर्दी लेकर
तो कोई अपनी लाल बत्ती लेकर
चला आता है मूतने.

नंगे-भूखे मरनेवालों की भाषा वह नहीं
महंगाई-बेकारी से बलात्कृत सपनों
के गर्भपात की वह भाषा नहीं

जिस भाषा में लिखकर कोई
झटक ले जाता है अकादमी
और कोई शिखर सम्मान
उसकी कलम को कौन तोड़ेगा?
जो गूंगों की स्याही सोख रहा है
जो फैला रहा है स्याही उनकी रातों में
जो उनकी जबान से छेड़खानी करता है.
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क्षमा करेंगे। यह किसी को केंद्रित करके लिखी नहीं गई। इसके केंद्र में प्रवृत्ति और कई सवाल हैं।
न हो तो मेरे ब्लाग www.aatmahanta.blogspot.com पर इसे पूर्णता में देख लें।

सुनील गज्जाणी said...

प्रणाम !
एक लम्बे अंतराल के बाद आप का कोई आलेख पढ़ा , आप ही के ब्लॉग पे , अच्छा लगा . आत्म कथन .. लेखक होता तो हर समाज का हिसा ही है मगर उसकी सूक्षम दृष्टी उसे अपने लेखन के कारन अलग स्थान प्रदान कर देती है . जो वो अपने समाज , प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सामाजो ही नहीं वरन देश ही नहीं पूरे विश्व को बड़ी सूक्षमता से अपनी कलाम में पिरो सब के बीच रखता है . बेहद सुंदर आत्म परक चिंतन ,साधुवाद
सादर

jhun2wala said...

दृष्टान्तों में जब बाते होती हैं तो दर्शन का पुनर्जन्म होता है;
आप यदि कहते जैसे चीनियों विसेषकर माओवाद ने जब तिब्बतियों को भारत में धकेला और लाल झंडा ल्हासा में फहराया तो वो भी एक दृष्टान्त होता बात भी शायद वही होती लेकिन दर्शन बदल जाता
"पूंजी और तकनीक की ताकतों के साथ जुड़ी लोभ की सत्ता ने किस व्यापक पैमाने पर हिंसा और संवेदनहीनता के साथ निरस्त्र मूलनिवासियों को उनकी जड़ों से उखाड़ना शुरू किया है। यह एक तरह का सभ्यता का उन्माद है।"

vikram7 said...

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

vikram7: कैसा,यह गणतंत्र हमारा.........